परिवारों को ऐसी दवाओं का सामना, जो मिल नहीं रहीं या खरीद पाना मुश्किल
अफगानिस्तान के गज़नी प्रांत की निवासी ज़रमीना कहती हैं कि उनके बेटे की एक दवा, जिसकी कीमत पहले 20 अफगानी थी, अब 180 अफगानी की हो गई है; यानी कीमत नौ गुना बढ़ गई है। दिल और मधुमेह की दवाओं का खर्च उठाना मुश्किल होने पर उन्होंने पहले बेटे की खुराक घटाई और फिर उसका इलाज पूरी तरह बंद कर दिया।
विषय-सूची
- परिवारों को ऐसी दवाओं का सामना, जो मिल नहीं रहीं या खरीद पाना मुश्किल
- सीमा तनाव कैसे दवाओं के संकट में बदला
- कीमतों में बढ़ोतरी का परिवारों पर असर
- पुरानी बीमारियों के मरीजों का इलाज लगातार जारी रखना मुश्किल
- इंसुलिन से लेकर बच्चों की दवाओं तक की कमी
- कारोबारियों के मुताबिक विकल्प की आपूर्ति महंगी क्यों है
- तस्करी से कीमतों और गुणवत्ता को लेकर अनिश्चितता बढ़ी
- भारत और अन्य आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका बढ़ी
- गुणवत्ता की जांच दवा दुकानों तक पहुंचनी चाहिए
- मुख्य बिंदु
उनका अनुभव गज़नी, काबुल, कंधार, लगमान और हेरात में मरीजों, फार्मासिस्टों और डॉक्टरों की शिकायतों को दर्शाता है। सीमा बंद होने और तालिबान के पाकिस्तान से दवा आयात रोकने के फैसले के बाद ये शिकायतें सामने आईं। 29 मई 2026 तक कंधार के फार्मासिस्ट बता रहे थे कि जिन दवाओं की कीमत पहले 100 से 150 अफगानी थी, वे अब 300 से 400 अफगानी में बिक रही हैं। साथ ही इंसुलिन, एंटीबायोटिक और हृदय रोग की दवाओं की कमी भी है।
इस व्यवधान से पहले ही अफगानिस्तान के पास इन आपूर्तियों की जल्दी भरपाई करने की सीमित क्षमता थी। तालिबान के प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नूरुल्लाह नूरी ने कहा कि देश में इस्तेमाल होने वाली 70 प्रतिशत से अधिक दवाएं पाकिस्तान से आती थीं। तालिबान अधिकारियों का यह भी कहना है कि लगभग 95 प्रतिशत दवाएं आयात की जाती हैं, इसलिए घरेलू कारखाने मांग का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा करते हैं।
मरीजों को अब एक साथ कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है: जानी-पहचानी दवाएं मिलनी बंद हो रही हैं, उनके विकल्प महंगे हो सकते हैं और अनौपचारिक रास्तों से आने वाली दवाओं के भंडारण और गुणवत्ता को लेकर चिंता है। पहले से घटती आमदनी से जूझ रहे परिवारों को तय करना पड़ रहा है कि वे कौन-से नुस्खे की दवाएं खरीद सकते हैं।
सीमा तनाव कैसे दवाओं के संकट में बदला
आर्थिक मामलों के जिम्मेदार तालिबान के उपनेता अब्दुल गनी बरादर ने पाकिस्तान से दवाओं के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की और अफगान आयातकों को पाकिस्तानी कंपनियों का बकाया चुकाने तथा वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता खोजने के लिए तीन महीने का समय दिया। उन्होंने पाकिस्तानी दवाओं की गुणवत्ता को "खराब" बताया।
यह घोषणा पाकिस्तान के साथ व्यापक टकराव के बीच हुई। 6 दिसंबर 2025 तक, बढ़ते तनाव और बार-बार हुई झड़पों के बाद दोनों देशों की 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा लगभग दो महीने से बंद थी। तुर्की और कतर की मध्यस्थता में हुई शांति वार्ता विवाद सुलझाने में नाकाम रही थी।
