न्यायिक नियुक्ति और परिवार की लंबित अपील
काठमांडू, 1 नवंबर। जनक पाण्डे को नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में नामित किए जाने पर वह उन न्यायाधीशों के साथ बैठेंगे जिन्हें उनकी पत्नी और उनके कई रिश्तेदारों से जुड़े भ्रष्टाचार मामलों की अपीलों पर फैसला करना होगा। उनकी पत्नी माया पुरी (पाण्डे) को विशेष अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन उसी अदालत ने उनके नाम पर दर्ज विवादित जमीन जब्त करने का आदेश भी दिया। फैसले के दोनों हिस्सों को अब चुनौती दी गई है।
विषय-सूची
- न्यायिक नियुक्ति और परिवार की लंबित अपील
- आठ शिकायतें और न्याय परिषद में असहमति
- भूमि के दोनों मामलों में क्या आरोप हैं
- विस्थापित 88 परिवारों के लिए तय की गई थी जमीन
- माया का बचाव और विशेष अदालत का फैसला
- दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचे
- नैतिक जोखिम पर पाण्डे और पूर्व न्यायाधीशों की अलग-अलग राय
- विवाद यहां तक कैसे पहुंचा
- न्यायिक स्वतंत्रता पर व्यापक बहस
- मुख्य बातें
अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग (CIAA) बरी किए जाने के फैसलों को पलटने की मांग कर रहा है। माया अपनी जमीन वापस चाहती हैं। दोनों पक्षों की अपीलें झापा जिले के दमक में रतुवा और डिपिनी नदियों के संगम के पास की सार्वजनिक जमीन से संबंधित हैं। इस इलाके को स्थानीय तौर पर बालुवाटार के नाम से जाना जाता है।
पाटन हाई कोर्ट की हेटौंडा पीठ में न्यायाधीश पाण्डे, संसदीय सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे चार नामित लोगों में शामिल हैं। पिछले शुक्रवार तक इन चारों के खिलाफ आठ शिकायतें दर्ज की गई थीं। शिकायतें जमा करने की अवधि 5 नवंबर तक है। प्रत्येक नामित व्यक्ति के खिलाफ कितनी शिकायतें हैं और क्या किसी शिकायत में भूमि विवाद का उल्लेख है, यह सार्वजनिक नहीं किया गया है।
तत्काल नैतिक सवाल सिर्फ पाण्डे की अपनी भागीदारी तक सीमित नहीं है। उन्होंने माना है कि वह अपनी पत्नी के मामले की सुनवाई नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि उनकी नियुक्ति से सहकर्मियों को ऐसे व्यक्ति के परिवार से जुड़े मामले का फैसला करना पड़ेगा, जो उनके साथ ही पद पर होगा।
पाण्डे का तर्क है कि दूसरे न्यायाधीश बिना किसी कठिनाई के अपीलों की सुनवाई कर सकते हैं। अब संसद को उनकी उपयुक्तता पर विचार करना है, जबकि सुप्रीम कोर्ट अलग से उनके परिवार से जुड़े कानूनी दावों पर फैसला करेगा। नियुक्ति प्रक्रिया और अपीलों की भूमिका अलग-अलग है: एक संभावित न्यायाधीश का आकलन करती है, जबकि दूसरी आपराधिक जिम्मेदारी और विवादित जमीन के स्वामित्व का निर्धारण करती है।
आठ शिकायतें और न्याय परिषद में असहमति
न्याय परिषद ने 6 अक्टूबर को रत्न बहादुर बागचन्द, चन्द्र बहादुर सारु, जनक पाण्डे और गोकर्ण दांगी की सिफारिश की थी। बागचन्द पोखरा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं। सारु पाटन हाई कोर्ट में कार्यरत हैं, जबकि दांगी पहले जनकपुर हाई कोर्ट की अस्थायी वीरगंज पीठ में सेवाएं दे चुके हैं।
इन सिफारिशों पर परिषद के भीतर आपत्तियां उठीं। सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल और परिषद सदस्य महेश कुमार नेपाल ने असहमति टिप्पणियां दर्ज कीं।
