वरिष्ठता, समावेशन और सार्वजनिक न किए गए आकलनों को लेकर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के नामांकित न्यायाधीशों पर सवाल

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Nepal Supreme Court Nominees Face Scrutiny Over Seniority, Inclusion and Undisclosed Assessments

चार नामांकन से योग्यता मापने के तरीके पर मतभेद उजागर

नेपाल की न्यायिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के रिक्त पदों के लिए चार न्यायाधीशों की सिफारिश की है। इनमें हाई कोर्ट के न्यायाधीशों में पांचवें, 13वें और 16वें स्थान पर रहे न्यायाधीश शामिल हैं। परिषद ने अपने फैसले में तुलनात्मक मूल्यांकन के अंक दर्ज नहीं किए। पांच सदस्यीय परिषद के दो सदस्यों ने लिखित असहमति जताई। इसके बाद संसद की सुनवाई समिति ने नामांकितों के खिलाफ 10 दिनों तक जन शिकायतें आमंत्रित करने का फैसला किया है।

विषय-सूची
  1. चार नामांकन से योग्यता मापने के तरीके पर मतभेद उजागर
  2. वरिष्ठता से आगे कानून क्या अपेक्षा करता है
  3. 30 नामों की सूची, लेकिन दर्ज तुलना नहीं
  4. कौन पीछे छूटे और रैंकिंग क्यों अहम है
  5. दोनों असहमतियों में अलग-अलग आपत्तियां
  6. बार ने वकीलों, महिलाओं और मधेसियों को बाहर रखने पर सवाल उठाए
  7. पारदर्शिता पर लंबे समय से जारी विवाद
  8. इन नामांकनों से आगे भी सुधार के वादों की परीक्षा
  9. तारीखों में अंतर के बीच संसद ने शिकायतों के लिए समय दिया
  10. मुख्य बिंदु

उम्मीदवारों में पोखरा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रत्न बहादुर बागचंद; पाटन हाई कोर्ट के चंद्र बहादुर सरु; पाटन हाई कोर्ट की हेटौड़ा पीठ के जनक पांडे और बीरगंज स्थित जनकपुर हाई कोर्ट की अस्थायी पीठ के गोकरण डांगी शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीशों में बागचंद पहले स्थान पर हैं और सूची में शामिल एकमात्र मुख्य न्यायाधीश हैं।

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने पूरी सिफारिश प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। परिषद सदस्य महेश कुमार नेपाल ने बागचंद और सरु का समर्थन किया, लेकिन पांडे और डांगी को लेकर असहमति जताई। यह अंतर अहम है: परिषद में मतभेद चयन प्रक्रिया और विशिष्ट उम्मीदवारों, दोनों को लेकर था; दोनों असहमत सदस्यों की एक जैसी आपत्ति नहीं थी।

मुख्य विवाद यह नहीं है कि पदोन्नति का आधार हमेशा वरिष्ठता ही होनी चाहिए या नहीं। न्यायिक परिषद अधिनियम, 2016, सेवा अवधि के अलावा कई गुणों पर विचार करने की अनुमति देता है। सवाल यह है कि क्या परिषद कानून में बताए गए मानदंडों के आधार पर यह बता सकती है कि इन चार उम्मीदवारों को दूसरों पर क्यों तरजीह दी गई।

यह स्पष्टीकरण अब भी अधूरा है। परिषद सचिव राम प्रसाद भट्टराई ने कहा कि मूल्यांकन के रिकॉर्ड सदस्यों के सामने रखे गए थे, लेकिन फैसले में संख्यात्मक तुलना दर्ज नहीं की गई। मूल्यांकन रिकॉर्ड उपलब्ध होने और चयन का कारण समझाने के बीच यही अंतर अब विवाद के केंद्र में है।

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वरिष्ठता से आगे कानून क्या अपेक्षा करता है

न्यायिक परिषद अधिनियम, 2016 की धारा 5 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सिफारिश के कई आधार दिए गए हैं। इनमें वरिष्ठता, अनुभव, विषय का ज्ञान, दक्षता, ईमानदारी, निष्पक्षता, पेशेवर और नैतिक आचरण, सार्वजनिक प्रतिष्ठा तथा न्याय और कानून में योगदान शामिल हैं।

