छापे के बाद जांच होनी चाहिए, हिरासत अपने आप नहीं
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को ऐसे दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है, जिनसे मजिस्ट्रेट उन वयस्कों की पहचान कर सकें जिन्हें यौन शोषण के लिए मजबूर किया गया है और उन महिलाओं से अलग कर सकें जो स्वेच्छा से यौन कार्य में लगी हैं। 29 मई, 2026 के फैसले की बाद में हुई समीक्षा में पाया गया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने देशव्यापी पीड़ित संरक्षण योजना को समर्थन देने वाले चार अतिरिक्त निर्देशों पर अब तक अमल नहीं किया है।
विषय-सूची
- छापे के बाद जांच होनी चाहिए, हिरासत अपने आप नहीं
- मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव क्यों जरूरी था
- मजिस्ट्रेट को किन बातों की जांच करनी होगी
- हिरासत और परिवार के पास वापसी में भी सहमति अहम
- पुनर्वास अब संवैधानिक दायित्व
- विशेष पुलिस इकाइयों को औपचारिक अधिकार जरूरी
- अदालत अब जांच रही है कि उसके आदेश असरदार हैं या नहीं
- बचाव की गिनती सिर्फ शुरुआत है
- नए ढांचे में किसकी पसंद मायने रखती है?
- संसद और राज्यों की अलग-अलग जिम्मेदारियां
- मुख्य बिंदु
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मानव तस्करी-रोधी इकाइयों को औपचारिक रूप से पुलिस थाने अधिसूचित करने का भी निर्देश दिया है। केंद्र सरकार को अनुपालन की विस्तृत जानकारी जुटाकर 14 दिसंबर की सुनवाई से पहले नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
संरक्षण का सबसे अहम सवाल यह है कि छापे के बाद क्या होता है। किसी वयस्क महिला को तस्करी की पीड़िताओं के लिए बनाई गई विस्तृत हिरासत और पुनर्वास प्रक्रिया से गुजारने से पहले मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक आकलन करना होगा, जिसे प्रारंभिक जांच कहा गया है। इसमें उसकी इच्छा, जबरदस्ती की आशंका और तत्काल सुरक्षा जोखिमों की जांच जरूरी है।
जो वयस्क कहती है कि उसने यौन कार्य का चुनाव किया है, उसके लिए यह आकलन तय कर सकता है कि वह अपने जीवन में लौटेगी या संरक्षण गृह जाएगी। किसी तस्कर की धमकियों का सामना कर रही महिला के मामले में यह उस दबाव की पहचान करने में मदद कर सकता है जो सहमति के कथित बयान के पीछे छिपा हो।
ये निर्देश 2004 में दायर याचिका, प्रज्वला बनाम भारत संघ, पर आधारित हैं। दो दशक से अधिक समय बाद इस मामले ने तस्करी से बची महिलाओं के संरक्षण का ढांचा तैयार किया है और अधिकारियों से यह मांग भी की है कि वेश्यालय पर छापे के दौरान मिली हर वयस्क महिला को हिरासत या पुनर्वास के लिए भेजे जाने योग्य व्यक्ति न माना जाए।
मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव क्यों जरूरी था
अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956, जिसे आईटीपीए कहा जाता है, तलाशी, बचाव, हिरासत और पुनर्वास की प्रक्रियाएं तय करता है। इसकी धाराएं 15, 16 और 17 अलग-अलग अनुभवों वाली महिलाओं को एक ही मजिस्ट्रेट के सामने ला सकती हैं: कोई जिसे बल या धोखे से तस्करी में धकेला गया हो, कोई जिसकी तस्करी वर्षों पहले हुई हो और जो अब भी यौन कार्य में हो, और कोई जिसने स्वेच्छा से यह काम चुना हो।