प्रधान मल्ल ने आपत्ति जताई कि पर्याप्त वजह बताए बिना वरिष्ठता की अनदेखी की गई, चयन प्रक्रिया समावेशी नहीं थी और नेपाल बार एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने पूरी सिफारिश प्रक्रिया में न तो भाग लिया और न ही उससे सहमति जताई। नेपाल ने खास तौर पर पाण्डे और दांगी की सिफारिश का विरोध किया।
संसदीय सुनवाई समिति ने 26 अक्टूबर को जनता से शिकायतें आमंत्रित कीं और स्पष्ट आधार तथा सबूत देने को कहा। शिकायतें 10 दिनों के भीतर समिति के सचिवालय या जिला प्रशासन कार्यालय में जमा की जा सकती थीं। शिकायतकर्ताओं से अपनी पहचान और संपर्क जानकारी देने को कहा गया था। जो अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते थे, उनके लिए गोपनीयता का विकल्प उपलब्ध था।
समिति शिकायतों की समीक्षा करेगी और मंजूरी पर फैसला लेने से पहले नामित व्यक्तियों की कार्ययोजनाएं सुनेगी। पाण्डे की सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है। परिषद के भीतर उठी आपत्तियां चयन प्रक्रिया से जुड़ी हैं; परिवार की लंबित अपीलें न्यायिक नैतिकता का एक अलग सवाल खड़ा करती हैं।
भूमि के दोनों मामलों में क्या आरोप हैं
CIAA ने फरवरी 2024 में सार्वजनिक जमीन को निजी नामों पर दर्ज किए जाने के आरोप में भ्रष्टाचार के दो मामले दायर किए। एक मामला 397 रोपनी और दूसरा 384 रोपनी जमीन से संबंधित था। दोनों आंकड़ों का कुल योग 781 रोपनी है, इसी वजह से विवाद को करीब 800 रोपनी जमीन का बताया जाता है। रोपनी नेपाल में जमीन के क्षेत्रफल की पारंपरिक इकाई है।
पहले मामले में 172 प्रतिवादी थे: 28 सरकारी कर्मचारी, 36 कथित अतिक्रमणकारी और बाद में जमीन खरीदने वाले 108 लोग। दूसरे मामले में 187 प्रतिवादी थे: नौ सरकारी कर्मचारी, 65 कथित अतिक्रमणकारी और 113 खरीदार। कई लोग दोनों मामलों में शामिल थे, इसलिए प्रतिवादियों की संख्या जोड़ने पर कुछ लोगों की गिनती दो बार होगी।
आयोग ने अधिकारियों पर सार्वजनिक संपत्ति का पंजीकरण कराने के लिए पद का दुरुपयोग करने और रेवतराज, जिन्हें गगन पुरी के नाम से भी जाना जाता है, तथा उनके रिश्तेदारों पर इस प्रक्रिया से लाभ उठाने का आरोप लगाया। गगन पुरी स्थानीय माओवादी नेता और माया के भाई हैं। उनकी मां देवरूपा पुरी और पत्नी केशवती पुरी भी लेनदेन से जुड़ी कार्यवाहियों में शामिल हैं।
CIAA की क्षतिपूर्ति मांग 346.65 मिलियन रुपये बताई गई है, हालांकि प्रकाशित एक अन्य आंकड़े में यह 34.67 मिलियन रुपये है। बड़ी राशि नेपाली में दिए गए विस्तृत आंकड़े 34 करोड़, 66 लाख और 54 हजार रुपये से मेल खाती है।
विस्थापित 88 परिवारों के लिए तय की गई थी जमीन
विवाद की शुरुआत 1981 की बाढ़ से जुड़ी है। उस समय रतुवा नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था और भूमिहीन लोगों की एक बस्ती विस्थापित हो गई थी। बाद में तटबंध का काम करके नदी का रुख मोड़ा गया। इसके बाद बची जमीन का पंजीकरण जांच का विषय बना।
CIAA के फैसले के अभिलेखों से जुड़ी जानकारी के अनुसार, 1982 में नदी संगम के उत्तर में दमक के वार्ड 13 और 14 की जमीन का विभाजन कर उसे 88 विस्थापित परिवारों में बांटने की योजना बनाई गई थी। स्वामित्व प्रमाणपत्र जारी होने से पहले भूमिहीन आयोग भंग कर दिया गया और जमीन खाली पड़ी रही।