सेवारत या पूर्व न्यायाधीशों के मामले में मूल्यांकन में निरीक्षण रिपोर्ट, कार्य-प्रदर्शन आकलन, हर साल निपटाए गए मामलों का अनुपात और यह भी शामिल है कि उच्च अदालतों ने उनके फैसलों को बरकरार रखा, आंशिक रूप से पलटा या पूरी तरह पलट दिया। कानूनी पेशे या अन्य पात्र क्षेत्रों से आने वाले उम्मीदवारों के लिए पेशे में निरंतरता, न्याय और कानून में योगदान तथा पूर्व सेवा के रिकॉर्ड प्रासंगिक हैं।

ये मानदंड परिषद को वरिष्ठता सूची से आगे देखने की अनुमति देते हैं। अनुभव, क्षमता, सत्यनिष्ठा और अन्य प्रासंगिक गुण चयन को उचित ठहराते हों, तो कनिष्ठ उम्मीदवार को अपने-आप अयोग्य नहीं माना जाता। वहीं, वरिष्ठता कानून में तय विचारणीय आधार है; परिषद उसे बिना कारण बताए यूं ही नजरअंदाज नहीं कर सकती।

इसलिए विवाद तुलना की गुणवत्ता पर आकर टिकता है। धारा 5 का उल्लेख यह स्थापित करता है कि किस कानूनी ढांचे का इस्तेमाल हुआ, लेकिन इससे यह नहीं समझ आता कि एक उम्मीदवार का प्रदर्शन दूसरे के मुकाबले कैसा था। फैसलों की संख्या और अपीलों के नतीजे आकलन में योगदान दे सकते हैं, हालांकि इनमें से कोई भी आंकड़ा अकेले न्यायिक गुणवत्ता साबित नहीं करता। विश्वसनीय स्पष्टीकरण में उपलब्ध साक्ष्यों को किए गए चयन से जोड़ना होगा।

30 नामों की सूची, लेकिन दर्ज तुलना नहीं

भट्टराई ने कहा कि परिषद सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए जरूरी योग्यता और अनुभव वाले 30 लोगों की सूची तैयार की थी। न्यायाधीशों की अलग सूची भी सौंपी गई। सोमवार को दोपहर 1:30 बजे शुरू हुई बैठक में प्रस्तुत सामग्री के साथ वार्षिक कार्य रिपोर्ट, निरीक्षण रिपोर्ट और कार्य-प्रदर्शन मूल्यांकन रिकॉर्ड भी थे।

मुख्य न्यायाधीश और परिषद के चार अन्य सदस्यों ने सूची की समीक्षा की। विचार-विमर्श के विवरणों के अनुसार, कानून मंत्री सोबिता गौतम ने सुझाव दिया कि दूसरे सदस्य उम्मीदवारों के नाम प्रस्तावित करें, क्योंकि वह कई न्यायाधीशों को नहीं जानती थीं। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार शर्मा ने वे चार नाम प्रस्तावित किए जिन्हें अंततः मंजूरी मिली।

इसके बाद क्या हुआ, इस बारे में परिषद के सदस्यों के बयान अलग-अलग हैं। कुछ ने कहा कि अन्य संभावित उम्मीदवारों पर चर्चा हुई और फैसला संवैधानिक तथा कानूनी दिशानिर्देशों के भीतर रहा। एक सदस्य ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट के कई न्यायाधीश एक ही दिन नियुक्त हुए थे, इसलिए उनका अनुभव समान था और उनमें अंतर करने के लिए वरिष्ठता तथा अन्य गुणों पर विचार करना पड़ा।

एक अन्य सदस्य ने आरोप लगाया कि सिफारिशें रिकॉर्ड की वस्तुनिष्ठ तुलना के बजाय निजी चयन पर आधारित थीं। भट्टराई ने पुष्टि की कि फैसले में धारा 5 की उपधाराओं का उल्लेख था, लेकिन कहा कि सदस्यों ने गोपनीय रूप से कोई अंक दिए भी हों, तो उन्हें फैसले में दर्ज नहीं किया गया। उनके बयान से यह साबित नहीं होता कि कोई मूल्यांकन हुआ ही नहीं। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि लिखित फैसले में मांगे जा रहे तुलनात्मक अंक शामिल नहीं थे।