अदालत को चिंता है कि एक ही प्रक्रिया इन अंतरों को धुंधला कर सकती है। महिला की उम्र, पृष्ठभूमि, पारिवारिक परिस्थितियों और निजी इतिहास की विस्तृत जांच उसे घर और आजीविका से दूर रख सकती है, भले ही वह कहे कि वह किसी संस्थागत हस्तक्षेप की इच्छुक नहीं है।
मई के फैसले में विधि आयोग की 64वीं रिपोर्ट और बुद्धदेव कर्मकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले का आधार लिया गया, जिसमें यौनकर्मियों की गरिमा की रक्षा की गई थी। विधि आयोग ने कहा था कि जब कोई महिला स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करती है, तो उसका बचाव करने का सवाल उसी तरह नहीं उठता।
अदालत ने दोहराया कि यौन कार्य अपने आप में अपराध नहीं है। स्वेच्छा से इसमें लगी किसी वयस्क को छापे के दौरान केवल वेश्यालय में पाए जाने के कारण गिरफ्तार, दंडित, परेशान या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। मौजूदा निर्देशों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस और मजिस्ट्रेट की वास्तविक कार्रवाई में इस संरक्षण का पालन हो।
मजिस्ट्रेट को किन बातों की जांच करनी होगी
प्रारंभिक जांच करने वाले मजिस्ट्रेट को वयस्क महिला के इस बयान पर विचार करना होगा कि उसका काम स्वैच्छिक था या नहीं, उसकी व्यक्त इच्छा, सामाजिक कार्यकर्ता का आकलन और धमकी, बल, दबाव या अनुचित प्रभाव के सबूत। आकलन में तत्काल खतरे और रिहाई के बाद दोबारा तस्करी का जोखिम भी शामिल होना चाहिए।
महिला के स्वेच्छा से काम करने की बात कहने पर भी जांच अनिवार्य रहेगी। अदालत ने माना कि तस्कर पीड़िताओं को ऐसा बयान देने या पुनर्वास से इनकार करने के लिए धमका या सिखा सकते हैं, ताकि वे उन पर फिर से नियंत्रण पा सकें।
इसलिए सहमति का आकलन उन परिस्थितियों के साथ करना होगा जिनमें वह जताई गई है। मजिस्ट्रेट को महिला की बात गंभीरता से सुननी होगी और यह भी जांचना होगा कि क्या कोई दूसरा व्यक्ति तय कर रहा है कि वह सुरक्षित रूप से क्या कह सकती है।
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से इस काम के लिए एक समान प्रोटोकॉल बनाने को कहा गया है, जिसमें प्रज्वला सहायता कर सकती है। एकरूप मार्गदर्शन जरूरी है, ताकि एक ही बयान या सुरक्षा संबंधी चिंता का आकलन किसी भी जिले में तुलनीय तरीके से हो।
हिरासत और परिवार के पास वापसी में भी सहमति अहम
मई के फैसले में संरक्षण गृह में लंबी हिरासत या परिवार को सौंपने का निर्णय लेते समय पीड़िता की सहमति को प्राथमिक आधार बनाया गया। उसकी इच्छा के विरुद्ध नियमित रूप से पुनर्वास थोपना उचित नहीं है।
मजिस्ट्रेट उसकी इच्छा से केवल असाधारण परिस्थितियों में अलग हो सकता है, जैसे उसकी सुरक्षा को खतरा हो या यह निष्कर्ष निकले कि दबाव, सिखाने या अनुचित प्रभाव ने उसके फैसले को प्रभावित किया है। मजिस्ट्रेट को इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।
लिखित कारण निर्णय को अधिक जवाबदेह बनाते हैं। इससे अधिकारी को यह स्पष्ट करना पड़ता है कि किसी वयस्क की बताई इच्छा को क्यों दरकिनार किया जा रहा है, बजाय इसके कि उसे बंद रखना या रिश्तेदारों के पास भेजना बचाव अभियान का स्वतः परिणाम मान लिया जाए।
