रद्द हुई निविदा के बाद तैयार सुरंग इंतजार में
नेपाल ने सुनकोशी मरिन डायवर्जन बहुउद्देश्यीय परियोजना के बांध और बिजलीघर के लिए लगभग 16 अरब रुपये की निविदा रद्द कर दी है। यह फैसला तीन योग्य बोलीदाताओं के वित्तीय प्रस्ताव खोले जाने से कुछ दिन पहले लिया गया। इस फैसले से उस परियोजना में एक और देरी का खतरा पैदा हो गया है, जिसका मकसद पांच दक्षिणी जिलों में 122,000 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई करना और 31.07 मेगावाट बिजली पैदा करना है।
विषय-सूची
- रद्द हुई निविदा के बाद तैयार सुरंग इंतजार में
- निविदा रद्द होने से पहले क्या हुआ?
- कौन-से बोलीदाता योग्य पाए गए और यह क्यों अहम था?
- सरकार ने बचत का दावा किया, लेकिन वकीलों ने कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए
- अस्वीकृत बोलीदाता मूल्यांकन को कैसे चुनौती दे सकते हैं
- पिछला ठेकेदार पहले ही काफी पीछे रह गया था
- अरबों की गारंटी और एक और विवादित हस्तक्षेप
- एक और देरी का मधेश के लिए क्या मतलब है
- मुख्य बातें
निविदा रद्द करने से पहले जल संसाधन एवं सिंचाई विभाग के महानिदेशक दिनेश राजौरिया और परियोजना निदेशक कृष्ण प्रसाद रिजाल को कथित तौर पर हिरासत में लिया गया था। पुलिस और मंत्रालय के सूत्रों ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के सचिवालय से जुड़े लोगों ने उन्हें खरीद प्रक्रिया रोकने के लिए दबाव डाला, क्योंकि सचिवालय के करीबी लोगों की पसंद वाली कंपनियां तकनीकी मूल्यांकन में सफल नहीं हुई थीं।
बुनियादी ढांचा मंत्री सुनील लम्साल ने इसकी अलग वजह बताई। उन्होंने कहा कि एक शिकायत में नई खरीद नियमावली के अनुरूप निविदा न होने पर सवाल उठाया गया था और दावा किया कि प्रक्रिया जारी रखने से सरकार को 2 अरब से 3 अरब रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता था। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल जिला प्रशासकों को बताया था कि अधिकारियों को काठमांडू भेजा जाना चाहिए।
इस विवाद का तत्काल व्यावहारिक असर यह है कि परियोजना की पूरी हो चुकी सुरंग बांध तैयार होने तक पानी नहीं पहुंचा सकती। बारा, रौतहट, सर्लाही, महोत्तरी और धनुषा के किसानों को सिंचाई व्यवस्था का इंतजार करना होगा, जबकि सरकार यह तय कर रही है कि खरीद प्रक्रिया फिर कैसे शुरू की जाए।
निविदा रद्द होने से पहले क्या हुआ?
परियोजना ने 8 जून को अंतरराष्ट्रीय बोलियां आमंत्रित कीं और आवेदन जमा करने के लिए 30 दिन दिए। बांध, बिजलीघर और संबंधित संरचनाओं के लिए छह कंपनियों या संयुक्त उद्यमों ने बोली लगाई। तकनीकी मूल्यांकन के बाद तीन बोलीदाता आगे रहे। उनके वित्तीय प्रस्ताव सोमवार, कार्तिक 16 को खोले जाने थे।
पुलिस सूत्रों ने कहा कि राजौरिया और रिजाल को कार्तिक 12 को सिरहा और सिंधुली से हिरासत में लेकर प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय लाया गया। बताया गया कि अगली शाम उन्हें छोड़ दिया गया। सूत्रों ने आरोप लगाया कि राजौरिया को गिरफ्तारी वारंट के बिना ले जाया गया और रिहाई से पहले वह निविदा रद्द करने पर राजी हो गए।
शनिवार को गोरखापत्र अखबार में निविदा रद्द करने की सूचना प्रकाशित हुई। परियोजना अभियंता अशोक राज गौतम ने पुष्टि की कि निर्देश विभाग की ओर से आया था। आगे खरीद प्रक्रिया को लेकर फैसला भी उसी विभाग को करना है।
परियोजना में काम कर रहे वरिष्ठ डिविजनल अभियंता गौतम ने फैसले के बारे में कहा:
जल संसाधन एवं सिंचाई विभाग के निर्देश पर ठेका रद्द किया गया है। नए सिरे से बोलियां आमंत्रित करनी हैं या कोई और कदम उठाना है, यह विभाग को तय करना होगा।
ऊर्जा, जल संसाधन एवं सिंचाई मंत्री बिराजभक्त श्रेष्ठ निविदा रद्द होने के समय संयुक्त राष्ट्र के एक ऊर्जा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए थाईलैंड में थे। वह निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ाने के पक्ष में थे। बाद में उन्होंने विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के पास कोई उचित कारण होगा और सरकारी कामकाज पारदर्शी होना चाहिए।
कौन-से बोलीदाता योग्य पाए गए और यह क्यों अहम था?