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कौन पीछे छूटे और रैंकिंग क्यों अहम है

मुख्य न्यायाधीशों की सूची में बागचंद का पहले स्थान पर होना बाकी तीन नामांकनों से अलग दिखता है। सरु हाई कोर्ट के न्यायाधीशों में पांचवें, पांडे 13वें और डांगी 16वें स्थान पर थे। मुख्य न्यायाधीशों और अन्य हाई कोर्ट न्यायाधीशों के लिए अलग-अलग वरिष्ठता सूचियां हैं, इसलिए इन स्थानों को एक संयुक्त रैंकिंग नहीं मानना चाहिए।

चार मुख्य न्यायाधीशों के नाम स्पष्ट रूप से उन लोगों में हैं जिन्हें शामिल नहीं किया गया: राजन प्रसाद भट्टराई, लाल बहादुर कुंवर, हरि प्रसाद भंडारी और राजेश्वर तिवारी। बाहर किए गए लोगों की कुल संख्या को लेकर खबरें अलग-अलग हैं। कुछ में इन चार का उल्लेख है, जबकि एक अन्य खबर में कहा गया है कि पांच और मुख्य न्यायाधीशों की सिफारिश नहीं हुई।

हाई कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों में पीछे रह गए लोगों में पहले स्थान पर रहे दिनेश प्रसाद यादव के साथ कृष्ण लाल भट्टराई, यमुना भट्टराई और टेक नारायण कुंवर शामिल थे। रैंकिंग के आंकड़े दिखाते हैं कि वरिष्ठता निर्णायक नहीं थी। लेकिन इनसे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि चुने गए उम्मीदवार कम सक्षम थे।

जो बात दर्ज नहीं है, वह यह कि प्रत्येक चयन में अनुभव, प्रदर्शन, सत्यनिष्ठा या किसी अन्य वैध आधार को वरिष्ठता से अधिक महत्व क्यों दिया गया। इस स्पष्टीकरण के बिना जनता यह नहीं समझ सकती कि वरिष्ठता से हटने का आधार उचित था या मनमाना। आपत्तियां साक्ष्य से जुड़ी इसी कमी पर केंद्रित हैं; वे किसी नामांकित व्यक्ति के कदाचार को साबित नहीं करतीं।

दोनों असहमतियों में अलग-अलग आपत्तियां

परिषद में शामिल सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने कहा कि सिफारिशों में पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ, समावेशी और विश्वसनीय मूल्यांकन प्रक्रिया का अभाव था। उनकी लिखित असहमति में वरिष्ठता को दरकिनार करने के स्पष्ट कारण न देने और महिलाओं, मधेसियों तथा कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को बाहर रखने पर भी सवाल उठाया गया।

मल्ल ने तर्क दिया कि न्यायिक अनुभव, संस्थागत स्मृति और न्यायिक परिपक्वता के कारण न्यायिक सेवा से आए न्यायाधीशों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व जरूरी था। अपनी असहमति में उन्होंने ऐसे न्यायाधीशों को प्रतिनिधित्व से बाहर रखने वाले तरीके को खारिज करते हुए लिखा:

"ऐसे न्यायाधीशों को प्रतिनिधित्व से वंचित करने या बाहर रखने का तरीका उचित या स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता," उन्होंने लिखा।

महेश कुमार नेपाल की असहमति सीमित थी। उन्होंने पांडे और डांगी की सिफारिशों से असहमति जताई, जबकि बागचंद और सरु का समर्थन किया। उनकी आपत्ति को चारों उम्मीदवारों का विरोध बताना परिषद के मतभेद को गलत ढंग से पेश करना होगा।

