जल प्रबंधन के लिए व्यापक रूपरेखा
चीन के सांसदों ने 6 नवंबर, 2026 को संशोधित जल कानून पारित किया और इसे 22 मार्च, 2027 से लागू करने की तारीख तय की। यह मतदान 14वीं नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति के 25वें सत्र में हुआ। इससे पहले हुई विधायी समीक्षा में जल संरक्षण, बुनियादी ढांचे, पारिस्थितिकी संरक्षण और वैकल्पिक जल आपूर्ति के उपयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार किया गया था।
विषय-सूची
संशोधित कानून में नौ अध्याय हैं। इनमें जल योजना, संरक्षण, आवंटन और उपयोग के साथ-साथ नदियों और झीलों का प्रबंधन, जल परियोजनाओं का निर्माण और संचालन, विवाद निपटान, निगरानी और कानूनी दायित्व शामिल हैं।
इसका मूल सिद्धांत जल बचत को प्राथमिकता देना और जल आपूर्ति, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरणीय परिस्थितियों तथा जल संबंधी जोखिमों का एक साथ प्रबंधन करना है। घरों, खेतों, कारखानों और स्थानीय सरकारों के लिए ये विषय आपस में जुड़े हैं: लोग कितना पानी लेते हैं, इससे तय होता है कि दूसरे उपयोगकर्ताओं और नदियों-झीलों के लिए कितना पानी बचेगा।
पारित कानून व्यापक सिद्धांत तय करता है। अंतिम समीक्षा के दौरान जिन विस्तृत उपायों का उल्लेख किया गया, उनमें पारिस्थितिकी मुआवजा, जनभागीदारी बढ़ाना, पानी का पुनः उपयोग और राष्ट्रीय जल नेटवर्क में सुधार शामिल थे। इन विवरणों को मसौदे के प्रावधानों के रूप में पेश किया गया था; कानून पारित होने की घोषणाओं में उनकी अंतिम शब्दावली स्पष्ट नहीं की गई और न ही पानी की विशिष्ट कीमतें, मुआवजे की राशि या दंड का स्तर बताया गया।
नौ अध्यायों में क्या शामिल है
कानून की संरचना में योजना, उपयोग और प्रवर्तन को एक ही रूपरेखा में रखा गया है। शुरुआती अध्याय में सामान्य प्रावधान हैं, इसके बाद जल संसाधन योजना; संरक्षण, विकास और उपयोग; तथा आवंटन और संरक्षण पर अध्याय हैं।
अगले अध्याय नदी और झील प्रबंधन तथा संरक्षण, जल परियोजनाओं के निर्माण और संचालन, जल विवाद निपटान और निगरानी, कानूनी दायित्व तथा पूरक प्रावधानों से जुड़े हैं। इस तरह कानून का दायरा भविष्य की जल आपूर्ति से जुड़े फैसलों से लेकर बुनियादी ढांचे के संचालन और मतभेदों के निपटारे तक फैला है।
पारित सिद्धांत व्यापक योजना बनाने, परस्पर प्रतिस्पर्धी जरूरतों पर विचार करने, तात्कालिक समस्याओं और उनके मूल कारणों दोनों पर ध्यान देने तथा पानी के अनेक कार्यों का प्रभावी उपयोग करने का आह्वान करते हैं। वे सरकारी कार्रवाई और बाजार तंत्र को साथ काम करने के लिए भी कहते हैं। व्यावहारिक तौर पर, आवंटन और संरक्षण से जुड़े सार्वजनिक फैसलों के साथ ऐसे आर्थिक संकेत भी काम करेंगे जो पानी के उपयोग को प्रभावित करते हैं।
समीक्षा से मतदान तक
नवंबर में हुआ मतदान अगस्त 2026 की दूसरी समीक्षा और स्थायी समिति के नवंबर सत्र में हुई तीसरी समीक्षा के बाद हुआ। उस सत्र से पहले स्थायी समिति के विधायी कार्य आयोग के प्रवक्ता हुआंग हाइहुआ ने 30 अक्टूबर को एक प्रेस वार्ता में प्रस्तावित संशोधनों की जानकारी दी थी।