आयोग को श्रावण 2074 बीएस में शिकायत मिली, जो जुलाई और अगस्त 2017 के अनुरूप है। शिकायत में बार-बार सर्वेक्षण और निजी स्वामित्व में अवैध पंजीकरण का आरोप लगाया गया था। इसकी जांच में करीब सात साल लगे।
आयोग का आरोप था कि सार्वजनिक जमीन को स्वबासी जमीन के रूप में दर्ज किया गया, यानी ऐसी जमीन जिसे व्यक्ति के कब्जे में मान्यता दी गई हो। उसने पुराने भूमि अभिलेखों को नए सर्वेक्षणों के साथ मिलाने के लिए अपनाई गई प्रक्रियाओं को भी चुनौती दी। व्यावहारिक रूप से आरोप यह है कि प्रशासनिक फैसलों ने सार्वजनिक संपत्ति को निजी जमीन में बदल दिया।
जांचकर्ताओं के अनुसार, जमीन का पंजीकरण 2066 बीएस, यानी लगभग 2009 और 2010 में शुरू हुआ और अगले नेपाली कैलेंडर दशक की शुरुआत तक पुरी के समूह ने करीब 200 रोपनी जमीन पर नियंत्रण कर लिया था। अभिलेखों में पुरी और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा बाद में किए गए 100 से अधिक हस्तांतरणों का उल्लेख है।
माया का बचाव और विशेष अदालत का फैसला
माया का कहना था कि उन्होंने स्थानीय निवासियों से खरीद और अपने ननिहाल से मिले उपहार के जरिए जमीन हासिल की। अपने बयान में उन्होंने एक बीघा और 19 कठ्ठा जमीन का उल्लेख किया। ये नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली भूमि माप की इकाइयां हैं।
माया ने कहा कि लेनदेन कानूनी थे और उनके पास की जमीन में सार्वजनिक संपत्ति शामिल होने से इनकार किया:
मैंने सर्वेक्षण में किसी भी सरकारी या सार्वजनिक जमीन को शामिल करके भ्रष्टाचार नहीं किया है। हमने उचित सरकारी कार्यालयों के जरिए जमीन हासिल की थी और इसमें हमारी ओर से कोई मिलीभगत या निहित स्वार्थ नहीं था।
विशेष अदालत ने माया और अन्य भू-स्वामियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि दुर्भावनापूर्ण मंशा साबित नहीं हुई। हालांकि, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 2002 की धारा 47 के तहत अदालत ने उनके नाम पर दर्ज विवादित जमीन जब्त करने का आदेश दिया।
इस फैसले के दो ठोस नतीजे हुए: माया को उस चरण में भ्रष्टाचार के आरोप से बरी कर दिया गया, लेकिन जब्ती के आदेश के तहत उन्होंने विवादित जमीन खो दी। उनकी अपील में इस नुकसान को पलटने की मांग की गई है।
दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचे
CIAA ने विशेष अदालत के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें उन प्रतिवादियों को बरी किया गया जिन्हें आयोग संपत्ति हासिल करने, इस्तेमाल करने और हस्तांतरित करने में सक्रिय भागीदार मानता है। उसका तर्क है कि वे सिर्फ लाभ पाने वाले नहीं थे और वह सुप्रीम कोर्ट से उनकी बरी किए जाने की सजा को पलटने की मांग कर रहा है।
आयोग का कहना है कि सरकारी जमीन का निजी पंजीकरण और फिर हस्तांतरण होने से सार्वजनिक धन और संपत्ति का नुकसान हुआ। माया का पक्ष है कि उन्होंने कानूनी तरीके से जमीन हासिल की थी और जब्ती का आदेश पलटा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को सबूतों और लागू कानून के आधार पर इन दावों पर फैसला करना है।
