गंगा जल संधि की समयसीमा से भारत-बांग्लादेश संबंधों की परीक्षा, ढाका ने मांटी जल की गारंटी

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Ganga Treaty Deadline Tests India-Bangladesh Ties as Dhaka Seeks Water Guarantees

दिसंबर की समयसीमा, जिसका असर खेतों और नदियों पर पड़ेगा

भारत और बांग्लादेश के सामने गंगा जल संधि को बदलने या नवीनीकृत करने के लिए 12 दिसंबर, 2026 की समयसीमा है। ढाका शुष्क मौसम में पानी की कमी से बचाव के लिए मजबूत सुरक्षा चाहता है, जबकि भारतीय राज्य मांग कर रहे हैं कि समझौते में उनकी अपनी जल आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाए। संधि में स्वतः विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए 1 जनवरी, 2027 को अगला आवंटन मौसम शुरू होने से पहले बातचीत पर दबाव है।

विषय-सूची
  1. दिसंबर की समयसीमा, जिसका असर खेतों और नदियों पर पड़ेगा
  2. जल बंटवारे का सूत्र कैसे काम करता है
  3. बांग्लादेश गारंटी क्यों चाहता है
  4. कूटनीतिक दूरी के बीच तकनीकी संपर्क जारी
  5. बिहार और पश्चिम बंगाल ने अपनी जरूरतें रखीं
  6. गाद नदी के ऊपरी हिस्से की बाढ़ को डेल्टा के अस्तित्व से जोड़ती है
  7. बांग्लादेश के लिए पानी की कमी का क्या मतलब है
  8. नदी को सिर्फ न्यूनतम मात्रा से अधिक चाहिए
  9. बातचीत को प्रभावित करने वाली तारीखें
  10. मुख्य बातें

दांव पर सिर्फ पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज से छोड़ा जाने वाला पानी नहीं है। बांग्लादेश ने मई में 2.8 अरब डॉलर की पद्मा बैराज परियोजना को मंजूरी दी, जबकि उसकी गंगा-कबादक सिंचाई परियोजना अब कथित तौर पर 550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है, जबकि इसका नियोजित क्षेत्र 955 वर्ग किलोमीटर था। वहीं, बिहार पेयजल, खेती और उद्योग के लिए सुनिश्चित आपूर्ति के साथ गाद और बाढ़ की समस्या पर कार्रवाई चाहता है।

12 दिसंबर, 1996 को भारत के प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत 1 जनवरी से 31 मई तक शुष्क मौसम में उपलब्ध गंगा जल का बंटवारा होता है। बांग्लादेश में इस नदी को पद्मा के नाम से जाना जाता है।

बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने देश की जल जरूरतों के लिए प्रयास जारी रखने का भरोसा देते हुए उम्मीद जताई है कि समझौता हो सकता है।

हमें विश्वास और उम्मीद है कि इस साल समाप्त हो रही संधि का नवीनीकरण होगा। हमें उम्मीद है कि भारत सही फैसला करेगा।

ढाका की मुख्य मांग इस बात को लेकर है कि नदी का जलस्तर घटने पर क्या होगा। भारत को इस मांग के साथ अपनी बढ़ती घरेलू जरूरतों और भीषण कमी के दौरान पानी देने का वादा करने की व्यावहारिक कठिनाई का संतुलन साधना होगा। दोनों सरकारों को अगस्त 2024 में हसीना के सत्ता से हटने और उसके बाद भारत में शरण लेने से तनावपूर्ण हुए संबंधों के बीच भी बातचीत करनी होगी।

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जल बंटवारे का सूत्र कैसे काम करता है

संधि के तहत फरक्का मापन और आवंटन का बिंदु है। क्यूसेक का अर्थ है किसी बिंदु से प्रति सेकंड बहने वाला एक घन फुट पानी। यह जल प्रवाह की दर मापता है, न कि किसी जलाशय में जमा कुल मात्रा।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के संधि के आकलन में दस-दस दिनों की अवधि पर लागू होने वाले तीन आवंटन स्तर बताए गए हैं:

