1.2 करोड़ श्रमिकों के लिए प्रस्तावित सुरक्षा जाल
भारत डिजिटल प्लेटफॉर्मों के जरिए होने वाले लेनदेन पर 2% उपकर लगाने पर विचार कर रहा है। इसका इस्तेमाल 1.2 करोड़ से अधिक गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। यह योजना 2027 में शुरू हो सकती है। शुरुआती प्रस्तावित लाभों में जीवन और दिव्यांगता बीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य कवरेज और मातृत्व लाभ शामिल हैं।
विषय-सूची
- 1.2 करोड़ श्रमिकों के लिए प्रस्तावित सुरक्षा जाल
- गणना दर जितनी ही क्यों अहम है
- सामाजिक सुरक्षा संहिता से प्रस्ताव का संबंध
- श्रमिकों को पहले क्या मिल सकता है
- पात्रता और लाभ श्रमिकों के साथ कैसे चल सकते हैं
- कोष की निगरानी कौन करेगा?
- श्रमिक प्रतिनिधित्व पर आलोचना
- कार्यबल मौजूदा आकार से लगभग दोगुना होने की राह पर
- अगले फैसलों की समय-सीमा
- मुख्य बिंदु
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 30 अक्टूबर, 2026 को गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड को अधिसूचित किया था। इस बोर्ड से योजना का ढांचा तय करने की उम्मीद है। नवंबर 2026 के दूसरे पखवाड़े में बैठक होने की संभावना थी, हालांकि बैठक की कोई निश्चित तारीख या योजना शुरू होने की पुष्टि नहीं की गई।
प्रस्ताव के तहत एग्रीगेटर सामाजिक सुरक्षा कोष के जरिए पूरा पैसा देंगे। श्रमिकों और केंद्र सरकार को कोई योगदान नहीं देना होगा। एग्रीगेटर वे व्यवसाय हैं जो ग्राहकों को सेवा देने वालों से जोड़ते हैं, जैसे ऐप के जरिए सवारी स्वीकार करने वाला चालक या ऑर्डर पहुंचाने वाला डिलीवरी कर्मी।
मुख्य विवाद इस बात पर है कि 2% की दर किस राशि पर लागू होगी। ग्राहक के पूरे लेनदेन पर प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लगाने और प्लेटफॉर्म द्वारा अपने पास रखे गए राजस्व पर उतना ही प्रतिशत लगाने से बिल में काफी अंतर हो सकता है। डिलीवरी कंपनियों और परिवहन प्लेटफॉर्मों ने अलग-अलग तरीकों की वकालत की है।
श्रमिकों के लिए यह प्रस्ताव दुर्घटना, बीमारी या गर्भावस्था के कारण कमाई रुकने पर आर्थिक मदद दे सकता है। पेंशन और भविष्य निधि जैसे लाभ, जो आगे के जीवन के लिए सहारा देते हैं, योजना की शुरुआत के बजाय बाद के चरण में दिए जा सकते हैं।
गणना दर जितनी ही क्यों अहम है
चर्चा में शामिल अधिकारी योगदान को कंपनी के कुल कारोबार पर बिना भेदभाव लागू करने के बजाय, अलग-अलग लेनदेन से जुड़े गिग राजस्व के आधार पर तय करने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि इससे एक तरह के एग्रीगेटर को दूसरी तरह के एग्रीगेटर को सब्सिडी देने से रोका जा सकेगा, क्योंकि उनके व्यवसाय राजस्व का लेखा-जोखा अलग-अलग तरीके से रखते हैं।
जोमैटो और स्विगी समेत खाद्य डिलीवरी और क्विक कॉमर्स कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्मों के जरिए हुए लेनदेन के मूल्य को आधार बनाने का समर्थन किया है। उबर और रैपिडो ने सवारी के पूरे मूल्य के बजाय अपने कारोबार को आधार बनाने का पक्ष लिया है।
परिवहन प्लेटफॉर्मों का तर्क है कि किराये का अधिकांश हिस्सा चालक को जाता है। इसलिए पूरे किराये पर शुल्क लगाने में वह पैसा भी शामिल होगा जिसे प्लेटफॉर्म अपने पास नहीं रखता। डिलीवरी कारोबार ने लेनदेन के व्यापक मूल्य को आधार बनाने का समर्थन किया है, जो उनके परिचालन में आय अर्जित करने और उसका लेखा रखने के तरीकों के अंतर को दर्शाता है।
इसलिए लेनदेन पर उपकर और गिग राजस्व पर उपकर की गणना अपने आप समान नहीं होती। अंतिम ढांचे में यह स्पष्ट करना होगा कि भुगतान का कौन-सा हिस्सा गिना जाएगा: ग्राहक का पूरा भुगतान, प्लेटफॉर्म के पास बचा राजस्व या सेवा से जुड़ी कोई अन्य परिभाषित राशि।
कोष के लिए यह परिभाषा तय करेगी कि उसमें कितना पैसा आएगा। प्लेटफॉर्मों के लिए इससे तय होगा कि डिलीवरी, परिवहन और अन्य सेवाओं में योगदान की तुलना कैसे होगी। एक ही प्रतिशत अलग-अलग राजस्व आधारों पर लागू होने से वित्तीय बोझ असमान हो सकता है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता से प्रस्ताव का संबंध
