सुरक्षित प्रसव बढ़ने के बावजूद नेपाल के मातृत्व अस्पतालों में विशेषज्ञों और गंभीर देखभाल की कमी

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Nepal's Maternity Hospitals Face Specialist and Critical Care Gaps Despite Safer Births

प्रसव के 18 घंटे बाद अचानक बिगड़ी हालत, मौत

काठमांडू के परोपकार प्रसूति तथा स्त्री रोग अस्पताल में 30 वर्ष की शुरुआती उम्र की एक महिला की गिरने के कुछ ही मिनटों के भीतर मौत हो गई। इस घटना ने नेपाल के राष्ट्रीय प्रसूति रेफरल केंद्र में आपातकालीन देखभाल की कमियों को उजागर किया। अस्पताल के निदेशक के अनुसार, वहां माताओं के लिए गहन चिकित्सा की 10 बिस्तरों वाली इकाई है, लेकिन हृदय रोग विशेषज्ञ, गुर्दा रोग विशेषज्ञ या गंभीर देखभाल विशेषज्ञ नहीं हैं।

विषय-सूची
  1. प्रसव के 18 घंटे बाद अचानक बिगड़ी हालत, मौत
  2. थक्के से जुड़ी दो आपात स्थितियां, नतीजे अलग
  3. मातृत्व आईसीयू में क्या सुविधाएं हैं
  4. रेफरल का मतलब एक और जोखिमभरी यात्रा हो सकता है
  5. मौत के कुछ कारणों का पता लगाना अब भी मुश्किल क्यों
  6. नेपाल में मातृ मृत्यु का पता लगाने की शुरुआत
  7. स्वास्थ्य केंद्रों में अधिक प्रसव, मातृ मौतों में कमी
  8. प्रगति के पड़ाव और अगला लक्ष्य
  9. उपकरणों से आगे का निवेश
  10. मुख्य बातें

महिला के परिजन उसे धादिंग से लाए थे। उन्हें उम्मीद थी कि थापाथली स्थित विशेषज्ञ अस्पताल में सुरक्षित प्रसव की देखभाल मिलेगी। बच्चे को जन्म देने के 18 घंटे बाद उसे ऑपरेशन के बाद वाले वार्ड से सामान्य वार्ड तक व्हीलचेयर में ले जाया गया। बिस्तर पर जाने के लिए खड़े होते ही वह गिर पड़ी।

अस्पताल के निदेशक डॉ. श्री प्रसाद अधिकारी ने बताया कि उसकी हालत कितनी तेजी से बदली:

लेकिन जब वह व्हीलचेयर से उठकर बिस्तर पर लेटने लगी, तो गिर पड़ी और डॉक्टरों के उसकी हालत का आकलन करने से पहले ही कुछ मिनटों में उसकी मौत हो गई।

अस्पताल के डॉक्टरों ने मौत का कारण पल्मोनरी एम्बोलिज्म बताया, जिसमें खून का थक्का फेफड़ों की एक रक्तवाहिका को अवरुद्ध कर देता है। उसके परिजनों ने लापरवाही का आरोप लगाते हुए अस्पताल में विरोध प्रदर्शन किया। इस आरोप की जांच के निष्कर्ष नहीं बताए गए।

यह मौत नेपाल में प्रसव को सुरक्षित बनाने के प्रयासों के एक कठिन दौर को सामने लाती है। अब अधिक महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच रही हैं और मातृ मृत्यु दर में तेज गिरावट आई है। फिर भी, मरीज की हालत अचानक गंभीर होने पर अस्पतालों को जरूरी विशेषज्ञों, नर्सिंग देखभाल और आपातकालीन उपचार उपलब्ध कराने में मुश्किल होती है।

थक्के से जुड़ी दो आपात स्थितियां, नतीजे अलग

परोपकार में एक अन्य महिला को प्रसव के बाद डीप वेन थ्रोम्बोसिस हुआ। उसे बीर अस्पताल की गंभीर देखभाल इकाई में भेजे जाने के बाद उसकी जान बच गई। अधिकारी ने बताया कि यह आपात स्थिति उस घातक घटना के कुछ सप्ताह बाद, रविवार शाम को हुई थी।