  • 70,000 क्यूसेक या उससे कम प्रवाह पर भारत और बांग्लादेश उपलब्ध पानी का बराबर बंटवारा करते हैं।
  • 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक मिलता है और शेष भारत को।
  • 75,000 क्यूसेक से अधिक प्रवाह पर भारत को 40,000 क्यूसेक मिलता है और शेष बांग्लादेश को।

उदाहरण के लिए, 60,000 क्यूसेक उपलब्ध होने पर दोनों देशों को 30,000-30,000 क्यूसेक का बुनियादी आवंटन मिलता है। 80,000 क्यूसेक पर दोनों को 40,000-40,000 क्यूसेक मिलते हैं। 11 मार्च से 10 मई तक की महत्वपूर्ण अवधि में विशेष प्रावधानों के तहत बारी-बारी से दस-दस दिन की अवधि के लिए प्रत्येक देश को 35,000 क्यूसेक दिए जाते हैं।

अनुच्छेद II के तहत किसी भी दस-दिवसीय अवधि में फरक्का पर कुल प्रवाह 50,000 क्यूसेक से नीचे जाने पर सरकारों को तुरंत परामर्श करना होता है। इसके बाद उन्हें समानता, निष्पक्षता और किसी भी पक्ष को नुकसान से बचाने के सिद्धांतों के आधार पर आपातकालीन समायोजन पर सहमत होना होता है।

फाउंडेशन के अनुसार, संधि की 30-वर्षीय अवधि में अंतिम निर्धारित आवंटन मौसम 31 मई, 2026 को समाप्त हुआ। 12 दिसंबर को संधि की कानूनी अवधि समाप्त होगी, इसलिए जल योजना के लिहाज से अगले जनवरी से पहले समझौता करना खास तौर पर जरूरी है।

बांग्लादेश गारंटी क्यों चाहता है

बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने ढाका की बातचीत संबंधी प्राथमिकताओं में न्यूनतम गारंटी को प्रमुख स्थान दिया है। उनका उद्देश्य नदी का प्रवाह घटने पर फसलों, पेयजल और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले दबाव के बीच अधिक पूर्वानुमेय आपूर्ति सुनिश्चित करना है।

बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी के बाद अनी ने सरकार का रुख बताया।

1977 के समझौते में शामिल गारंटी प्रावधान को बहाल करना, नई संधि में बांग्लादेश की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक है।

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज ने नवीनीकरण की संभावनाओं पर अपने अध्ययन में बताया है कि 1977 के समझौते ने कम प्रवाह की निर्दिष्ट अवधियों में बांग्लादेश के निर्धारित आवंटन का कम से कम 80 प्रतिशत सुरक्षित किया था। 1982 में एक समझौता ज्ञापन के तहत बांग्लादेश ने इस प्रावधान को हटाने पर सहमति दी।

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इसके बजाय 1996 की संधि में आवंटन सूत्र, महत्वपूर्ण मौसम में बारी-बारी से मिलने वाले आश्वासन और 50,000 क्यूसेक से कम प्रवाह पर आपात परामर्श शामिल हैं। ढाका कमी से निपटने के लिए अधिक मजबूत व्यवस्था चाहता है, ताकि प्रवाह बेहद कम होने के बाद ही बातचीत पर निर्भर न रहना पड़े।

भारत की चिंता इससे अलग है: बिना शर्त न्यूनतम जल छोड़ने की बाध्यता से असाधारण सूखे का बोझ उसके अपने उपभोक्ताओं पर केंद्रित हो सकता है। ओआरएफ के विकास अध्ययन विभाग के उपाध्यक्ष नीलांजन घोष का तर्क है कि किसी भी गारंटी में पानी की वास्तविक उपलब्धता और सूखे के जोखिम का निष्पक्ष बंटवारा झलकना चाहिए।

