केंद्र के पास अब भी मौजूद अधिकारों को लेकर छह मुख्यमंत्री जुटे
नेपाल के सात में से छह मुख्यमंत्री पुलिस व्यवस्था, सरकारी कर्मचारियों और वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण की मांग करने के लिए बिराटनगर में जुटे हैं। गंडकी के मुख्यमंत्री सुरेंद्र राज पांडे ने कहा कि प्रांतों की पिछली बैठक में रखी गई 17 मांगों में से 16 अब भी अनसुलझी हैं। उन्होंने कहा कि आंशिक रूप से पूरी हुई मांग, यानी ड्राइविंग लाइसेंस कार्ड छापने की अनुमति, के बावजूद प्रांत केंद्रीय मुद्रण विभाग पर निर्भर हैं।
विषय-सूची
- केंद्र के पास अब भी मौजूद अधिकारों को लेकर छह मुख्यमंत्री जुटे
- संवैधानिक विवाद का क्या अर्थ है
- पहले हुए समझौतों की लंबी सूची अब भी अधूरी
- पुलिस की जिम्मेदारी, लेकिन प्रांतीय कमान नहीं
- कर्मचारी नियुक्तियों में देरी का असर प्रांतीय मंत्रालयों तक
- प्रांतीय कानूनों के सामने संघीय पाबंदियां
- भूमि विवादों से खास परियोजनाएं अटकीं
- प्रांतों की वित्तीय मांगें अलग-अलग
- आपदा राहत और पर्यटन साझा परियोजनाओं के अवसर
- प्रांतीय प्रदर्शन भी कसौटी का हिस्सा
- मुख्य बिंदु
कोशी में हो रहे इस सम्मेलन में कोशी, मधेश, बागमती, गंडकी, लुंबिनी और कर्णाली के मुख्यमंत्री शामिल हैं। सुदूरपश्चिम के मुख्यमंत्री खगराज भट्ट प्रांतीय बजट विवाद के कारण अनुपस्थित हैं, हालांकि उनके प्रांत का प्रतिनिधित्व मुख्य सचिव कर रहे हैं। संघीय सरकार के प्रतिनिधि इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं।
सम्मेलन के बुधवार को एक बिराटनगर घोषणा-पत्र के साथ संपन्न होने की उम्मीद है, जिसमें कानूनी बाधाओं, वित्तीय अधिकारों और प्रांतों के बीच सहयोग को शामिल किया जाएगा। बागमती के मुख्यमंत्री किरण थापा मगर ने कहा कि इस घोषणा-पत्र से मुख्यमंत्रियों का साझेदारी मंच बनेगा। एक संयुक्त आपदा राहत कोष और धार्मिक पर्यटन सर्किट का भी प्रस्ताव है, जिससे काठमांडू को संबोधित मांगों से आगे बढ़कर एजेंडा तय होगा।
मुख्य शिकायत जिम्मेदारी और नियंत्रण के बीच का अंतर है। प्रांतीय सरकारें मंत्रालय चलाती हैं, बजट मंजूर करती हैं, कानून बनाती हैं और विकास परियोजनाएं संचालित करती हैं, फिर भी उनके नेताओं का कहना है कि पुलिस तैनाती, वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति, जमीन और राजस्व से जुड़े अहम फैसले संघीय सरकार के पास रहते हैं।
मुख्यमंत्री एक जैसी मांगें नहीं रख रहे हैं। मधेश चाहता है कि संसाधन उसकी आबादी और सेवा संबंधी जरूरतों के अनुरूप हों। कर्णाली और सुदूरपश्चिम चाहते हैं कि दुर्गम भूभाग, गरीबी और विकास में कमी को अधिक महत्व दिया जाए। उनकी साझा चुनौती इन अलग-अलग प्राथमिकताओं को एक व्यवहार्य समझौते में बदलना है, साथ ही यह बताना है कि प्रांत अपना प्रदर्शन कैसे सुधारेंगे।
संवैधानिक विवाद का क्या अर्थ है
नेपाल का संविधान सरकार को संघीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तरों में बांटता है। अनुच्छेद 232 के अनुसार उनके संबंध सहयोग, सहअस्तित्व और समन्वय पर आधारित होने चाहिए। मुख्यमंत्रियों का तर्क है कि यह व्यवस्था तब तक ठीक से काम नहीं कर सकती, जब तक कानून और प्रशासनिक ढांचे प्रांतीय जिम्मेदारियों को केंद्र की मंजूरी पर निर्भर बनाए रखते हैं।