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डीप वेन थ्रोम्बोसिस में किसी गहरी शिरा में, अक्सर पैर में, खून का थक्का बन जाता है। पल्मोनरी एम्बोलिज्म तब होता है जब थक्का फेफड़ों में रक्त प्रवाह को रोक देता है। कभी-कभी यह थक्का शरीर के किसी दूसरे हिस्से से वहां पहुंचता है। गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि में खून के थक्के बनने का जोखिम बढ़ जाता है।

अधिकारी ने कहा कि उनकी टीम ने जीवित बची मरीज को तुरंत बीर अस्पताल भेज दिया। ये दोनों आपात स्थितियां प्रसूति अस्पतालों के सामने अलग-अलग तरह की जरूरतों को दिखाती हैं: बच्चे को सुरक्षित जन्म दिलाना एक काम है, जबकि मां के फेफड़ों, हृदय या अन्य अंगों पर अचानक आए खतरे का उपचार करने के लिए दूसरी टीम और गहन देखभाल का अलग स्तर चाहिए हो सकता है।

इसलिए परिवारों के लिए प्रसव के बाद का समय खतरनाक बना रह सकता है, भले ही प्रसव ठीक हुआ दिखाई दे। धादिंग की महिला की हालत अस्पताल में रहते हुए, प्रसव के महज 18 घंटे बाद बिगड़ी।

मातृत्व आईसीयू में क्या सुविधाएं हैं

परोपकार की मातृ गहन देखभाल इकाई को श्रेणी बी में रखा गया है। डॉक्टर इसे उन मरीजों के लिए मध्यम स्तर की देखभाल बताते हैं, जिन्हें करीबी निगरानी की जरूरत होती है। उनका कहना है कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को श्रेणी ए इकाइयों की जरूरत होती है, जहां गंभीर देखभाल विशेषज्ञ उनकी निगरानी और उपचार कर सकें।

अस्पताल में कर्मचारियों की कमी उसकी आईसीयू श्रेणी तक सीमित नहीं है। अधिकारी ने बताया कि वहां हृदय रोगों के उपचार के लिए हृदय रोग विशेषज्ञ, गुर्दे की समस्याओं के लिए नेफ्रोलॉजिस्ट और सबसे गंभीर रूप से बीमार मरीजों के उपचार का समन्वय करने के लिए गंभीर देखभाल विशेषज्ञ नहीं हैं।

अधिकारी ने नर्सों पर काम के बोझ और बाहर से विशेषज्ञ बुलाने की जरूरत के बारे में बताया:

गहन चिकित्सा इकाई में एक समय पर भर्ती 10 मरीजों की देखभाल दो नर्सों को करनी पड़ती है। जटिलताएं आने पर हमें दूसरे अस्पतालों से विशेषज्ञ बुलाने पड़ते हैं, और उपचार मिलने में देरी मरीजों की जान जोखिम में डाल सकती है।

इस स्तर पर, सभी 10 बिस्तर भरे होने पर हर नर्स की जिम्मेदारी पांच मरीजों की होती है। अस्पताल हर महीने करीब एक दर्जन गंभीर रूप से बीमार माताओं और लगभग तीन दर्जन शिशुओं को विशेषज्ञ गंभीर देखभाल के लिए दूसरे अस्पतालों में भेजता है। इसलिए परोपकार में बिस्तर मिलना मरीज के आपातकालीन उपचार का महज पहला चरण हो सकता है।

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रेफरल का मतलब एक और जोखिमभरी यात्रा हो सकता है

परोपकार के डॉक्टरों का कहना है कि दूसरे सरकारी अस्पतालों में गहन देखभाल का बिस्तर मिलना अक्सर मुश्किल होता है। बिस्तर मिलने के बाद भी मरीज को वहां तक की यात्रा सुरक्षित पूरी करनी होती है। डॉक्टरों के अनुसार, नेपाल की अधिकांश एम्बुलेंस में यात्रा के दौरान उन्नत जीवनरक्षक सहायता देने के लिए जरूरी उपकरण नहीं हैं।

