हजारों शिकायतें, कार्रवाई के लिए कोई आयुक्त नहीं
नेपाल के सत्य एवं मेलमिलाप आयोग को देश के सशस्त्र संघर्ष के दौरान हुए दुर्व्यवहारों के बारे में 78,909 शिकायतें मिली हैं, लेकिन संक्रमणकालीन न्याय के लिए जिम्मेदार दोनों निकायों में पद खाली होने से उनका काम ठप पड़ा है। संसदीय समीक्षा में राजनीतिक विभाजन, संस्थागत स्वतंत्रता की कमी और कर्मचारियों की कमजोर कार्यप्रेरणा को 21 नवंबर, 2006 के शांति समझौते के करीब दो दशक बाद भी न्याय दिलाने में प्रमुख बाधाएं बताया गया है।
विषय-सूची
- हजारों शिकायतें, कार्रवाई के लिए कोई आयुक्त नहीं
- संसदीय समीक्षा में क्या मिला
- शांति का वादा लंबा इंतजार कैसे बना
- शिकायतों की संख्या में करीब एक चौथाई की वृद्धि
- लापता लोगों के परिवार अलग लंबित मामलों से जूझ रहे हैं
- कानूनी विवाद क्यों अहम रहे
- पीड़ित चाहते हैं भरोसेमंद नियुक्तियां
- नई सरकार के वादे की हो रही है पड़ताल
- क्षतिपूर्ति के लिए धन और अपील का रास्ता जरूरी
- मुख्य बिंदु
हालिया गतिरोध सरकार के 5 मई, 2026 के अध्यादेश के बाद आया, जिसके तहत सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को हटाया गया। इनमें सत्य एवं मेलमिलाप आयोग और बलपूर्वक लापता किए गए व्यक्तियों की जांच आयोग के अधिकारी भी शामिल थे। उनके पद अब तक खाली हैं। इन अधिकारियों की नियुक्ति 14 मई, 2025 को हुई थी, यानी उन्हें हटाए जाने से एक साल से भी कम समय पहले।
राष्ट्रीय सभा की विधायी प्रबंधन समिति के तहत डॉ. अंजन शाक्य के नेतृत्व वाली एक उपसमिति ने छह कानूनों के क्रियान्वयन की जांच की। 20 जुलाई को गठित इस उपसमिति ने 30 अक्टूबर को अपने निष्कर्ष मूल समिति को सौंपे। बलपूर्वक लापता किए गए व्यक्तियों की जांच, सत्य एवं मेलमिलाप आयोग अधिनियम, 2014 की समीक्षा में ऐसी प्रक्रिया का वर्णन है, जिसके लिए व्यापक कानूनी व्यवस्था तो है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन पर्याप्त नहीं।
लापता परिजनों का पता जानने, यौन हिंसा को आधिकारिक मान्यता दिलाने या नुकसान के मुआवजे की मांग कर रहे परिवारों के लिए इसका तात्कालिक नतीजा एक और इंतजार है। संसदीय उपसमिति के सदस्य खम्म खाती ने कहा कि आयोगों में नियुक्तियां पहले होनी चाहिए।
आयोगों में पदाधिकारी नहीं हैं। सबसे पहले वहां काम शुरू होना चाहिए," उन्होंने कहा। "आयोगों का गठन होना चाहिए और उन्हें मिली शिकायतों की जांच कर उन्हें आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
संसदीय समीक्षा में क्या मिला
उपसमिति ने क्रियान्वयन को प्रभावित करने वाले पांच मुद्दों की पहचान की: संक्रमणकालीन न्याय को मुख्य रूप से पारंपरिक आपराधिक न्याय मानना; राजनीतिक पहल और सहमति का अभाव; क्षतिपूर्ति संबंधी सिफारिशों के खिलाफ पीड़ितों को अपील की अनुमति देने वाला प्रावधान; कर्मचारियों की कमजोर कार्यप्रेरणा; और आयोगों की सीमित वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता।
संघर्ष या व्यापक दुर्व्यवहार के दौर के बाद संक्रमणकालीन न्याय में कई काम शामिल होते हैं। नेपाल में इनमें यह पता लगाना कि क्या हुआ, जिम्मेदारी की जांच करना, न्याय और क्षतिपूर्ति देना तथा मेलमिलाप के लिए परिस्थितियां बनाना शामिल है। क्षतिपूर्ति से आशय पीड़ितों को हुए नुकसान की भरपाई के उपायों से है, जिनमें मुआवजा और अन्य सहायता शामिल हैं।