कोशी के मुख्यमंत्री हिकमत कुमार कार्की चाहते हैं कि कानून में अधिक स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किस स्तर के पास कौन से अधिकार हैं। उनकी चिंता व्यावहारिक है: कोई निर्वाचित प्रांतीय सरकार किसी सेवा के लिए जिम्मेदार तो हो सकती है, लेकिन उसे देने के लिए जरूरी कर्मचारियों, परिसंपत्तियों या संस्थानों पर उसका स्पष्ट अधिकार न हो।
मेजबान प्रांत के मुख्यमंत्री कार्की ने इस जुटान को संघवाद को बेहतर बनाने का मंच बताया, न कि किसी खास सरकार के खिलाफ विरोध। नेपाली से अनूदित टिप्पणियों में उन्होंने कानूनी सीमाएं स्पष्ट करने की मांग की:
अब कानून में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि कौन से अधिकार संघीय सरकार के हैं, कौन से प्रांत के और कौन से स्थानीय स्तर के।
बागमती के थापा मगर ने भी कहा कि केवल काठमांडू से प्रांतीय राजधानियों तक अधिकार पहुंचा देने से संघवाद का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। नागरिकों को सरकार तक पहुंच, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नीतियां और अपने फैसलों के लिए जवाबदेह सार्वजनिक संस्थान चाहिए। उन्होंने परस्पर विरोधी जिम्मेदारियों और कमजोर समन्वय को बाधा बताया और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने को समाधान मानने से इनकार किया।
पहले हुए समझौतों की लंबी सूची अब भी अधूरी
बिराटनगर की बैठक प्रांतीय सम्मेलनों और संघीय नेताओं को सौंपे गए ज्ञापनों के कई वर्षों बाद हो रही है। कार्की ने कहा कि नेपाली कैलेंडर के 2075 से उठाए गए कई मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। पांडे चाहते हैं कि नया सम्मेलन केवल एक और सूची तैयार करने के बजाय पहले हुए समझौतों के क्रियान्वयन की समीक्षा करे।
इस क्रम में ये बैठकें और प्रस्तावित कदम शामिल हैं:
- 2075: मुख्यमंत्रियों ने पोखरा में बैठक की। यह प्रांतीय मांगों के समन्वय के शुरुआती प्रयासों में से एक थी।
- 15 असार 2080: पोखरा की बैठक में संघीय सरकार को देने के लिए 17 सूत्रीय संयुक्त ज्ञापन तैयार किया गया।
- 16 असार 2080: प्रांतीय नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल की मौजूदगी में राष्ट्रीय समन्वय परिषद की बैठक में अपनी चिंताएं रखीं।
- 13 पौष 2080: हेटौडा में हुई बैठक में नौ सूत्रीय अलग संयुक्त ज्ञापन तैयार किया गया।
- 27 असोज 2083: प्रकाशित तारीख के अनुसार बिराटनगर सम्मेलन शुरू हुआ।
- उद्घाटन के बाद बुधवार: प्रतिभागियों से बिराटनगर घोषणा-पत्र जारी करने की उम्मीद है।
पांडे के इस बयान का अर्थ है कि 17 में से 16 मांगें अब तक पूरी नहीं हुईं, यानी उस सूची की लगभग 94 प्रतिशत मांगें लंबित हैं। यह संख्या मांगों की गिनती बताती है, उनका सापेक्ष महत्व या लागत नहीं। लाइसेंस छापने का उनका उदाहरण यह भी दिखाता है कि औपचारिक रूप से अधिकार सौंपे जाने के बाद भी प्रांत उसे स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने के साधनों के बिना निर्भर रह सकता है।