वयस्कों की यह प्रक्रिया व्यावसायिक यौन शोषण के लिए की गई तस्करी पर लागू होती है। बच्चों के मामले में बाल कल्याण समितियों के जरिए किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की अलग प्रक्रिया लागू होती है। उनका संरक्षण इसलिए बच्चों के लिए बनाई गई कानूनी व्यवस्था के तहत ही रहेगा।
पुनर्वास अब संवैधानिक दायित्व
पीड़ित संरक्षण योजना में बचाव से लेकर अभियोजन और सामुदायिक जीवन में फिर से शामिल होने तक के हस्तक्षेप शामिल हैं। इसके सिद्धांतों में निजता, सूचित सहमति, व्यक्ति की जरूरत के अनुरूप देखभाल और पीड़ितों को अपराधी जैसा व्यवहार दिए जाने से संरक्षण शामिल हैं। यह संरक्षण गृहों के भीतर दंडात्मक तरीकों पर भी रोक लगाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास को संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 के तहत रखा है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है; अनुच्छेद 23 तस्करी और जबरन मजदूरी पर रोक लगाता है। दोनों मिलकर तस्करी के बाद मिलने वाले सहयोग को लागू कराए जा सकने वाले अधिकार के रूप में मानने का संवैधानिक आधार देते हैं।
आश्रय, परामर्श, कौशल प्रशिक्षण या पुनर्वास के अन्य सहयोग की मांग करने वाली पीड़िता इस अधिकार को लागू कराने के लिए अदालत जा सकती है। सरकार की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति को शोषण की स्थिति से निकालने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे उबरने और जीवन फिर से बनाने में मदद करना भी इसमें शामिल है।
न्यायमूर्ति पारदीवाला के तर्क में शोषण का संबंध उससे पहले की परिस्थितियों से जोड़ा गया, जिनमें गरीबी, बेघर होना, सीमित शिक्षा और आर्थिक असुरक्षा शामिल हैं। इन परिस्थितियों से समझ आता है कि व्यावहारिक सहयोग के बिना किया गया बचाव किसी पीड़िता को फिर से शोषण के जोखिम में छोड़ सकता है।
विशेष पुलिस इकाइयों को औपचारिक अधिकार जरूरी
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत मानव तस्करी-रोधी इकाइयों को पुलिस थाने अधिसूचित करने का निर्देश दिया गया है। केंद्र को यह मामला उनके साथ उठाकर जल्द से जल्द अधिसूचना जारी करने की मांग करनी होगी।
पुलिस थाने का औपचारिक दर्जा मिलने से विशेष तस्करी-रोधी इकाइयों के जांच कार्य को स्पष्ट कानूनी आधार मिलता है। इस निर्देश का उद्देश्य किसी इकाई को तस्करी के मामलों की जिम्मेदारी सौंपने और उस भूमिका को निभाने के लिए जरूरी मान्यता प्राप्त दर्जा देने के बीच की कमी को दूर करना है।
यह संरक्षण ढांचा जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से कानूनी सहायता तक पहुंच भी मजबूत करता है। हिरासत, पुनर्वास या परिवार के पास वापसी के फैसले का सामना कर रही महिला के लिए अपनी इच्छा बताने और उसकी स्वतंत्रता सीमित करने वाले आदेश को चुनौती देने में कानूनी मदद अहम हो सकती है।
अनुपालन की जिम्मेदारियां पुलिस से आगे तक जाती हैं। इनमें मान्यता प्राप्त कल्याण संस्थानों को अधिसूचित करना, हर राज्य में सामाजिक कार्यकर्ताओं की सूची तैयार करना और पुलिस तथा सरकार के नोडल अधिकारियों को नामित करना शामिल है। इन व्यवस्थाओं से उन संस्थानों और लोगों की पहचान होती है जो न्यायिक निर्देशों को रोजमर्रा के काम में लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं।
