शिक्षा की बढ़ती मांग के बीच लाखों बच्चे वंचित
अफगानिस्तान का शिक्षा संकट उन बच्चों से लेकर, जो प्राथमिक स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, उन महिलाओं तक फैला है जिन्हें विश्वविद्यालयों से बाहर रखा गया है। 24 जनवरी 2026 को यूनेस्को और यूनिसेफ ने कहा कि 22 लाख किशोरियों पर माध्यमिक शिक्षा हासिल करने की पाबंदी है और प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की उम्र तक पहुंचने वाले 93 प्रतिशत बच्चे अब भी बुनियादी पठन-कौशल हासिल करने की दिशा में प्रयासरत हैं।
विषय-सूची
- शिक्षा की बढ़ती मांग के बीच लाखों बच्चे वंचित
- लड़कियों के लिए छठी कक्षा के बाद रास्ता बंद
- पाबंदियां कैसे बढ़ीं
- स्कूलों की क्षमता से ज्यादा बच्चों को चाहिए जगह
- स्कूल में होना ही पूरी समस्या नहीं
- मौजूदा पाबंदियों से पहले से चला आ रहा संकट
- समुदाय की कक्षाओं में घर के पास पढ़ाई
- पाबंदियों से महिला पेशेवरों की उपलब्धता पर खतरा
- पाबंदियों के बचाव की आलोचना
- मुख्य बिंदु
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर काबुल में जारी एजेंसियों के संयुक्त शिक्षा वक्तव्य में अफगानिस्तान को एकमात्र ऐसा देश बताया गया जहां लड़कियों और महिलाओं के लिए माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर पूरी तरह पाबंदी है। उनकी अपील में दो तात्कालिक मांगें शामिल थीं: कक्षाओं तक पहुंच बहाल करना और बच्चों को वहां मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना।
बताया गया है कि इस संकट के कारण 70 लाख विद्यार्थी स्कूल से बाहर हैं, हालांकि इस कुल संख्या के समर्थन में किसी तारीख के साथ राष्ट्रीय गणना नहीं दी गई। यूनेस्को और यूनिसेफ की अफगानिस्तान शिक्षा स्थिति 2026 रिपोर्ट अधिक विस्तृत तस्वीर पेश करती है: प्राथमिक स्कूल की उम्र के लगभग 53 प्रतिशत बच्चे औपचारिक सामान्य शिक्षा से बाहर हैं, जबकि आबादी में बढ़ोतरी और परिवारों की वापसी से स्कूलों में जगह की मांग बढ़ रही है।
अफगान परिवारों को एक साथ कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। तालिबान की पाबंदियों के चलते लड़कियों के लिए छठी कक्षा के बाद पढ़ाई का रास्ता बंद है। स्कूलों में जगह, योग्य शिक्षकों और निवेश की भी कमी है। दाखिला पाने वाले बच्चे भी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जरूरी पठन-कौशल के बिना रह सकते हैं।
लड़कियों के लिए छठी कक्षा के बाद रास्ता बंद
जनवरी के वक्तव्य में माध्यमिक स्कूल जाने पर पाबंदी वाली किशोरियों की संख्या 22 लाख बताई गई है; अफगानिस्तान शिक्षा स्थिति 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2021 से 26 लाख से अधिक लड़कियां छठी कक्षा के बाद पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं।
प्राथमिक स्कूल पूरा करने वाली लड़की के लिए इस पाबंदी का अर्थ है कि शिक्षा का सामान्य अगला पड़ाव बंद है। विश्वविद्यालयों से बाहर रखा जाना इस बाधा को वयस्क जीवन तक बढ़ा देता है और कई पेशों के लिए जरूरी औपचारिक प्रशिक्षण का रास्ता रोकता है।
यूनेस्को अफगानिस्तान की प्रभारी अधिकारी सूह्युन किम ने लड़कियों को शिक्षा से वंचित करने की राष्ट्रीय कीमत बताते हुए कहा:
जब लड़कियों को शिक्षा से वंचित किया जाता है, तो इसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ती है।