चाइना इंटरनेशनल वाटर एंड इलेक्ट्रिक कॉरपोरेशन, एएनईएनजी-आरसीसी संयुक्त उद्यम और सिनोहाइड्रो कॉरपोरेशन शुरुआती तकनीकी मूल्यांकन में सफल रहे। तकनीकी मूल्यांकन में यह जांचा जाता है कि बोलीदाता कीमतों पर विचार किए जाने से पहले संबंधित अनुभव, वित्तीय क्षमता और काम पूरा करने की योग्यता जैसी शर्तें पूरी करते हैं या नहीं।
तीन असफल बोलियां एसआईएल-केसी कंस्ट्रक्शन-फेवा संयुक्त उद्यम, सोंगडा-कालिका कंस्ट्रक्शन संयुक्त उद्यम और सीआरईजीसी-एसडब्ल्यूडीसीसी संयुक्त उद्यम की थीं। कुछ असफल कंपनियों ने परियोजना को पत्र लिखकर उन्हें अयोग्य ठहराने के कारण पूछे। उनमें से एक कंपनी के प्रतिनिधि ने स्वीकार किया कि उन्होंने लम्साल के पास शिकायत की थी।
कालिका कंस्ट्रक्शन का स्वामित्व नेपाल कंस्ट्रक्शन एंटरप्रेन्योर्स फेडरेशन के अध्यक्ष निकोलस पांडे के पास है। मंत्रालय के सूत्रों ने आरोप लगाया कि वियतनाम की सोंगडा के साथ उसकी साझेदारी तकनीकी मूल्यांकन में असफल होने के बाद दबाव बढ़ गया। उनका दावा था कि पांडे ने प्रधानमंत्री सचिवालय के साथ करीबी संबंध बना लिए थे और सचिवालय चाहता था कि इस साझेदारी को ठेका मिले।
योग्य एएनईएनजी-आरसीसी संयुक्त उद्यम में नेपाली साझेदार रसुवा कंस्ट्रक्शन का स्वामित्व नेपाली कांग्रेस के सांसद मोहन आचार्य के पास है। मंत्रालय के सूत्रों को उम्मीद थी कि यह संयुक्त उद्यम जीतेगा। वित्तीय प्रस्ताव खोले नहीं गए थे, इसलिए निविदा रोक दिए जाने के समय कीमतों की तुलना अधूरी थी।
इसलिए आरोप ठेकेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा और सरकारी अधिकारियों के आचरण, दोनों से जुड़े हैं। सूत्रों ने प्रतिद्वंद्वी बोलीदाताओं के राजनीतिक संबंधों का जिक्र किया, जबकि लम्साल ने हस्तक्षेप को संशोधित नियमों का पालन कर सरकारी धन बचाने की कोशिश बताया।
सरकार ने बचत का दावा किया, लेकिन वकीलों ने कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए
लम्साल ने कहा कि निविदा रद्द होने से करीब दस दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत मिली थी। शिकायत में आरोप था कि निविदा नई खरीद नियमावली का पालन नहीं करती। संभावित 2 अरब से 3 अरब रुपये के नुकसान का उनका अनुमान 16 अरब रुपये की निविदा राशि का करीब 12.5 से 18.75 प्रतिशत है। यह संभावित बचत को बड़ी रकम बनाता है, हालांकि उन्होंने इस आंकड़े की गणना नहीं बताई।
निविदा रद्द करने की सूचना में नेपाल के सार्वजनिक खरीद अधिनियम की धारा 3(2) का हवाला दिया गया। वकील सेमंता दहाल और पूर्व शहरी विकास सचिव मणिराम गेलाल ने इस प्रावधान के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि यह धारा खरीद को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे से संबंधित है, न कि खरीद कार्यालय को अपनी ओर से निविदा रद्द करने का अधिकार देती है।
दहाल और गेलाल ने कहा कि धारा 26 में निविदा रद्द करने के अधिकार और आधार बताए गए हैं। जिन आधारों का उन्होंने जिक्र किया उनमें स्वीकार्य बोलियों का न होना, समझौता करने में असमर्थता, लागत अनुमान से अधिक कीमतें या यह निर्णय शामिल है कि निर्माण या सेवाओं की अब जरूरत नहीं है।
