विभाजित सरकार की तैयारी के बीच भारत को वार्ता में अधिक गुंजाइश
नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स के अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल करने के बाद, भारत को पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर की अमेरिकी खरीद से जुड़े प्रस्तावित व्यापार समझौते पर नए सिरे से फैसला करना होगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एजेंडे को राजनीतिक समर्थन का नुकसान हुआ है, लेकिन उनके पास टैरिफ बढ़ाने और नई दिल्ली से रियायतें लेने के कई कानूनी रास्ते अब भी हैं।
विषय-सूची
- विभाजित सरकार की तैयारी के बीच भारत को वार्ता में अधिक गुंजाइश
- घरेलू खर्च चुनावी नाराजगी में क्यों बदले
- कांग्रेस क्या बदल सकती है और ट्रंप के नियंत्रण में अब भी क्या है
- फरवरी के ढांचे पर अंतिम समझौते का इंतजार
- टैरिफ के आंकड़ों को सावधानी से समझना क्यों जरूरी है
- दो जांचें सौदेबाजी की शर्तें बदल सकती हैं
- जल्दबाजी में हुआ समझौता असमान रियायतें ला सकता है
- ईरान और रूसी तेल व्यापार को ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ते हैं
- वीजा और रक्षा सहयोग अलग रास्तों पर
- वार्ता को आकार देने वाली तारीखें
- मुख्य बिंदु
4 नवंबर को घोषित नतीजों में डेमोक्रेट्स ने सीनेट की पांच सीटें और प्रतिनिधि सभा के आधा दर्जन से अधिक निर्वाचन क्षेत्र जीते। मतगणना जारी थी और प्रमाणन में कई दिन लगने की उम्मीद थी। जीवन-यापन की लागत, आयात शुल्क और ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर नाराजगी से रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा।
भारत के लिए तत्काल अवसर यह है कि उसे कृषि, औद्योगिक वस्तुओं और डिजिटल व्यापार से जुड़ी मांगें जल्दबाजी में स्वीकार किए बिना अमेरिकी बाजारों तक पहुंच पर बातचीत के लिए अधिक गुंजाइश मिलेगी। सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने के लिए अधिकृत नहीं होने के कारण नाम न बताने की शर्त पर बात कर रहे भारतीय अधिकारियों ने कहा कि कांग्रेस की मजबूत निगरानी से नई दिल्ली पर दबाव कम हो सकता है।
व्यापार विशेषज्ञ उलटी दिशा में एक जोखिम भी देखते हैं: ट्रंप यह दिखाने के लिए भारत के साथ जल्द समझौता करने की कोशिश कर सकते हैं कि वे विदेश में अब भी नतीजे हासिल कर सकते हैं। इसलिए मुख्य सवाल यह है कि अपने बाजार खोलने के बदले भारत कितनी टिकाऊ टैरिफ राहत हासिल कर सकता है।
घरेलू खर्च चुनावी नाराजगी में क्यों बदले
SSRS द्वारा किए गए AP Voter Poll में 39% मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था को देश का सबसे अहम मुद्दा बताया। यह लोकतंत्र (32%) और आव्रजन (14%) से आगे था। करीब तीन-चौथाई लोगों ने आर्थिक हालात को खराब बताया, जबकि 65% ने कहा कि ट्रंप की नीतियों ने उन्हें और बिगाड़ा है।
महंगाई दर 3.7% बताई गई, जबकि ट्रंप के दोबारा पद संभालने के समय यह 2.4% थी। यानी 1.3 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई और महंगाई दर फेडरल रिजर्व के 2% लक्ष्य से 1.7 प्रतिशत अंक ऊपर पहुंच गई। घरों के लिए लगातार महंगाई का मतलब है कि कीमतें बढ़ती रहती हैं, भले ही बढ़ोतरी की रफ्तार पहले आई तेज उछाल से कम हो।
टैरिफ ने दबाव और बढ़ाया। आयात शुल्क उस कारोबारी से वसूला जाता है जो कोई उत्पाद अमेरिका में लाता है। कवरेज में बताए गए शोध के अनुसार, इस लागत का बड़ा हिस्सा आखिरकार ऊंची कीमतों के जरिए अमेरिकी उपभोक्ताओं तक पहुंचा। ABC News के एक सर्वेक्षण में 64% लोगों ने कहा कि टैरिफ जरूरत से ज्यादा बढ़ गए हैं।
ईरान युद्ध ने दबाव का दूसरा स्रोत जोड़ा। बताया गया कि संघर्ष शुरू होने के बाद खुदरा ईंधन कीमतें करीब 50% बढ़ गईं। AP Voter Poll में 62% लोगों ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने के फैसले को गलत माना और 74% ने कहा कि संघर्ष उनके कांग्रेस चुनाव में वोट देने के फैसले का बड़ा या निर्णायक कारक था।