किम ने बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने और महिला शिक्षकों को सहयोग देने का भी आह्वान किया। बुनियादी शिक्षा से आशय पढ़ने और गणित के उन शुरुआती कौशलों से है जिनकी बच्चों को अधिक चुनौतीपूर्ण विषयों को समझने से पहले जरूरत होती है। विद्यार्थियों को शिक्षा के रास्ते पर आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए अफगानिस्तान में शिक्षा तक व्यापक पहुंच और बेहतर शिक्षण, दोनों जरूरी हैं।
पाबंदियां कैसे बढ़ीं
तालिबान 15 अगस्त 2021 को सत्ता में लौटा। अगले महीने लागू पाबंदियों के तहत लड़कियों को छठी कक्षा के बाद औपचारिक शिक्षा से बाहर कर दिया गया। बाद के फैसलों ने विश्वविद्यालयों और चिकित्सा प्रशिक्षण तक उनकी पहुंच भी रोक दी।
मुख्य घटनाक्रम कई वर्षों में सामने आए:
- सितंबर 2021: लड़कियों को छठी कक्षा के बाद औपचारिक शिक्षा से रोक दिया गया।
- मार्च 2022: लड़कियों के लिए माध्यमिक स्कूल फिर खोलने की योजनाएं वापस ले ली गईं।
- दिसंबर 2022: महिलाओं को विश्वविद्यालयों से बाहर कर दिया गया।
- दिसंबर 2024: नर्सिंग और दाई प्रशिक्षण कार्यक्रमों समेत चिकित्सा प्रशिक्षण संस्थानों में महिलाओं पर पाबंदी लगा दी गई।
- 24 जनवरी 2026: यूनेस्को और यूनिसेफ ने शिक्षा तक पूरी, सुरक्षित और समावेशी पहुंच की मांग दोहराई।
इन फैसलों ने एक ही शैक्षिक यात्रा के लगातार पड़ावों को प्रभावित किया है। विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए लड़की को माध्यमिक शिक्षा पूरी करनी होती है, जबकि नर्सिंग या चिकित्सा जैसे काम के लिए पेशेवर प्रशिक्षण जरूरी है। कई पड़ाव बंद होने से नुकसान केवल स्कूल के एक साल तक सीमित नहीं रहता।
जनवरी की अपील में लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा या महिलाओं की विश्वविद्यालयों तक पहुंच बहाल करने की कोई तारीख नहीं दी गई।
स्कूलों की क्षमता से ज्यादा बच्चों को चाहिए जगह
शिक्षा स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सात से 18 वर्ष की आबादी 2019 के लगभग 1.04 करोड़ से बढ़कर 2024 में 1.15 करोड़ हो गई। पांच साल में यह करीब 11 लाख, यानी लगभग 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।
बच्चों की संख्या के साथ कदम मिलाने के लिए स्कूलों को और जगह बनानी होगी। बार-बार आने वाली आपात स्थितियां, अपर्याप्त निवेश और पाकिस्तान तथा ईरान से अफगान प्रवासियों की वापसी से इमारतों, शिक्षकों और शिक्षा सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में 10 लाख से अधिक लौटने वालों का भी उल्लेख है, जिनमें 2,45,000 से ज्यादा बच्चे शामिल हैं। लौटने वाले बच्चे उन समुदायों में शिक्षा की मांग बढ़ाते हैं जहां उनके परिवार बसते हैं, जिससे कक्षाओं, शिक्षण सामग्री और शिक्षकों की जरूरत बढ़ जाती है।
रिपोर्ट में वर्णित अवधि के दौरान सरकारी प्राथमिक स्कूलों में करीब 66 लाख बच्चों का दाखिला हुआ, जो 2022 से लगभग 5,60,000 अधिक है। यह लगभग 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी है, जो करीब 60.4 लाख के अनुमानित शुरुआती आंकड़े पर आधारित है। हालांकि, एजेंसियों ने कहा कि दाखिले में वृद्धि स्कूल जाने की उम्र की बढ़ती आबादी के साथ कदम नहीं मिला पा रही है।