समय-क्रम में एक असंगति है। विवरण प्रांतीय अनुभव को नौ साल या लगभग एक दशक पुराना बताते हैं, जबकि एक विवरण सम्मेलन की तारीख 2083 बताता है और संविधान को 2072 का बताता है। ये विवरण एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते, इसलिए बीता हुआ समय क्रियान्वयन के सत्यापित माप के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
पुलिस की जिम्मेदारी, लेकिन प्रांतीय कमान नहीं
पुलिस समायोजन, यानी संघीय ढांचे में कर्मचारियों और कमान की जिम्मेदारियां तय करने की प्रक्रिया, सबसे पुरानी मांगों में से एक है। मुख्यमंत्रियों का कहना है कि प्रांतीय पुलिस अब भी उनके नियंत्रण में नहीं आई है। इससे वे सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जवाबदेह होने के बावजूद सुरक्षा संस्था को निर्देश देने में असमर्थ हैं।
मधेश के मुख्यमंत्री कृष्ण प्रसाद यादव ने इस समस्या को भारत के साथ प्रांत की खुली सीमा से जोड़ा। उन्होंने कहा कि पुलिस समायोजन न होने से तस्करी और अपराध पर काबू पाने के प्रयास कठिन हो जाते हैं। उन्होंने परिसंपत्तियों, उपकरणों और अभिलेखों के हस्तांतरण की भी मांग की और कहा कि संचालन ढांचा न होने पर जिम्मेदारी से प्रभावी सुरक्षा प्रबंधन नहीं हो सकता।
पांडे ने इसी मुद्दे को आपदा से निपटने की क्षमता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि बाढ़ और भूस्खलन के दौरान लोग प्रांतीय सरकारों से मदद मांगते हैं, लेकिन प्रांतीय नेताओं का पुलिस पर नियंत्रण नहीं है, जबकि बचाव के लिए अक्सर सबसे पहले उसी बल की जरूरत पड़ती है। उनकी मांग नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी है, मुख्यमंत्रियों के लिए अतिरिक्त अनुरक्षकों या निजी सुरक्षा से नहीं।
नेपाल में संघवाद का अध्ययन करने वाले अर्जुन बिक ने सुनसरी के कप्तानगंज में धार्मिक तनाव का उदाहरण दिया, जहां उनके अनुसार प्रांतीय जानकारी मददगार हो सकती थी। उनका तर्क था कि पास के बिराटनगर में स्थित सरकार स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों को समझने के कारण तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती थी। यह इस बारे में उनका आकलन है कि प्रांतीय कमान कैसे काम कर सकती है, इस बात का प्रमाण नहीं कि अलग कमान व्यवस्था से घटना को अनिवार्य रूप से रोका या सुलझाया जा सकता था।
बागमती के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि सम्मेलन पुलिस समायोजन को लेकर संघीय सरकार पर औपचारिक कानूनी दबाव बनाने पर विचार करे। बैठक के विवरण में किसी खास अदालती याचिका, सुनवाई या बाध्यकारी क्रियान्वयन की समय-सीमा की घोषणा नहीं की गई है।
कर्मचारी नियुक्तियों में देरी का असर प्रांतीय मंत्रालयों तक
लुंबिनी के मुख्यमंत्री चेत नारायण आचार्य ने कहा कि संघीय सिविल सेवा विधेयक अब भी संसद में लंबित है। उनका तर्क है कि देरी से अनिश्चितता पैदा हुई है और कर्मचारियों का मनोबल गिरा है, जबकि प्रशासनिक अधिकारों का अधूरा हस्तांतरण प्रांतीय कामकाज को कमजोर कर रहा है।