कांग्रेस क्या बदल सकती है और ट्रंप के नियंत्रण में अब भी क्या है
डेमोक्रेट्स के नियंत्रण से कांग्रेस की समितियों को टैरिफ संबंधी फैसलों की जांच करने, प्रशासन के अधिकारियों से सवाल पूछने और कारोबारों तथा उपभोक्ताओं पर उनके असर की पड़ताल करने की अधिक शक्ति मिलेगी। कांग्रेस कानून बनाने और संघीय खर्च पर भी नियंत्रण रखती है, जिससे सांसदों को व्हाइट हाउस के साथ सौदेबाजी के रास्ते मिलते हैं।
व्यापार विशेषज्ञ बिस्वजीत धर ने कहा कि समितियां आयात प्रतिबंधों की जांच कर सकती हैं और रियायतें हासिल करने के लिए बजट संबंधी फैसलों का इस्तेमाल कर सकती हैं। सीनेटर रॉन वाइडन, जिन्हें सीनेट की वित्त समिति का संभावित अध्यक्ष बताया गया है, और चार्ल्स शूमर, जिन्हें संभावित बहुमत नेता माना जा रहा है, से जुड़े प्रस्ताव व्यापार नीति पर राष्ट्रपति के नियंत्रण को चुनौती देंगे। शूमर का प्रस्ताव 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 समेत ट्रंप द्वारा इस्तेमाल किए गए कई अधिकारों को निरस्त करेगा।
ऐसे बदलाव पारित करने के लिए समिति में जीत पर्याप्त नहीं होगी। ट्रंप विधेयक पर वीटो कर सकते हैं और राष्ट्रपति के वीटो को निष्प्रभावी करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। सीनेट के प्रक्रियागत नियम भी विधेयक को आगे बढ़ाना मुश्किल बना सकते हैं। नवनिर्वाचित कांग्रेस जनवरी 2027 में कार्यभार संभालेगी, इसलिए उसकी समितियों और विधायी शक्तियां चुनावी रात के तुरंत बाद पूरी तरह लागू नहीं होंगी।
ट्रंप ने Truth Social पर "VETO" शब्द वाली लाल टोपी की तस्वीर पोस्ट कर विरोध का संकेत दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वे आव्रजन समेत कई मुद्दों पर डेमोक्रेट्स के साथ सहयोग करने को तैयार हैं।
भारत के पूर्व राजदूत मोहन कुमार ने तर्क दिया कि घरेलू स्तर पर सीमित राष्ट्रपति विदेश नीति पर अधिक ध्यान दे सकता है। उनके आकलन में, ट्रंप अपना कार्यकाल जनवरी 2029 में खत्म होने तक व्यापार, सुरक्षा और कूटनीति में कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं।
फरवरी के ढांचे पर अंतिम समझौते का इंतजार
भारत और अमेरिका ने फरवरी 2026 में अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक ढांचे की घोषणा की थी। अंतिम समझौते पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं और उसे लागू भी नहीं किया गया है। प्रस्तावित व्यवस्था में भारत की ओर से टैरिफ में कटौती और अमेरिकी उत्पादों की बड़ी खरीद के बदले कई भारतीय निर्यात पर अमेरिकी शुल्क कम करने की बात है।
भारत अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कई कृषि तथा खाद्य उत्पादों पर टैरिफ घटाएगा या खत्म करेगा। इनमें पशु चारा, मेवे, फल, सोयाबीन तेल, वाइन और शराब शामिल हैं। ढांचे में पांच वर्षों के दौरान ऊर्जा, विमान, कीमती धातुओं, प्रौद्योगिकी उत्पादों और कोकिंग कोयले समेत 500 अरब डॉलर की अमेरिकी वस्तुओं की खरीद भी प्रस्तावित थी।
इस खरीद प्रतिबद्धता का पांच वर्षों में औसत सालाना मूल्य 100 अरब डॉलर बैठता है। इसका बड़ा पैमाना इसे लागू करने की शर्तों को अहम बनाता है: खरीद के फैसले करते समय भारतीय कारोबारों और सार्वजनिक खरीदारों को कीमतों, मांग और प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ताओं पर विचार करना होगा।