उनका मुख्य तर्क था कि प्रक्रिया रोकने के तथ्यात्मक और कानूनी कारण अधिकारियों को स्पष्ट करने चाहिए। गेलाल ने कहा कि समीक्षा निकाय या अदालत यह जांच सकती है कि खरीद प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं। वहीं, परियोजना कार्यालय को अपनी निविदा रद्द करते समय संबंधित रद्दीकरण प्रावधान का इस्तेमाल करना चाहिए।
प्रधानमंत्री सचिवालय ने अपने हस्तक्षेप के पीछे की सटीक खामी सार्वजनिक रूप से नहीं बताई थी। विभाग ने भी यह घोषणा नहीं की थी कि वह नई बोलियां आमंत्रित करेगा, निविदा में संशोधन करेगा या कोई दूसरा रास्ता अपनाएगा। इन फैसलों से तय होगा कि कितना काम दोबारा करना पड़ेगा।
अस्वीकृत बोलीदाता मूल्यांकन को कैसे चुनौती दे सकते हैं
नेपाल की खरीद प्रणाली में निविदा संबंधी फैसलों से असंतुष्ट कंपनियों के लिए औपचारिक प्रक्रिया है। बोलीदाता सार्वजनिक खरीद समीक्षा समिति के जरिए समीक्षा मांग सकते हैं और जरूरत पड़ने पर फैसलों को अदालत में चुनौती दे सकते हैं। बताया गया कि उस समय तक इस निविदा के बारे में समिति में कोई शिकायत दाखिल नहीं हुई थी।
अभियंता लक्ष्मण केसी ने अधिकारियों को डराने-धमकाने के कथित इस्तेमाल की आलोचना की। उन्होंने कहा कि तकनीकी मूल्यांकन से असंतुष्ट कंपनियों को समीक्षा प्रक्रिया या अदालतों का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय निविदा को अंतिम चरण में रद्द करने से बोलीदाताओं का खर्च बेकार जा सकता है और राष्ट्रीय गौरव की इस परियोजना में वर्षों की देरी हो सकती है।
परियोजना की राशि खरीद नियमावली में अंतरराष्ट्रीय बोली के लिए बताई गई 5 अरब रुपये की सीमा से अधिक थी। विदेशी कंपनियां नेपाली साझेदारों के साथ हिस्सा ले सकती थीं। इस विवाद में घरेलू भागीदारी को प्राथमिकता देने की कथित कोशिशें भी शामिल थीं, जिनमें योग्य साझेदारियों को मूल्यांकन में अतिरिक्त अंक और कीमत में छूट देना शामिल है।
ये प्राथमिकताएं तय करती हैं कि योग्य प्रस्तावों की तुलना कैसे होगी। इस मामले में वित्तीय प्रस्ताव खोले जाने से पहले ही प्रक्रिया खत्म हो गई। इसलिए तत्काल विवाद निविदा रद्द करने की वैधता और उन बोलीदाताओं के साथ हुए व्यवहार को लेकर है, जो तकनीकी शर्तें पहले ही पूरी कर चुके थे।
चुनाव अभियान में स्वच्छ सरकार की मांगों के बीच सत्ता में आए शाह के प्रशासन पर ये आरोप लगे हैं। उनका मार्च का चुनावी प्रचंड बहुमत भ्रष्टाचार और राजनीतिक विशेषाधिकारों के खिलाफ जेनरेशन जेड आंदोलन के बाद आया था। खरीद प्रक्रिया का यह विवाद अरबों रुपये और सरकारी अधिकारियों के साथ व्यवहार से जुड़े एक फैसले में उन वादों की परीक्षा ले रहा है।
पिछला ठेकेदार पहले ही काफी पीछे रह गया था
भारत की पटेल इंजीनियरिंग और नेपाल की रमन कंस्ट्रक्शन के संयुक्त उद्यम पटेल-रमन जेवी को जनवरी 2023 में पहले का ठेका दिया गया था। कर सहित इसकी कीमत करीब 14.08 अरब रुपये थी। ठेके की अवधि का लगभग 60 प्रतिशत बीत चुका था, जबकि भौतिक प्रगति करीब 10 प्रतिशत ही थी।
नई निविदा का अनुमानित 16 अरब रुपये का मूल्य पिछले ठेके की राशि से करीब 1.92 अरब रुपये अधिक, यानी लगभग 14 प्रतिशत ज्यादा है। अनुमानित लागत और दिए गए ठेके की कीमत अलग-अलग माप हैं, लेकिन ये आंकड़े उस खरीद प्रक्रिया का पैमाना दिखाते हैं जिसे मूल ठेकेदार को हटाने के बाद फिर शुरू किया जा रहा है।