सिविल सेवा कानून यह तय करता है कि सरकारी कर्मचारियों की भर्ती, तैनाती, पदोन्नति और प्रबंधन कैसे होगा। प्रांतों के लिए यह विवाद रोजमर्रा के प्रशासन तक पहुंचता है: किसी मंत्रालय के पास मंजूर कार्यक्रम हो सकता है, लेकिन उसे लागू करने के लिए स्थिर नेतृत्व या पर्याप्त कर्मचारी न हों।
यादव ने संघीय सरकार की ओर से प्रांतीय मंत्रालयों में सचिव भेजने की जारी प्रथा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि प्रांतीय स्वायत्तता और प्रशासन में संघीय दखल के बीच स्पष्ट सीमा तय होनी चाहिए।
गंडकी ने आंशिक वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई है। पांडे ने कहा कि संगठन और प्रबंधन सर्वेक्षण के जरिए प्रांत ने हर मंत्रालय में कम से कम एक 11वें कर्मचारी स्तर का पद बनाया है। इसका उद्देश्य यह है कि संघीय सचिव के नहीं पहुंचने पर कोई वरिष्ठ प्रांतीय कर्मचारी काम जारी रख सके। उन्होंने यह भी शिकायत की कि सचिवों की नियुक्ति होने पर भी बार-बार तबादलों से कामकाज की निरंतरता बाधित होती है।
यह कदम प्रांतीय पहल और उसकी सीमाओं, दोनों को दिखाता है। गंडकी सचिव के नीचे के स्तरों पर कर्मचारी व्यवस्था मजबूत कर सकता है, लेकिन पांडे का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में वह मंत्रालय के सचिवों की स्वतंत्र नियुक्ति नहीं कर सकता। सम्मेलन के विवरण में संघीय सिविल सेवा कानून पारित होने की कोई तारीख नहीं दी गई है।
प्रांतीय कानूनों के सामने संघीय पाबंदियां
पांडे ने नेपाली कैलेंडर के 2012 के पुलिस अधिनियम, 2028 के शिक्षा अधिनियम और 2049 के वन अधिनियम को पुराने कानूनों के रूप में बताया, जिनका हवाला देकर प्रांतीय कार्रवाई सीमित की जाती है। उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून को भी बाधा बताया। ये कानूनी अवरोधों के बारे में उनके विवरण हैं, किसी प्रकाशित न्यायिक फैसले के निष्कर्ष नहीं।
गंडकी ने उन क्षेत्रों में पहले ही कुछ उपाय कानून के रूप में पारित किए हैं, जिन्हें वह अपने अधिकार क्षेत्र में मानता है। पांडे ने कहा कि संघीय कानून से टकराव के कारण उसके वन कानून को अदालत में रोक दिया गया। विवरण में मामले, अदालत के आदेश या अगली सुनवाई की पहचान नहीं दी गई है, इसलिए सटीक कानूनी आधार और समय-सीमा अनसुलझी है।
अन्य प्रांतीय पहलों को भी इसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। घरेलू शराब की ब्रांडिंग और विपणन के लिए गंडकी की व्यवस्थाएं संघीय उत्पाद शुल्क प्रावधानों से प्रभावित हैं। पांडे ने कहा कि औषधीय और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए गांजा की खेती से संबंधित उसके कानून पर भी संघीय कानूनी पाबंदियां हैं। इसलिए प्रांतीय कानून पारित हो जाने का यह अर्थ नहीं कि आगे कानूनी बदलावों के बिना ये गतिविधियां शुरू हो सकती हैं।
पत्थर, गिट्टी, रेत और खनन अधिकारों को लेकर विवाद का वित्तीय असर भी है। पांडे ने कहा कि तीनों स्तरों के बीच अधिकारों के overlapping होने से प्रांत की राजस्व वसूली की क्षमता सीमित होती है। कोई प्रांत अपने काम का अधिक हिस्सा स्थानीय स्तर पर वित्तपोषित करना चाहे, फिर भी उसे यह स्पष्ट होने पर निर्भर रहना पड़ सकता है कि उत्खनन की अनुमति कौन दे सकता है और उससे होने वाली आय किसे मिलेगी।