पाकिस्तान ने तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान समेत उग्रवादी समूहों को पनाह देने का आरोप लगाया। काबुल ने इस आरोप को खारिज किया। अफगान दवा दुकानों और उनके ग्राहकों के लिए इस घटनाक्रम से देश की दवा आपूर्ति करने वाला एक प्रमुख मार्ग बाधित हुआ।
- सौर हिजरी वर्ष 1404, जो 2025–2026 के अनुरूप है, के दौरान तालिबान अधिकारियों ने पाकिस्तान से दवाओं का आयात पूरी तरह रोकने की घोषणा की।
- 6 दिसंबर 2025 तक हेरात में दवाओं की कमी की खबरें थीं, जबकि अफगान कारोबारी दूसरे देशों से आपूर्ति के विकल्प तलाश रहे थे।
- 29 मई 2026 तक कंधार में मरीजों और फार्मासिस्टों ने लगातार कमी, कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी और तस्करी के रास्तों पर निर्भरता की जानकारी दी।
दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध किस तारीख से लागू हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। सीमा बंदी, आयात प्रतिबंध और उसके बाद की जब्ती की कार्रवाइयों ने मिलकर कई महीनों तक बाजार को बाधित किया है।
कीमतों में बढ़ोतरी का परिवारों पर असर
काबुल निवासी हसन कहते हैं कि रक्तचाप की जिस दवा को वे पहले 150 अफगानी में खरीदते थे, उसकी कीमत अब 300 अफगानी है। उनकी मधुमेह की दवा 150 से बढ़कर 400 अफगानी की हो गई, जबकि एक दूसरी दवा 180 से बढ़कर 280 अफगानी की हो गई।
हसन द्वारा बताई गई कीमतों के अनुसार, इन तीनों दवाओं में से एक-एक खरीदने पर अब 980 अफगानी खर्च होंगे, जबकि पहले कुल 480 अफगानी लगते थे। यानी परामर्श शुल्क, आने-जाने के खर्च या किसी अन्य दवा को शामिल किए बिना ही कुल रकम पहले से दोगुने से कुछ अधिक हो गई है।
काबुल की एक अन्य निवासी सकीना कहती हैं कि पाकिस्तानी दवाएं, जो पहले आसानी से मिल जाती थीं, अब केवल कुछ जगहों पर उपलब्ध हैं। कंधार में बनी कुछ विकल्प दवाएं भी महंगी हो गई हैं: उनके मुताबिक, जिन उत्पादों की कीमत पहले 30 से 50 अफगानी थी, वे अब लगभग 180 से 190 अफगानी में बिक रहे हैं।
दवा आयातक अब्दुल रहमान अचकज़ई ने एक और उदाहरण दिया: 100 मिलीग्राम की क्वेटियापीन की एक पैकिंग, जो कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के इलाज में इस्तेमाल होती है, की कीमत पहले 80–100 अफगानी थी, जो अब बढ़कर 200 से अधिक हो गई है। उन्होंने कहा कि इसका ईरानी विकल्प 10 अफगानी प्रति पैक मिलता था।
परिवारों और कारोबारियों के ये बयान दिखाते हैं कि कुछ खास उत्पादों की कीमतें कितनी तेजी से बदल सकती हैं। अलग-अलग दवा दुकानों में भी कीमतें भिन्न हैं, जिससे किफायती दवा खोजने की कोशिश मरीजों और उनके परिजनों के लिए एक और बोझ बन जाती है।
पुरानी बीमारियों के मरीजों का इलाज लगातार जारी रखना मुश्किल
मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और अस्थमा में अक्सर लंबे समय तक नियमित इलाज की जरूरत होती है। परिवार किसी एक महंगी खरीद का खर्च उठा सकता है, लेकिन हर महीने उसे दोहराना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब परिवार के कई सदस्यों को दवाओं की जरूरत हो।
कंधार के मधुमेह मरीज रहमतुल्लाह ने बताया कि इंसुलिन और दूसरी दवाएं मिलना कठिन होने पर उन्हें अपने लिए लिखी गई दवाओं में से चुनना पड़ा।
मैं पहले सस्ती इंसुलिन खरीदता था, लेकिन अब इसे ढूंढ़ना मुश्किल और बहुत महंगा है। आर्थिक समस्याओं, बढ़ती कीमतों और कमी के कारण कभी-कभी डॉक्टर की लिखी सारी दवाएं मुझे नहीं मिल पातीं। आमतौर पर मैं केवल सबसे जरूरी दवाएं ही खरीदता हूं।