अदालत अब जांच रही है कि उसके आदेश असरदार हैं या नहीं
प्रज्वला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट ने अनुपालन की एक तालिका दी, जिसमें मई के फैसले के तहत अलग-अलग प्राधिकरणों को सौंपी गई जिम्मेदारियों का उल्लेख था। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने केंद्र की ओर से की गई कार्रवाई पर स्थिति नोट पेश किया।
पीठ ने अनुपालन की निगरानी के साधन के रूप में इस तालिका का स्वागत किया। समीक्षा में पाया गया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने चार अतिरिक्त निर्देशों पर अब तक अमल नहीं किया है, जिससे जारी कार्यवाही में आगे की कार्रवाई अहम हो गई है।
न्यायमूर्ति पारदीवाला और महादेवन ने विस्तृत फैसला जारी करने के बाद उसके अमल का भरोसेमंद आकलन करने का तरीका न होने की समस्या को इन शब्दों में बताया:
एक बार ये निर्देश फैसले के रूप में कागज पर दर्ज हो जाते हैं, तो मामला अचानक समाप्त हो जाता है,
अदालत ने याचिकाकर्ता और केंद्र से योजना की प्रगति और प्रभावशीलता पर नजर रखने के ठोस तरीके सुझाने को कहा। आगे दिए गए पड़ाव बताते हैं कि तस्करी से जुड़ी याचिका कैसे संरक्षण, सहमति और अमल की जारी समीक्षा में बदली:
- 2004: प्रज्वला ने जनहित याचिका दायर की, जिससे मौजूदा ढांचे की नींव पड़ी।
- 2022: बुद्धदेव कर्मकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में अनुच्छेद 21 के तहत यौनकर्मियों की गरिमा के संरक्षण को बरकरार रखा गया।
- 29 मई, 2026: न्यायमूर्ति पारदीवाला और महादेवन ने प्रज्वला फैसला और उसकी पीड़ित संरक्षण योजना सुनाई।
- बाद की अनुपालन समीक्षा: अदालत ने मजिस्ट्रेटों के लिए दिशानिर्देश और विशेष पुलिस इकाइयों तथा अन्य क्रियान्वयन जिम्मेदारियों पर आगे की कार्रवाई मांगी।
- 14 दिसंबर: अगली सुनवाई निर्धारित है; इससे पहले केंद्र को नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
बचाव की गिनती सिर्फ शुरुआत है
सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2024 में मानव तस्करी के 2,135 मामले दर्ज हुए और करीब 5,800 पीड़ितों की पहचान की गई। इसका मतलब है कि हर दर्ज मामले में औसतन लगभग 2.7 पीड़ितों की पहचान हुई, जो दिखाता है कि एक जांच में कई लोग शामिल हो सकते हैं।
ज्यादा कठिन आकलन यह है कि संरक्षण व्यवस्था में आने के बाद लोगों के साथ क्या होता है। ढांचे के व्यावहारिक नतीजे इस बात पर निर्भर करते हैं कि पीड़िताओं को स्थिर आवास, शिक्षा, रोजगार, परामर्श और दोबारा तस्करी से सुरक्षा मिलती है या नहीं।
प्रभावशीलता पर नजर रखने की व्यवस्था बनाने के अदालत के अनुरोध से ये नतीजे अनुपालन की चर्चा का हिस्सा बनते हैं। किसी संस्था को अधिसूचित करना या अधिकारी को नामित करना प्रशासनिक कदम है; पीड़िता को उचित सहयोग मिलना वह ठोस परिणाम है जिसे यह योजना हासिल करना चाहती है।
इनमें से ज्यादातर संरक्षण जिला अधिकारियों, मजिस्ट्रेटों, पुलिस और आश्रय गृहों के प्रबंधकों को देने होंगे। इसलिए प्रशिक्षण, कर्मचारी, कानूनी सहायता और उपयुक्त आवास तय करेंगे कि दबाव और चुनाव के बीच का अंतर अदालत से बाहर भी बना रहता है या नहीं।
नए ढांचे में किसकी पसंद मायने रखती है?
