भारत ने 92 GWh ऊर्जा भंडारण के लिए 14,500 करोड़ रुपये की योजना को मंज़ूरी दी

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India Approves Rs 14,500 Crore Plan for 92 GWh of Energy Storage

स्वच्छ बिजली भंडारण के लिए पांच साल की पहल

भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर, 2026 को 92 गीगावाट-घंटे बिजली भंडारण विकसित करने के लिए 14,500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता को मंज़ूरी दी। इस योजना में बैटरियां, पंप्ड हाइड्रो और उभरती प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। इसका उद्देश्य देश में नवीकरणीय बिजली का अधिक उपयोग करना और सौर व पवन ऊर्जा उत्पादन घटने पर बिजली उपलब्ध कराना है।

विषय-सूची
  1. स्वच्छ बिजली भंडारण के लिए पांच साल की पहल
  2. 92 GWh में कितनी बिजली संग्रहित हो सकती है?
  3. सबसे बड़ा हिस्सा पंप्ड हाइड्रो को
  4. 14,500 करोड़ रुपये से किस चीज़ का खर्च उठेगा
  5. कौन भाग ले सकता है और परियोजनाएं कैसे चुनी जाएंगी
  6. पारेषण लाइनों को भी हिसाब में क्यों शामिल किया गया है
  7. बैटरियों के लिए 40% घरेलू सामग्री की शर्त
  8. 2031-32 की ज़रूरत के संदर्भ में योजना
  9. मुख्य बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक सहायता देने को मंज़ूरी दी। प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्रिमंडल की मंज़ूरी संबंधी बयान के अनुसार, इन परियोजनाओं से कुल 97,600 करोड़ रुपये का निवेश आने की उम्मीद है।

कुल क्षमता में 60 GWh पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज, 30 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण और 2 GWh वैकल्पिक भंडारण प्रौद्योगिकियों से आएगी। ये परियोजनाएं अभी शुरू होनी हैं। घोषणा में भंडारण क्षमता के निर्माण के लिए वित्तपोषण कार्यक्रम की रूपरेखा दी गई है; बिजली सेवाएं परियोजनाओं के चालू होने के बाद उपलब्ध होंगी।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली में एक प्रेस वार्ता के दौरान इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इसे लागू करने में राज्य सरकारें शामिल होंगी और इसका उद्देश्य देशभर में भंडारण क्षमता का विस्तार करना है।

यह फैसला भारत के बिजली क्षेत्र में बदलाव की एक व्यावहारिक चुनौती से जुड़ा है: स्वच्छ बिजली का उत्पादन और सही समय पर उसकी उपलब्धता, दोनों के लिए अलग-अलग तरह के बुनियादी ढांचे की ज़रूरत होती है। सौर पैनल दिन के उजाले में बिजली बनाते हैं, जबकि घरों, कारोबारों और कारखानों को सूर्यास्त के बाद भी बिजली चाहिए। भंडारण से पहले उत्पादित बिजली का कुछ हिस्सा बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है।

92 GWh में कितनी बिजली संग्रहित हो सकती है?

गीगावाट-घंटा ऊर्जा की मात्रा मापने की इकाई है। एक GWh दस लाख किलोवाट-घंटे के बराबर होता है। यही वह मूल इकाई है जिसका इस्तेमाल आम तौर पर घरों की बिजली खपत मापने के लिए किया जाता है। इसलिए प्रस्तावित 92 GWh का मतलब 9.2 करोड़ किलोवाट-घंटे की भंडारण क्षमता है।

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गीगावाट और गीगावाट-घंटा अलग-अलग सवालों का जवाब देते हैं। गीगावाट बताता है कि कोई प्रणाली कितनी तेज़ी से बिजली दे सकती है, जबकि गीगावाट-घंटा बताता है कि वह कितनी ऊर्जा संग्रहित कर सकती है। भंडारण केंद्र से बिजली देने की दर तय करती है कि संग्रहित ऊर्जा कितनी देर तक चल सकेगी।

मंत्रिमंडल के बयान में कार्यक्रम की ऊर्जा क्षमता बताई गई है, लेकिन कुल बिजली निर्गम क्षमता, अलग-अलग परियोजनाओं के स्थान, भंडारण की अवधि और उन्हें चालू करने की तारीखों का उल्लेख नहीं है। इन जानकारियों से तय होगा कि केंद्र एक बार में कितनी बिजली दे सकते हैं और वे ग्रिड के किन हिस्सों को सेवा देंगे।