कपड़ों, वस्त्रों, चमड़े, जूतों, प्लास्टिक, रसायनों और कुछ मशीनों समेत कई भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित अमेरिकी पारस्परिक टैरिफ 18% था। ढांचे में कुछ विमान उत्पादों, जेनेरिक दवाओं, रत्नों और हीरों पर टैरिफ हटाने के साथ-साथ आपसी हित के क्षेत्रों में तरजीही पहुंच की भी बात थी।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि दोनों देश समझौते पर हस्ताक्षर करने के "बेहद करीब" हैं और "99 प्रतिशत काम" पूरा हो चुका है। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि इस समझौते से भारत को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। हस्ताक्षर की कोई अंतिम तारीख घोषित नहीं की गई।
टैरिफ के आंकड़ों को सावधानी से समझना क्यों जरूरी है
भारत पर लागू टैरिफ बार-बार बदले हैं और अलग-अलग दरें व्यापार के विभिन्न चरणों या श्रेणियों को दर्शाती हैं। भारतीय वस्तुओं पर शुल्क कथित तौर पर अधिकतम 50% तक पहुंचे थे, जबकि फरवरी के ढांचे में कई उत्पादों पर 18% पारस्परिक दर प्रस्तावित थी।
20 फरवरी को Learning Resources, Inc. v. Trump मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम के तहत लगाए गए पारस्परिक टैरिफ रद्द कर दिए। उस फैसले के बाद सामान्य आधार दर 10% बताई गई, जबकि चीन को छोड़कर ज्यादातर देशों पर मौजूदा टैरिफ 10% से 12.5% के बीच बताए गए।
क्षेत्र-विशेष के शुल्क अलग कानूनी रास्ते से लागू होते हैं। बताया गया कि भारत समेत स्टील और एल्युमीनियम के आयात पर 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत 50% टैरिफ लागू रहे। आपातकालीन टैरिफ संबंधी शक्तियों पर अदालत के फैसले के बाद भी ये शुल्क बने रहे।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने चेतावनी दी कि भविष्य के किसी समझौते में भारतीय उत्पादों पर सामान्य अमेरिकी टैरिफ से 15 से 18 प्रतिशत अंक अधिक अतिरिक्त शुल्क लग सकते हैं। उनकी चेतावनी संभावित समझौते की संरचना से जुड़ी है, जबकि ढांचे की 18% दर और उसके बाद की आधार दर टैरिफ नीति के अलग-अलग चरणों को दर्शाती हैं।
निर्यातक के लिए वास्तविक गणना उत्पाद, शुल्क के पीछे के कानूनी अधिकार और किसी अतिरिक्त शुल्क के जुड़ने पर निर्भर करती है। एक ही मुख्य दर हर खेप की स्थिति नहीं बता सकती।
दो जांचें सौदेबाजी की शर्तें बदल सकती हैं
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय से 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत विनिर्माण में अतिरिक्त क्षमता की जांच के निष्कर्ष जारी करने की उम्मीद है। प्रशासन इन निष्कर्षों का इस्तेमाल नए शुल्क लगाने और भारत समेत साझेदार देशों के साथ टैरिफ व्यवस्थाओं पर फिर से बातचीत के लिए कर सकता है।
अतिरिक्त क्षमता का मतलब है कि उत्पादन की क्षमता उपलब्ध मांग से ज्यादा हो। वाशिंगटन को चिंता है कि विदेशों में सरकारी समर्थन या अन्य नीतियां जरूरत से ज्यादा उत्पादन को बढ़ावा दे सकती हैं, जो फिर ऐसी कीमतों पर अमेरिकी बाजारों में पहुंचे जो घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुंचाएं।
धारा 301 के तहत एक अलग जांच इस बात से जुड़ी थी कि व्यापारिक साझेदार जबरन मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठा रहे हैं या नहीं। इस प्रक्रिया के तहत भारत पर 10% टैरिफ की खबर थी। विनिर्माण संबंधी जांच शुल्क का एक और संभावित स्रोत बनाती है।
धारा 301 अमेरिका को उन विदेशी तौर-तरीकों के जवाब में कार्रवाई की अनुमति देती है जिन्हें वह अमेरिकी व्यापार के लिए अनुचित या नुकसानदेह मानता है। धारा 232 ऐसे आयात पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देती है जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाए। दोनों कांग्रेस द्वारा पहले पारित कानूनों के तहत काम करते हैं, जिससे प्रशासन हर उपाय के लिए नए वोट की मांग किए बिना कार्रवाई कर सकता है।
जल्दबाजी में हुआ समझौता असमान रियायतें ला सकता है