ठेका समाप्त करने की समय-रेखा में अलग-अलग तारीखें दी गई हैं। अदालत की कार्यवाही के विवरण के अनुसार, ठेकेदार को नोटिस देने के बाद समाप्ति का फैसला 11 नवंबर 2025 को लिया गया था। परियोजना के पहले विवरण में समाप्ति की तारीख मंसिर 8, 2082 दी गई है। दोनों विवरण एक ही मूल समस्या बताते हैं: बार-बार चेतावनी देने के बावजूद निर्माण कार्य में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई।
पटेल-रमन ने 25 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। अगले दिन न्यायमूर्ति टेक प्रसाद ढुंगाना ने अंतरिम आदेश जारी कर ठेका समाप्त करने और बैंक गारंटी जब्त करने पर रोक लगा दी। अदालत ने 9 फरवरी को यह आदेश रद्द कर दिया, जिससे सरकार आगे की कार्रवाई कर सकी।
प्रमुख पड़ावों का क्रम बताता है कि परियोजना खरीद प्रक्रिया के एक और ठहराव तक कैसे पहुंची:
- जनवरी 2023: पटेल-रमन जेवी को बांध और संबंधित संरचनाओं का ठेका मिला।
- मई 2024: डायवर्जन सुरंग की खुदाई दूसरी ओर पहुंची।
- 27 अगस्त 2025: सुरंग को अंतिम रूप देने का काम पूरा हुआ।
- नवंबर 2025: पिछला ठेका समाप्ति और अदालती कार्यवाही के दौर में पहुंचा।
- 9 फरवरी: सुप्रीम कोर्ट ने ठेका समाप्त करने पर लगी अंतरिम रोक हटा दी।
- 8 जून: परियोजना ने नए ठेके के लिए बोलियां आमंत्रित कीं।
- कार्तिक 16: वित्तीय प्रस्ताव खोले जाने थे, लेकिन निविदा रद्द होने से यह कदम रुक गया।
इसके बाद सार्वजनिक खरीद निगरानी कार्यालय ने पटेल-रमन को तीन साल के लिए काली सूची में डाल दिया। इस अवधि में कंपनी को नए सार्वजनिक ठेके नहीं मिल सकेंगे, जबकि उसकी मौजूदा परियोजनाएं जारी रह सकती हैं।
अरबों की गारंटी और एक और विवादित हस्तक्षेप
पिछले ठेकेदार को करीब 2.14 अरब रुपये का भुगतान किया गया था, जो ठेका राशि का लगभग 15 प्रतिशत है। उसकी गारंटी से जुड़ी रकम भी बड़ी थी: 2.4 अरब रुपये की कार्य-निष्पादन गारंटी और अग्रिम भुगतान की सुरक्षा के लिए 1.2 अरब रुपये।
परियोजना के शुरुआती विवरण में पूरी 3.6 अरब रुपये की रकम जब्त किए जाने की बात कही गई थी। बाद के वित्तीय विवरण के अनुसार, 1.2 अरब रुपये का अग्रिम भुगतान वसूल कर लिया गया था, लेकिन 2.4 अरब रुपये की कार्य-निष्पादन गारंटी की वसूली बाकी थी। सरकार ने वास्तव में कितनी रकम वसूली है, यह समझने के लिए यह अंतर अहम है।
कार्य-निष्पादन गारंटी ठेकेदार के दायित्व पूरे न करने की स्थिति में सरकार को वित्तीय सुरक्षा देती है। अग्रिम भुगतान गारंटी उस रकम की सुरक्षा करती है जो संबंधित काम पूरा होने से पहले चुकाई जाती है। दोनों में से किसी की वसूली के लिए बैंक और कानूनी प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश दिखाता है।
पुराने ठेके को लेकर भी राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप हैं। पूर्व ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग के करीबी एक सूत्र ने कहा कि शाह से जुड़े लोगों ने, जो उस समय काठमांडू के मेयर थे, घिसिंग से पटेल-रमन का समझौता समाप्त न करने का आग्रह किया था। सूत्र के अनुसार, लम्साल ने और समय मांगा और ठेकेदार को दो महीने की अतिरिक्त मोहलत मिली।