दबाव के बावजूद परिवार शिक्षा पाने की कोशिश जारी रखे हुए हैं। दाखिले में बढ़ोतरी दिखाती है कि स्कूल अधिक विद्यार्थियों को जगह दे रहे हैं, जबकि औपचारिक प्राथमिक शिक्षा से बाहर बच्चों का बड़ा हिस्सा बताता है कि कितनी मांग अब भी अधूरी है। लड़कों की भागीदारी भी घट रही है, इसलिए लड़कियों पर लगाई गई खास पाबंदियों के साथ-साथ यह शिक्षा तक पहुंच का व्यापक संकट भी है।
स्कूल में होना ही पूरी समस्या नहीं
यूनेस्को और यूनिसेफ के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षा के अंत तक पहुंचने वाले 93 प्रतिशत बच्चे अब भी बुनियादी पठन-कौशल हासिल करने की दिशा में प्रयासरत हैं। यह इस स्तर तक पहुंचे बच्चों के बीच सीखने की गंभीर समस्या को दिखाता है। पढ़ना वह कौशल है जिसकी मदद से विद्यार्थी अलग-अलग विषयों में निर्देश, पाठ्यपुस्तकें और लिखित अभ्यास समझते हैं।
शिक्षा स्थिति रिपोर्ट में देशव्यापी आकलन का भी जिक्र है, जिसमें चौथी कक्षा के आधे से कम विद्यार्थी भाषा में न्यूनतम दक्षता हासिल कर सके। भाषा कौशल में कठिनाई झेलने वाले बच्चों को आगे के पाठ समझने में परेशानी होती है, भले ही उन्हें कक्षा में जगह मिल जाए।
2025 में किए गए शुरुआती शोध में पाया गया कि उन स्कूलों में विद्यार्थियों का प्रदर्शन बेहतर था जहां अधिक शिक्षकों ने विश्वविद्यालयी शिक्षा हासिल की थी, खासकर भाषा सीखने में। नतीजों से यह भी पता चला कि महिला शिक्षकों का विषय ज्ञान अधिक मजबूत था और उन्हें विद्यार्थियों के बेहतर सीखने के परिणामों से जोड़ा गया।
एजेंसियों की पहल में स्कूलों का पुनर्वास, शिक्षक विकास और पढ़ने तथा गणित में शुरुआती शिक्षा को मजबूत करना शामिल है। ये प्राथमिकताएं कक्षा की स्थिति को पढ़ाई की गुणवत्ता से जोड़ती हैं: बच्चों को सीखने की जगह, पढ़ाने के लिए तैयार शिक्षक और इस्तेमाल करने लायक सामग्री चाहिए।
मौजूदा पाबंदियों से पहले से चला आ रहा संकट
तालिबान के सत्ता में लौटने से पहले ही अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल से बाहर थे। यूनिसेफ के जनवरी 2020 के शिक्षा कार्यक्रम संक्षेप में 2018 की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया गया था कि 37 लाख बच्चे, यानी स्कूल जाने की उम्र की आबादी के 42 प्रतिशत बच्चे, स्कूल से बाहर थे। इनमें लड़कियों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी।
37 लाख के कुल आंकड़े के आधार पर यह संख्या करीब 22.2 लाख लड़कियों की थी। संक्षेप में महिला शिक्षकों की कमी, स्कूलों में अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं, कम उम्र में शादी और पारंपरिक मान्यताओं को लड़कियों की शिक्षा की राह में बाधा बताया गया था। इसमें आपूर्ति बांटने, शिक्षकों को वेतन देने और संघर्ष तथा प्राकृतिक आपदाओं के बीच कामकाज जारी रखने की कठिनाइयों का भी उल्लेख था।
इसी दस्तावेज में शिक्षा तक पहुंच में हुई बड़ी प्रगति का भी जिक्र था: प्राथमिक स्कूल में दाखिला 2002 में 10 लाख से बढ़कर 2015 में 85 लाख हो गया था। हालांकि, 2015 के एक आंकड़े के मुताबिक, दाखिला लेने वाले बच्चों में से सिर्फ 54 प्रतिशत ने प्राथमिक शिक्षा पूरी की।
