एक गिरावट, वर्षों का कष्ट और संवैधानिक चुनौती
सिनचू के एक सेवानिवृत्त कारखाना कर्मचारी, जो गिरने के बाद लगभग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गए, ने ताइवान के संवैधानिक न्यायालय से विचार करने को कहा है कि क्या उन्हें जीवन समाप्त करने के लिए चिकित्सकीय सहायता पाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनके वकील ची युएह-लियांग ने 27 अक्टूबर, 2026 को याचिका दायर की। इससे पहले जून में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अंतिम अपील खारिज कर दी थी।
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आवेदक, जिनकी पहचान उपनाम चुंग से हुई है और जो 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, इच्छामृत्यु की कानूनी अनुमति और उनकी मदद करने वाले चिकित्सा पेशेवरों को आपराधिक मुकदमे से संरक्षण चाहते हैं। ची इस याचिका को ताइवान में इच्छामृत्यु को वैध बनाने की मांग करने वाला पहला संवैधानिक मुकदमा बताते हैं।
चुंग की चोटों ने उनकी गर्दन की तीसरी से सातवीं कशेरुका तक को प्रभावित किया है। उनकी याचिका के अनुसार, गर्दन के नीचे उन्हें अकड़न, सुन्नपन और गंभीर तकलीफ होती है; उनकी नसों की स्थिति लगातार बिगड़ रही है, उन्हें असंयम की समस्या है और रोजमर्रा के बुनियादी काम करने की क्षमता खो गई है। देखभाल के लिए वे दूसरों पर निर्भर हैं।
यह मामला अदालत के सामने एक ठोस मांग रखता है: क्या जीवन पर व्यक्तिगत नियंत्रण में चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु पाने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए, जब किसी व्यक्ति को ऐसा कष्ट हो जिसे वह असहनीय मानता हो। ची चुंग की मांग खारिज करने वाले अदालती फैसलों और चिकित्सा कर्मचारियों को उनकी इच्छा पूरी करने से रोकने वाले कानूनी प्रतिबंधों, दोनों को चुनौती दे रहे हैं।
यह याचिका सामान्य अदालतों के माध्यम से अनुमति पाने की असफल कोशिश के बाद दायर की गई है। अब चुंग संवैधानिक समीक्षा मांग रहे हैं। इस प्रक्रिया में संवैधानिक न्यायालय जांच सकता है कि कानून या न्यायिक फैसले संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों से टकराते हैं या नहीं।
सेवानिवृत्ति के बाद चुंग का जीवन कैसे बदला
सेवानिवृत्त होने से पहले चुंग एक कारखाने में काम करते थे। इसके कुछ समय बाद पैदल चलते हुए वे गिर गए, जिससे उनकी गर्दन में चोट आई और उनका रोजमर्रा का जीवन बदल गया। उनकी याचिका में पेट पर रस्सी कसकर बंधे होने जैसा एहसास और अंगों के लगभग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाने का वर्णन है।
चुंग ने याचिका में अपनी हालत का वर्णन इन शब्दों में किया:
जीते-जागते मृत व्यक्ति जैसा।
उन्होंने अपने अनुभव की तुलना पिंजरे में कैद होने से भी की है। ये विवरण चोट, दूसरों पर निर्भरता और कष्ट के उनके निजी अनुभव को व्यक्त करते हैं, जो कानूनी राहत की उनकी मांग का आधार है।
चुंग चाहते थे कि जब तक वे अपनी बात स्पष्ट रूप से कह पाने में सक्षम हैं, तब तक उनकी इच्छा जाहिर हो जाए। परिवार के सहयोग से, जिसमें उनकी बेटी की मदद भी शामिल थी, उन्होंने कानूनी दस्तावेजों और अन्य कानूनी सामग्री का अध्ययन किया और अदालत में याचिका दायर की। लिखित दस्तावेज तैयार करने में परिवार के सदस्यों ने उनकी मदद की।