सरकार का कहना है कि 92 GWh की वृद्धि भारत की मौजूदा ग्रिड-स्तरीय भंडारण क्षमता के 170% के बराबर है। सीधे शब्दों में कहें तो यह प्रस्तावित वृद्धि मौजूदा क्षमता की 1.7 गुना है। इस तरह कार्यक्रम से मौजूदा भंडारण बुनियादी ढांचे का बड़े पैमाने पर विस्तार होगा।

सबसे बड़ा हिस्सा पंप्ड हाइड्रो को

पंप्ड स्टोरेज के हिस्से में 60 GWh आएंगे, जो कार्यक्रम की कुल क्षमता का करीब 65% है। बैटरियों का हिस्सा करीब 33% होगा, जबकि शेष लगभग 2% उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए रखा गया है। इस बंटवारे में जल-आधारित भंडारण योजना का सबसे बड़ा घटक है।

वैष्णव ने बताया कि पंप्ड स्टोरेज में सौर बिजली का उपयोग पानी को ऊंचाई पर पंप करने के लिए किया जा सकता है। बिजली की ज़रूरत होने पर पानी नीचे छोड़ा जाता है और टरबाइन चलाकर बिजली बनाई जाती है। ऊंचाई पर जमा पानी ऊर्जा का भंडार बनता है।

बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियां, जिन्हें BESS कहा जाता है, बिजली को अलग प्रक्रिया से संग्रहित करती हैं और बाद में जारी करती हैं। दोनों तरीके उस समय की बिजली को, जब उत्पादन भरपूर हो, उस समय के लिए बचाने में मदद कर सकते हैं जब मांग अधिक हो या नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन कम हो।

2 GWh का हिस्सा इन दो प्रमुख प्रौद्योगिकियों से इतर विकल्पों के लिए जगह देता है। आधिकारिक बयान में इसे उभरती या वैकल्पिक ऊर्जा भंडारण श्रेणी बताया गया है, लेकिन सहायता पाने वाली प्रौद्योगिकियों की पहचान नहीं की गई है।

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14,500 करोड़ रुपये से किस चीज़ का खर्च उठेगा

इस कार्यक्रम में व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसे आम तौर पर VGF कहा जाता है। यह सार्वजनिक वित्तीय सहायता है, जिसका उद्देश्य उन परियोजनाओं को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने में मदद करना है जिनसे अपेक्षित आमदनी निवेश आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं होती।

सरकार की 14,500 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता अनुमानित 97,600 करोड़ रुपये के कुल परियोजना निवेश का हिस्सा है। अरब रुपये में ये आंकड़े क्रमशः 145 अरब और 976 अरब रुपये हैं। कार्यक्रम के तहत अनुमानित निवेश का करीब 14.9% हिस्सा सार्वजनिक सहायता से आएगा।

यह तुलना प्रस्तावित वित्तपोषण मॉडल को दिखाती है: सरकारी धन से निवेश के कहीं बड़े स्रोत को जुटाने में मदद मिलेगी। परियोजनाओं के निर्माण के लिए बाकी धन डेवलपर और वित्तपोषण के अन्य स्रोत उपलब्ध कराएंगे।

मंज़ूरी में कार्यक्रम का बजट दिया गया है, न कि हर केंद्र के लिए एक समान सब्सिडी दर। परियोजनाओं की लागत, चुनी गई प्रौद्योगिकी और अंततः तय होने वाली वित्तपोषण शर्तें यह निर्धारित करेंगी कि सहायता व्यवहार में कैसे काम करेगी।

सरकार का कहना है कि इस वित्तीय सहायता से भंडारण बुनियादी ढांचे का निर्माण तेज़ होगा, नवीकरणीय बिजली का उपयोग बेहतर होगा और दिनभर आपूर्ति संतुलित रखने के लिए पारंपरिक बिजली उत्पादन पर निर्भरता घटेगी। भरोसेमंद और सस्ती बिजली उपलब्ध कराना इसका घोषित उद्देश्य है।

कौन भाग ले सकता है और परियोजनाएं कैसे चुनी जाएंगी

सार्वजनिक और निजी बिजली वितरण कंपनियां बैटरी तथा पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज परियोजनाओं के लिए VGF सहायता की पात्र होंगी। वितरण कंपनियां स्थानीय नेटवर्क के ज़रिए ग्राहकों तक बिजली पहुंचाने का काम करती हैं।

वैकल्पिक भंडारण प्रौद्योगिकियों वाली परियोजनाओं को सार्वजनिक और निजी संस्थाएं भी लागू कर सकेंगी। इस तरह कार्यक्रम की सभी प्रौद्योगिकी श्रेणियों में सरकारी और निजी, दोनों तरह के संगठनों की भूमिका होगी।