पांडे ने कहा कि गंडकी संघीय कानूनों का अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं कर सकता और अपने कानून बनाना जारी रखेगा। उनका रुख अनसुलझे मुद्दे को सामने लाता है: प्रांतीय पहल अधिकारों की सीमाओं को परख सकती है, लेकिन अदालत का हस्तक्षेप व्यापक अधिकार-विभाजन तय करने के बजाय क्रियान्वयन को रोक सकता है।
भूमि विवादों से खास परियोजनाएं अटकीं
भूमि अधिग्रहण इस बात के कुछ सबसे स्पष्ट उदाहरण देता है कि प्रशासनिक नियंत्रण से उन परियोजनाओं पर क्या असर पड़ता है जिनके लिए पहले से धन या कोई निश्चित उद्देश्य है। पांडे ने कहा कि प्रांतीय विधानसभा और मंत्रालयों की इमारतों के लिए भी गंडकी के पास अपनी जमीन नहीं है। उनके अनुसार, विधानसभा का परिसर एक पूर्व स्थानीय विकास प्रशिक्षण संस्थान का है और प्रांतीय स्वामित्व में हस्तांतरित करने के बजाय केवल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया गया है।
कोराला सीमा चौकी पर प्रांत ने पर्यटकों और यात्रियों को हवा और बारिश से बचाने के लिए एक ढांचा बनाने हेतु धन आवंटित किया। पांडे के अनुसार, शुरू में अनुमति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि जमीन संघीय सीमा शुल्क कार्यालय के नाम पर दर्ज थी। अंततः प्रांत ने स्थानीय सरकार के साथ मिलकर इसे आपातकालीन बचाव केंद्र के रूप में बनाया।
उन्होंने यह भी कहा कि एशियाई विकास बैंक के ऋण से समर्थित मनांग और मुस्तांग की सेब क्षेत्र परियोजना आवश्यक जमीन न मिलने के कारण लागू नहीं हो सकी। विवरण में ऋण की राशि, परियोजना का बजट या संशोधित पूरा होने की तारीख नहीं बताई गई है।
ये उदाहरण धन की कमी और अधिकार की कमी के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं। कोराला में प्रांत ने धन आवंटित किया था, लेकिन तुरंत उस जगह का इस्तेमाल नहीं कर सका। सेब परियोजना के लिए वित्तीय सहायता मिलने से जमीन तक पहुंच का सवाल हल नहीं हुआ। स्वामित्व और मंजूरी की प्रक्रियाएं तय किए बिना खर्च की जिम्मेदारियां सौंपने से निर्माण या उत्पादन शुरू होने से पहले ही कार्यक्रम अटक सकते हैं।
प्रांतों की वित्तीय मांगें अलग-अलग
कार्की ने कोशी का वार्षिक आंतरिक राजस्व लगभग 4 अरब से 5 अरब नेपाली रुपये बताया, जबकि कर्णाली का राजस्व 1 अरब रुपये से कम है। इन आंकड़ों के अनुसार कोशी का आंतरिक राजस्व कर्णाली से चार गुने से अधिक है। ये मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए अनुमान हैं और किसी साझा वित्त वर्ष या राजस्व के विस्तृत ब्योरे का उल्लेख नहीं है।
कर्णाली के मुख्यमंत्री मंगल बहादुर शाही ने तर्क दिया कि धन बांटने का आधार केवल आबादी नहीं हो सकती। बिखरी बस्तियों, दुर्गम भूभाग और सीमित बुनियादी ढांचे वाले बड़े क्षेत्र में कम लोगों के रहने पर भी लागत अधिक हो सकती है। दूरदराज के इलाकों में सड़क बनाना या सेवाएं पहुंचाना ऐसा खर्च मांगता है, जिसे निवासियों की साधारण गिनती से नहीं मापा जा सकता।
