नेपाल में संगठित अपराध के आरोप से अंतिम बरी होने के बाद संबंधित अपराधों के निपटारे का रास्ता खुला

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Nepal Opens Settlement Route for Related Offenses After Final Organized Crime Acquittal

अंतिम बरी होने पर संबंधित मामले का निपटारा संभव

नेपाल के महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने देशभर के जिला और उच्च सरकारी वकील कार्यालयों को निर्देश दिया है कि संगठित अपराध के आरोप से जुड़े उन पात्र आपराधिक मामलों में समझौते की अनुमति दी जाए, जिनमें अदालत ने वह आरोप खारिज कर दिया हो और उससे संबंधित अपील प्रक्रिया अंतिम रूप से पूरी हो चुकी हो। यह बदलाव उन मामलों से जुड़ा है जिनमें एक ही अभियोजन में समझौते की अनुमति देने वाले और उसे रोकने वाले अपराध एक साथ शामिल होते हैं।

विषय-सूची
  1. अंतिम बरी होने पर संबंधित मामले का निपटारा संभव
  2. समझौते के नियम में क्या बदलाव है
  3. एक ही अभियोजन में अलग-अलग नतीजे क्यों हो सकते हैं
  4. अपील पूरी होना क्यों जरूरी है
  5. कौन-से अपराध पात्र हो सकते हैं?
  6. समझौता अदालत तक कैसे पहुंचता है
  7. पीड़ितों और आरोपियों के लिए क्या बदलेगा
  8. मुख्य बातें

उप महान्यायाधिवक्ता दशरथ पंगेनी ने इसका व्यावहारिक उदाहरण दिया: धोखाधड़ी और संगठित अपराध, दोनों के आरोपों का सामना कर रहे किसी व्यक्ति को संगठित अपराध के आरोप से बरी किया जा सकता है, जबकि अदालत धोखाधड़ी का आरोप बरकरार रखे। परिपत्र के तहत, आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी होने पर धोखाधड़ी के मामले में पीड़ित के साथ समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

इस प्रक्रिया में पीड़ित की सहमति, सरकारी वकील का आवेदन और अदालत का आदेश अहम हैं। सरकारी वकील के कार्यालय को यह भी पुष्टि करनी होगी कि खारिज किए गए आरोप से जुड़ी अपील की कार्यवाही पूरी हो चुकी है। इसलिए आरोपी और पीड़ित, दोनों के लिए निर्णायक बात अदालत का फैसला और अपील प्रक्रिया के बाद उसका अंतिम होना है।

यह परिपत्र धोखाधड़ी, सहकारी संस्थाओं से जुड़े मामले, अनादरित चेक और विदेशी रोजगार से जुड़े अपराधों समेत कई श्रेणियों में व्यावहारिक बाधा दूर करता है। पहले, किसी अन्यथा पात्र मामले में संगठित अपराध का आरोप जुड़ जाने से यह अनिश्चितता पैदा होती थी कि उस आरोप से बरी होने के बाद भी समझौता हो सकता है या नहीं।

महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने यह परिपत्र 14 अक्टूबर 2026 को इस फैसले का विवरण दिए जाने से पहले वाले सप्ताह में जारी किया। इसकी सटीक तारीख नहीं बताई गई। निर्देश आंशिक समझौते से संबंधित है, यानी कई आरोपों वाले अभियोजन में किसी पात्र अपराध का निर्धारित समझौता प्रक्रिया के जरिए निपटारा किया जा सकता है।

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समझौते के नियम में क्या बदलाव है

नेपाल सरकार द्वारा दायर आपराधिक मामलों में समझौते को नियंत्रित करने वाले मानकों की धारा 29(ग) आम तौर पर समझौते की अनुमति वाले अपराध को ऐसे अपराध के साथ जोड़े जाने पर समझौता रोकती है, जिसमें इसकी अनुमति नहीं है। एक ही व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन में कई आरोप हो सकते हैं, जिनमें से हर एक की कानूनी शर्तें और परिणाम अलग होते हैं।

दिक्कत तब आई जब अदालत ने समझौते पर रोक लगाने वाले आरोप को खारिज कर दिया, लेकिन दूसरे ऐसे आरोप को बरकरार रखा जिसके लिए कानूनन समझौता संभव था। अभियोजकों को स्पष्ट जवाब चाहिए था कि क्या आरोपों का मूल संयोजन आरोपी और पीड़ित के बीच समझौते में अब भी बाधा बनेगा।

महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने नेपाल सरकार वादी होने वाले आपराधिक मामलों में समझौते का आदेश देने संबंधी मानक, 2083, संशोधित किए हैं और इस स्थिति से निपटने के लिए निर्देश जारी किए हैं। वर्ष 2083 नेपाल के विक्रम संवत कैलेंडर के अनुसार है।

परिपत्र के अनुसार, समझौते पर रोक लगाने वाला आरोप अदालत द्वारा अप्रमाणित पाए जाने और उससे जुड़ी अपील प्रक्रिया अंतिम होने के बाद मामले के पात्र हिस्से में समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। पंगेनी ने इसका उद्देश्य समझौते की अनुमति वाले अपराधों और इसकी अनुमति न देने वाले अपराधों के साथ अलग-अलग ढंग से निपटकर बाधाएं दूर करना बताया।

एक ही अभियोजन में अलग-अलग नतीजे क्यों हो सकते हैं

धोखाधड़ी और संगठित अपराध के आरोपों का सामना कर रहा व्यक्ति एक ही कार्यवाही में दो कानूनी आरोपों का जवाब देता है। धोखाधड़ी मूल गलत काम से संबंधित है। संगठित अपराध का आरोप किसी योग्य अपराध को अंजाम देने में कई लोगों की संगठित भागीदारी से जुड़ा है। हर आरोप के लिए अपनी अलग कानूनी शर्तें पूरी होनी चाहिए।

संगठित अपराध के आरोप तब लग सकते हैं जब दो से अधिक लोग मिलकर संगठित तरीके से ऐसा अपराध करें, जिसमें तीन साल से अधिक कैद की सजा हो सकती है। संगठित अपराध का आरोप आरोपी को अतिरिक्त सजा के दायरे में भी ला सकता है, इसलिए इसका नतीजा मूल अपराध से आगे तक महत्वपूर्ण होता है।

सर्वोच्च अदालत ने संगठित अपराध निवारण अधिनियम, 2070 के तहत संगठित अपराध की शर्तों को अपहरण, बंधक बनाने और संगठित अपराध से जुड़े फैसला संख्या 11233 में स्पष्ट किया। न्यायमूर्ति ईश्वर प्रसाद खतिवडा और हरि प्रसाद फुयाल की संयुक्त पीठ ने विक्रम संवत कैलेंडर के अनुसार 2080/03/25 को यह फैसला सुनाया। फैसले के अनुच्छेद 26 में कहा गया है कि किसी अपराध में तीन या उससे अधिक लोगों की भागीदारी से अपने आप संगठित अपराध साबित नहीं होता। ठोस साक्ष्य से यह दिखना चाहिए कि आपराधिक, आर्थिक या अन्य भौतिक लाभ के लिए स्थापित स्थायी ढांचे से जुड़े तीन या उससे अधिक लोगों के समूह ने आपराधिक समूह के निर्देश पर, उसकी ओर से, उसके साथ मिलकर या उसके संस्थापक अथवा सदस्य के रूप में जानबूझकर गंभीर अपराध किया।

अनुच्छेद 25 में संगठित आपराधिक समूह और किसी विशेष अपराध को करने के लिए अस्थायी रूप से जुटे समूह के बीच भी अंतर किया गया है। अपराध करने के लिए बनाया गया स्थायी संस्थागत ढांचा स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए; अल्पकालिक या एक बार के लाभ के लिए कई लोगों का मिलकर अपराध करना उन्हें संगठित अपराध का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस फैसले के अनुसार, मूल सामूहिक अपराध के सबूतों के अलावा संगठित अपराध के आरोप के समर्थन में दिए गए साक्ष्यों का अलग आकलन जरूरी है।

अदालत यह मान सकती है कि धोखाधड़ी हुई, लेकिन संगठित अपराध का आरोप साबित नहीं हुआ। पंगेनी के उदाहरण में धोखाधड़ी का आरोप बरकरार रहता है, जबकि संगठित अपराध के आरोप से बरी कर दिया जाता है। परिपत्र के तहत बरी किए जाने का फैसला अंतिम होने पर अभियोजकों को बाकी धोखाधड़ी के मामले से निपटने का रास्ता मिलता है।

धोखाधड़ी की शिकायत का निपटारा चाहने वाले पीड़ित के लिए यह अंतर अहम है। हर आरोप पर अदालत के निष्कर्ष से तय होता है कि मामले का कौन-सा हिस्सा समझौते के योग्य हो सकता है। पात्रता फिर उस अपराध पर लागू नियमों और पीड़ित के साथ आवश्यक समझौते पर निर्भर करती है।