उन्नत जीवनरक्षक सहायता का मतलब गंभीर रूप से बीमार मरीज के जरूरी शारीरिक कार्यों, जैसे सांस लेने और रक्त संचार, को बनाए रखने में मदद देना है। स्थानांतरण के दौरान हालत बिगड़ने वाले मरीज को प्राप्तकर्ता अस्पताल पहुंचने के बाद नहीं, बल्कि तुरंत उपचार की जरूरत हो सकती है।

सुर्खेत स्थित कर्णाली प्रांतीय अस्पताल पर भी ऐसे ही दबाव हैं। प्रसव के बाद हालत बिगड़ने पर काठमांडू ले जाते समय 20 वर्ष की शुरुआती उम्र की एक महिला की हेलीकॉप्टर में मौत हो गई। डॉक्टरों ने उसे आगे के उपचार के लिए रेफर किया था।

सुर्खेत अस्पताल में हर हफ्ते जटिल प्रसव के दो से तीन मामले आते हैं। हाल की आपात स्थितियों के विवरण में जिस मंगलवार का जिक्र है, उस दिन डोल्पा से प्रसव पीड़ा में एक महिला को भी हवाई मार्ग से वहां लाया गया था। ये यात्राएं दिखाती हैं कि देखभाल कई चरणों में हो सकती है: दूरदराज के जिले से प्रांतीय अस्पताल तक और, कुछ मरीजों के लिए, वहां से आगे काठमांडू तक।

अस्थिर हालत वाली मां के लिए हर चरण में एक प्राप्तकर्ता टीम, उपयुक्त बिस्तर और उसकी हालत को संभालने में सक्षम परिवहन जरूरी है। रेफरल व्यवस्था के लिए इन तीनों का तालमेल जरूरी है।

मौत के कुछ कारणों का पता लगाना अब भी मुश्किल क्यों

सुर्खेत अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के प्रमुख डॉ. अमित सिंह ने कहा कि कभी-कभी उनकी टीम मां या नवजात की मौत का सटीक कारण निर्धारित नहीं कर पाती। उन्होंने डॉक्टरों के सामने मौजूद सीमाओं का जिक्र किया:

कई मामलों में हम मौत का वास्तविक कारण पता नहीं लगा पाते। हम केवल यह अनुमान लगा सकते हैं कि इसकी वजह कोई एक या दूसरी जटिलता रही होगी।

नेपाल में मातृ स्वास्थ्य पर चर्चा में उद्धृत अध्ययनों के अनुसार, प्रसव के बाद गंभीर रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप संबंधी विकार, रेफरल में देरी और कुप्रबंधन मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में हैं। अन्य कारणों में संक्रमण, गर्भपात से जुड़ी जटिलताएं, पहले से मौजूद हृदय रोग और एम्नियोटिक फ्लूइड एम्बोलिज्म शामिल हैं। यह एक दुर्लभ आपात स्थिति है, जिसमें एम्नियोटिक द्रव मां के रक्तप्रवाह में पहुंचने से गंभीर प्रतिक्रिया होती है।

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प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था से जुड़ा एक विकार है, जिसमें उच्च रक्तचाप होता है और अंगों पर असर के संकेत मिलते हैं। एक्लेम्पसिया में दौरे पड़ते हैं। गंभीर रक्तस्राव, जिसे प्रसवोत्तर रक्तस्राव भी कहते हैं, तेजी से जानलेवा हो सकता है। इन स्थितियों में अलग-अलग उपचार की जरूरत होती है। इससे समझ आता है कि जटिल आपात स्थिति में केवल प्रसूति विशेषज्ञता पर्याप्त क्यों नहीं हो सकती।

सिंह ने कहा कि गंभीर देखभाल की सुविधा से बड़ा फर्क पड़ सकता है। उनकी चिंता का संबंध मरीजों की जान तत्काल बचाने और मौतों के कारणों को सही ढंग से समझने, दोनों से है, ताकि अस्पताल यह तय कर सकें कि उपचार या रेफरल व्यवस्था में कहां बदलाव की जरूरत है।