समीक्षा के अनुसार संवेदनशील मामलों की प्रभावी जांच के लिए आयोगों को स्वतंत्रता, संसाधन और प्रशासनिक अधिकारों की जरूरत है। इसमें अधिनियम के समर्थन के लिए बनाए गए 17 नियमों, निर्देशों और प्रक्रियाओं का भी उल्लेख है। समीक्षा के मुताबिक, नियम मौजूद होने और उन्हें लागू कर सकने वाले संस्थानों के बीच अंतर बना हुआ है।
खाती ने कहा कि कानून मंत्री ने संक्रमणकालीन न्याय के प्रावधानों को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई थी, लेकिन सरकार की कार्रवाई उस वादे के अनुरूप नहीं रही। उन्होंने न्याय, सत्य, क्षतिपूर्ति और स्थायी मेलमिलाप को इस प्रक्रिया के मुख्य उद्देश्य बताया।
कानून और प्रक्रियाएं बनाने के साथ अब काम राजनीतिक सहमति सुनिश्चित करना, आयोगों की संस्थागत क्षमता मजबूत करना और पीड़ितों के लिए न्याय की गारंटी देना है," उन्होंने कहा। "लेकिन एक बार फिर सरकार इस मुद्दे को प्राथमिकता देती नहीं दिख रही है।
शांति का वादा लंबा इंतजार कैसे बना
नेपाल का सशस्त्र संघर्ष 13 फरवरी, 1996 को शुरू हुआ और सरकार तथा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बीच 21 नवंबर, 2006 को व्यापक शांति समझौते पर हस्ताक्षर के साथ औपचारिक रूप से समाप्त हुआ। संसदीय समीक्षा में छह महीने के भीतर सत्य एवं मेलमिलाप आयोग गठित करने की प्रतिबद्धता का उल्लेख है।
दोनों आयोग अंततः 10 फरवरी, 2015 को गठित हुए, यानी शांति समझौते के आठ साल से भी अधिक समय बाद। राजनीतिक विवाद और कानूनी अनिश्चितता के कारण उनका गठन टलता रहा, जबकि बाद में हुई नियुक्तियों से पीड़ितों को अपेक्षित नतीजे नहीं मिले।
- 21 नवंबर, 2006: सरकार और माओवादी विद्रोहियों ने व्यापक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 2014: संक्रमणकालीन न्याय अधिनियम ने दोनों आयोगों के लिए कानूनी आधार बनाया।
- 10 फरवरी, 2015: दोनों आयोग गठित हुए।
- 2024: अधिनियम में संशोधनों से अतिरिक्त शिकायतें दर्ज करने का रास्ता खुला।
- 14 मई, 2025: आयोगों के अधिकारियों की तीसरी खेप नियुक्त की गई।
- 5 मई, 2026: एक अध्यादेश के जरिए उन अधिकारियों को हटाया गया और पद खाली रह गए, जो अब तक नहीं भरे गए हैं।
शांति प्रक्रिया के तहत हथियारों का प्रबंधन और माओवादी लड़ाकों का नेपाली सेना में एकीकरण आगे बढ़ा। कुछ निष्कासित लड़ाकों और संघर्ष के दौरान गंभीर रूप से घायल हुए लोगों की जरूरतों समेत अन्य मुद्दे भी अनसुलझे हैं। आम नागरिक पीड़ितों को न्याय दिलाना सबसे बड़ी अधूरी प्रतिबद्धताओं में से एक है।
शिकायतों की संख्या में करीब एक चौथाई की वृद्धि
सत्य एवं मेलमिलाप आयोग ने शुरुआत में 63,718 शिकायतें दर्ज की थीं। अब इनकी संख्या 78,909 है, यानी 15,191 की वृद्धि या करीब 24 प्रतिशत अधिक। 2024 के संशोधनों के बाद शिकायतें दर्ज करने की अवधि बढ़ने से उन लोगों को सामने आने का मौका मिला, जो पहले शिकायत दर्ज नहीं कर पाए थे।