हुआंग ने आगे के संशोधन के लिए पांच मुख्य क्षेत्रों की पहचान की: राष्ट्रीय जल नेटवर्क, जनभागीदारी, योजना संबंधी आवश्यकताएं, जलीय पारिस्थितिकी संरक्षण और कानूनी दायित्व। इस क्रम से पता चलता है कि अंतिम विधायी समीक्षा में बुनियादी ढांचे और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं पर एक साथ विचार किया गया।
- अगस्त 2026: स्थायी समिति के 24वें सत्र में मसौदे की दूसरी समीक्षा हुई।
- 30 अक्टूबर, 2026: हुआंग हाइहुआ ने अगले सत्र से पहले प्रस्तावित बदलावों की जानकारी दी।
- 2 नवंबर, 2026: 25वें सत्र में तीसरी समीक्षा के लिए मसौदा पेश किया गया।
- 6 नवंबर, 2026: सांसदों ने संशोधित कानून पारित करने के लिए मतदान किया।
- 22 मार्च, 2027: संशोधित जल कानून लागू होगा।
समय-सारिणी में कानून पारित होने और लागू होने के बीच अंतराल है। लागू होने की तारीख वह दिन है जब संशोधित कानून प्रभावी होगा, जबकि इससे पहले की तारीखें उसके प्रावधानों की समीक्षा और मंजूरी से जुड़ी हैं।
घरों, उत्पादन और प्रकृति के लिए योजना
जल संसाधन मंत्रालय ने तीसरी समीक्षा का ब्यौरा प्रकाशित किया था, जिसमें प्रस्तावित किया गया कि जल योजनाओं में घरेलू, उत्पादन संबंधी और पारिस्थितिक जरूरतों के बीच तालमेल हो। मंत्रालय के तीसरी समीक्षा के ब्यौरे में जनभागीदारी के प्रस्तावित तरीकों, विशेषज्ञों से परामर्श और योजना को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का भी उल्लेख था।
घरेलू मांग का मतलब रोजमर्रा के जीवन के लिए पानी है। उत्पादन में खेती और उद्योग जैसे उपयोग शामिल हैं। पारिस्थितिक मांग से आशय नदियों, झीलों और उन पर निर्भर जीव-जगत को बनाए रखने के लिए जरूरी पानी से है। इन तीनों पर एक साथ विचार करने का मतलब है कि योजनाकारों को मानवीय गतिविधियों के लिए पानी लेने के साथ-साथ प्रकृति की जल आवश्यकताओं का भी हिसाब रखना होगा।
स्थानिक संतुलन के पारित सिद्धांत में पानी की उपलब्धता और उसकी जरूरत वाले स्थानों के बीच संबंध पर ध्यान दिया गया है। योजना संबंधी प्रस्तावों के साथ मिलाकर देखें तो यह ऐसे फैसलों की ओर संकेत करता है जिनमें कुल आपूर्ति के साथ स्थान को भी ध्यान में रखा जाता है। केवल राष्ट्रीय स्तर पर पानी की मात्रा से किसी नदी घाटी या शहर की स्थिति का पूरा पता नहीं चलता।
पर्यावरणीय दायित्वों के साथ राष्ट्रीय जल नेटवर्क
2 नवंबर को पेश किए गए मसौदे में राष्ट्रीय जल नेटवर्क का निर्माण तेज करने का प्रस्ताव था। इसका घोषित उद्देश्य जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की चीन की क्षमता को बेहतर बनाना था। जल सुरक्षा का मतलब है कि जरूरी जरूरतों के लिए भरोसेमंद जल उपलब्ध हो और कमी तथा पानी से जुड़े जोखिमों जैसे खतरों का प्रबंधन किया जाए।
नेटवर्क के प्रस्तावित प्रावधानों में एक पूर्ण, भरोसेमंद, कुशल और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार प्रणाली बनाने की बात थी, जिसे स्मार्ट प्रबंधन और व्यवस्थित नियमन का समर्थन मिले। ध्यान केवल अलग-अलग परियोजनाओं के निर्माण पर नहीं, बल्कि नेटवर्क के विभिन्न हिस्सों के एक साथ काम करने के तरीके पर भी था।