इस विवाद के केंद्र में उनकी अपनी इच्छा है। वे ऐसा कानूनी चिकित्सकीय विकल्प चाहते हैं जिसे वे खुद चुन सकें। साथ ही, वे राज्य से उन लोगों को आपराधिक सजा के खतरे से बचाने की मांग कर रहे हैं जो उनकी मदद करेंगे।
सिनचू से संवैधानिक न्यायालय तक का रास्ता
चुंग ने 2025 में सिनचू जिला न्यायालय में पहली बार याचिका दायर कर उस अधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी, जिसे वे सहायता से मृत्यु पाने का अपना अधिकार मानते हैं। उन्होंने इसमें शामिल चिकित्सा कर्मियों को आपराधिक दायित्व से छूट देने की भी मांग की। निचली और दूसरी, दोनों अदालतों ने उनकी मांग खारिज कर दी।
जून 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी आगे की अपील खारिज कर दी और सामान्य अदालतों के रास्ते को बंद कर दिया। इसके बाद चुंग ने हualien में वकालत करने वाले ची से संपर्क किया। ची ताइवान में जीवन से जुड़े व्यक्तिगत निर्णयों की स्वायत्तता को बढ़ावा देने वाले एक संगठन के अध्यक्ष भी हैं।
कानूनी प्रयास के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:
- 2025: चुंग ने इच्छामृत्यु पाने की अनुमति और उनकी मदद करने वाले चिकित्सा कर्मचारियों के संरक्षण के लिए सिनचू जिला न्यायालय में याचिका दायर की।
- शुरुआती याचिका खारिज होने के बाद: उन्होंने आगे की अदालती कार्यवाही के जरिए चुनौती जारी रखी, लेकिन वह भी असफल रही।
- जून 2026: सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील खारिज कर दी और यह फैसला अंतिम हो गया।
- 27 अक्टूबर, 2026: ची ने फैसलों और संबंधित कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा के लिए याचिका दायर की।
संवैधानिक याचिका इस विवाद को किसी एक व्यक्ति को अनुमति देने की मांग से आगे ले जाकर कानूनी व्यवस्था को चुनौती देती है। ची का तर्क है कि ये प्रतिबंध अपने जीवन के बारे में फैसले लेने के बुनियादी अधिकार और मानव गरिमा में हस्तक्षेप करते हैं।
जीवन के अंतिम चरण के मौजूदा कानून क्यों अहम हैं
ची का तर्क आंशिक रूप से चिकित्सा उपचार से इनकार करने और मृत्यु लाने के उद्देश्य से चिकित्सकीय सहायता पाने के बीच के अंतर पर केंद्रित है। ताइवान का रोगी अधिकार स्वायत्तता अधिनियम और धर्मशाला उपशामक देखभाल अधिनियम, जीवन को बनाए रखने वाले उपचार और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल से जुड़े कुछ फैसलों के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं।
जीवन को बनाए रखने वाले उपचार को वापस लेने या न देने से मरीज उन उपायों को ठुकरा सकता है जो उसे जीवित रखते हैं। उपशामक देखभाल का उद्देश्य दर्द और अन्य तकलीफों को कम करना है। इस याचिका में मांगी गई इच्छामृत्यु में चिकित्सा पेशेवर मरीज के स्वैच्छिक अनुरोध पर उसका जीवन समाप्त करने के उद्देश्य से उपाय करते हैं।
ची का कहना है कि स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय ने मृत्यु के समय गरिमा सुनिश्चित करने के लिए इन दोनों मौजूदा कानूनों पर भरोसा किया है। उनका तर्क है कि ये व्यवस्थाएं चुंग जैसे लोगों को वह विकल्प नहीं देतीं जिसकी वे मांग कर रहे हैं, खासकर तब जब देखभाल के बावजूद उनका कष्ट जारी रहता है।
ची ताइवान की आपराधिक संहिता की धारा 275 को भी चुनौती देते हैं, जो किसी अन्य व्यक्ति को आत्महत्या से मरने में मदद करने जैसे कृत्यों से जुड़ी है। इस प्रावधान के तहत मुकदमे का खतरा, चुंग की उस मांग के केंद्र में है जिसमें वे उनकी मदद करने वाले चिकित्सा कर्मचारियों को संरक्षण देने की मांग करते हैं।