लम्साल ने घिसिंग से मिलकर ठेका जारी रखने का अनुरोध करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि ठेकेदार ने उनसे संपर्क किया था और उन्होंने केवल बैठक की व्यवस्था करने में मदद की। उनके जवाब से इस मामले में उनकी भूमिका भी विवादित हो गई है, जैसे ताजा निविदा रद्द करने की अलग-अलग वजहें विवाद का विषय हैं।
एक और देरी का मधेश के लिए क्या मतलब है
सुनकोशी मरिन परियोजना की योजना सुनकोशी नदी का पानी सिंधुली में मरिन नदी तक पहुंचाने और फिर तराई के पांच जिलों में सिंचाई की आपूर्ति करने की है। प्रस्तावित बांध करीब 30 मीटर ऊंचा और 158 मीटर लंबा है। कमलामाई नगरपालिका के कुसुमटार तक पहुंचने वाला पानी बिजलीघर भी चलाएगा।
निर्माण के विस्तृत विवरण में पूरी हो चुकी डायवर्जन सुरंग की लंबाई 13.3 किलोमीटर बताई गई है, जबकि परियोजना के पहले विवरण में यह 13.1 किलोमीटर है। चाइना ओवरसीज इंजीनियरिंग ग्रुप ने टनल बोरिंग मशीन से इसकी खुदाई की थी। सुरंग को अंतिम रूप देने और उसकी जांच का काम पूरा हो चुका है, लेकिन बांध न होने से पूरी व्यवस्था चालू नहीं हो सकती।
पूरी परियोजना वित्त वर्ष 2016-17 में शुरू हुई थी और इसकी अनुमानित लागत 49.42 अरब रुपये है। संशोधित मास्टर प्लान में अब वित्त वर्ष 2032-33 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है। इसलिए साल भर सिंचाई का इंतजार कर रहे किसानों को परियोजना के लिए कहीं अधिक लंबी समय-सीमा का सामना करना पड़ रहा है, जितना केवल सुरंग के निर्माण से लगता है।
घिसिंग ने कहा कि नई खरीद प्रक्रिया से निर्माण फिर शुरू होने में छह महीने से एक साल तक की देरी हो सकती है। पूर्व ऊर्जा मंत्री ने बताया कि वह एक और ठहराव के विरोध में क्यों थे:
पिछले ठेकेदार का समझौता इसलिए समाप्त किया गया क्योंकि वह काम नहीं कर रहा था। निर्माण आगे बढ़ाने के लिए नया ठेका जल्द से जल्द दिया जाना चाहिए।
परियोजना से मिलने वाले लाभ बांध, बिजलीघर और जलापूर्ति व्यवस्था के एक साथ काम करने पर निर्भर हैं। खरीद प्रक्रिया पूरी होने से अधूरी संरचनाओं का काम आगे बढ़ सकेगा। लेकिन निविदा विवाद लंबा खिंचने पर तैयार सुरंग महंगी होकर भी इंतजार करती रहेगी और लक्षित खेतों को परियोजना से सिंचाई नहीं मिलेगी।
मुख्य बातें
- नेपाल ने करीब 16 अरब रुपये की निविदा तब रद्द कर दी, जब तीन योग्य बोलीदाताओं के वित्तीय प्रस्ताव खोले जाने बाकी थे।
- पुलिस और मंत्रालय के सूत्रों ने हिरासत तथा राजनीतिक दबाव के आरोप लगाए; मंत्री सुनील लम्साल ने खरीद नियमों और सरकारी संभावित बचत का हवाला दिया।
- वकील सेमंता दहाल और पूर्व सचिव मणिराम गेलाल ने प्रक्रिया रद्द करने के लिए इस्तेमाल किए गए कानूनी प्रावधान पर सवाल उठाए।
- परियोजना का लक्ष्य तराई के पांच जिलों में 122,000 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई करना और 31.07 मेगावाट बिजली पैदा करना है।
- डायवर्जन व्यवस्था चालू होने से पहले पूरी हो चुकी सुरंग को अधूरे बांध की जरूरत है।
- संशोधित योजना में वित्त वर्ष 2032-33 तक पूरा करने का लक्ष्य है। विभाग को अब तय करना है कि खरीद प्रक्रिया कैसे फिर शुरू होगी।