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अपील पूरी होना क्यों जरूरी है

मामले की सुनवाई कर रही अदालत से बरी होना प्रक्रिया का एक चरण है। अपील में उच्च अदालत फैसले की समीक्षा कर सकती है, इसलिए परिपत्र के अनुसार पात्र अपराध में समझौते का आदेश दिए जाने से पहले खारिज किए गए आरोप से जुड़ी कार्यवाही का अंतिम रूप से पूरा होना जरूरी है।

सरकारी वकील के कार्यालय को यह पुष्टि करनी होगी कि फैसला अंतिम हो चुका है। इसलिए आवेदन पर विचार करने वाले अभियोजक को फैसले के साथ-साथ उस आरोप से जुड़ी किसी भी अपील की स्थिति भी देखनी होगी, जो पहले समझौते में बाधा बन रहा था।

अपील की यह शर्त प्रक्रिया का क्रम तय करती है: अदालत संबंधित आरोप खारिज करे, उस निष्कर्ष पर अपील की कार्यवाही पूरी हो और फिर बाकी पात्र अपराध में समझौते का आवेदन आगे बढ़ सके। पक्षकार पहले से समझौते के लिए तैयार हों, तब भी यही शर्त लागू होगी।

निर्देश सभी मामलों के लिए एक समान समय-सीमा तय नहीं करता। कोई मामला किस समय समझौते के योग्य होगा, यह अदालत के फैसले और अपील के इतिहास पर निर्भर करेगा। इसके बाद समझौते के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

कौन-से अपराध पात्र हो सकते हैं?

फैसले में कई ऐसी श्रेणियों की पहचान की गई है जिनमें समझौते पर रोक लगाने वाला संबंधित आरोप अंतिम रूप से खारिज होने के बाद समझौता संभव हो सकता है। इनमें वित्तीय नुकसान, संपत्ति को क्षति, अनुबंध के तहत काम और विदेशी रोजगार से जुड़े मामले शामिल हैं।

  • सहकारी संस्थाओं से जुड़े मामले और धोखाधड़ी के अन्य अपराध।
  • आपराधिक उपद्रव के अपराध, जिनमें आगजनी या तोड़फोड़ से जुड़े संबंधित मामले शामिल हैं।
  • अनादरित चेक, जिन्हें आम तौर पर बाउंस चेक कहा जाता है।
  • अनुचित लेन-देन।
  • संपत्ति का नुकसान या क्षति करने वाला आपराधिक न्यासभंग।
  • आम लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।
  • निविदा, अनुबंध या समझौते के तहत किए जा रहे काम को प्रभावित करने वाले अपराध।
  • विदेशी रोजगार से जुड़े अपराध।

अनादरित चेक वह चेक है जिसका भुगतान बैंक प्रस्तुत किए जाने पर नहीं करता। आपराधिक न्यासभंग में किसी को सौंपी गई धनराशि या संपत्ति का दुरुपयोग शामिल है। ये अलग-अलग तरह के गलत काम हैं, लेकिन किसी भी श्रेणी का पात्र मामला संगठित अपराध के आरोप के साथ जोड़े जाने पर उसी प्रक्रियागत बाधा का सामना कर सकता है।

यह सूची उन क्षेत्रों की पहचान करती है जहां समझौते का रास्ता लागू हो सकता है। अभियोजकों और अदालतों को अब भी संबंधित अपराध, फैसले, पूरी हो चुकी अपील प्रक्रिया और पीड़ित की सहमति की जांच करनी होगी। सहकारी संस्थाओं और विदेशी रोजगार से जुड़े मामलों में भी अगले कदम का निर्धारण हर अभियोजन की कानूनी स्थिति से होगा।

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समझौता अदालत तक कैसे पहुंचता है

सरकारी वकील द्वारा अदालत में समझौते का आवेदन देने से पहले पीड़ित की सहमति जरूरी है। सरकार द्वारा दायर आपराधिक मामले में सरकारी अभियोजक के साथ आरोपी और पीड़ित व्यक्ति भी शामिल होते हैं। इसलिए पक्षकारों के बीच हुए समझौते को औपचारिक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है।

सरकारी वकील को यह साबित करना होगा कि मामला परिपत्र की शर्तें पूरी करता है। इसके लिए यह जांचना होगा कि बाकी अपराध में समझौते की अनुमति है या नहीं और संबंधित आरोप को खारिज करने का निष्कर्ष अपील प्रक्रिया के बाद अंतिम हुआ है या नहीं।