इस अवधि को बढ़ाने में बलात्कार और अन्य यौन हिंसा झेल चुकी महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। संशोधनों पर पहले हुई संसदीय बहस के दौरान, मूल 63,718 शिकायतों में से केवल 314 बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़ी थीं, यानी करीब 0.5 प्रतिशत। पीड़ितों के लिए काम करने वालों का कहना था कि प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक थी।
आयोग की 2024/25 की वार्षिक रिपोर्ट में 173 शिकायतों की विस्तृत जांच दर्ज की गई। शुरुआती 63,718 शिकायतों की तुलना में यह करीब 0.27 प्रतिशत था, यानी दर्ज हर 1,000 शिकायतों पर तीन से भी कम विस्तृत जांच।
इसी वार्षिक रिपोर्ट में 618 लोगों को पहचान पत्र जारी करने, 538 मामलों में मुआवजे की सिफारिश और 2,268 शिकायतों को अभिलेखागार में रखने का उल्लेख है। ये आंकड़े अलग-अलग प्रकार की प्रशासनिक गतिविधियां दिखाते हैं, जबकि विस्तृत जांचों की संख्या से पता चलता है कि कथित दुर्व्यवहारों की जांच कितनी धीमी रही।
लापता लोगों के परिवार अलग लंबित मामलों से जूझ रहे हैं
बलपूर्वक लापता किए गए व्यक्तियों की जांच आयोग ने 3,288 शिकायतें दर्ज कीं। इसके काम के ब्योरे में 746 शिकायतों की जांच और 277 शिकायतों को सत्य एवं मेलमिलाप आयोग को भेजना शामिल है। आयोग ने 137 शिकायतों को दोहराई गई शिकायतें, 332 को अभिलेखागार में रखी गई शिकायतें और 2,542 को विस्तृत जांच के लिए सुरक्षित रखा गया बताया।
बलपूर्वक गुमशुदगी में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना या किसी अन्य तरीके से उसकी स्वतंत्रता छीनना और फिर उसके हाल या ठिकाने को छिपाना शामिल है। परिवारों के लिए यह जानना न्याय का अहम हिस्सा है कि उनका परिजन जीवित है या नहीं, उसे कहां ले जाया गया और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।
संसदीय समीक्षा के अनुसार मजबूत आयोग लापता लोगों के ठिकाने का पता लगाने और गंभीर उल्लंघनों की सच्चाई स्थापित करने में मदद कर सकते हैं। इसकी सिफारिशें संस्थागत सुधार को उन ठोस जवाबों से जोड़ती हैं, जिनकी परिवार वर्षों से मांग कर रहे हैं।
दोनों आयोगों का काम नियुक्तियां होने पर ही फिर शुरू हो सकता है। खाली पदों को भरने की कोई तारीख घोषित नहीं की गई है।
कानूनी विवाद क्यों अहम रहे
2014 के अधिनियम का उद्देश्य 2013 में जारी एक पुराने अध्यादेश की कमजोरियों को दूर करना था। यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शोध संग्रह में उपलब्ध अधिनियम के विश्लेषण में दो आयोगों, पुराने दुर्व्यवहारों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत और सत्य की खोज में संवेदनशील गवाहों की भागीदारी के प्रावधानों का वर्णन है।
शोधपत्र मूल कानून से जुड़ी चिंताओं की भी पहचान करता है। इनमें अंतरराष्ट्रीय अपराधों और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघनों के लिए संभावित आम माफी, सत्य की खोज, आम माफी और अभियोजन के बीच अस्पष्ट संबंध तथा व्यक्तिगत अधिकारों के लिए अपर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं। आम माफी एक कानूनी उपाय है, जो किसी व्यक्ति को अभियोजन या सजा से बचा सकता है।
2015 में नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने आम माफी से जुड़े करीब एक दर्जन प्रावधान रद्द कर दिए और सरकार को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अधिनियम संशोधित करने का निर्देश दिया। इसके बाद संसद में हुई बातचीत से पता चला कि जवाबदेही पर सहमति बनाना कितना मुश्किल था।