न्यायिक सेवा से प्रतिनिधित्व के बारे में भी अलग-अलग बातें कही गई हैं। नामांकितों को न्यायिक सेवा से आए न्यायाधीश बताया गया है और समर्थकों ने कहा कि इन चयन से न्यायिक सेवा और निचली अदालतों से पदोन्नति की मांगों को पूरा किया गया। इसके बावजूद मल्ल ने कहा कि सिफारिशों में न्यायिक सेवा के न्यायाधीशों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। इस मतभेद को केवल यह कहकर नहीं सुलझाया जा सकता कि चारों नामांकित फिलहाल हाई कोर्ट में कार्यरत हैं; विवाद इस बात पर भी है कि किन न्यायिक करियर मार्गों और अनुभव के किन स्तरों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

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बार ने वकीलों, महिलाओं और मधेसियों को बाहर रखने पर सवाल उठाए

नेपाल बार एसोसिएशन ने भी अपनी आपत्तियां 7 अक्टूबर को महासचिव केदार प्रसाद कोइराला के जारी बयान में रखीं। उसने कहा कि सिफारिशों का कोई वस्तुनिष्ठ आधार और पारदर्शिता नहीं थी तथा वरिष्ठता, अनुभव, दक्षता, ईमानदारी, निष्पक्षता और पेशेवर आचरण संबंधी वैधानिक मानदंडों का सम्मान नहीं किया गया।

एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 129(5) का उल्लेख किया, जिसके तहत पात्र कानूनी पेशेवरों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए विचार के योग्य माना जा सकता है, और अनुच्छेद 42(1) का भी, जो समावेशन से संबंधित है। इस बार कानूनी पेशे से किसी उम्मीदवार की सिफारिश नहीं हुई। बार ने महिलाओं और मधेसियों की अनुपस्थिति पर भी आपत्ति जताई।

एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. विजय प्रसाद मिश्रा ने कहा कि बार से परामर्श नहीं किया गया। संगठन ने कहा कि उसने राष्ट्रीय सम्मेलनों और समिति बैठकों के जरिए वकीलों को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देने की मांग बार-बार की थी। परिषद की चर्चा के विवरणों में मधेसी और महिला प्रतिनिधित्व के लिए दिनेश प्रसाद यादव और यमुना भट्टराई पर विचार करने की मांग का भी उल्लेख है।

ये आपत्तियां वरिष्ठता से अलग सवाल उठाती हैं: क्या चयन में संवैधानिक समावेशन और पात्र पेशेवर पृष्ठभूमियों की विविधता पर पर्याप्त ध्यान दिया गया। विचार के लिए पात्र होने का अर्थ यह नहीं कि किसी को इन चार पदों में से एक पर नियुक्ति का अधिकार है। प्रक्रिया ने संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया, बार का यह आरोप किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में पेश नहीं किया गया है।

पारदर्शिता पर लंबे समय से जारी विवाद

मौजूदा विवाद नियुक्तियों को लेकर वर्षों से जारी आलोचना के बाद आया है। आलोचना यह रही है कि नियुक्तियां एकसमान और स्पष्ट मानकों के बिना की जाती हैं। विशाल खनाल के 2018 के अकादमिक लेख में, जो काठमांडू स्कूल ऑफ लॉ रिव्यू में प्रकाशित हुआ था, तर्क दिया गया कि वरिष्ठता को दरकिनार करना अपवाद होना चाहिए और इसके लिए पारदर्शी, विश्वसनीय तथा ठोस नियम होने चाहिए।

खनाल ने दर्ज किया कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए पीछे रखे जाने के बाद अपीलीय अदालत के मुख्य न्यायाधीश एक राज आचार्य ने 2015 में इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने जनवरी 2017 में हाई कोर्ट के 80 न्यायाधीशों की सिफारिश की भी समीक्षा की, जिसे वकीलों ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि परिषद के दो सदस्य अनुपस्थित थे और संवैधानिक समावेशन संबंधी अपेक्षाओं की कथित तौर पर अनदेखी की गई थी।

वह पुराना विवाद मौजूदा विवाद से अलग है। बताया गया है कि हालिया विचार-विमर्श में सभी पांच सदस्य उपस्थित थे; समस्या अधूरी परिषद नहीं, बल्कि मूल्यांकन और चयन को लेकर मतभेद है। इसलिए नियमित नियुक्तियों के लिए आवश्यकता के सिद्धांत के इस्तेमाल पर खनाल की आलोचना ऐतिहासिक संदर्भ देती है, इन नामांकनों पर सीधे कानूनी निष्कर्ष नहीं।