कंधार के डॉक्टर मुनीर अहमद ने कहा कि पुरानी बीमारियों के मरीज सबसे अधिक प्रभावित लोगों में हैं। उनके मुताबिक, इलाज पूरा करने में दवाओं की कीमत और उपलब्धता, दोनों बाधाएं हैं।
जब मरीजों को दवाएं लिखी जाती हैं, तो ऊंची कीमतों और कमी के कारण कई लोग जरूरत की दवाएं नहीं ले पाते।
ज़रमीना कहती हैं कि डॉक्टर उनके बेटे के लिए एक खास पाकिस्तानी ब्रांड लेने की सलाह देते हैं, जिसका विकल्प वह नहीं ढूंढ़ पाई हैं। गज़नी के एक अन्य निवासी समीर कहते हैं कि अब उपलब्ध कुछ दवाओं का असर बहुत कम लगता है, भले ही डॉक्टर उनकी खुराक बढ़ा दें। उनके बयान उस अनिश्चितता को दिखाते हैं जिसका सामना परिवारों को तब करना पड़ता है, जब जानी-पहचानी दवा मिलनी बंद हो जाए और उसका विकल्प भरोसेमंद न लगे।
इंसुलिन से लेकर बच्चों की दवाओं तक की कमी
मरीज और फार्मासिस्ट पैनाडोल, ब्रूफेन, ऑगमेंटिन, एमॉक्सिसिलिन, इंसुलिन, रक्तचाप की दवाएं, नसों में दी जाने वाली तरल दवाएं, बच्चों के लिए एंटीबायोटिक सिरप, अस्थमा के इनहेलर और हृदय रोग की दवाएं मिलने में कठिनाई की बात कह रहे हैं। इस सूची में आम लक्षणों, संक्रमणों और लगातार इलाज की जरूरत वाली स्थितियों की दवाएं शामिल हैं।
सीमित नकदी वाले परिवारों के लिए बच्चों की दवाएं खास तौर पर मुश्किल से मिल रही हैं। कंधार के निवासियों का कहना है कि संपन्न परिवार अब भी इलाज का खर्च उठा सकते हैं, जबकि दूसरे परिवार अपने बच्चों के लिए लिखी दवाएं खरीदने में असमर्थ हैं।
हसन कहते हैं कि मां की दवा ढूंढ़ने के लिए उन्होंने काबुल के कई इलाकों की तलाश की और आखिरकार बाग-ए-बाला में मिली। इस तरह कमी से दवा के खर्च के अलावा आने-जाने और अलग-अलग दुकानों पर पूछताछ में लगने वाले समय का बोझ भी बढ़ता है।
हेरात की कार्यकर्ता लीना हैदरी ने दिसंबर 2025 में ऐसी ही तलाश का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि उन्हें करीब एक महीने से त्वचा रोग की मरहम नहीं मिल रही थी और एंटीबायोटिक, इंसुलिन तथा हृदय रोग की दवाओं की कमी भी थी।
उस समय तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री जलाल जलाली ने कहा था कि अफगानिस्तान में "दवाओं की कोई कमी नहीं है"। मरीज और कारोबारी खास उत्पादों को पाने में कठिनाई बता रहे थे; बाद में कंधार से आई खबरों में भी यह समस्या जारी रही।
कारोबारियों के मुताबिक विकल्प की आपूर्ति महंगी क्यों है
दवा आयातक अहमद शाह मोज़मिल कीमतों में बढ़ोतरी के लिए मुख्य रूप से तालिबान की नीतियों, अधिक करों, भारी सीमा शुल्क जमा और पाकिस्तान के साथ संघर्ष को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो से तीन वर्षों में डॉलर की विनिमय दर अपेक्षाकृत स्थिर रही है और बढ़ोतरी का मुख्य कारण यह नहीं है।
अचकज़ई कहते हैं कि आयातकों को खुद दवाओं के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है और वे यह खर्च ग्राहकों पर डाल रहे हैं। उनके आकलन में पाकिस्तानी दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत और भरोसेमंद गुणवत्ता का मेल थीं, जबकि तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के विकल्प महंगे हैं। उन्होंने ईरानी विकल्पों को सस्ता, लेकिन कम गुणवत्ता वाला बताया।