नीतिगत प्रस्तावों में चर्चा किए गए एक संभावित समझौते में न्यूनतम हिस्से के साथ असाधारण कमी के बंटवारे के स्पष्ट नियम शामिल हो सकते हैं। गारंटी का कोई अंतिम सूत्र, संधि की अवधि या हस्ताक्षर की तारीख घोषित नहीं की गई है। खबरों के अनुसार, बड़े बदलावों वाली संधि और कम अवधि पर विचार हो रहा है। हालांकि, शमा ने कहा है कि बांग्लादेश की बातचीत समिति तय करेगी कि नवीनीकरण मांगा जाए या नई व्यवस्था की।

कूटनीतिक दूरी के बीच तकनीकी संपर्क जारी

प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बातचीत के लिए एक समिति गठित की है। शमा ने बताया कि जल संसाधन मंत्री और सरकार के वित्त सलाहकार इस प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें विदेश मंत्रालय का प्रतिनिधित्व भी है। प्रधानमंत्री के सलाहकार राशेद अल महमूद तितुमीर जल बंटवारे पर तकनीकी समिति के प्रमुख हैं।

बांग्लादेश का कहना है कि नवीनीकरण पर बातचीत के उसके अनुरोधों का भारत ने जवाब नहीं दिया है। इनमें जून से भेजी गई सूचनाएं भी शामिल हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि नदी संबंधी मामले संयुक्त नदी आयोग के दायरे में आते हैं। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सितंबर में कहा था कि संधि पर तकनीकी बैठकें जारी थीं। शमा ने भी कार्यस्तर पर संपर्क की पुष्टि करते हुए कहा है कि औपचारिक चर्चा आगे होगी।

1972 में स्थापित संयुक्त नदी आयोग, दोनों देशों के बीच साझा 54 नदियों पर सहयोग का द्विपक्षीय माध्यम है। मंत्री स्तर पर इसकी पिछली पुष्टि की गई बैठक 2022 में हुई थी, इससे पहले 12 साल का अंतराल रहा। मई 2026 में तकनीकी बातचीत हुई।

मई में कोलकाता में हुई बैठकों के दौरान संयुक्त नदी आयोग के सदस्य एमडी अनवर कादिर के नेतृत्व में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल ने फरक्का में संयुक्त प्रवाह मापन स्थल का भी दौरा किया। इस तरह मौजूदा तकनीकी सहयोग संधि पर बातचीत का माध्यम उपलब्ध कराता है, भले ही राजनीतिक सहमति अभी अधूरी हो।

बांग्लादेश में जल विवादों को लेकर घरेलू दबाव भी बढ़ रहा है। 30 अक्टूबर को ढाका में एक रैली में नेशनल सिटिजन पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने चेतावनी दी कि अगर नए समझौते में बांग्लादेश का उचित हिस्सा सुरक्षित नहीं हुआ तो प्रदर्शन होंगे। इन मांगों के चलते रहमान सरकार को मिलने वाले पानी की मात्रा और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों की मजबूती, दोनों पर जवाब देना पड़ रहा है।

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बिहार और पश्चिम बंगाल ने अपनी जरूरतें रखीं

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि राज्य बांग्लादेश को उसका हिस्सा दिए जाने का विरोध नहीं करता, लेकिन नवीनीकरण या नए समझौते से पहले अपनी जरूरतों पर पूरा विचार चाहता है। नवंबर की शुरुआत में नई दिल्ली के एक कार्यक्रम में उन्होंने कृषि, पेयजल आपूर्ति, उद्योग और आर्थिक विकास के लिए सुनिश्चित पानी की मांग की।

चौधरी ने कहा कि बिहार के पास फिलहाल गंगा का पानी लेने का अवसर केवल जुलाई से अक्टूबर तक है। 2022 में शुरू की गई बिहार गंगा जल आपूर्ति योजना के तहत राज्य को मानसून के इन महीनों में गया और राजगीर में भंडारण तथा पेयजल आपूर्ति के लिए पानी लेने की अनुमति है।