भंडारण क्षमता का आवंटन टैरिफ के आधार पर प्रतिस्पर्धी बोली से होगा। सरल शब्दों में, बोली प्रक्रिया की शर्तों के तहत प्रतिभागी तय भंडारण सेवा के लिए ली जाने वाली कीमत पर प्रतिस्पर्धा करेंगे।

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टैरिफ अहम हैं, क्योंकि वितरण कंपनियों को खरीदी गई बिजली और सेवाओं का भुगतान करना होता है। बिजली भंडारण की कीमत इस बात को प्रभावित करेगी कि लागत संभालते हुए भरोसेमंद तरीके से मांग पूरी करने की कोशिश कर रही बिजली कंपनी के लिए कोई परियोजना कितनी उपयोगी होगी।

वैष्णव ने कहा कि कार्यान्वयन में राज्य सरकारें शामिल होंगी। इससे कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर पर वित्तपोषण की रूपरेखा के साथ-साथ राज्यों की बिजली प्रणालियों से जुड़े भंडारण बुनियादी ढांचे के विस्तार में भी उनकी भूमिका होगी।

पारेषण लाइनों को भी हिसाब में क्यों शामिल किया गया है

भंडारण के एक और लाभ को समझाने के लिए वैष्णव ने 10 मेगावाट बिजली निकासी क्षमता वाले सौर संयंत्र का उदाहरण दिया। बिजली निकासी क्षमता का अर्थ है किसी संयंत्र से बिजली को बाहर ले जाकर व्यापक नेटवर्क तक पहुंचाने के लिए कनेक्शन की क्षमता।

सौर ऊर्जा के लिए इस्तेमाल होने वाला कनेक्शन रात में बहुत कम सौर बिजली ले जा सकता है। भंडारण से दिन में बनी बिजली का कुछ हिस्सा बाद के घंटों के लिए बचाया जा सकता है, जिससे पूरे दिन कनेक्शन का इस्तेमाल संभव होता है।

मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देने वाले मंत्री वैष्णव ने मौजूदा बुनियादी ढांचे का अधिक उपयोग करने की संभावना इस तरह बताई:

भंडारण की मदद से हम अपनी मौजूदा पारेषण क्षमता को कई गुना बढ़ा सकते हैं,

उनके उदाहरण का संबंध इस बात से था कि कोई लाइन समय के साथ कितनी बिजली ले जा सकती है। 10 MW क्षमता वाले कनेक्शन की बिजली सीमा उतनी ही रहती है, लेकिन भंडारण से उन घंटों की संख्या बढ़ सकती है जिनमें यह बिजली पहुंचाता है। इन घंटों का बेहतर उपयोग पारेषण बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश का अधिक लाभ लेने में मदद कर सकता है।

नवीकरणीय बिजली उत्पादन बढ़ने के साथ पारेषण क्षमता मजबूत करने की योजनाओं के साथ भी यह कार्यक्रम जुड़ा है। भंडारण और पारेषण परस्पर संबंधित ज़रूरतों को पूरा करते हैं: एक बिजली को समय के हिसाब से आगे के लिए बचाता है, जबकि दूसरा उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है।

बैटरियों के लिए 40% घरेलू सामग्री की शर्त

योजना से सहायता पाने वाली बैटरी परियोजनाओं को कम से कम 40% घरेलू सामग्री की शर्त पूरी करनी होगी। मंत्रिमंडल के बयान में इसे भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयातित कलपुर्जों पर निर्भरता घटाने का उपाय बताया गया है।

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यह नीति उपकरणों की मांग के ज़रिए काम करती है। वित्तीय सहायता से परियोजनाओं को आगे बढ़ने में मदद मिलती है, जबकि घरेलू सामग्री की शर्त उनके उपकरणों की मांग का एक हिस्सा भारतीय उत्पादन की ओर मोड़ती है। सरकार को उम्मीद है कि इससे बैटरी विनिर्माण को मदद देने वाली मौजूदा प्रोत्साहन योजनाओं को भी बल मिलेगा।

30 GWh बैटरी भंडारण के लिए उपकरण खरीदने पर भारतीय निर्माताओं को नए ग्राहक मिल सकते हैं। व्यावसायिक अवसर इस बात पर निर्भर करेगा कि किन परियोजनाओं को मंज़ूरी मिलती है, उनकी खरीद संबंधी ज़रूरतें क्या हैं और घरेलू आपूर्तिकर्ता आवश्यक उत्पाद देने में कितने सक्षम हैं।