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को मान्यता देने और उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने का कानूनी ढांचा देती है। इसमें एग्रीगेटर के योगदान का सूत्र सालाना कारोबार के 1% से 2% के बीच बताया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को देय राशि का 5% है।
यह अधिकतम सीमा अहम है, क्योंकि कारोबार के आधार पर गणना से बड़ी राशि निकलने पर भी यह श्रमिकों को किए जाने वाले भुगतान के अनुपात में योगदान को सीमित करती है। प्रस्तावित 2% दर निर्धारित दायरे की ऊपरी सीमा पर है, जबकि लेनदेन को लेकर जारी चर्चा गणना के आधार से संबंधित है।
वीआईटी स्कूल ऑफ लॉ की जैस्मिन ज्योति के ने इंडियन जर्नल ऑफ लॉ एंड लीगल रिसर्च में प्रकाशित योगदान का अकादमिक विश्लेषण में इन मुद्दों की पड़ताल की है। लेख के अनुसार, उसे लिखे जाने के समय योगदान की दर और लागू होने की तारीख तय नहीं थी और धारा 114 के तहत कोई योजना चालू नहीं थी।
लेख में प्लेटफॉर्मों से मिली जानकारी पर अत्यधिक निर्भरता की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इसमें योगदान का स्पष्ट आधार तय करने, न्यूनतम भुगतान की शर्त, कोष के पैसे की सुरक्षा और सार्वजनिक निगरानी तथा राज्य करों में एकरूपता की सिफारिश की गई है। ये सुझाव दो व्यावहारिक कामों पर केंद्रित हैं: सही राशि वसूलना और यह सुनिश्चित करना कि श्रमिकों को उपयोगी सहायता मिले।
श्रमिकों को पहले क्या मिल सकता है
शुरुआती प्रस्तावित पैकेज में जीवन और दिव्यांगता बीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य लाभ और मातृत्व सहायता पर जोर है। ये उन स्थितियों में मदद दे सकते हैं जिनमें श्रमिक को चिकित्सा खर्च उठाना पड़े, उसकी आय रुक जाए या परिवार अपने मुख्य कमाने वाले को खो दे।
चर्चा में शामिल एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने योजना को लगभग तैयार बताया और संकेत दिया कि इसे 2027 में लागू किया जा सकता है। पेंशन, भविष्य निधि और बुढ़ापे के लिए अन्य सुरक्षा बाद में शुरू की जा सकती है, जब सरकार को यह बेहतर भरोसा हो जाए कि श्रमिक कितने समय तक गिग रोजगार में बने रहते हैं।
व्यापक संहिता में योजनाओं के अधिक विकल्पों की अनुमति है, जिनमें बुढ़ापे की सुरक्षा और शिशु देखभाल केंद्र भी शामिल हैं। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के योगदान और कुछ जुर्मानों से धन जुटाने की भी परिकल्पना है। फिलहाल विचाराधीन योजना में केवल एग्रीगेटर योगदान करेंगे।
लाभ की राशि, कवरेज की विस्तृत शर्तें और दावा करने की प्रक्रिया अभी तय नहीं हुई हैं। इन्हीं फैसलों से तय होगा कि दुर्घटना, बीमारी, दिव्यांगता या मृत्यु के बाद श्रमिक या उसके परिवार को वास्तव में कितनी मदद मिल सकेगी।
पात्रता और लाभ श्रमिकों के साथ कैसे चल सकते हैं
योजना के लिए बताई गई पात्रता शर्तों के अनुसार, एक वित्त वर्ष में किसी एक एग्रीगेटर के साथ कम से कम 90 दिन काम करना होगा या कई प्लेटफॉर्मों पर कुल 120 दिन काम करना होगा। इसलिए कई ऐप इस्तेमाल करने वाले श्रमिक को एक ही ऐप पर काम करने वाले की तुलना में पात्रता के लिए अधिक समय देना होगा।
भारत की पंजीकरण व्यवस्था में आधार से जुड़ी सार्वभौमिक खाता संख्या की परिकल्पना है। इससे श्रमिकों को लाभ पाने के लिए एक स्थायी पहचान मिलेगी, जिसमें राज्यों के बीच स्थान बदलने पर भी मदद शामिल है। श्रमिकों के पंजीकरण में प्लेटफॉर्म सरकार के साथ काम करेंगे।
पंजीकरण और काम का रिकॉर्ड, दोनों को साथ-साथ काम करना होगा। उदाहरण के लिए, डिलीवरी और परिवहन ऐपों के बीच काम बदलने वाले व्यक्ति की पात्रता के लिए विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर की गई गतिविधि को कुल अवधि में गिनना होगा। बोर्डों के काम में राज्य स्तर पर रखे गए रिकॉर्ड की समीक्षा करना भी शामिल है।
कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि का कवरेज अलग तरीके से लागू होता है। संहिता के तहत उद्योग के प्रकार की परवाह किए बिना, 20 या उससे अधिक कर्मचारी रखने वाले प्रतिष्ठानों पर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के प्रावधान लागू होते हैं। प्रस्तावित योजना में गिग श्रमिकों के लिए भविष्य निधि सहायता बाद के चरण में दिए जाने वाले लाभों में शामिल है।
कोष की निगरानी कौन करेगा?
केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया 22 सदस्यीय गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिक बोर्ड के अध्यक्ष हैं। केंद्रीय श्रम सचिव उपाध्यक्ष हैं। बोर्ड में अन्य सदस्यों के साथ पांच एग्रीगेटर प्रतिनिधि और पांच श्रमिक प्रतिनिधि शामिल हैं।
बोर्ड में शामिल कंपनियों में जोमैटो की मूल कंपनी इटर्नल, स्विगी, जेप्टो, अर्बन कंपनी और रैपिडो हैं। श्रमिक संगठनों में भारतीय मजदूर संघ, इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स और नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस शामिल हैं।
सरकार ने असंगठित श्रमिकों के लिए 40 सदस्यों का एक अलग बोर्ड भी गठित किया है। इसमें श्रमिकों के सात और नियोक्ताओं के सात प्रतिनिधि हैं। दोनों बोर्डों का कार्यकाल तीन साल का है और उन्हें साल में कम से कम तीन बार बैठक करनी होगी।
बोर्ड केंद्र सरकार को योजनाओं की सिफारिश करते हैं, कल्याण कार्यक्रमों की निगरानी करते हैं, कोष के खर्च की समीक्षा करते हैं और संहिता के प्रशासन पर सलाह देते हैं। उनकी जिम्मेदारियों में राज्य स्तर पर रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था की जांच करना भी शामिल है। इन कार्यों के तहत वित्तपोषण और लाभ पहुंचाने, दोनों की निगरानी उनके दायरे में आती है।
श्रमिक प्रतिनिधित्व पर आलोचना
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव अमरजीत कौर ने बोर्डों की संरचना की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल के करीब संगठनों का पक्ष झुका हुआ है। उन्होंने कहा कि उनके संगठन से नामांकन देने को कहा गया था, लेकिन उसे प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
कौर ने यह भी कहा कि 2011 में यूनियन की सदस्यता के आधार पर शुरू की गई सत्यापन प्रक्रिया उसके नतीजे प्रकाशित किए बिना रोक दी गई थी। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस ने कई मान्यता प्राप्त यूनियनों को बाहर रखने को चुनौती दी है। विपक्ष शासित राज्यों के सीमित प्रतिनिधित्व पर भी आलोचना हुई है।
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुदीप दत्ता ने कहा कि उनका संगठन सरकार के सामने और संसद में बोर्ड की संरचना को चुनौती देगा:
हम श्रम मंत्री को पत्र लिखेंगे और संसद में भी यह मुद्दा उठाएंगे,
भारतीय मजदूर संघ के उपाध्यक्ष पवन कुमार ने कहा कि उनका संगठन जल्द बैठक चाहता है ताकि वह अपने कल्याण संबंधी प्रस्ताव पेश कर सके। इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के सह-संस्थापक शेख सलाउद्दीन ने कहा कि बोर्ड की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि श्रमिकों और उनके परिवारों तक लाभ पहुंचते हैं या नहीं।
असहमति इस बात को लेकर है कि योगदान के नियम, पात्रता और खर्च की प्राथमिकताएं तय करने में किसकी भूमिका होगी। प्लेटफॉर्म अपने भुगतान से जुड़ी चर्चाओं में हिस्सा लेंगे, जबकि श्रमिक प्रतिनिधियों से कवरेज और आसानी से मिलने वाले लाभों की मांग करने की अपेक्षा होगी।
कार्यबल मौजूदा आकार से लगभग दोगुना होने की राह पर
भारत में गिग श्रमिकों की संख्या 2025-26 में करीब 1.2 करोड़ पहुंच गई, जो 2020-21 में 77 लाख थी। यह लगभग 43 लाख श्रमिकों की बढ़ोतरी है, यानी करीब 55% की वृद्धि। अब यह समूह कार्यबल के 2% से अधिक है।