चुंग के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या कोई चिकित्सा पेशेवर उनकी मांग पर कानूनी रूप से अमल कर सकता है। अदालत के सामने याचिका यह सवाल रखती है कि क्या मौजूदा प्रतिबंध उन संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप हैं, जिनका दावा एक ऐसा व्यक्ति कर रहा है जो फैसले लेने में सक्षम है और गंभीर, लगातार बने रहने वाले कष्ट से गुजर रहा है।
उनके वकील की प्रस्तावित तीन शर्तें
ची ने याचिका में मांगे गए इच्छामृत्यु विकल्प के लिए तीन शर्तें रखी हैं। ये चिकित्सकीय आकलन, मरीज की अपनी पसंद और चिकित्सा पेशेवरों की भागीदारी से संबंधित हैं।
- चिकित्सक यह आकलन करेगा कि मरीज की बीमारी का इलाज संभव नहीं है और उसे असहनीय कष्ट हो रहा है।
- फैसला मरीज की स्वैच्छिक इच्छा के अनुरूप होगा।
- इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पूरी करने के उपाय चिकित्सा पेशेवर करेंगे।
इस प्रस्ताव में पात्रता के केंद्र में चिकित्सकीय राय और व्यक्ति का फैसला, दोनों रखे गए हैं। चिकित्सक बीमारी और कष्ट का आकलन करेगा, जबकि मरीज यह तय करेगा कि वह प्रक्रिया का अनुरोध करना चाहता है या नहीं।
ची चाहते हैं कि गरिमापूर्ण और कष्ट-मुक्त मृत्यु पाने की पहुंच को एक वास्तविक कानूनी विकल्प के रूप में मान्यता मिले। वे विधायकों से किसी भी कानून में व्यक्तिगत स्वायत्तता को केंद्र में रखने का आग्रह भी करते हैं। उनका तर्क है कि व्यवस्था इतनी प्रतिबंधात्मक नहीं होनी चाहिए कि सहायता मांगने वाले लोग इसका शायद ही कभी इस्तेमाल कर पाएं।
ये तीन शर्तें उस तरीके का वर्णन करती हैं जिसकी मांग वकील कर रहे हैं। विस्तृत व्यवस्था में यह भी तय करना होगा कि अनुरोधों का आकलन और उनका प्रशासन कैसे किया जाएगा। याचिका दायर होने की खबरों में सुनवाई की तारीख, फैसले की तारीख या संवैधानिक न्यायालय द्वारा मामला सुनने के फैसले की कोई जानकारी नहीं दी गई।
ची के अभियान के पीछे के अनुभव
ची, जो मनोवैज्ञानिक भी हैं, कहते हैं कि परिवार के सदस्यों को बीमारी से मरते देखने के बाद उन्होंने इस मुद्दे पर पैरवी शुरू की। उनके पिता को उन्नत चरण के लिवर कैंसर का पता चलने के तीन महीने बाद उनकी मृत्यु हो गई। ची को याद है कि मॉर्फीन से उनके पिता का दर्द कम नहीं हुआ।
ची का कहना है कि कैंसर से पीड़ित उनके पिता ने उनसे पूछा था:
मैं कब मर सकता हूं?
इस अनुभव के बाद ची ने नौ साल पहले इच्छामृत्यु को कानूनी रूप से उपलब्ध कराने के लिए अभियान शुरू किया। उनके काम में उनके अध्यक्षता वाले संगठन के माध्यम से जनसमर्थन जुटाना और हाल ही में एक ताइवानी व्यक्ति को सहायता से मृत्यु पाने के लिए स्विट्जरलैंड ले जाना शामिल है।
हो उपनाम से पहचाने गए उस व्यक्ति की उम्र 40 वर्ष से अधिक थी और उन्हें चारको-मैरी-टूथ रोग, यानी सीएमटी, था। यह वंशानुगत बीमारी परिधीय नसों को प्रभावित करती है। ये वे नसें हैं जो मस्तिष्क और मेरुरज्जु को मांसपेशियों तथा शरीर के बाकी हिस्सों से जोड़ती हैं। इससे मांसपेशियों में धीरे-धीरे कमजोरी, क्षय और संवेदना का नुकसान हो सकता है।
हो में किशोरावस्था के दौरान लक्षण दिखने लगे थे और वर्षों तक उनकी चलने-फिरने की क्षमता घटती रही। ची के अनुसार, आखिरकार वे मुश्किल से घिसटकर चलने लगे और उन्हें डर था कि आगे चलने-फिरने की क्षमता भी खो देंगे। उन्होंने ताइवान के कानून बदलने का इंतजार करने के बजाय जून 2026 में स्विट्जरलैंड जाने का फैसला किया।