मंत्रिमंडल ने लिथियम और निकल प्रसंस्करण के लिए 2,814 करोड़ रुपये की अलग पूंजीगत व्यय सहायता योजना को भी मंज़ूरी दी। ये सामग्री बैटरी विनिर्माण में इस्तेमाल होती हैं, इसलिए घरेलू औद्योगिक क्षमता बनाने के व्यापक प्रयास में खनिज प्रसंस्करण की भी अहम भूमिका है।

प्रेस वार्ता में वैष्णव ने खनन और पुनर्चक्रण से प्राप्त सामग्री समेत 24 चिन्हित महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लिए सहायता का भी ज़िक्र किया। महत्वपूर्ण खनिज बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा विनिर्माण जैसे उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल हैं। प्रसंस्करण को बढ़ावा देने का यह व्यापक प्रयास राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के अनुरूप है।

भंडारण का विकास और खनिज प्रसंस्करण उत्पादन श्रृंखला के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े हैं। भंडारण परियोजनाओं से तैयार प्रणालियों की मांग पैदा होती है; प्रसंस्करण कच्चे माल को औद्योगिक इस्तेमाल के लिए तैयार करता है। सरकार बिजली बुनियादी ढांचे के साथ उसे आपूर्ति करने वाली विनिर्माण क्षमता भी विकसित करना चाहती है।

2031-32 की ज़रूरत के संदर्भ में योजना

मंत्रिमंडल के बयान के अनुसार, भारत को 2031-32 तक 411 GWh ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण की ज़रूरत होने का अनुमान है। नए कार्यक्रम के 92 GWh इस ज़रूरत का करीब 22.4% हैं। यह आंकड़ा 92 को 411 से विभाजित करके निकाला गया है।

यह तुलना मंज़ूरी के महत्व को संदर्भ में रखती है: यह तय ज़रूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करेगी, लेकिन इसके साथ भारत की मौजूदा भंडारण क्षमता और आगे ज़रूरी होने वाली अतिरिक्त क्षमता भी शामिल है।

वैष्णव ने कहा कि भारत की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 52% है। स्थापित क्षमता से आशय बिजली उत्पादन उपकरणों की निर्धारित उत्पादन क्षमता से है। वास्तव में कितनी बिजली पैदा होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उपकरण कितने समय काम करते हैं और सूरज की रोशनी व हवा कितनी उपलब्ध है।

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भंडारण बिजली व्यवस्था के इन दोनों हिस्सों को जोड़ने में मदद करता है। जब नवीकरणीय बिजली उत्पादन भरपूर हो, तो कुछ ऊर्जा बचाकर रखी जा सकती है। जब उत्पादन घटे या मांग बढ़े, तो संग्रहित ऊर्जा वापस ग्रिड में दी जा सकती है। उपभोक्ताओं को इसका लाभ भंडारण केंद्रों के रूप में नहीं, बल्कि बिजली की अधिक स्थिर आपूर्ति के रूप में मिलेगा।

वित्तपोषण की अवधि और आगे की भंडारण ज़रूरत से कार्यक्रम की मुख्य समय-सीमा तय होती है:

  • 4 नवंबर, 2026: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 92 GWh भंडारण के लिए 14,500 करोड़ रुपये की VGF सहायता को मंज़ूरी दी।
  • वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31: मंज़ूर सहायता कार्यक्रम इस अवधि में लागू होना है।
  • वित्त वर्ष 2031-32: सरकार ने 411 GWh ग्रिड-स्तरीय भंडारण की ज़रूरत बताई है।

अब मंज़ूरी को प्रतिस्पर्धी बोली से आवंटित परियोजनाओं, वित्तपोषण व्यवस्थाओं और निर्माण में बदलना होगा। परियोजनाओं के चालू होने पर ही तय होगा कि बिजली कंपनियों को मांग पूरी करने में मदद के लिए कितनी संग्रहित बिजली उपलब्ध होगी।

मुख्य बातें

  • मंत्रिमंडल ने 92 GWh नए बिजली भंडारण के लिए 14,500 करोड़ रुपये की सहायता को मंज़ूरी दी।
  • कार्यक्रम में 60 GWh पंप्ड स्टोरेज, 30 GWh बैटरी भंडारण और 2 GWh वैकल्पिक प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
  • परियोजनाओं में कुल 97,600 करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान है।
  • सहायता वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक मिलेगी।
  • क्षमता का आवंटन टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली से होगा।
  • बैटरी परियोजनाओं को कम से कम 40% घरेलू सामग्री की शर्त पूरी करनी होगी।
  • प्रस्तावित 92 GWh, 2031-32 के लिए बताई गई 411 GWh भंडारण ज़रूरत का करीब 22.4% है।
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