CIAA की अपील को मामला संख्या 082-CR-1433 के रूप में दर्ज किया गया है। यह जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार के 74 मामलों में शामिल थी, जिन्हें एक साथ सूचीबद्ध किया गया था। यह संख्या विवाद से जुड़ी व्यापक कार्यवाहियों को दर्शाती है।
गगन पुरी को अलग-अलग फैसलों के कारण अन्य नतीजों का भी सामना करना पड़ रहा है। विशेष अदालत ने जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार के एक मामले में उन्हें एक साल की जेल और 3,152,000 रुपये का जुर्माना सुनाया। फरवरी 2024 में एक अलग मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत ने 40.3 मिलियन रुपये वसूलने का आदेश दिया। मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
नैतिक जोखिम पर पाण्डे और पूर्व न्यायाधीशों की अलग-अलग राय
पाण्डे ने अपनी पत्नी के खिलाफ अभियोजन को स्वीकार करते हुए उनकी बरी होने का हवाला दिया है। उनका कहना है कि लंबित अपील से सुप्रीम कोर्ट के बाकी न्यायाधीशों के काम में बाधा नहीं आएगी।
अपनी स्थिति को दूसरे न्यायाधीशों से अलग मानने की वजह बताते हुए पाण्डे ने कहा:
मैं अपनी पत्नी से जुड़े मामले की सुनवाई नहीं कर सकता, लेकिन दूसरों के लिए यह समस्या क्यों होनी चाहिए?
किसी निजी संबंध के कारण न्यायाधीश का मामले की सुनवाई से अलग होना रिक्यूजल कहलाता है। यहां पाण्डे ने अपनी पत्नी के मामले से अलग रहने की जरूरत स्वीकार की है। असहमति इस बात को लेकर है कि उनके सहकर्मियों पर किस तरह का दबाव पड़ सकता है या ऐसा दबाव पड़ने का आभास हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश टोप बहादुर सिंह ने कहा कि किसी सहकर्मी की पत्नी से जुड़ी अपील का फैसला करने से न्यायिक स्वतंत्रता की धारणा प्रभावित हो सकती है, भले ही न्यायाधीश निष्पक्षता से काम करना चाहें। उन्होंने बताया कि वे उन मामलों से बचते थे जिनमें उनके परिचित पड़ोसी शामिल होते थे।
पूर्व न्यायाधीश एकराज आचार्य ने कहा कि न्यायाधीशों ने निजी तौर पर अलग-अलग मानक अपनाए हैं। उन्होंने पूर्व न्यायाधीश त्रिलोक प्रताप राणा के उस फैसले का उदाहरण दिया जिसमें वे राणा परिवार के सदस्यों से जुड़े मामलों से दूर रहे थे, और पड़ोसियों से जुड़े मामलों में सिंह की सावधानी का भी उल्लेख किया।
आचार्य ने बताया कि सुनवाई से अलग रहने का नियम कितनी दूर तक लागू होना चाहिए, यह तय करना कठिन है:
मुख्य सवाल यह है कि नैतिक अनुशासन बनाए रखने के लिए कितनी दूर तक जाना चाहिए।
इस मामले से जुड़े लोगों के लिए इसके नतीजे ठोस हैं। माया जमीन वापस चाहती हैं; CIAA दोषसिद्धि और सार्वजनिक संपत्ति की वसूली चाहता है; और न्यायाधीशों को ये दावे उस व्यक्ति के साथ काम करते हुए तय करने पड़ सकते हैं जो माया के पति हैं। संसदीय सुनवाई से सांसदों को नियुक्ति से पहले इस स्थिति की पड़ताल करने का अवसर मिलता है।
विवाद यहां तक कैसे पहुंचा
भूमि से जुड़ी कार्यवाहियां और नामांकन अलग-अलग समय पर आगे बढ़े हैं। मुख्य घटनाक्रम से पता चलता है कि दशकों पहले शुरू हुआ विवाद अब नियुक्ति का तत्काल मुद्दा क्यों बन गया है:
- 1981: बाढ़ और रतुवा नदी का रास्ता बदलने से भूमिहीन लोगों की एक बस्ती विस्थापित हुई।
