हिरासत की शक्तियां और संवैधानिक अधिकार चुनौती के केंद्र में
श्रीलंका का सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावित संगठित अपराध रोकथाम विधेयक को चुनौती देने वाली 26 याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। वकीलों ने उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई है, जिनके तहत रक्षा मंत्रालय के सचिव के आदेश पर दो महीने से एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। अटॉर्नी जनरल को 4 और 5 नवंबर, 2026 को हुई दलीलों के बाद सोमवार, 9 नवंबर को सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश होना है।
विषय-सूची
- हिरासत की शक्तियां और संवैधानिक अधिकार चुनौती के केंद्र में
- अदालत में क्या हुआ?
- गंभीर अपराध की परिभाषा कितनी व्यापक होगी?
- लंबी हिरासत पर नियंत्रण किसका होगा?
- पुलिस हिरासत, जमानत और मजिस्ट्रेट की भूमिका
- अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग को लेकर वकील चिंतित क्यों हैं?
- दो-तिहाई बहुमत और जनमत-संग्रह की मांग क्यों?
- राष्ट्रपति ने किन बदलावों का वादा किया है?
- मुख्य बातें
मुख्य न्यायाधीश प्रीति पद्मन सूरसेन न्यायमूर्ति अचला वेंगप्पुली और न्यायमूर्ति संपत अभयकोन के साथ पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं में बार एसोसिएशन ऑफ श्रीलंका, डिस्टिलरीज कंपनी और मलिंदा सेनविरत्ने शामिल हैं। वे अदालत से आग्रह कर रहे हैं कि विधेयक के मौजूदा चुनौती दिए गए स्वरूप को संसद में दो-तिहाई बहुमत और जनमत-संग्रह में मंजूरी के बाद ही पारित किया जाए।
राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने टैटू से संबंधित प्रावधान हटाने और आबकारी अध्यादेश के तहत अपराधों से जुड़े प्रावधानों में संशोधन की योजना भी घोषित की है। उनकी घोषणा उन दो क्षेत्रों की पहचान करती है जिनमें सरकार बदलाव के लिए तैयार है। वहीं, अदालत में हिरासत, जमानत, न्यायिक अधिकार और आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग से जुड़ी व्यापक आपत्तियों पर सुनवाई हो रही है।
प्रस्तावित कानून के तहत गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति के लिए व्यावहारिक रूप से अहम सवाल यह है: यह तय कौन करेगा कि उसे हिरासत में रखा जाए या नहीं, हिरासत कितने समय तक चल सकती है और हस्तक्षेप करने के लिए न्यायाधीश के पास क्या अधिकार होंगे। पत्रकारों की एक और चिंता यह है कि गंभीर अपराधों की जानकारी प्रकाशित करने पर पाबंदियों से अदालती कार्यवाही की कवरेज प्रभावित हो सकती है या नहीं।
अदालत में क्या हुआ?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने 4 नवंबर की सुबह मौखिक दलीलें शुरू कीं और देर रात तक अपनी बात रखी। 5 नवंबर को वही पीठ फिर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए बैठी।
न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ताओं को अपने संवैधानिक एतराज और जरूरी समझे गए संशोधनों का विवरण देते हुए लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया। ये दलीलें 5 नवंबर को दाखिल की गईं। इससे सरकार के जवाब के लिए तय तारीख से पहले अदालत के सामने याचिकाकर्ताओं का विस्तृत पक्ष आ गया।
कार्यवाही की प्रमुख तारीखें:
- 4 नवंबर, 2026: याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलीलें पेश करना शुरू किया। सुनवाई देर रात तक जारी रही।
- 5 नवंबर, 2026: अदालत ने 26 याचिकाओं पर फिर विचार किया और याचिकाकर्ताओं ने संवैधानिकता तथा प्रस्तावित संशोधनों पर लिखित दलीलें दाखिल कीं।
- 9 नवंबर, 2026: अटॉर्नी जनरल को सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश होना है।
विशिष्ट प्रावधानों पर दलीलें रखने वाले वकीलों के अलावा, याचिकाकर्ताओं की ओर से राष्ट्रपति के वकील संजीव जयवर्धने, एम.ए. सुमंथिरन, अली साबरी और नवीन मरपना पेश हुए। अटॉर्नी जनरल की ओर से सॉलिसिटर जनरल विराज दयारत्ने, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुदर्शन डी सिल्वा, उप सॉलिसिटर जनरल सुधर्षी हेरथ और डॉ. अवंती परेरा पेश हुए।
गंभीर अपराध की परिभाषा कितनी व्यापक होगी?