ची स्विट्जरलैंड में हो से मिले और उनकी मृत्यु से एक दिन पहले उनके साथ दोपहर का भोजन किया। उन्होंने हो को शांत और अपने फैसले को लेकर दृढ़ बताया। ची के अनुसार, हो ने एक बटन दबाकर खुद प्रक्रिया शुरू की। यह सहायता से आत्महत्या का एक रूप है, जिसमें अंतिम कदम व्यक्ति खुद उठाता है।
ची ने बताया कि हो ने संगठन से ताइवान में कानूनी बदलाव के लिए काम जारी रखने को कहा था। ची के अनुसार, इस अनुभव ने चुंग की संवैधानिक याचिका के साथ-साथ अभियान जारी रखने का एक और निजी कारण दिया।
व्यक्तिगत पसंद और कानून बनाने का दबाव
चुंग का मामला अपने जीवन के बारे में स्पष्ट अनुरोध करने वाले एक व्यक्ति से जुड़ा है। ची अपने अभियान को ताइवान में उन हत्याओं से भी जोड़ते हैं जिनमें परिवार लंबे समय तक देखभाल के दबाव से टूट गए। उनका तर्क है कि ऐसे मामलों के पीछे का कष्ट कानूनी सुधार को जरूरी बनाता है।
ची की प्रस्तावित शर्तों के तहत मरीज की स्वैच्छिक पसंद और चिकित्सकीय आकलन जरूरी होंगे। किसी भी विधायी बहस में, देखभाल की उपलब्धता और देखभाल देने वालों की जिम्मेदारियों से जुड़े सवालों के साथ, ये शर्तें तय करेंगी कि किसी व्यक्ति के अनुरोध पर कैसे विचार किया जाए।
ची ने इच्छामृत्यु के मामले में नीदरलैंड के लंबे अनुभव और बेल्जियम सहित अन्य जगहों पर उन बुजुर्गों के अनुरोधों पर हो रही चर्चाओं का उल्लेख किया है जिन्हें लगता है कि उनका जीवन पूरा हो चुका है। ये व्यापक विचार उनकी पैरवी का हिस्सा हैं; चुंग की याचिका लाइलाज बीमारी, असहनीय कष्ट और चिकित्सकीय सहायता के स्वैच्छिक अनुरोध पर केंद्रित है।
अब अभियान के दो रास्ते हैं। सामान्य अदालतों में हार के बाद चुंग संवैधानिक राहत मांग रहे हैं, जबकि ची विधायकों से एक ऐसा कानूनी ढांचा बनाने का भी आग्रह कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल किया जा सके। फिलहाल अहम घटनाक्रम संवैधानिक याचिका दायर होना है; अदालत का जवाब आना बाकी है।
चुंग के लिए मांगा गया बदलाव स्पष्ट है: चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु चुनने की अनुमति, और उनकी मदद करने वालों पर आपराधिक मुकदमे का खतरा न हो। उनका मामला ताइवान से इस अनुरोध पर संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ चिकित्सा देखभाल और आपराधिक दायित्व से जुड़े मौजूदा नियमों के तहत विचार करने को कहता है।
मुख्य बातें
- चुंग नाम से पहचाने गए सिनचू के एक सेवानिवृत्त कारखाना कर्मचारी गर्दन की चोट के बाद लगभग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गए हैं। वे इच्छामृत्यु की कानूनी अनुमति मांग रहे हैं।
- जून 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील खारिज कर दी। वकील ची युएह-लियांग ने 27 अक्टूबर को संवैधानिक समीक्षा की याचिका दायर की।
- चुनौती पहले के अदालती फैसलों और कानूनी प्रतिबंधों से जुड़ी है, जिनमें आपराधिक संहिता की धारा 275 भी शामिल है।
- ची ने तीन शर्तें प्रस्तावित की हैं: चिकित्सकीय आकलन में लाइलाज बीमारी और असहनीय कष्ट की पुष्टि, स्वैच्छिक अनुरोध और चिकित्सा पेशेवरों की सहायता।
- ची इस याचिका को ताइवान में इच्छामृत्यु को वैध बनाने की मांग करने वाला पहला संवैधानिक मुकदमा बताते हैं।
- याचिका दायर होने की खबरों में सुनवाई या फैसले की कोई तारीख नहीं बताई गई।