- 1982: 88 विस्थापित परिवारों के लिए जमीन का विभाजन किया गया, लेकिन भूमिहीन आयोग भंग होने से पहले स्वामित्व प्रमाणपत्र वितरित नहीं हुए।
- 2017: CIAA को गैरकानूनी सर्वेक्षण और पंजीकरण के आरोप वाली शिकायत मिली।
- फरवरी 2024: विशेष अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गगन पुरी के खिलाफ फैसला सुनाया और CIAA ने जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार के दो मामले दायर किए।
- 6 अक्टूबर: न्याय परिषद ने पाण्डे समेत सुप्रीम कोर्ट के चार नामित व्यक्तियों की सिफारिश की।
- 26 अक्टूबर: संसदीय सुनवाई समिति ने जनता से शिकायतें आमंत्रित कीं।
- 1 नवंबर: पिछले शुक्रवार तक चारों नामित व्यक्तियों के खिलाफ आठ शिकायतें दर्ज की जा चुकी थीं।
- 5 नवंबर: शिकायतें जमा करने की अवधि समाप्त होगी।
समिति का अगला काम आपत्तियों की पड़ताल करना और नामित व्यक्तियों की सुनवाई करना है। मंजूरी मिलने पर नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट की अपीलों पर न्यायिक फैसले होना जारी रहेगा।
न्यायिक स्वतंत्रता पर व्यापक बहस
नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा ने 1 नवंबर को कहा कि उनकी पार्टी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अखंडता बनाए रखने के तरीकों पर चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने संस्थानों की संरचना और उसकी व्यवस्थाओं के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए बिना किसी पूर्वाग्रह के चर्चा की अपील की।
उनकी टिप्पणियां व्यापक संस्थागत बहस पर थीं, माया की अपील के गुण-दोष पर नहीं। पाण्डे के नामांकन से जुड़े ठोस सवाल सीमित हैं: उनके पारिवारिक हितों का खुलासा कैसे होगा, वे संबंधित कार्यवाहियों से कैसे अलग रहेंगे और उनके सहकर्मी उनके रिश्तेदारों से जुड़े मामलों पर कैसे विचार करेंगे।
समिति को अदालतों की अलग भूमिका का सम्मान करते हुए नामित व्यक्ति का आकलन करना है। माया की बरी होने के फैसले के खिलाफ अपील लंबित है, उनकी जमीन विवादित जब्ती आदेश के अधीन है और CIAA अब भी अलग नतीजे की मांग कर रहा है। इन लंबित कार्यवाहियों के कारण नामांकन का समय नैतिक बहस का अहम पहलू बन गया है।
मुख्य बातें
- जनक पाण्डे नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के लिए सिफारिश किए गए चार न्यायाधीशों में से एक हैं।
- उनकी पत्नी माया पुरी को भ्रष्टाचार के आरोप से बरी किया गया, लेकिन विशेष अदालत ने उनके नाम पर दर्ज विवादित जमीन जब्त करने का आदेश दिया।
- CIAA बरी किए जाने के फैसलों को चुनौती दे रहा है, जबकि माया जमीन वापस चाहती हैं।
- भ्रष्टाचार के दोनों मामले दमक की 397 और 384 रोपनी जमीन से जुड़े हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 781 रोपनी है।
- पिछले शुक्रवार तक चारों नामित व्यक्तियों के खिलाफ आठ शिकायतें दर्ज हुई थीं; शिकायतें जमा करने की अवधि 5 नवंबर को समाप्त होगी।
- न्याय परिषद के दो सदस्यों ने सिफारिशों पर असहमति जताई। महेश कुमार नेपाल ने खास तौर पर पाण्डे और गोकर्ण दांगी का विरोध किया।
- पाण्डे मानते हैं कि वह अपनी पत्नी के मामले की सुनवाई नहीं कर सकते। पूर्व न्यायाधीशों ने इस मामले का फैसला करने वाले उनके सहकर्मियों को लेकर भी चिंता जताई है।