नेपाल में मातृ मृत्यु का पता लगाने की शुरुआत

नेपाल ने 2021 की जनगणना के जरिए राष्ट्रीय जनगणना से जुड़ा अपना पहला मातृ मृत्यु अध्ययन शुरू किया। स्थानीय तौर पर इसे 2078 की जनगणना कहा जाता है। स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय ने मृत्यु की पहचान और उनके कारणों की जांच के लिए केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के साथ काम किया।

अध्ययन की योजना के तहत जनगणना कर्मियों को घरों से पूछना था कि क्या पिछले 12 महीनों में 15 से 49 वर्ष की किसी महिला की मृत्यु हुई है। इसके बाद स्वास्थ्यकर्मी परिस्थितियों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाते, जिसमें यह भी शामिल होता कि मृत्यु गर्भावस्था, प्रसव के दौरान या प्रसव के छह सप्ताह के भीतर हुई थी।

योजना में 847 सर्वेक्षक और वर्बल ऑटोप्सी प्रश्नावली के जरिए आगे के साक्षात्कार शामिल थे। वर्बल ऑटोप्सी में मृत्यु का संभावित कारण समझने के लिए परिजनों या देखभालकर्ताओं से मृत्यु से पहले के लक्षणों और घटनाओं की जानकारी जुटाई जाती है।

मंत्रालय में उस समय संयुक्त सचिव रहे इंद्रमणि पोखरेल ने कहा कि इस काम का उद्देश्य मातृ मृत्यु और उनके कारणों की पहचान करना था, ताकि सुरक्षित मातृत्व सेवाएं बेहतर, अधिक सुलभ और हासिल करने में आसान बनें। अध्ययन की घोषणा में यह अनुमान भी दिया गया कि प्रजनन आयु की महिलाओं की कुल मौतों में 12 प्रतिशत मातृ मृत्यु थीं।

स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से 2022 में प्रकाशित नेपाल मातृ मृत्यु अध्ययन 2021 में सभी सात प्रांतों को शामिल किया गया। नेपाल स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद और स्वास्थ्य विकास साझेदारों के साथ किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि करीब चार में से तीन मातृ मौतें स्वास्थ्य केंद्रों में या परिवहन के दौरान हुईं। अध्ययन ने कमजोर रेफरल व्यवस्था, स्वास्थ्य केंद्रों की सीमित क्षमता और समय पर गुणवत्तापूर्ण देखभाल मिलने में देरी को प्रमुख समस्याओं के रूप में चिन्हित किया।

अध्ययन में पिछले 12 महीनों के दौरान हुई गर्भावस्था संबंधी मौतों के लिए 2021 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया और फिर प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों ने वर्बल ऑटोप्सी की। गर्भावस्था संबंधी 653 मौतों में से 622 को मातृ मृत्यु के रूप में वर्गीकृत किया गया। इन मौतों और जनगणना में दर्ज 412,935 जीवित जन्मों के आधार पर मातृ मृत्यु अनुपात प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 151 आंका गया। यह अनुपात बागमती में 98 से लेकर लुम्बिनी में 207 तक था, जबकि कर्णाली में 172 था। विस्तृत विश्लेषण में 611 मातृ मौतें शामिल थीं, क्योंकि 11 मामलों की जानकारी अधूरी थी। कारणों का निर्धारण चिकित्सकीय रिपोर्ट के बजाय वर्बल ऑटोप्सी की जानकारी के आधार पर किया गया, इसलिए निष्कर्ष स्मृति और रिपोर्टिंग से जुड़े अन्य पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकते हैं।