याचिकाकर्ता मलिंदा सेनविरत्ने की ओर से पेश राष्ट्रपति के वकील रोमेश डी सिल्वा ने दलील दी कि विधेयक में गंभीर अपराधों की परिभाषा जरूरत से ज्यादा व्यापक है। यह आपत्ति प्रस्तावित कानून के दायरे से जुड़ी है: किन संदिग्ध अपराधों के कारण कोई व्यक्ति इसके दायरे में आ सकता है।
कानूनी परिभाषा तय करती है कि खास शक्तियों का इस्तेमाल कब किया जा सकता है। यदि कोई कानून गंभीर अपराधों की जांच के लिए असाधारण शक्तियां देता है, तो उस श्रेणी के शब्द तय करते हैं कि किन मामलों में उन शक्तियों का इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए डी सिल्वा की दलील इस परिभाषा को उन हिरासत संबंधी प्रावधानों से सीधे जोड़ती है, जिन्हें उन्होंने चुनौती दी है।
अदालत से विधेयक के दोनों पहलुओं पर एक साथ विचार करने को कहा गया है: इसके दायरे में आने वाला आचरण और उसकी जांच के दौरान अधिकारियों को मिलने वाली शक्तियां। जांच का सामना कर रहे लोगों के लिए ये प्रावधान शुरुआत से ही कानूनी प्रक्रिया तय करेंगे, दोषी होने या न होने के किसी फैसले से पहले।
लंबी हिरासत पर नियंत्रण किसका होगा?
डी सिल्वा ने उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई जिनके तहत पुलिस महानिरीक्षक या उप पुलिस महानिरीक्षक के अनुरोध पर रक्षा मंत्रालय का सचिव दो महीने से एक साल तक की हिरासत का आदेश दे सकता है। उनकी चुनौती इस बात पर केंद्रित है कि किसी संदिग्ध को हिरासत में रखने का अधिकार एक कार्यकारी अधिकारी को दिया जा रहा है।
सरकार का कार्यकारी अंग कानूनों को लागू करता है और सरकारी एजेंसियों का संचालन करता है। अदालतों की भूमिका अलग है; वे कानूनी विवादों पर फैसला करती हैं और स्वतंत्रता पर लगी पाबंदियों के वैध आधार की समीक्षा करती हैं। याचिकाकर्ताओं की चिंता यह है कि विधेयक इन दोनों अंगों के बीच अधिकारों का बंटवारा किस तरह करेगा।
राष्ट्रपति के वकील इराज डी सिल्वा ने भी दलील दी कि कुछ प्रावधान न्यायिक हस्तक्षेप के बिना कार्यपालिका को व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने की अनुमति देंगे। उनकी दलील में संवैधानिक चुनौती के केंद्र में अदालतों की भूमिका रही।
जांच के लिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्वतंत्रता उस दौरान छिन जाती है, जब अधिकारी संदिग्ध अपराध की पड़ताल करते हैं। अदालत में चर्चा की गई प्रस्तावित अवधि पूरे एक साल तक हो सकती है। ऐसे में हिरासत की मंजूरी, उसकी समीक्षा और रिहाई के नियम संदिग्धों और उनके परिवारों के लिए बड़ा मुद्दा हैं।
पुलिस हिरासत, जमानत और मजिस्ट्रेट की भूमिका
वकील सुरेन फर्नांडो ने 72 घंटे की पुलिस हिरासत, जमानत पर पाबंदियों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियों को सीमित करने से जुड़ी आपत्तियां उठाईं। ये मुद्दे जांच के शुरुआती चरणों और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के रिहाई मांगने के अवसरों से जुड़े हैं।
72 घंटे यानी तीन दिन। यह अवधि पुलिस हिरासत से संबंधित है, जबकि रोमेश डी सिल्वा की चुनौती में उठाई गई लंबी अवधि रक्षा मंत्रालय के सचिव की मंजूरी से होने वाली हिरासत से जुड़ी है। अदालत में दी गई दलीलें शुरुआती हिरासत व्यवस्था और स्वतंत्रता पर कहीं अधिक लंबी पाबंदी की आशंका, दोनों पर हैं।
जमानत के तहत किसी आरोपी को मुकदमा चलने के दौरान हिरासत से बाहर रहने की अनुमति मिलती है। आम तौर पर इसके साथ ऐसी शर्तें होती हैं जिनका उद्देश्य अदालत में उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना और कानूनी प्रक्रिया की रक्षा करना होता है। इसलिए जमानत पर पाबंदियां इस बात पर तत्काल असर डाल सकती हैं कि आगे की कार्यवाही का इंतजार करते हुए कोई व्यक्ति हिरासत में रहेगा या नहीं।
मजिस्ट्रेटों से जुड़ी फर्नांडो की आपत्तियां उन फैसलों में न्यायाधीशों के अधिकारों से संबंधित हैं। हिरासत, जमानत और नजरबंदी से जुड़े तर्कों को मिलाकर देखें तो सवाल यह है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में बनाए रखने पर अदालतों का कितना नियंत्रण रहेगा।
अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग को लेकर वकील चिंतित क्यों हैं?