बिहार ने शुष्क मौसम में पेयजल और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए 2,000 क्यूसेक की मांग की है, जबकि एक आंतरिक समिति ने कथित तौर पर 900 क्यूसेक की सिफारिश की। यह सिफारिश राज्य की मांग का 45 प्रतिशत है और इससे 1,100 क्यूसेक की कमी रह जाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) ने नई बातचीत की मांग की है। पार्टी अध्यक्ष संजय कुमार झा का तर्क है कि समझौते में बिहार की भविष्य की जल सुरक्षा और विकास संबंधी जरूरतें शामिल होनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल के हित अलग हैं, लेकिन उतने ही प्रत्यक्ष। नौवहन और कोलकाता बंदरगाह को सहारा देने के लिए भागीरथी-हुगली प्रणाली में पानी मोड़ने के उद्देश्य से फरक्का बनाया गया था। पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, औद्योगिक गतिविधियां, कोलकाता-हल्दिया बंदरगाह प्रणाली और भारतीय सुंदरबन तक पहुंचने वाला मीठा पानी, सभी राज्य की चिंताओं में शामिल हैं।

इसलिए भारत के सामने बातचीत की चुनौती में फरक्का के ऊपर की ओर पानी के इस्तेमाल पर घरेलू सहमति बनाना भी शामिल है। गंगा की पारिस्थितिकी का अध्ययन कर चुके तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर सुनील कुमार चौधरी ने सुनिश्चित आवंटन तय करने से पहले 2050 तक बिहार की जरूरतों का आकलन करने की मांग की है।

गाद नदी के ऊपरी हिस्से की बाढ़ को डेल्टा के अस्तित्व से जोड़ती है

बिहार की मांगों में गाद का मुद्दा भी शामिल है। गाद में नदी द्वारा बहाकर लाई जाने वाली रेत, सिल्ट और मिट्टी आती है। जब गाद नदी की धाराओं में जमती है तो उनकी गहराई और पानी के रास्ते बदल सकते हैं। नीचे की ओर गाद बाढ़ के मैदानों को फिर से उपजाऊ बनाने और डेल्टा की जमीन तैयार करने में मदद करती है।

बक्सर से फरक्का तक 580 किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने वाले आईआईटी कानपुर के 2018 के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि बैराज हर साल 156 मिलियन टन गाद रोक सकता है। आईआईटी कानपुर में पृथ्वी विज्ञान के प्रोफेसर राजीव सिन्हा ने बिहार को हितधारक के रूप में शामिल करने और संधि में गाद प्रबंधन को जगह देने की मांग की है।

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बिहार ने फरक्का को गाद जमाव, बाढ़ और कटाव से जोड़ा है। हालांकि, भारत के केंद्रीय जल आयोग ने बैराज के बैकवॉटर प्रभाव की अधिकतम पहुंच लगभग 42 किलोमीटर बताई है। इससे और ऊपर के इलाकों में बाढ़ की स्थिति का आकलन करने के लिए बेसिन में सहायक नदियों के प्रवाह, नदी धाराओं में बदलाव, तटबंधों और गाद की आवाजाही की जांच जरूरी है।

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में कटाव और गंगा तथा फुलहर नदियों के बीच जमीन के संकरे होने से नदी के रास्तों, बस्तियों और परिवहन संपर्कों में बदलाव को लेकर चिंता बढ़ी है। बांग्लादेश को भी शुष्क मौसम में कम प्रवाह और मानसून में विनाशकारी कटाव, दोनों का सामना करना पड़ता है। चपाईनवाबगंज में जल विकास बोर्ड का कहना है कि हाल के वर्षों में नदी करीब तीन किलोमीटर चौड़ी हो गई है।

घोष के ओआरएफ विश्लेषण में बढ़ते समुद्र स्तर, भूमि धंसने और तटीय कटाव के साथ गाद की आपूर्ति को भी बंगाल डेल्टा के अस्तित्व के लिए अहम बताया गया है। इसमें फरक्का और अन्य हस्तक्षेपों के योगदान का पता लगाने के लिए गाद का सटीक हिसाब रखने की मांग की गई है। नदी के विभिन्न हिस्सों में कितनी गाद आती है, जमती है और बाहर निकलती है, इसका मापन प्रतिस्पर्धी दावों को व्यावहारिक प्रबंधन फैसलों में बदलने में मदद करेगा।