लेख में यह भी तर्क दिया गया था कि प्रदर्शन और सत्यनिष्ठा के मानक विकसित नहीं किए गए और उन्हें एकसमान तरीके से लागू नहीं किया गया। यह अकादमिक आकलन है, बाध्यकारी फैसला नहीं; लेकिन यह उसी अंतर को रेखांकित करता है जिसकी अब पड़ताल हो रही है: वांछनीय गुणों की सूची होना, उन्हें मापने की एकसमान प्रक्रिया होने के बराबर नहीं है।

नियुक्ति मानक लागू करने की कोशिशें भी सफल नहीं हुईं। मुख्य न्यायाधीश खिल राज रेग्मी के कार्यकाल में तैयार किए गए मानक सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए थे। हरि कृष्ण कार्की के नेतृत्व में तैयार हाई कोर्ट नियुक्ति मानक बाद के नेतृत्व ने लागू नहीं किए। हालिया चर्चाओं के विवरणों से संकेत मिलता है कि नए और व्यवस्थित ढांचे पर चर्चा नहीं हुई।

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इन नामांकनों से आगे भी सुधार के वादों की परीक्षा

19 मई को संसदीय सुनवाई में शर्मा ने वादा किया था कि न्यायिक परिषद की सिफारिशें स्पष्ट रूप से योग्यता पर आधारित होंगी। उनकी कार्ययोजना में योग्यताओं, क्षमता, अनुभव और न्यायिक सत्यनिष्ठा को मापने के वस्तुनिष्ठ तरीके तय करने का प्रस्ताव था, ताकि नियुक्तियां पारदर्शी और पूर्वानुमेय बनें।

हालिया फैसले को इसी वादे के आधार पर परखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि परिषद नियमित रूप से न्यायाधीशों के फैसलों के रिकॉर्ड मंगाकर उनकी समीक्षा करती है और समस्याएं मिलने पर उम्मीदवारों को आगे नहीं बढ़ाती। आलोचकों का कहना है कि नियमित निगरानी से यह स्पष्ट नहीं होता कि इस बार कुछ उम्मीदवारों को दूसरों पर क्यों चुना गया।

15 सितंबर को हाई कोर्ट के लिए की गई एक अलग सिफारिश ने भी बहस बढ़ाई है। पहले कास्की जिला अदालत के न्यायाधीश रहे हिमलाल बेलबासे को जनकपुर हाई कोर्ट में नियुक्त किया गया था। 63 वर्ष की अनिवार्य सेवानिवृत्ति आयु पूरी होने के बाद वह पद संभालने के सिर्फ चार दिन बाद, 20 सितंबर को सेवानिवृत्त हो गए। इतनी कम अवधि की नियुक्ति को लेकर पदोन्नति के उद्देश्य और समय पर सवाल उठे।

बेलबासे ने इससे पहले राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने से जुड़े संगठित अपराध और धनशोधन मामले में आरोपों में संशोधन की अनुमति दी थी। यह सुझाव कि उनकी पदोन्नति उस फैसले का इनाम थी, आरोप मात्र हैं, स्थापित तथ्य नहीं।

पीठ के चयन को लेकर अलग विवाद सामने आया है। 7 अक्टूबर को 38 मामलों में संवैधानिक पीठ की सुनवाई न्यायमूर्ति हरि प्रसाद फुयाल के पीठ में बैठने से इनकार करने के बाद नहीं हो सकी। उस पीठ की संरचना को लेकर विवाद चार नामांकनों से अलग है, लेकिन दोनों मामलों में सवाल यह है कि न्यायिक नियुक्तियों और पदस्थापन के फैसलों के कारण पर्याप्त रूप से सार्वजनिक किए जा रहे हैं या नहीं।

तारीखों में अंतर के बीच संसद ने शिकायतों के लिए समय दिया

संसदीय सुनवाई समिति के अध्यक्ष बोध नारायण श्रेष्ठ ने कहा कि सिंह दरबार में सोमवार को हुई बैठक में सभी चार नामांकितों के खिलाफ शिकायतें आमंत्रित करने के लिए 10 दिन का नोटिस मंजूर किया गया। सचिवालय को सार्वजनिक माध्यमों से नोटिस प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया। एक अन्य विवरण में प्रकाशन की प्रस्तावित तारीख कार्तिक 9 बताई गई है।