बार एसोसिएशन ऑफ श्रीलंका की ओर से पेश राष्ट्रपति के वकील सालिया पीरिस ने दलील दी कि विधेयक पुलिस को न्यायपालिका से अधिक शक्तियां देगा और उनके दुरुपयोग के अवसर पैदा करेगा। उन्होंने गंभीर अपराधों से जुड़ी जानकारी के खुलासे पर पाबंदियों को भी चुनौती दी।
पीरिस ने चेतावनी दी कि इन पाबंदियों से अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है। अदालतों की कवरेज से जनता को पता चलता है कि क्या आरोप लगाए गए हैं, वकीलों ने क्या दलीलें दी हैं और न्यायाधीशों ने क्या फैसले किए हैं। इसलिए किसी अपराध की जानकारी प्रकाशित करने पर पाबंदी का असर संदिग्ध और जांचकर्ताओं से परे भी हो सकता है।
रिपोर्टिंग से जुड़ी आपत्ति मामले में एक और जनहित के मुद्दे को सामने लाती है: न्याय प्रक्रिया की जानकारी तक पहुंच। पीरिस ने इस चिंता को पुलिस के अधिकारों और संविधान से संरक्षित मौलिक अधिकारों पर अपनी दलीलों के साथ रखा।
दो-तिहाई बहुमत और जनमत-संग्रह की मांग क्यों?
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विधेयक के प्रावधान संविधान से टकराते हैं और इन्हें संसद में दो-तिहाई बहुमत तथा जनमत-संग्रह में मतदाताओं की मंजूरी की जरूरत होनी चाहिए। पीरिस ने यह भी दलील दी कि मौलिक अधिकारों पर असर के कारण विधेयक को जनमत-संग्रह के लिए रखा जाना चाहिए।
संवैधानिक चुनौती में यह सवाल उठता है कि प्रस्तावित कानून देश के सर्वोच्च कानून के अनुरूप है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल विधेयक पारित करने की कानूनी शर्तों का है, जिसमें यह भी शामिल है कि चुनौती दिए गए प्रावधानों को सामान्य कानून की तुलना में अधिक स्तर की मंजूरी चाहिए या नहीं।
दो-तिहाई बहुमत के लिए संसद में व्यापक समर्थन जरूरी होगा, जबकि जनमत-संग्रह में सवाल मतदाताओं के सामने रखा जाएगा। याचिकाकर्ता दोनों शर्तें चाहते हैं। अदालत ने अभी अपना फैसला नहीं सुनाया है और सरकार का विस्तृत जवाब 9 नवंबर को आना तय है।
लिखित दलीलों में याचिकाकर्ताओं ने मांगे गए संशोधनों का विवरण भी दिया है। इस तरह संसद में पेश विधेयक पर दलीलों के साथ-साथ संभावित बदलावों की भाषा भी कार्यवाही का हिस्सा है।
राष्ट्रपति ने किन बदलावों का वादा किया है?
राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा कि टैटू से संबंधित प्रावधान हटाया जाएगा और आबकारी अध्यादेश के तहत अपराधों से जुड़े प्रावधानों में संशोधन किया जाएगा। उन्होंने यह घोषणा एक धार्मिक सम्मेलन में की, जो एकात नागितिमु – इवाथ वेनु नामक अभियान की पहली वर्षगांठ पर आयोजित हुआ था। इसे टुगेदर वी राइज के नाम से भी जाना जाता है।
आबकारी अध्यादेश में शराब के नियमन और उससे जुड़े अपराधों सहित कई विषय शामिल हैं। राष्ट्रपति की घोषणा से प्रस्तावित संगठित अपराध कानून के तहत इन अपराधों से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा किए जाने की बात सामने आई है। विधेयक को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में डिस्टिलरीज कंपनी भी शामिल है।
राष्ट्रपति की घोषणा और कानूनी दलीलें प्रस्तावित कानून के अलग-अलग पहलुओं से संबंधित हैं। टैटू से जुड़ा प्रावधान हटाने से इसके दायरे का एक पहलू बदलेगा। वकीलों ने गंभीर अपराधों की परिभाषा, हिरासत, जमानत, न्यायिक शक्तियों और जानकारी प्रकाशित करने पर पाबंदियों से जुड़े बदलाव भी मांगे हैं।
अटॉर्नी जनरल की तय पेशी अदालत में सरकार का पक्ष बताने का अगला घोषित अवसर है। सरकार का जवाब याचिकाकर्ताओं की मौखिक दलीलों और संशोधनों के उनके लिखित प्रस्तावों के बाद आएगा।
मुख्य बातें
- श्रीलंका का सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावित संगठित अपराध रोकथाम विधेयक के खिलाफ 26 याचिकाओं पर विचार कर रहा है।
- चुनौतियां गंभीर अपराधों की परिभाषा, हिरासत की शक्तियों, जमानत, न्यायिक अधिकार और अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर पाबंदियों से जुड़ी हैं।
- वकीलों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुरोध पर रक्षा मंत्रालय के सचिव द्वारा मंजूर दो महीने से एक साल तक की हिरासत पर आपत्ति जताई।
- याचिकाकर्ता संसद में दो-तिहाई बहुमत और जनमत-संग्रह के जरिए मंजूरी चाहते हैं।
- राष्ट्रपति दिसानायके ने टैटू से जुड़ा प्रावधान हटाने और आबकारी अध्यादेश के अपराधों से जुड़े प्रावधानों में संशोधन की घोषणा की है।
- अटॉर्नी जनरल को 9 नवंबर, 2026 को सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश होना है।