सुदूरपश्चिम के भट्ट भी चाहते हैं कि वित्तीय हस्तांतरण में भौगोलिक कठिनाइयों, गरीबी और प्रांत की विकास स्थिति को प्रमुख संकेतक बनाया जाए। बिराटनगर में अनुपस्थित होने के बावजूद उन्होंने यही चिंता जताई कि आवंटन में वंचित समुदायों तक पहुंचने की लागत को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मधेश पर अलग तरह का दबाव है। यादव ने कहा कि उसकी बड़ी आबादी के अनुपात में संसाधन और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा नहीं है। उन्होंने बागमती की तुलना में वेंटिलेटर वाले बिस्तरों की कम संख्या का उल्लेख किया, लेकिन संख्याएं नहीं दीं, जिनसे संख्यात्मक तुलना हो सके। उनकी मांग है कि आबादी और सार्वजनिक सेवाओं की जरूरतों के अनुरूप धन हस्तांतरित किया जाए और प्राकृतिक संसाधनों का उचित बंटवारा हो।
इन मांगों में अनिवार्य रूप से टकराव नहीं है। आबादी बताती है कि कितने लोगों को सेवाओं की जरूरत है; भूगोल बताता है कि उन तक पहुंचने में कितना खर्च आएगा; और गरीबी तथा मौजूदा बुनियादी ढांचा अधूरी जरूरतों का संकेत देते हैं। मुश्किल बातचीत इस बात पर होगी कि हर कारक को कितना महत्व दिया जाए। सम्मेलन के उद्घाटन पर कोई सहमत सूत्र या संशोधित आवंटन घोषित नहीं किया गया।
आपदा राहत और पर्यटन साझा परियोजनाओं के अवसर
थापा मगर ने सभी सात प्रांतों की भागीदारी वाला आपदा प्रबंधन और राहत कोष प्रस्तावित किया। उन्होंने बागमती और आसपास के इलाकों में हाल की बाढ़ और भूस्खलन का जिक्र किया, जिनसे राजमार्गों, पुलों और बस्तियों को नुकसान पहुंचा। उन्होंने कहा कि बचाव और पुनर्वास में सुरक्षा बलों, सरकारी कर्मचारियों और स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया।
यह प्रस्ताव ऐसी समस्या को दर्शाता है जो प्रांतीय सीमाओं पर नहीं रुकती। एक प्रांत में राजमार्ग या पुल को नुकसान पहुंचने से दूसरी जगहों पर यात्रा और आपूर्ति बाधित हो सकती है। साझा कोष से संयुक्त प्रतिक्रिया में योगदान का तरीका मिल सकता है, हालांकि विवरण में योगदान की प्रस्तावित राशि, प्रबंधन के नियम या इसे स्थापित करने की तारीख नहीं दी गई है।
कार्की ने जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी आपदाओं को भी बड़ी चुनौतियां बताया। उन्होंने कानूनी विवाद सुलझाने के प्रयासों के साथ-साथ प्रांतों से संयुक्त निवेश और साझा परिणामों की दिशा में काम करने का आग्रह किया। शाही ने प्रांतीय सरकारों और विधानसभाओं के बीच संबंध मजबूत करने तथा प्रांतों के बीच अनुभव साझा करने की मांग की।
यादव ने दो मसौदा दस्तावेज पेश किए और जनकपुरधाम, विवाह पंचमी उत्सव और मिथिला कला को कोशी के बराहक्षेत्र और रामधुनी तथा लुंबिनी से जोड़ने वाला पर्यटन सर्किट प्रस्तावित किया। इस विचार का उद्देश्य अलग-अलग प्रचार करने के बजाय कई प्रांतों के गंतव्यों को जोड़ना है। उन्होंने संघीय सरकार से नए कार्यालय बनाने के बजाय मौजूदा कार्यालय प्रांतों को सौंपने का आग्रह भी किया।
पर्यटन सर्किट, साझेदारी मंच और राहत कोष अभी प्रस्ताव या घोषित योजनाएं हैं। इनमें से किसी को भी पहले से चल रहे वित्तपोषित कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका व्यावहारिक महत्व सहमत जिम्मेदारियों, वित्तीय प्रतिबद्धताओं और क्रियान्वयन की व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।