श्रीवास्तव को उम्मीद है कि चुनावी हार के बाद ट्रंप भारत के साथ दिखाने लायक समझौता करने के लिए और उत्सुक होंगे। उन्होंने कहा कि घरेलू विनिर्माण को समर्थन, आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना और संरक्षणवादी टैरिफ अब अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों की नीतियों में शामिल हैं। इनमें यूनियन की नौकरियों को लेकर चिंतित डेमोक्रेट्स भी हैं।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक श्रीवास्तव ने भारत पर पड़ने वाले अपेक्षित दबाव का वर्णन किया:
रूस, चीन और ईरान के खिलाफ विदेश नीति का दबदबा काम नहीं कर रहा है, इसलिए ट्रंप को जल्द जीत चाहिए। अमेरिकी प्रभाव दिखाने के लिए भारत पर व्यापार समझौते का दबाव बढ़ने की उम्मीद है।
उनकी मुख्य चिंता सामान्य आयात शुल्क को लेकर है, जिन्हें मोस्ट फेवर्ड नेशन टैरिफ कहा जाता है। नाम के बावजूद, MFN आम तौर पर वह मानक टैरिफ है जो विश्व व्यापार संगठन का कोई सदस्य दूसरे सदस्यों पर लागू करता है। प्रस्तावित ढांचे के तहत भारत अमेरिकी वस्तुओं पर इनमें से कई शुल्क घटाएगा, जबकि वाशिंगटन अपने मानक टैरिफ बनाए रखेगा और अतिरिक्त शुल्कों से राहत देगा।
विश्व व्यापार संगठन के विशेषज्ञ अभिजीत दास ने चेताया कि अमेरिकी वस्तुओं को तरजीही पहुंच देना भारत की MFN प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन हो सकता है, जब तक कि यह व्यवस्था किसी अपवाद, जैसे वैध मुक्त व्यापार समझौते, के अंतर्गत न आती हो। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सामान्य शुल्कों में अमेरिका की ओर से वैसी ही कटौती के बिना कोई समझौता इस शर्त को पूरा करेगा।
कोआन एडवाइजरी ग्रुप में भू-राजनीति और नीति निदेशक दीप पाल भारत के लिए एक अवसर देखते हैं। उन्होंने कहा कि वार्ताकार यह मान सकते हैं कि ट्रंप की कमजोर राजनीतिक स्थिति से बेहतर समझौता संभव है, जिससे बातचीत फिर शुरू हो सकती है। दोनों पक्षों के हित स्पष्ट हैं: वाशिंगटन ऐसा समझौता चाहता है जिसे वह जीत के रूप में पेश कर सके, जबकि नई दिल्ली प्रतिस्पर्धी निर्यातकों पर टिकाऊ बढ़त चाहती है।
ईरान और रूसी तेल व्यापार को ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ते हैं
ईरान के खिलाफ युद्ध ऊर्जा कीमतों, जहाजरानी और कूटनीति के जरिए भारत को प्रभावित करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद होने से तेल की खेपों का एक अहम रास्ता बाधित हुआ है। भारत मध्य पूर्व के तेल का बड़ा खरीदार है, इसलिए व्यवधान जारी रहने से परिवहन, उद्योग और घरों पर लागत बढ़ती है।
चुनाव के बाद ट्रंप ने फरवरी में ईरान पर हुए हमले का बचाव किया, हालांकि उन्होंने माना कि रिपब्लिकन पार्टी की हार के कारणों में ईरान "एक हिस्सा" था। नई दिल्ली इस पर नजर रखेगी कि क्या नतीजे संघर्ष खत्म करने के लिए अधिक गंभीर बातचीत को बढ़ावा देते हैं।
रूसी ऊर्जा दबाव का एक और बिंदु है। सितंबर में हस्ताक्षरित Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 में रूसी तेल और गैस के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ का प्रावधान है। ट्रंप ने राष्ट्रीय हित संबंधी अधिकार का इस्तेमाल करके इन प्रावधानों को फिलहाल रोक रखा है।
अगस्त में भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी करीब 44% थी। इससे पता चलता है कि टैरिफ की नई धमकी द्विपक्षीय व्यापार वार्ता से कहीं अधिक को प्रभावित कर सकती है। प्रतिबंध कानून को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, दोनों का समर्थन मिला था, जिससे भारत पर दलगत सीमाओं के पार से दबाव पड़ सकता है।
पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत ने उम्मीद जताई कि चुनावी झटके से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करने वाले फैसलों पर अंकुश लगेगा। श्रीवास्तव ने सलाह दी कि भारत लागू कराई जा सकने वाली रियायतें हासिल करे और साथ ही अपने ऊर्जा तथा विकास संबंधी फैसले खुद लेने की क्षमता बनाए रखे।