विश्लेषण की गई मौतों में 57 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्रों में, 26 प्रतिशत घर पर और लगभग 17 प्रतिशत केंद्रों तक जाते हुए या केंद्रों के बीच यात्रा के दौरान हुईं। 61 प्रतिशत मौतें प्रसव के बाद हुईं। गैर-प्रसूति जटिलताओं से 32 प्रतिशत, प्रसूति रक्तस्राव से 26 प्रतिशत और उच्च रक्तचाप संबंधी विकारों से 12 प्रतिशत मातृ मौतें हुईं। प्रसव के दौरान या उसके बाद मरने वाली महिलाओं में से 76 प्रतिशत ने स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन सिर्फ 53 प्रतिशत ने गर्भावस्था के दौरान सभी चार अनुशंसित जांचें कराई थीं।

74 प्रतिशत महिलाओं को देखभाल में कम से कम एक तरह की देरी का सामना करना पड़ा और 17 प्रतिशत को तीनों तरह की देरी हुई: देखभाल लेने का फैसला करने, स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने और वहां उपचार मिलने में। देखभाल लेने में देरी 57 प्रतिशत, उपचार मिलने में देरी 40 प्रतिशत और स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने में देरी 33 प्रतिशत मामलों में हुई। रिपोर्ट की गई समस्याओं में समय पर रेफरल के लिए जोखिमों की पहचान में देरी, प्राप्तकर्ता केंद्रों में प्रशासनिक देरी, परिवहन की व्यवस्था, केंद्रों के बीच खराब संवाद और उपकरणों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, रक्त तथा दवाओं की कमी शामिल थीं।

स्वास्थ्य केंद्रों में अधिक प्रसव, मातृ मौतों में कमी

नेपाल में प्रसूति सेवाओं के विस्तार से काफी लाभ हुआ है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में संस्थागत प्रसव की मुफ्त सेवाएं 2009 में शुरू की गईं और देशभर में 2,800 से अधिक प्रसव केंद्र खोले गए हैं।

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स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले प्रसव का हिस्सा मुफ्त प्रसव सेवाएं शुरू होने के आसपास के समय में लगभग 18 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 90.5 प्रतिशत हो गया। यह 72.5 प्रतिशत अंकों की वृद्धि है और इसका मतलब है कि अब अधिकतर प्रसव उन जगहों पर हो रहे हैं जहां प्रशिक्षित देखभाल उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।

मातृ मृत्यु अनुपात 1996 में प्रति 100,000 जन्मों पर 539 मौतों से घटकर 2016 में 239 हो गया। हाल के अस्पताल विवरणों में विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 142 मातृ मौतों का है। डब्ल्यूएचओ ने 2000 के बाद से 70 प्रतिशत से अधिक की कमी भी दर्ज की है।

मातृ मृत्यु अनुपात गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से जुड़ी मौतों की संख्या को प्रति 100,000 जीवित जन्मों के हिसाब से दर्शाता है। इससे देशों और स्वास्थ्य सेवाओं को गर्भावस्था तथा प्रसव से जुड़े जोखिम पर नजर रखने में मदद मिलती है, बजाय इसके कि वे केवल मौतों की कुल संख्या देखें।

नेपाल का घोषित सतत विकास लक्ष्य 2030 तक प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर मातृ मौतों की संख्या 70 तक लाना है। डब्ल्यूएचओ के उद्धृत 142 के अनुमान से 70 तक पहुंचने के लिए प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर मौतों में 72 की कमी, यानी आधे से कुछ अधिक की गिरावट जरूरी होगी।

प्रगति के पड़ाव और अगला लक्ष्य

नेपाल में प्रगति कई दशकों में हुई है। प्रमुख तारीखें सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने, मौतों के कारण समझने के प्रयासों और बाकी राष्ट्रीय लक्ष्य की कहानी बताती हैं:

  • 1996: मातृ मृत्यु अनुपात प्रति 100,000 जन्मों पर 539 मौतें था।
  • 2009: सरकार ने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में संस्थागत प्रसव की मुफ्त सेवाएं शुरू कीं।
  • 2016: मातृ मृत्यु अनुपात प्रति 100,000 जन्मों पर 239 मौतें था।
  • 2021: नेपाल ने राष्ट्रीय जनगणना से जुड़ा मातृ मृत्यु अध्ययन शुरू किया।
  • 2025: स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले प्रसव का दर्ज हिस्सा 90.5 प्रतिशत पहुंच गया।
  • 2030: नेपाल का लक्ष्य प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर मातृ मौतों की संख्या 70 तक लाना है।