तीसरी समीक्षा में जल हस्तांतरण परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। मसौदे में प्रस्ताव था कि उनसे जल जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़े, लेकिन पर्यावरण को नुकसान से भी बचाया जाए। पानी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने से गंतव्य क्षेत्र की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है, पर योजना बनाते समय उस जगह का भी ध्यान रखना होगा जहां से पानी लिया जा रहा है।
पारित कानून में जल परियोजनाओं के निर्माण और संचालन के लिए एक अलग अध्याय है और नदियों तथा झीलों के लिए भी अलग अध्याय रखा गया है। इस संरचना में निर्मित बुनियादी ढांचे और प्राकृतिक जलमार्गों का प्रबंधन एक ही कानूनी ढांचे में आता है।
नदियों और झीलों में पानी बनाए रखना
तीसरी समीक्षा में पारिस्थितिक प्रवाह और पारिस्थितिक जल स्तर के लिए अधिक विस्तृत नियमों का प्रस्ताव था। पारिस्थितिक प्रवाह से आशय नदी में बहते रहने वाले पानी की उस मात्रा से है जो उसके पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरी है। पारिस्थितिक जल स्तर झील या अन्य जलाशय में पानी की ऊंचाई के लिए इसी तरह की जरूरत को दर्शाता है।
मसौदे में इन प्रवाहों और स्तरों के लिए नियंत्रण लक्ष्य तय करने का प्रस्ताव था। साथ ही, पारिस्थितिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग परियोजनाओं से छोड़े जाने वाले पानी के लक्ष्य भी तय किए जाने थे। इसमें कहा गया कि ऐसे लक्ष्य जल संसाधनों की स्थिति सहित कई कारकों को ध्यान में रखें। ये आवश्यकताएं बुनियादी ढांचे के संचालन को आसपास के जलमार्गों की स्थिति से जोड़ती हैं।
पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए मुआवजा एक और प्रस्तावित प्रावधान था। मसौदे के अनुसार, नियमों या समझौतों के मुताबिक जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण का संरक्षण करने वाले क्षेत्रों, संगठनों और व्यक्तियों को मुआवजा दिया जाएगा।
इस विचार का उद्देश्य यह मान्यता देना है कि जल संरक्षण का काम करने वाले लोगों या स्थानों पर लागत आ सकती है, जबकि उसके लाभ कहीं और तक पहुंच सकते हैं। जल पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाला समुदाय अपनी सीमाओं से बाहर के उपयोगकर्ताओं को भी लाभ पहुंचा सकता है। प्रस्तावित मुआवजा प्रणाली इस संरक्षण कार्य को कानूनी ढांचे में जगह देगी।
कीमतों और पुनः उपयोग से जल बचत
हुआंग ने संरक्षण और पानी के बार-बार उपयोग को संशोधन की मुख्य प्राथमिकताएं बताया। मसौदे में राष्ट्रीय जल संरक्षण अभियान, कृषि, उद्योग और शहरी क्षेत्रों में बेहतर संरक्षण तथा प्रोत्साहन और नियंत्रण उपायों के मेल का प्रस्ताव था।
30 अक्टूबर की वार्ता में स्थायी समिति के विधायी कार्य आयोग के प्रवक्ता हुआंग हाइहुआ ने बताया कि संशोधन में जल संरक्षण को केंद्रीय स्थान क्यों दिया गया:
जल जीवन का स्रोत है और वह आधार है जिस पर मानवता तथा प्रकृति का अस्तित्व निर्भर करता है।
कीमतों से जुड़े प्रस्ताव में ऐसा तंत्र बनाने की बात थी जो आर्थिक और सामाजिक विकास, पानी की उपलब्धता, आपूर्ति लागत, उपयोगकर्ताओं की भुगतान क्षमता और संरक्षण संबंधी जरूरतों को दर्शाए। इन कारकों के जरिए वहनीयता और पानी उपलब्ध कराने की लागत को एक ही हिसाब में रखा जाएगा, साथ ही सोच-समझकर पानी के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश होगी।