ये आकलन उन दवाओं को लेकर मतभेद भी उजागर करते हैं जिनकी जगह नए विकल्प लाए जा रहे हैं। प्रतिबंध की घोषणा करते समय बरादर ने खराब गुणवत्ता का हवाला दिया था, जबकि आयातकों ने पाकिस्तानी दवाओं को किफायती और उपयोगी बताया। मरीजों को बदलती कीमतों के साथ-साथ इन परस्पर विरोधी दावों के बीच रास्ता ढूंढ़ना पड़ रहा है।
लगमान निवासी इस्मत कहते हैं कि चाबहार मार्ग से भारतीय दवाएं मंगाने का खर्च आयात को सीमित करता है। उनका यह भी कहना है कि दूसरे देशों और अफगान निर्माताओं से आने वाली आपूर्ति ने पाकिस्तानी दवाओं की पूरी भरपाई नहीं की है और न ही बाजार की मांग पूरी की है।
नया आपूर्तिकर्ता ढूंढ़ना केवल किसी दूसरे देश को चुनने भर की बात नहीं है। आयातकों को जरूरी उत्पाद और उनकी पर्याप्त मात्रा हासिल करनी होती है, परिवहन की व्यवस्था करनी होती है और ऐसा भंडार बनाए रखना होता है जिसकी दवा दुकानें फिर से पूर्ति कर सकें। आयात पर अफगानिस्तान की भारी निर्भरता के कारण इन व्यवस्थाओं में बदलाव के दौरान आपूर्ति में रुकावट झेलना कठिन है।
तस्करी से कीमतों और गुणवत्ता को लेकर अनिश्चितता बढ़ी
दवा कारोबारियों का कहना है कि अफगानिस्तान में अब भी उपलब्ध पाकिस्तानी दवाओं में पुराना भंडार और तस्करी के रास्तों से लाई गई दवाएं शामिल हैं। दवा विक्रेता राशिद अहमदी कहते हैं कि जन स्वास्थ्य निरीक्षक दुकानों में मिली पाकिस्तानी दवाएं जब्त कर लेते हैं। तालिबान अधिकारियों ने यह चेतावनी भी दी है कि पकड़ी गई तस्करी की खेपें जला दी जाएंगी।
कारोबारी और स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि कुछ खेपें बाजार तक पहुंचती हैं, जबकि कुछ जब्त कर नष्ट कर दी जाती हैं। खेप खोने का जोखिम पहले से अस्थिर आपूर्ति व्यवस्था की लागत को और बढ़ा देता है।
इस्मत कहते हैं कि पीलिया की एक दवा, जिसकी कीमत पहले 650 अफगानी थी, अब कहीं 900 से 1,000 और कहीं 600 से 700 अफगानी में बिक रही है। वह कीमतों में उतार-चढ़ाव के लिए अवैध आयात को जिम्मेदार मानते हैं और कहते हैं कि अलग-अलग दवा दुकानों में भाव अलग हैं।
स्वास्थ्य अधिकारी चेतावनी देते हैं कि तस्करी के जरिए आई दवाएं घटिया हो सकती हैं, उनका भंडारण ठीक से नहीं हुआ हो सकता या उनकी उपयोग-अवधि खत्म होने वाली हो सकती है। भंडारण मायने रखता है, क्योंकि कुछ दवाएं अनुपयुक्त तापमान के संपर्क में आने पर असर खो सकती हैं। उदाहरण के लिए, इंसुलिन के परिवहन और भंडारण के दौरान तापमान का सावधानी से प्रबंधन जरूरी है।
हैदरी ने स्थानीय बाजारों में नकली और अवधि समाप्त दवाएं मिलने की चेतावनी भी दी। किसी मरीज के लिए कीमत जांचना आसान है, लेकिन यह पता लगाना कहीं कठिन है कि दवा में सही तत्व हैं या उसे उपयुक्त परिस्थितियों में रखा गया है।
भारत और अन्य आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका बढ़ी
अफगान और भारतीय कंपनियों ने दिसंबर 2025 की शुरुआत में 100 मिलियन डॉलर मूल्य की दवा आपूर्ति का अनुबंध किया। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी तत्काल स्वास्थ्य जरूरतों के लिए काबुल भेजी गई 73 टन दवाओं, टीकों और चिकित्सा आपूर्तियों की खेप की पुष्टि की।
व्यावसायिक समझौते और सहायता के तौर पर भेजी गई खेप के उद्देश्य अलग हैं। आपूर्ति अनुबंध लगातार खरीद में मदद कर सकता है, जबकि दान में मिली चिकित्सा सामग्री तत्काल जरूरतें पूरी करती है। दवा दुकानों में दवाओं की निरंतर उपलब्धता इस बात पर निर्भर करती है कि मरीजों को जिन खास उत्पादों की जरूरत है, उनकी बार-बार आपूर्ति हो।