हाल की मौतें और आपातकालीन स्थानांतरण दिखाते हैं कि इस प्रयास पर अब कहां दबाव है: देखभाल तक पहुंच चुकी महिलाओं की गंभीर जटिलताओं का उपचार करने की अस्पतालों की क्षमता। धादिंग या डोल्पा जैसे जिलों से रेफर मरीजों के लिए अगले अस्पताल में विशेषज्ञ उपचार की उपलब्धता उनकी आगे की यात्रा तय कर सकती है।

उपकरणों से आगे का निवेश

मातृ स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. पवन शर्मा ने कहा कि मौतों में और कमी लाने के लिए निरंतर खर्च और सरकार की प्रतिबद्धता जरूरी है। उन्होंने बताया कि केवल मशीनें खरीदने से जरूरी कमियां क्यों दूर नहीं होंगी:

महंगे उपकरण अकेले मातृ मृत्यु कम नहीं कर सकते। सीमित प्रयासों से जल्दी सुधार संभव है, लेकिन आगे की प्रगति के लिए बड़े निवेश और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

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परोपकार का अनुभव कर्मचारियों की कमी को स्पष्ट करता है। किसी अस्पताल में आईसीयू हो सकता है, फिर भी उसे दूसरे स्थानों से विशेषज्ञ बुलाने, गंभीर देखभाल का कोई दूसरा बिस्तर तलाशने और मरीज को स्थानांतरित करने की व्यवस्था करनी पड़ सकती है। नर्सों के पास उन मरीजों की निगरानी के लिए भी पर्याप्त क्षमता होनी चाहिए, जिनकी हालत तेजी से बदल सकती है।

कई चिकित्सा क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ काम करने वाले अस्पताल प्रसूति देखभाल, हृदय और गुर्दे से जुड़ी विशेषज्ञता तथा गंभीर देखभाल को एक ही उपचार प्रक्रिया में शामिल कर सकते हैं। गंभीर जटिलताओं वाली माताओं को इससे अस्पतालों के बीच आपातकालीन यात्राओं पर कम निर्भर रहना पड़ सकता है।

नेपाल ने प्रसव के लिए स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या में काफी बढ़ोतरी की है। अब अगला काम इन केंद्रों को इस तरह सक्षम बनाना है कि नियमित प्रसूति देखभाल आपात स्थिति में बदलने पर वे तुरंत कार्रवाई कर सकें, बच्चे के जन्म के बाद भी।

मुख्य बातें

  • धादिंग की एक महिला की परोपकार प्रसूति तथा स्त्री रोग अस्पताल में प्रसव के 18 घंटे बाद मौत हो गई; डॉक्टरों ने इसका कारण पल्मोनरी एम्बोलिज्म बताया।
  • प्रसव के बाद खून का थक्का बनने से प्रभावित एक अन्य मरीज बीर अस्पताल भेजे जाने के बाद बच गई।
  • परोपकार में 10 बिस्तरों वाली श्रेणी बी मातृ आईसीयू है, लेकिन हृदय, गुर्दे और गंभीर देखभाल के विशेषज्ञ नहीं हैं।
  • अस्पताल हर महीने करीब 12 गंभीर रूप से बीमार माताओं और लगभग 36 शिशुओं को दूसरे केंद्रों में भेजता है।
  • 2022 में प्रकाशित नेपाल मातृ मृत्यु अध्ययन 2021 के अनुसार, करीब चार में से तीन मातृ मौतें स्वास्थ्य केंद्रों में या परिवहन के दौरान हुईं; 74 प्रतिशत महिलाओं को देखभाल में कम से कम एक देरी का सामना करना पड़ा।
  • 2025 में स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले प्रसव का हिस्सा 90.5 प्रतिशत पहुंच गया, जबकि नेपाल का लक्ष्य 2030 तक प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर मातृ मौतों की संख्या 70 करना है।
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