प्रांतीय प्रदर्शन भी कसौटी का हिस्सा
मुख्यमंत्रियों ने यह भी माना कि प्रांतीय कमजोरियों की वजह केवल संघीय पाबंदियां नहीं हैं। कार्की ने बजट प्रबंधन, परियोजनाओं में देरी और प्रशासनिक खर्च की प्रभावशीलता की समीक्षा की मांग की। आचार्य ने माना कि प्रांतों में भी कमियां हैं और उन्हें दूर करने की जरूरत है।
पांडे ने कहा कि सरकार के तीनों स्तरों के कुल प्रशासनिक खर्च में प्रांतों का हिस्सा पांच प्रतिशत से कम है। यह दावा प्रशासनिक खर्च से जुड़ा है, कुल सार्वजनिक व्यय में उनके हिस्से से नहीं। इसके पीछे के लेखे या वित्तीय अवधि का उल्लेख नहीं है, इसलिए इससे सरकारी लागतों की सत्यापित तुलना नहीं की जा सकती।
शाही ने तर्क दिया कि संघवाद के तहत विकास और सेवा वितरण में सुधार हुआ है, जबकि जनता की अधूरी अपेक्षाओं ने व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा किया है। जवाब में उन्होंने परिणाम दिखाने वाला काम और तथ्य पेश करने की मांग की। सम्मेलन के विवरण में इस दावे को मापने के लिए परियोजनाओं की संख्या या सेवा संबंधी संकेतक नहीं दिए गए हैं।
पांडे ने राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय नेता अब भी प्रांतीय गठबंधन तय करते हैं, जिससे अस्थिरता बढ़ती है और पार्टी संरचनाओं के भीतर प्रांतीय स्वतंत्रता सीमित होती है। उनकी आलोचना सभी दलों तक फैली थी, केवल मौजूदा संघीय प्रशासन तक नहीं।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्रियों ने पांच से छह महीने पहले प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह को लिखित मांगें सौंपी थीं, लेकिन कर्मचारियों के समन्वय या अधिकारों के हस्तांतरण में कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई। सम्मेलन के बाद वे एक और संयुक्त बैठक की मांग करेंगे। तत्काल घोषित कदम बुधवार को घोषणा-पत्र जारी करना है; संघीय जवाब की तारीख या कानून बनाने की समय-सीमा नहीं दी गई है। कसौटी यह होगी कि क्या घोषणा-पत्र ठोस काम सौंपता है और कार्रवाई की ओर ले जाता है, साथ ही प्रांत अपने पास पहले से मौजूद अधिकारों और धन का हिसाब देते हैं।
मुख्य बिंदु
- बिराटनगर सम्मेलन में छह मुख्यमंत्री शामिल हो रहे हैं; सुदूरपश्चिम का प्रतिनिधित्व उसके मुख्य सचिव कर रहे हैं।
- पुलिस समायोजन, सिविल सेवा कानून, भूमि पर नियंत्रण और वित्तीय हस्तांतरण प्रमुख मांगें हैं।
- पांडे का कहना है कि पहले की 17 साझा मांगों में से 16 अब भी अनसुलझी हैं।
- मधेश आबादी और सेवाओं के आधार पर वित्तपोषण चाहता है; कर्णाली और सुदूरपश्चिम भूभाग, गरीबी और विकास संबंधी जरूरतों को अधिक महत्व देने की मांग करते हैं।
- मुख्यमंत्रियों का साझेदारी मंच, संयुक्त आपदा राहत कोष और पर्यटन सर्किट प्रस्तावित हैं।
- बिराटनगर घोषणा-पत्र बुधवार को जारी होने की उम्मीद है, लेकिन संघीय क्रियान्वयन की कोई बाध्यकारी समय-सीमा घोषित नहीं की गई है।
- प्रांतीय नेता बजट, परियोजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक प्रदर्शन में सुधार की जरूरत भी स्वीकार करते हैं।