प्रतिनिधि सभा की एक पूर्व उपसमिति 19 मई को 21 दिन की समयसीमा के साथ गठित हुई थी। उसने 27 पंजीकृत संशोधनों वाले संशोधन विधेयक पर चर्चा में पांच महीने बिताए। चार विवाद बाकी रहे: किन हत्याओं को गंभीर उल्लंघन माना जाए, पीड़ितों के मेलमिलाप से इनकार करने पर क्या हो, संघर्ष में सीधे शामिल हुए बिना नुकसान झेलने वालों के मामले कैसे सुलझाए जाएं और सहयोग करने वाले अपराधियों की सजा कितनी घटाई जा सके।
ये चर्चाएं 2024 के संशोधनों से पहले हुई थीं। इनसे समझ आता है कि कानून पारित करने में सालों क्यों लगे: सांसद यह तय कर रहे थे कि किस पर अभियोजन चल सकता है, किन लोगों की चोटों और नुकसान को प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा और मेलमिलाप में पीड़ितों का कितना अधिकार होगा।
पीड़ित चाहते हैं भरोसेमंद नियुक्तियां
संघर्ष पीड़ित साझा मंच के संस्थापक अध्यक्ष सुमन अधिकारी ने ऐसे स्वतंत्र आयुक्तों की मांग की है जिन्हें संक्रमणकालीन न्याय का अनुभव हो और जिन पर पीड़ित भरोसा कर सकें। उन्होंने प्रमुख राजनीतिक दलों पर आयोगों का इस्तेमाल अपने समर्थकों को पद देने और राजनीतिक सौदेबाजी के लिए करने का आरोप लगाया है।
सुमन अधिकारी के पिता और शिक्षक मुक्तिनाथ अधिकारी को 16 जनवरी, 2002 को लामजुंग के दुराडांडा में उनके स्कूल से ले जाकर मार दिया गया था। उनकी पैरवी जवाबदेही की व्यक्तिगत मांग को संघर्ष पीड़ितों के लिए न्याय के व्यापक अभियान से जोड़ती है।
सुमन अधिकारी ने नए अधिकारियों के चयन के लिए सिफारिश समिति गठित करने की मांग की।
"हम जल्द समाधान चाहते हैं। सिफारिश समिति बनाकर आयोग में अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए," उन्होंने कहा।
संसदीय समीक्षा और पीड़ितों की मांगें सक्षम संस्थानों की जरूरत पर एकमत हैं। पद भरना, जांचकर्ताओं को पर्याप्त संसाधन देना और आयोगों की स्वतंत्रता सुरक्षित रखना आपस में जुड़े काम हैं। समीक्षा में कर्मचारियों की कार्यप्रेरणा को भी जांच और सच्चाई पता लगाने के संवेदनशील काम को प्रभावित करने वाली समस्या बताया गया है।
नई सरकार के वादे की हो रही है पड़ताल
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने करीब दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के बाद 27 मार्च, 2026 को सरकार बनाई। उसके चुनावी वादों में संक्रमणकालीन न्याय के बाकी काम तत्काल पूरे करने की पहल शामिल थी। इससे उन पीड़ितों में नई उम्मीद जगी, जो पिछली सरकारों से कार्रवाई की मांग करते हुए वर्षों से इंतजार कर रहे थे।
पीड़ितों के 40 संगठनों ने 23 अप्रैल को प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह को खुला पत्र भेजकर सत्य, न्याय और क्षतिपूर्ति की मांग की। उन्होंने सरकार के 100-सूत्री सुधार एजेंडे और उसकी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता में उनकी चिंताओं को शामिल न किए जाने की आलोचना की।