बांग्लादेश के लिए पानी की कमी का क्या मतलब है

गंगा-कबादक सिंचाई परियोजना बांग्लादेश की कृषि जल आपूर्ति पर दबाव का एक पैमाना देती है। इसका बताया गया 550 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र, 955 वर्ग किलोमीटर के निर्धारित क्षेत्र से 405 वर्ग किलोमीटर कम है। यह करीब 42 प्रतिशत की गिरावट है।

गोराई जैसी वितरिका नदियों से होकर आने वाला मीठा पानी दक्षिण-पश्चिम में खारे पानी के प्रवेश को रोकने और सुंदरबन को सहारा देने में भी मदद करता है। आपूर्ति घटने से सिंचाई, मत्स्य पालन, नौवहन और भूजल का पुनर्भरण प्रभावित होता है। घरों के लिए अधिक खारा पानी पीने योग्य स्रोतों को सीमित कर सकता है और फसल उगाना कठिन बना सकता है।

बरिंद क्षेत्र के 72 वर्षीय प्रोटेस्टेंट पादरी बिकाश सोरेन ने अपने गांव से साल भर नावों के गुजरने के दिन याद किए और अब दिख रहे बदलाव का वर्णन किया।

साल में लगभग तीन महीने तक नदी बहती हुई मुश्किल से ही दिखती है।

बांग्लादेश की मंजूरशुदा पद्मा बैराज परियोजना का उद्देश्य पानी की कमी कम करना है। इसमें 113 मेगावाट का नियोजित जलविद्युत संयंत्र भी शामिल है। इसकी उपयोगिता ऊपर की ओर से भरोसेमंद जल आपूर्ति और नदी के उचित प्रबंधन पर निर्भर करेगी।

बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में जल संसाधन इंजीनियरिंग के प्रोफेसर एमडी अताउर रहमान ने सफलता के लिए तीन शर्तें बताई हैं: गंगा का भरोसेमंद प्रवाह, गाद का वैज्ञानिक प्रबंधन और नीचे की ओर पर्यावरणीय प्रवाह की सुरक्षा। ये शर्तें परियोजना की इंजीनियरिंग योजना को सीधे संधि वार्ता से जोड़ती हैं।

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नदी को सिर्फ न्यूनतम मात्रा से अधिक चाहिए

1996 का ढांचा 1949 से 1988 तक के ऐतिहासिक प्रवाह पैटर्न पर आधारित है। नई संधि के प्रस्तावों में बदलती वर्षा, तापमान, जल निकासी और भूजल की स्थितियों को दर्शाने के लिए हाल के, संयुक्त रूप से सत्यापित मापों की मांग की गई है।

पर्यावरणीय प्रवाह इन गणनाओं में एक और पहलू जोड़ता है। इसका अर्थ नदी के पौधों, जीव-जंतुओं और उनसे जुड़े आवासों को बनाए रखने के लिए जरूरी पानी की मात्रा, समय, अवधि और गुणवत्ता से है। मौसमी प्रवाह की लहरें गाद भी ले जाती हैं और नदियों को बाढ़ के मैदानों से जोड़ती हैं।

अलग-अलग स्थानों पर मापन भी महत्वपूर्ण है। ओआरएफ के आकलन में पाया गया कि उसके अध्ययन की अवधि के दौरान बांग्लादेश के हार्डिंग ब्रिज पर शुष्क मौसम का प्रवाह आम तौर पर फरक्का से छोड़े गए पानी से अधिक था। इसकी वजहें बताते हुए महानंदा जैसी सहायक नदियों और संभावित भूजल विनिमय का उल्लेख किया गया। नदी के किनारे संयुक्त निगरानी से योजनाकारों को स्थानीय जरूरतें तय करते समय इन योगदानों का हिसाब रखने में मदद मिलेगी।

नीतिगत प्रस्तावों में दैनिक और दस-दिवसीय प्रवाह आंकड़े प्रकाशित करना, सूखे से निपटने की स्पष्ट प्रक्रियाएं बनाना, संयुक्त नदी आयोग के तहत स्थायी वैज्ञानिक समिति गठित करना और हर पांच साल में जलवायु परिस्थितियों की समीक्षा करना शामिल है। मध्यस्थता प्रावधान न होने से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए विवाद निपटान की पारदर्शी प्रक्रिया भी प्रस्तावित है।