यौनकर्मियों के संगठनों को इस काम से जुड़े दबावों का व्यावहारिक अनुभव है। महिलाएं सड़कों, वेश्यालयों और अपने घरों से काम करती हैं, जबकि यूनियन और अन्य समूह चिकित्सा उपचार, कंडोम जैसी बचाव सामग्री और सरकारी बाल देखभाल तक पहुंच की मांग करते हैं।
छापे की प्रक्रियाएं हिरासत, चिकित्सकीय जांच और गृह राज्य वापस भेजने के जरिए इन व्यवस्थाओं को बाधित कर सकती हैं। कुछ महिलाओं की अस्थि-परीक्षण जांच होती है, जिसमें हड्डियों के विकास के आधार पर उम्र का अनुमान लगाया जाता है। ऐसे हस्तक्षेप व्यक्ति की आय, पारिवारिक संबंधों और देखभाल तक पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं।
विधि शिक्षाविदों, लॉयड लॉ कॉलेज के शशांक शेखर और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की दिव्या श्रीधर ने कहा है कि यौनकर्मियों के समूहों की खुली अदालत में सुनवाई नहीं हुई। उनकी आलोचना एक व्यावहारिक कमी की ओर इशारा करती है: जिन लोगों के चुनाव का आकलन करने के लिए यह ढांचा बनाया गया है, उनका अनुभव इसकी प्रक्रियाओं और निगरानी को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
यह फैसला गरिमा, स्वतंत्रता और मनमाने हस्तक्षेप से मुक्ति की रक्षा करता है, लेकिन सहमति से किए जाने वाले वयस्क यौन कार्य को व्यापक कानूनी मान्यता देने का सवाल अनसुलझा छोड़ता है। इसका तात्कालिक उद्देश्य सीमित और ठोस है: अधिकारियों को यह फर्क करना होगा कि कोई वयस्क अपनी इच्छा से चुनाव कर रही है या उसकी कथित इच्छा को कोई दूसरा व्यक्ति नियंत्रित कर रहा है।
संसद और राज्यों की अलग-अलग जिम्मेदारियां
कानून बनने तक देशव्यापी ढांचा स्थापित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया। यह पूर्ण न्याय देने के लिए जरूरी आदेश जारी करने की उसकी संवैधानिक शक्ति है। अदालत ने तस्करी के खिलाफ व्यापक कानून बनाने की मांग भी की।
कानूनी सुधारों से आईटीपीए, भारतीय न्याय संहिता के तस्करी संबंधी प्रावधानों और बाल संरक्षण कानूनों को अधिक सुसंगत व्यवस्था में लाया जा सकता है। ये कानून आपस में कैसे काम करेंगे, यह संसद तय कर सकती है, जबकि संरक्षण की जिम्मेदारियां निभाने के लिए जरूरी संस्थान, कर्मचारी और धन मुहैया कराना सरकारों का काम है।
तत्काल काम पहले ही सौंप दिया गया है: राज्यों को अधिसूचनाएं और अनुपालन के अन्य उपाय पूरे करने हैं, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को मजिस्ट्रेटों के लिए मार्गदर्शन तैयार करना है और केंद्र को प्रगति की रिपोर्ट देनी है। छापों के दौरान मिली वयस्क महिलाओं के लिए सबसे अहम बदलाव यह है कि उनके बारे में फैसला लेने से पहले उनकी इच्छा सुनना और उसका आकलन करना अनिवार्य होगा।
मुख्य बिंदु
- तस्करी और वयस्कों के स्वैच्छिक यौन कार्य में अंतर करने के लिए मजिस्ट्रेटों को प्रारंभिक जांच करनी होगी।
- संरक्षण गृह में लंबी हिरासत या परिवार के पास वापसी के फैसले में वयस्क की सहमति प्राथमिक आधार होगी।
- बताई गई इच्छा से अलग फैसला केवल असाधारण परिस्थितियों में और लिखित कारणों के साथ लिया जा सकता है।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मानव तस्करी-रोधी इकाइयों को औपचारिक रूप से पुलिस थाने अधिसूचित करना होगा।
- पीड़ित संरक्षण योजना पुनर्वास को संवैधानिक अधिकार मानती है और संरक्षण गृहों में दंडात्मक तरीकों पर रोक लगाती है।
- बच्चों के मामले में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत अलग प्रक्रिया लागू होती है।
- 14 दिसंबर की सुनवाई से पहले केंद्र को नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।