इसके बाद अदालत आवेदन पर विचार करती है और समझौते की अनुमति देने वाला आदेश जारी कर सकती है। लागू करना जरूरी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा। इस क्रम में हर पक्ष की भूमिका अलग है: पीड़ित सहमति देता है, अभियोजक आवेदन करता है और अदालत समझौते को मंजूरी देती है।

समझौते की शर्तें मामले और लागू नियमों पर निर्भर करेंगी। परिपत्र में बताया गया बदलाव समझौते की प्रक्रिया तक पहुंच से संबंधित है; इसके साथ मुआवजे की कोई तय रकम या गणना का कोई सूत्र घोषित नहीं किया गया।

पीड़ितों और आरोपियों के लिए क्या बदलेगा

पात्र मामलों में, समझौते पर रोक लगाने वाला आरोप अंतिम रूप से खारिज होने के बाद पीड़ितों के पास समझौते पर विचार करने के लिए अब अधिक स्पष्ट प्रक्रियागत रास्ता है। इसी स्थिति में आरोपी भी इस प्रक्रिया के जरिए बाकी पात्र अपराध का निपटारा करा सकते हैं।

इस परिपत्र से सरकारी वकीलों को उन मामलों के लिए एक समान निर्देश भी मिलता है जिनमें पहले अनिश्चितता बनी रहती थी। इसे देशभर के जिला और उच्च सरकारी वकील कार्यालयों में भेजने का उद्देश्य है कि कार्यवाही के अलग-अलग चरणों में आरोपों के ऐसे ही संयोजन वाले मामलों को संभाल रहे अभियोजकों का मार्गदर्शन हो।

धोखाधड़ी से जुड़े दो मामलों की प्रक्रिया फिर भी अलग-अलग गति से आगे बढ़ सकती है। एक मामले में संगठित अपराध से बरी होने का फैसला और उससे जुड़ी अपील की कार्यवाही पहले ही अंतिम हो चुकी हो सकती है। दूसरे मामले में बरी किए जाने के फैसले को चुनौती अब भी लंबित हो सकती है। समझौते के लिए उनकी पात्रता इन प्रक्रियागत तथ्यों के साथ-साथ पीड़ित की सहमति और बाकी आरोप की पात्रता पर निर्भर करेगी।

मुख्य बदलाव स्पष्ट है: समझौते पर रोक लगाने वाला आरोप अंतिम रूप से खारिज होने के बाद अभियोजक अदालत से किसी संबंधित पात्र अपराध में समझौते की अनुमति मांग सकते हैं। प्रभावित पक्षों के लिए अब यह तय करने का व्यावहारिक आधार फैसला, अपील का रिकॉर्ड और सहमति की प्रक्रिया है कि आगे बढ़ना है या नहीं।

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मुख्य बातें

  • महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने नेपालभर के जिला और उच्च सरकारी वकील कार्यालयों को समझौते से जुड़े निर्देश भेजे हैं।
  • संबंधित पात्र अपराध में तब समझौता हो सकता है जब अदालत समझौते पर रोक लगाने वाला आरोप खारिज कर दे और उस निष्कर्ष से जुड़ी अपील प्रक्रिया अंतिम हो जाए।
  • उप महान्यायाधिवक्ता दशरथ पंगेनी ने धोखाधड़ी का आरोप बरकरार रहने और संगठित अपराध से बरी किए जाने का उदाहरण दिया।
  • सर्वोच्च अदालत के फैसला संख्या 11233 के अनुसार, स्थायी आपराधिक ढांचे और गंभीर अपराध में जानबूझकर भागीदारी के ठोस साक्ष्य जरूरी हैं; केवल तीन या उससे अधिक लोगों की भागीदारी से संगठित अपराध साबित नहीं होता।
  • सरकारी वकील के कार्यालय को पुष्टि करनी होगी कि संबंधित अपील की कार्यवाही पूरी हो चुकी है।
  • पीड़ित की सहमति, सरकारी वकील का आवेदन और अदालत की मंजूरी जरूरी है।
  • संभावित पात्र श्रेणियों में धोखाधड़ी, सहकारी संस्थाओं से जुड़े मामले, बाउंस चेक, संपत्ति से जुड़े कुछ अपराध और विदेशी रोजगार संबंधी अपराध शामिल हैं।
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