मसौदे में गैर-पारंपरिक जल स्रोतों को एकीकृत आवंटन में शामिल करने का भी प्रस्ताव था। सूची में एकत्रित वर्षा जल, समुद्री जल और विलवणीकृत समुद्री जल, खदानों और गड्ढों का पानी तथा हल्का खारा पानी शामिल थे। एकीकृत आवंटन का अर्थ है कि अलग संसाधन मानने के बजाय इन आपूर्तियों को जल योजना में शामिल करके देखा जाए।
प्रस्ताव में उपचारित जल के पुनः उपयोग को खास प्राथमिकता दी गई। जिला स्तर और उससे ऊपर की स्थानीय सरकारों को लागू मानकों पर खरे उतरने वाले उपचारित जल के उपयोग को प्रोत्साहित करना होगा और शहरी हरित क्षेत्रों के रखरखाव जैसे कामों में इसे प्राथमिकता देनी होगी। उपचारित जल वह अपशिष्ट जल है जिसे फिर से उपयोग करने योग्य बनाने के लिए साफ किया गया हो। शहरी हरियाली की सिंचाई में इसका इस्तेमाल दूसरी जल आपूर्तियों की मांग घटा सकता है।
जनभागीदारी और जवाबदेही
तीसरी समीक्षा में लोगों को जल संरक्षण, पानी की बचत और जल संबंधी जोखिमों की रोकथाम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव था। योजना संबंधी प्रावधानों में जनभागीदारी और विशेषज्ञों से परामर्श की बात भी थी, ताकि योजनाएं बनाते समय स्थानीय अनुभव और तकनीकी आकलन, दोनों की भूमिका हो।
प्रस्तावित भागीदारी उपाय जल प्रबंधन के दो अलग-अलग चरणों से जुड़े हैं। योजनाएं तैयार होते समय लोग योगदान दे सकते हैं और फैसले होने के बाद पानी की रक्षा या बचत के कामों में हिस्सा ले सकते हैं। विशेषज्ञों से परामर्श योजना के तकनीकी मुद्दों के आकलन में मदद करेगा।
पारित कानून में जल विवाद निपटान और निगरानी तथा कानूनी दायित्व पर भी अध्याय हैं। ये विषय तब अहम होते हैं जब उपयोगकर्ताओं में पानी को लेकर मतभेद हों या अधिकारी यह जांचें कि कानूनी दायित्वों का पालन हुआ है या नहीं। हुआंग ने कहा कि अंतिम समीक्षा में योजना और पारिस्थितिकी संरक्षण से जुड़े बदलावों के साथ दायित्व संबंधी प्रावधानों में सुधार का भी प्रस्ताव था।
22 मार्च, 2027 से संशोधित ढांचा आपस में जुड़े कई फैसलों को नियंत्रित करेगा: पानी का आवंटन कैसे होगा, परियोजनाएं कैसे चलेंगी, नदियों और झीलों की रक्षा कैसे होगी तथा जवाबदेही कैसे तय होगी। इसकी मुख्य दिशा है संरक्षण को प्राथमिकता देना और मानवीय जरूरतों, पर्यावरणीय जरूरतों तथा पानी से जुड़े जोखिमों पर एक साथ विचार करना।
मुख्य बातें
- चीन ने 6 नवंबर, 2026 को संशोधित जल कानून पारित किया। यह 22 मार्च, 2027 से लागू होगा।
- कानून में नौ अध्याय हैं, जिनमें योजना, संरक्षण, आवंटन, नदियां और झीलें, जल परियोजनाएं, विवाद, निगरानी और दायित्व शामिल हैं।
- पारित सिद्धांत पानी बचाने और जल संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरणीय परिस्थितियों तथा जल संबंधी जोखिमों के प्रबंधन में तालमेल को प्राथमिकता देते हैं।
- मसौदे की अंतिम समीक्षा में राष्ट्रीय जल नेटवर्क, पारिस्थितिकी मुआवजा, नदी प्रवाह, जनभागीदारी और योजना संबंधी आवश्यकताओं पर विचार किया गया।
- प्रस्तावित संरक्षण उपायों में कीमतों में सुधार, गैर-पारंपरिक जल स्रोतों का समन्वित आवंटन और शहरी हरियाली के लिए उपचारित जल के उपयोग को प्राथमिकता देना शामिल था।