वीजा और रक्षा सहयोग अलग रास्तों पर
भारतीय पेशेवर और प्रौद्योगिकी कंपनियां H-1B वीजा पर लगी पाबंदियों की कांग्रेस द्वारा जांच पर भी नजर रखेंगी। इस वीजा से अमेरिकी नियोक्ता विशेष कौशल वाली नौकरियों के लिए लोगों को नियुक्त कर सकते हैं। माइक्रोसॉफ्ट, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और इन्फोसिस उन कंपनियों में हैं जो इस कार्यक्रम पर निर्भर हैं।
प्रशासन ने सितंबर 2025 में कुछ नई H-1B याचिकाओं के लिए 100,000 डॉलर का शुल्क घोषित किया था। इसके बाद दो संघीय अदालतों ने इस पर रोक लगा दी और अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा ने बिना शुल्क के याचिकाएं मंजूर करना शुरू कर दिया। डेमोक्रेट सांसद सुनवाई और कानून के जरिए इन पाबंदियों के आर्थिक असर की जांच कर सकते हैं।
रक्षा सहयोग की नींव अधिक स्थिर है। भारत और अमेरिका ने अक्टूबर 2025 में 10 साल के लिए एक रूपरेखा पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां, सूचना साझा करना और सैन्य उपकरणों का संयुक्त उत्पादन शामिल है। चीन को लेकर साझा चिंताएं अमेरिका की दोनों पार्टियों में इस रिश्ते को समर्थन देती हैं।
ट्रंप परिवार के कारोबारी सौदों की कांग्रेस की जांच से संबंधित व्यावसायिक रिश्ते रखने वाली कंपनियों पर अतिरिक्त निगरानी हो सकती है, जिनमें भारतीय कारोबार भी शामिल हैं। ऐसी जांच टैरिफ, वीजा और रक्षा सहयोग के फैसलों से अलग रास्ते पर चलेगी।
वार्ता को आकार देने वाली तारीखें
व्यापार वार्ता अदालत के फैसलों, ऊर्जा प्रतिबंधों और सैन्य संघर्ष के साथ-साथ आगे बढ़ी है। कई घटनाएं बताती हैं कि फरवरी का ढांचा अब अलग राजनीतिक और कानूनी माहौल में क्यों है।
- अक्टूबर 2025: भारत और अमेरिका ने 10 साल की रक्षा रूपरेखा पर हस्ताक्षर किए।
- 6 फरवरी 2026: दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी कर प्रस्तावित अंतरिम व्यापार ढांचे और 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता की रूपरेखा दी।
- फरवरी 2026: ईरान पर हमले के साथ संघर्ष शुरू हुआ, जिसने बाद में ऊर्जा आपूर्ति बाधित की और ईंधन लागत बढ़ाई।
- 20 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के तहत लगाए गए पारस्परिक टैरिफ रद्द कर दिए।
- सितंबर 2026: ट्रंप ने रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए।
- 4 नवंबर 2026: मध्यावधि चुनावों के घोषित नतीजों में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल किया।
- जनवरी 2027: नवनिर्वाचित कांग्रेस कार्यभार संभालने वाली है।
व्यापार के मोर्चे पर अगला अहम घटनाक्रम विनिर्माण में अतिरिक्त क्षमता को लेकर धारा 301 के तहत जांच के निष्कर्ष आने की उम्मीद है। इससे तय करने में मदद मिलेगी कि वार्ता फिर शुरू होने पर भारत को टैरिफ के किस दबाव का सामना करना पड़ेगा।
मुख्य बिंदु
- कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण भारत को वार्ता में अधिक गुंजाइश देता है और ट्रंप के व्यापार संबंधी फैसलों की कड़ी जांच का रास्ता खोलता है।
- ट्रंप के पास धारा 232 और 301 के तहत टैरिफ अधिकारों के साथ प्रतिबंध लगाने की शक्तियां और राष्ट्रपति का वीटो अब भी है।
- फरवरी के व्यापार ढांचे में कई भारतीय वस्तुओं पर 18% पारस्परिक टैरिफ और पांच वर्षों में भारत की ओर से 500 अरब डॉलर की खरीद की परिकल्पना थी।
- अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, जबकि बाद के अदालत के फैसलों और नई टैरिफ जांचों ने सौदेबाजी की परिस्थितियां बदल दी हैं।
- रूसी तेल पर प्रतिबंध और ईरान युद्ध भारत की व्यापार वार्ता को उसकी ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ते हैं।
- वीजा पाबंदियों की अदालतों और कांग्रेस में जांच हो रही है, जबकि रक्षा सहयोग को अमेरिका की दोनों पार्टियों का समर्थन हासिल है।