तालिबान अधिकारियों ने दवा आपूर्ति पर भारत, ईरान और उज्बेकिस्तान के साथ बातचीत की है। स्वास्थ्य और व्यापार मंत्री भी आयात पर चर्चा के लिए भारत और ईरान गए।
एक अफगान दवा उद्यमी ने कहा कि कारोबार भारत, तुर्की और ईरान से दवाएं मंगाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन केंद्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने माना कि उत्पादन बढ़ाने में समय लगेगा। घरेलू निर्माता मांग का केवल छोटा हिस्सा पूरा करते हैं, इसलिए अफगानिस्तान की निर्भरता अब भी काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति मार्गों पर है।
गुणवत्ता की जांच दवा दुकानों तक पहुंचनी चाहिए
तालिबान के राष्ट्रीय दवा एवं खाद्य प्राधिकरण के कार्यवाहक प्रमुख अब्दुल बारी उमर ने कहा है कि प्राधिकरण घटिया दवाओं की बिक्री नियंत्रित करने के लिए डिजिटल प्रणाली स्थापित करने और नई प्रक्रिया तैयार करने की योजना बना रहा है। इसे लागू करने की कोई तारीख नहीं दी गई।
मरीजों को भरोसेमंद आपूर्ति के साथ-साथ खरीदी जा रही दवाओं पर भरोसा भी चाहिए। कंधार के निवासियों और फार्मासिस्टों का कहना है कि कीमतें नियंत्रित करने और कमी दूर करने के व्यावहारिक कदम पर्याप्त नहीं रहे हैं। वहीं, कारोबारियों का कहना है कि निरीक्षण और जब्ती से पाकिस्तानी उत्पादों की उपलब्धता पर और असर पड़ रहा है।
अफगानिस्तान का व्यापक मानवीय संकट परिवारों के पास बढ़ते चिकित्सा खर्च का बोझ सहने की बहुत कम गुंजाइश छोड़ता है। दिसंबर 2025 में उद्धृत संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े के अनुसार, लगभग 23 मिलियन लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है। बेरोजगारी और घटती आमदनी इस दबाव को और बढ़ाते हैं।
ज़रमीना और इलाज पहले ही घटा रहे दूसरे परिवारों के लिए तत्काल सवाल सीधा है: क्या अगली दवा मिल पाएगी, उस पर भरोसा किया जा सकेगा और उसे खरीदना संभव होगा? विकल्प के तौर पर आयात, घरेलू उत्पादन और गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण तभी सबसे ज्यादा मायने रखते हैं, जब मरीजों को जरूरी दवाएं लगातार ऐसी कीमत पर मिलें जिसे वे चुका सकें।
मुख्य बिंदु
- सीमा बंद होने और पाकिस्तानी दवाओं के आयात पर प्रतिबंध के बाद अफगानिस्तान के कई प्रांतों में मरीज दवाओं की कमी और कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी की बात कह रहे हैं।
- तालिबान अधिकारियों का कहना है कि अफगानिस्तान अपनी लगभग 95 प्रतिशत दवाएं आयात करता है; पहले 70 प्रतिशत से अधिक दवाएं पाकिस्तान से आती थीं।
- कुछ मरीज कीमत के कारण खुराक घटा रहे हैं, नुस्खे की केवल कुछ दवाएं खरीद रहे हैं या इलाज बंद कर रहे हैं।
- तस्करी, जब्ती और भंडारण, उपयोग-अवधि तथा नकली उत्पादों को लेकर चिंताएं बाजार में अनिश्चितता बढ़ा रही हैं।
- अफगान कारोबारियों ने वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश की है, जिसमें भारतीय कंपनियों के साथ 100 मिलियन डॉलर का समझौता भी शामिल है।
- अधिकारियों ने दवाओं की गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण की योजनाओं की घोषणा की है, लेकिन उन्हें लागू करने की तारीख नहीं बताई।