खबरों में घटनाक्रम की तारीखें पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। कई खबरों में सिफारिशें 6 अक्टूबर की बताई गई हैं, जबकि एक में 18 सितंबर की तारीख दी गई है। नेपाली खबरों में फैसले की तारीख मंगलवार, आशोज 20, 2083 बताई गई है। इन विवरणों को चुपचाप मिलाकर किसी एक निश्चित तारीख के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

  • 19 मई: शर्मा ने संसदीय सुनवाई में नियुक्ति की सिफारिशें स्पष्ट रूप से योग्यता पर आधारित बनाने का वादा किया।
  • 15 सितंबर: परिषद ने हाई कोर्ट में तीन नियुक्तियों की सिफारिश की, जिनमें बेलबासे भी शामिल थे।
  • 20 सितंबर: बेलबासे नए पद पर चार दिन बिताने के बाद सेवानिवृत्त हुए।
  • 6 अक्टूबर, कई खबरों के अनुसार: परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के चार उम्मीदवारों की सिफारिश की। एक अन्य खबर में 18 सितंबर की तारीख दी गई है।
  • 7 अक्टूबर: नेपाल बार एसोसिएशन ने अपनी आपत्तियां जारी कीं।
  • इसके बाद हुई सोमवार की बैठक: सुनवाई समिति ने शिकायतों के लिए 10 दिन का नोटिस मंजूर किया। एक विवरण में प्रकाशन की तारीख कार्तिक 9 बताई गई है।

शिकायतों की अवधि से जनता को संसदीय विचार से पहले आपत्तियां दर्ज कराने का मौका मिलता है। इससे अपने-आप यह तय नहीं होता कि किसी नामांकन को खारिज किया जाना चाहिए या नहीं। संसदीय सुनवाई प्रक्रिया के बाद राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं। यहां सुनवाई की कोई निश्चित तारीख, अंतिम नतीजा या शिकायतें दर्ज कराने की अंतिम कैलेंडर तारीख स्थापित नहीं है।

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परिषद ने अदालतों के काम के बोझ और जरूरी कर्मचारियों, जिनमें हाई कोर्ट और जिला अदालतों में न्यायाधीशों के पद शामिल हैं, की समीक्षा के लिए तीन महीने के कार्यकाल वाली समिति बनाने का फैसला भी किया। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के पद 21 से बढ़ाकर 25 करने के प्रस्ताव पर अलग से चर्चा हुई है, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली है। इनमें से कोई भी कर्मचारी संबंधी समीक्षा मौजूदा चयन के लिए गायब स्पष्टीकरण नहीं देती।

मुख्य बिंदु

  • सुप्रीम कोर्ट के चार रिक्त पदों के लिए रत्न बहादुर बागचंद, चंद्र बहादुर सरु, जनक पांडे और गोकरण डांगी की सिफारिश की गई।
  • मुख्य न्यायाधीशों में बागचंद पहले स्थान पर हैं; हाई कोर्ट के न्यायाधीशों में सरु, पांडे और डांगी क्रमशः पांचवें, 13वें और 16वें स्थान पर हैं।
  • सपना प्रधान मल्ल ने पूरी प्रक्रिया का विरोध किया। महेश कुमार नेपाल ने केवल पांडे और डांगी को लेकर असहमति जताई।
  • परिषद ने मूल्यांकन रिकॉर्ड की समीक्षा की, लेकिन उसके सचिव ने कहा कि फैसले में तुलनात्मक अंक दर्ज नहीं किए गए।
  • नेपाल बार एसोसिएशन ने पारदर्शिता की कमी और वकीलों, महिलाओं तथा मधेसियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए।
  • संसद की सुनवाई समिति ने 10 दिन की जन शिकायत अवधि मंजूर की। सिफारिश की तारीख को लेकर खबरों में अंतर है और सुनवाई का कोई अंतिम नतीजा स्थापित नहीं है।
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