नीति आयोग का अनुमान है कि 2029-30 तक गिग श्रमिकों की संख्या 2.35 करोड़ हो जाएगी, जो कार्यबल का 6.7% होगी। 2025-26 के 1.2 करोड़ के अनुमान से तुलना करें तो यह 1.15 करोड़ और श्रमिकों की बढ़ोतरी होगी, यानी करीब 96% की वृद्धि।
प्रस्ताव के साथ दिए गए आर्थिक अनुमानों के अनुसार, 2029-30 तक इस क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान ₹2.35 लाख करोड़ होगा, जबकि एक अन्य उद्धृत अनुमान ₹2.25 लाख करोड़ है। ये राशियां क्रमशः ₹2.35 ट्रिलियन और ₹2.25 ट्रिलियन के बराबर हैं। सकल घरेलू उत्पाद किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापता है।
सरकार ने अलग से दावा किया है कि आबादी में सामाजिक सुरक्षा कवरेज 2015 के 19% से बढ़कर 2025 में 64.3% हो गया, जिससे करीब 94 करोड़ लोग लाभान्वित हुए। प्रस्तावित गिग श्रमिक योजना का लक्ष्य अधिक विशिष्ट है: प्लेटफॉर्मों के जरिए काम करने वालों के लिए लाभ, वित्तपोषण और पंजीकरण की स्पष्ट व्यवस्था बनाना।
अगले फैसलों की समय-सीमा
योजना का विकास कानूनी ढांचे, नए प्रशासनिक निकायों और वित्तपोषण पर बातचीत के जरिए हुआ है। अगले फैसलों में योगदान का सूत्र और लाभ पैकेज तय करना शामिल है। इसके बाद इन्हें लागू करने के लिए जरूरी नियम बनाने होंगे।
- 2020: सामाजिक सुरक्षा संहिता ने गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को मान्यता देने का कानूनी ढांचा बनाया।
- 2025-26: भारत में गिग श्रमिकों की संख्या करीब 1.2 करोड़ आंकी गई, जो 2020-21 में 77 लाख थी।
- 30 अक्टूबर, 2026: श्रम मंत्रालय ने दो राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्डों को अधिसूचित किया।
- नवंबर 2026 का दूसरा पखवाड़ा: योजना का ढांचा विचारने के लिए गिग श्रमिक बोर्ड की बैठक होने की उम्मीद थी।
- 2027: चर्चा में शामिल एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, प्रस्तावित योजना शुरू हो सकती है।
- 2029-30: नीति आयोग ने गिग श्रमिकों की संख्या 2.35 करोड़ होने का अनुमान जताया है।
मुख्य फैसला यह है कि प्लेटफॉर्मों की गतिविधियों को कल्याणकारी वित्तपोषण के भरोसेमंद स्रोत में कैसे बदला जाए। योगदान का स्पष्ट आधार, विभिन्न ऐपों पर काम गिनने वाले रिकॉर्ड और कारगर दावा प्रक्रिया, कंपनियों द्वारा दिए गए उपकर को श्रमिकों तक पहुंचने वाली सहायता से जोड़ेंगे।
मुख्य बिंदु
- भारत 1.2 करोड़ से अधिक गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लाभों के लिए 2% उपकर लगाने पर विचार कर रहा है।
- प्रस्तावित योजना का पूरा वित्तपोषण एग्रीगेटर करेंगे और यह 2027 में शुरू हो सकती है।
- डिलीवरी और परिवहन प्लेटफॉर्म योगदान की गणना के अलग-अलग तरीकों के पक्ष में हैं।
- शुरुआती लाभों में जीवन, दिव्यांगता, दुर्घटना, स्वास्थ्य और मातृत्व सुरक्षा शामिल हो सकती है।
- पात्रता के लिए एक वित्त वर्ष में किसी एक एग्रीगेटर के साथ 90 दिन या कई प्लेटफॉर्मों पर 120 दिन काम करना होगा।
- गिग श्रमिक बोर्ड में 22 सदस्य हैं और इसकी अध्यक्षता श्रम मंत्री मनसुख मांडविया करते हैं।
- पेंशन और भविष्य निधि सहायता बाद में दी जा सकती है।