2015 से 2021 तक के यूनिसेफ कार्यक्रम का लक्ष्य स्कूल से बाहर बच्चों की संख्या को 2017 के 37 लाख के शुरुआती आंकड़े से घटाकर 2021 तक 32 लाख करना था। यानी 5 लाख बच्चों की कमी का लक्ष्य रखा गया था। कार्यक्रम में उपस्थिति और पढ़ाई जारी रखने की दर बढ़ाने का लक्ष्य भी था। ये लक्ष्य दिखाते हैं कि बाद की पाबंदियों से लड़कियों की आगे की शिक्षा तक पहुंच बंद होने से पहले ही कितना काम बाकी था।
समुदाय की कक्षाओं में घर के पास पढ़ाई
औपचारिक स्कूलों से दूर रहने वाले बच्चों तक पहुंचने का एक व्यावहारिक तरीका सामुदायिक शिक्षा रही है। यूनिसेफ के 2020 के संक्षेप में घर से पैदल दूरी पर लगने वाली ऐसी कक्षाओं का वर्णन था, जहां स्थानीय परिवारों के भरोसेमंद शिक्षक पढ़ाते थे। समुदाय जगह, विद्यार्थियों और शिक्षकों का इंतजाम करते थे, जबकि यूनिसेफ शिक्षण सामग्री और सहायता देता था।
इस मॉडल में पहली से तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई और त्वरित शिक्षा केंद्र शामिल थे, जहां प्राथमिक शिक्षा के छह साल का पाठ्यक्रम तीन साल में पूरा कराया जाता था। त्वरित शिक्षा उन बच्चों को पढ़ाई में आगे बढ़ने का मौका देती है जो स्कूल नहीं जा सके, ताकि उन्हें बहुत छोटे बच्चों के साथ पहली कक्षा से शुरू न करना पड़े।
शिक्षा स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 5,300 सामुदायिक कक्षाओं में लगभग 1,62,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इनमें लड़कियों की हिस्सेदारी 64 प्रतिशत, यानी करीब 1,04,000 विद्यार्थियों की है। एजेंसियों ने कहा कि सामुदायिक कक्षाएं, साक्षरता कार्यक्रम, दूरस्थ शिक्षा और निजी ट्यूशन किशोरियों की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने आमने-सामने की औपचारिक शिक्षा बहाल करने की मांग की।
2020 के संक्षेप में एक कहानी बताती है कि मौजूदा पाबंदियों से पहले यह तरीका कैसे काम करता था। उस समय कंधार की 17 वर्षीय छात्रा बसीरिया सुबह दसवीं कक्षा में पढ़ती थी और दोपहर में त्वरित शिक्षा केंद्र में लड़कियों को पढ़ाती थी। उसकी कुछ छात्राएं असुरक्षा, गरीबी या सीमित पहुंच के कारण स्कूल नहीं जा पाई थीं।
बसीरिया ने बताया कि उसने अपने समुदाय की लड़कियों से पूछा कि वे स्कूल क्यों नहीं जातीं:
कुछ ने कहा कि उनके माता-पिता उन्हें स्कूल नहीं जाने देते, जबकि कुछ को लगता था कि दाखिला लेने के लिए उनकी उम्र ज्यादा हो गई है।
उसका अनुभव घर के पास कक्षा और भरोसेमंद शिक्षक की अहमियत दिखाता है। यह भी बताता है कि लड़कियों की पढ़ाई जारी रखने और छात्राओं के अगले समूह को पढ़ाने के लिए महिलाओं की उपलब्धता के बीच सीधा संबंध है।
पाबंदियों से महिला पेशेवरों की उपलब्धता पर खतरा
अफगानिस्तान में यूनिसेफ के प्रतिनिधि डॉ. ताजुद्दीन ओयवाले ने शिक्षा को जरूरी सेवाओं की भविष्य की उपलब्धता से सीधे जोड़ा। जनवरी के वक्तव्य में उन्होंने ऐसे कई पेशों का उल्लेख किया जिनमें महिलाओं की तत्काल जरूरत है:
अफगानिस्तान को महिला शिक्षकों, नर्सों, सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों की तत्काल जरूरत है।
ओयवाले ने चेतावनी दी कि लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी से भविष्य में महिलाओं और लड़कियों को मिलने वाली देखभाल प्रभावित होगी, क्योंकि इस व्यवस्था में महिलाओं का इलाज केवल महिलाएं ही कर सकती हैं। चिकित्सा प्रशिक्षण के रास्ते बंद होने से नर्स और दाई बनने की इच्छुक छात्राओं के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र की अन्य योग्यताएं हासिल करने वाली छात्राएं भी प्रभावित होती हैं।