कुछ प्रस्तावों में व्यापक बातचीत में नेपाल को शामिल करने की बात है, क्योंकि गंडक और कोसी जैसी सहायक नदियां गंगा के प्रवाह में योगदान देती हैं। भारत अपने पड़ोसियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय व्यवस्थाओं का पक्षधर है। अगर 12 दिसंबर तक नई व्यापक संधि पूरी नहीं हो पाती, तो अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव भी रखा गया है।

बातचीत को प्रभावित करने वाली तारीखें

यह विवाद निर्माण, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और जल बंटवारे की कई अलग-अलग व्यवस्थाओं से होकर गुजरा है। बांग्लादेश ने 1976 में संयुक्त राष्ट्र में यह मुद्दा उठाया था। 1977 के समझौते से पहले महासभा ने सर्वसम्मति से एक बयान जारी किया था।

  • 1975: फरक्का बैराज ने काम करना शुरू किया।
  • 5 नवंबर, 1977: भारत और बांग्लादेश ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें बांग्लादेश के लिए 80 प्रतिशत न्यूनतम आवंटन की सुरक्षा थी।
  • 1982: एक समझौता ज्ञापन के तहत बांग्लादेश ने गारंटी प्रावधान हटाने पर सहमति दी।
  • 12 दिसंबर, 1996: दोनों प्रधानमंत्रियों ने 30 साल के लिए मौजूदा संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • मई 2026: तकनीकी बैठकें और संयुक्त मापन स्थल का दौरा हुआ; बांग्लादेश ने पद्मा बैराज परियोजना को मंजूरी दी।
  • 31 मई, 2026: मौजूदा संधि की शुष्क मौसम की अंतिम निर्धारित आवंटन अवधि समाप्त हुई।
  • 12 दिसंबर, 2026: संधि की अवधि समाप्त होगी।

राजनीतिक संपर्क भी बातचीत के माहौल का हिस्सा है। फरवरी में रहमान के पदभार संभालने के बाद मोदी ने उन्हें भारत आने का न्योता दिया, लेकिन अगस्त की प्रस्तावित यात्रा नहीं हुई और रहमान ने सितंबर के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का निमंत्रण ठुकरा दिया। हसीना के प्रत्यर्पण की बांग्लादेश की मांग और भारत से दिए गए उनके राजनीतिक बयानों पर आपत्तियां भी संबंधों में तनाव बनाए हुए हैं।

नई संधि में तीन फैसलों को जोड़ना होगा: उपलब्ध पानी का बंटवारा कैसे हो, असाधारण कमी किस तरह साझा की जाए और दोनों देशों को सहारा देने वाली नदी प्रणाली को कैसे कायम रखा जाए। जनवरी में शुष्क मौसम का आवंटन फिर शुरू होने से इन फैसलों के लिए तत्काल व्यावहारिक समयसीमा तय हो जाती है।

मुख्य बातें

  • गंगा संधि 12 दिसंबर, 2026 को समाप्त होगी और इसमें स्वतः विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है।
  • बांग्लादेश 1977 की गारंटी के आधार पर शुष्क मौसम के अपने हिस्से के लिए अधिक मजबूत सुरक्षा चाहता है।
  • बांग्लादेश से किए गए वादों के साथ भारत को बिहार और पश्चिम बंगाल की जल मांगों का भी ध्यान रखना होगा।
  • तकनीकी संपर्क जारी है, जबकि नई संधि की औपचारिक शर्तों पर सहमति नहीं बनी है।
  • गाद, लवणता, पर्यावरणीय प्रवाह और भरोसेमंद मापन व्यापक समझौते के प्रस्तावों के लिए अहम हैं।
  • बांग्लादेश की 2.8 अरब डॉलर की पद्मा बैराज परियोजना भरोसेमंद प्रवाह और गाद के उचित प्रबंधन पर निर्भर है।
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