मई में आयुक्तों को हटाए जाने का कुछ पीड़ितों ने स्वागत किया। उन्होंने नियुक्तियों को राजनीतिक सत्ता-साझेदारी बताते हुए चुनौती दी थी। अब उनकी मांग है कि नई नियुक्ति प्रक्रिया से भरोसेमंद अधिकारी चुने जाएं और आयोग काम करने लगें।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की 8 मई को जारी प्राथमिकताओं में पीड़ितों से परामर्श, प्रक्रिया में उनकी भागीदारी और सभी पीड़ितों का दस्तावेजीकरण एवं पंजीकरण करने का आह्वान किया गया। इसमें अदालत के बाहर के तरीकों का समर्थन भी किया गया, साथ ही गंभीर उल्लंघनों के अपराधियों के खिलाफ बिना शर्त कार्रवाई की मांग रखी गई।
इन प्राथमिकताओं में पीड़ितों की सहायता और आपराधिक जवाबदेही को एक ही कार्यक्रम का हिस्सा माना गया है। गंभीर अपराधों की जांच के साथ-साथ लोगों को मान्यता, सहायता और लापता परिजनों के बारे में जवाबों की जरूरत हो सकती है।
क्षतिपूर्ति के लिए धन और अपील का रास्ता जरूरी
संसदीय उपसमिति के अनुसार नेपाल सरकार, अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अन्य स्रोतों के योगदान से एक अलग संक्रमणकालीन न्याय ट्रस्ट या कोष स्थापित किया गया है। उसने पीड़ितों के न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए इस कोष को सक्रिय करने की निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता का आह्वान किया।
समीक्षा में दाता देशों के साथ समन्वय और स्थानीय, प्रांतीय तथा संघीय सरकारों के समर्थन की भी मांग की गई है। इसकी सिफारिशों में तकनीकी और प्रशासनिक सहायता, पीड़ितों की सुरक्षा तथा रोजगार के अवसर शामिल हैं। जिन लोगों की आजीविका संघर्ष से प्रभावित हुई, उनके लिए ऐसे उपाय न्याय प्रक्रिया को रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ेंगे।
अध्ययन के अनुसार क्षतिपूर्ति पर आयोग की सिफारिशों से असंतुष्ट पीड़ित अपील कर सकते हैं। संशोधनों पर पहले हुई चर्चा में विशेष अदालत में क्षतिपूर्ति संबंधी अपील और उस अदालत के फैसलों की सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षा का प्रस्ताव भी रखा गया था। जब पीड़ितों को लगे कि किसी सिफारिश में उनके नुकसान का पर्याप्त समाधान नहीं हुआ, तब अपील के उपाय सुलभ होना अहम है।
नेपाल के सामने तत्काल काम स्पष्ट हैं: आयुक्तों की नियुक्ति करना, संस्थानों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देना, उनके कर्मचारियों को समर्थन देना और शिकायतों की जांच शुरू करना। संसदीय समीक्षा इन कदमों की जिम्मेदारी राजनीतिक नेताओं और सरकार पर डालती है, जबकि पीड़ित उन फैसलों का इंतजार कर रहे हैं जो कानूनी वादों को कार्रवाई में बदलें।
मुख्य बिंदु
- सत्य एवं मेलमिलाप आयोग को 78,909 शिकायतें मिली हैं, जो शुरुआत में मिली शिकायतों से करीब 24 प्रतिशत अधिक हैं।
- 5 मई, 2026 के अध्यादेश के तहत अधिकारियों को हटाए जाने के बाद संक्रमणकालीन न्याय के दोनों आयोगों में पद खाली हैं।
- संसदीय समीक्षा में राजनीतिक असहमति, सीमित स्वायत्तता और कर्मचारियों की कमजोर कार्यप्रेरणा को प्रमुख बाधाएं बताया गया है।
- सत्य एवं मेलमिलाप आयोग की 2024/25 की रिपोर्ट में 173 विस्तृत जांच दर्ज की गईं।
- पीड़ित संगठन स्वतंत्र नियुक्तियां, भागीदारी, सत्य, जवाबदेही और क्षतिपूर्ति चाहते हैं।
- आयोगों के खाली पद भरने की कोई तारीख घोषित नहीं की गई है।