शिक्षकों की कमी का भी यही पैटर्न है। योग्य शिक्षक बनने के लिए लड़कियों को माध्यमिक स्कूल और आगे की पढ़ाई तक पहुंच चाहिए। यूनिसेफ के पहले के कार्यक्रम में लड़कियों के लिए शिक्षक शिक्षा तक पहुंच पहल शामिल थी, जिसके तहत महिला शिक्षक उम्मीदवारों को दो साल की छात्रवृत्ति दी जाती थी। शिक्षकों की योग्यता पर 2025 के शोध से इस शैक्षिक रास्ते की जरूरत और स्पष्ट होती है।
विश्वविद्यालयों में दाखिला भी 2021 से पहले के स्तर के मुकाबले बहुत कम है। शिक्षा स्थिति रिपोर्ट में वर्णित अवधि के दौरान विद्यार्थियों की संख्या करीब 2,08,000 बताई गई है, जबकि 2024 में यह 1,89,000 और 2020 में लगभग 4,30,000 थी। 2024 से संख्या बढ़ी है, लेकिन अब भी 2020 के स्तर से करीब 52 प्रतिशत कम है।
पाबंदियों के बचाव की आलोचना
इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं और महिला शिक्षकों की कमी से जुड़ा अस्थायी विराम बताते हुए इन पाबंदियों का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि लड़कियां छठी कक्षा तक पढ़ सकती हैं और दावा किया कि महिलाएं उच्च धार्मिक शिक्षा हासिल करना जारी रख सकती हैं।
तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत करने की बात कह चुके नाइक ने तर्क दिया कि उपयुक्त शिक्षक उपलब्ध होने तक शिक्षा रोकना स्वीकार्य है:
इसलिए अगर कोई सही शिक्षक मिलने तक शिक्षा में देरी करता है, तो इसमें कोई समस्या नहीं है।
ब्रिटेन में रहने वाले पाकिस्तानी शिक्षा कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई के पिता जियाउद्दीन यूसुफजई ने इस तर्क को खारिज किया। उन्होंने इसे:
बेहद चिंताजनक और निराशाजनक
बताया। यूसुफजई ने अनिश्चितकालीन पाबंदी को देरी कहने पर सवाल उठाया और पूछा कि महिला शिक्षकों की कमी कैसे दूर की जाएगी। यूनेस्को और यूनिसेफ की जनवरी की अपील में पहुंच बहाल करने के साथ योग्य शिक्षकों, शिक्षण सामग्री और स्कूलों में निवेश पर जोर दिया गया है। शिक्षा पर पाबंदियों का असर उन्हीं छात्राओं पर पड़ता है जो आगे चलकर इन कमियों को दूर करने के लिए प्रशिक्षण हासिल कर सकती थीं।
मुख्य बिंदु
- यूनेस्को और यूनिसेफ ने 24 जनवरी 2026 को कहा कि 22 लाख किशोरियों पर माध्यमिक स्कूल जाने की पाबंदी है।
- शिक्षा स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक स्कूल की उम्र के लगभग 53 प्रतिशत बच्चे औपचारिक सामान्य शिक्षा से बाहर हैं।
- सात से 18 वर्ष की आबादी 2019 के लगभग 1.04 करोड़ से बढ़कर 2024 में 1.15 करोड़ हो गई।
- प्राथमिक शिक्षा के अंत तक पहुंचने वाले करीब 93 प्रतिशत बच्चे अब भी बुनियादी पठन-कौशल हासिल करने की दिशा में प्रयासरत हैं।
- लगभग 5,300 सामुदायिक कक्षाओं में 1,62,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं, जिनमें लड़कियों की हिस्सेदारी 64 प्रतिशत है।
- संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां शिक्षा तक पहुंच बहाल करने, शिक्षण को मजबूत करने और स्कूलों में निवेश की मांग कर रही हैं। लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा या महिलाओं के विश्वविद्यालयों के दोबारा खुलने की कोई तारीख नहीं दी गई है।






