विनिर्माण में अंतर से भारत की सौर योजनाओं पर दबाव
भारत का सौर उद्योग प्रौद्योगिकी संबंधी अड़चन का सामना कर रहा है, जबकि वह अपनी आपूर्ति शृंखला का अधिक हिस्सा देश में विकसित करने की कोशिश कर रहा है। चीन ने 16 अक्टूबर 2026 को सौर विनिर्माण की 12 प्रौद्योगिकियों पर निर्यात नियंत्रण का प्रस्ताव दिया। इससे सेल, सिलिकॉन वेफर और इनके उत्पादन के लिए जरूरी कारखानों में भारतीय निवेश जटिल हो सकता है।
विषय-सूची
- विनिर्माण में अंतर से भारत की सौर योजनाओं पर दबाव
- चीन किन चीजों पर नियंत्रण का प्रस्ताव दे रहा है
- पैनल बनाना काम का सिर्फ एक हिस्सा क्यों है
- उत्पादन के शुरुआती चरणों में चीन की स्थिति सबसे मजबूत
- भारत के स्रोत-नियमों की समय-सीमा की परीक्षा
- नई फैक्ट्रियों को वित्तीय जोखिम अधिक क्यों है
- चालू कारखानों पर तुरंत दबाव कम पड़ सकता है
- उद्योग को अधिक समय और वैकल्पिक प्रौद्योगिकी साझेदार चाहिए
- आपूर्ति की अधिक सुरक्षा की कीमत चुकानी पड़ सकती है
- मुख्य बिंदु
भारत के विनिर्माण के अलग-अलग चरणों के बीच बड़ा अंतर है। सोलेक्स एनर्जी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक चेतन शाह के मुताबिक, जून 2026 तक भारत की मॉड्यूल क्षमता करीब 262 गीगावाट थी, जबकि सेल क्षमता 37 गीगावाट और इंगट व वेफर क्षमता महज 2 गीगावाट थी। अधिकांश सौर सेल के शुरुआती कच्चे माल, पॉलीसिलिकॉन का व्यावसायिक उत्पादन देश में नहीं है।
इन आंकड़ों का मतलब है कि मॉड्यूल क्षमता, सेल क्षमता से करीब सात गुना है। भारत अपने घरेलू सेल कारखानों की आपूर्ति से कहीं अधिक पैनल असेंबल कर सकता है। तैयार पैनलों का उत्पादन बढ़ने के बावजूद इससे निर्माता आयातित कच्चे माल पर निर्भर रहते हैं।
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने चेतावनी दी है कि प्रस्तावित नियंत्रणों से नए कारखानों में देरी हो सकती है और मॉडल एवं निर्माता की स्वीकृत सूची II, जिसे आम तौर पर ALMM-II कहा जाता है, के क्रियान्वयन में जटिलता आ सकती है। इस व्यवस्था के तहत इसके दायरे में आने वाली सौर परियोजनाओं को स्वीकृत निर्माताओं के भारत में बने सेल इस्तेमाल करने होते हैं।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने प्रस्ताव पर 15 नवंबर 2026 तक परामर्श मांगा है। मसौदे में उन प्रौद्योगिकियों को अलग किया गया है जिनका निर्यात प्रतिबंधित होगा और जिन्हें निर्यात करने के लिए अनुमति लेनी होगी। प्रस्ताव के तहत तैयार सौर पैनलों का व्यापार जारी रहेगा, लेकिन कुछ विनिर्माण प्रक्रियाओं और उनसे जुड़े उपकरणों तक पहुंच पर सख्त नियंत्रण होगा।
भारत के लिए तात्कालिक चिंता यह है कि क्या नई उत्पादन लाइनों को घरेलू स्रोत से खरीद की शर्तें पूरी करने के लिए समय पर मशीनरी, तकनीकी जानकारी और चालू करने संबंधी सहायता मिल पाएगी। जिन कारखानों तक उपकरण पहले ही पहुंच चुके हैं, उनकी स्थिति उन कंपनियों से अलग है जो अब भी अपना पहला ऑर्डर देने की तैयारी कर रही हैं।
चीन किन चीजों पर नियंत्रण का प्रस्ताव दे रहा है
सौर क्षेत्र की ये 12 मदें, सौर ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बायोमेडिसिन की 40 प्रौद्योगिकियों को कवर करने वाले व्यापक संशोधन का हिस्सा हैं। बीजिंग ने एयरोस्पेस और रक्षा में इनके इस्तेमाल समेत राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया है।
प्रस्तावित निर्यात प्रतिबंधों में 70 माइक्रोमीटर या उससे कम मोटाई वाले सिलिकॉन वेफर बनाने की निर्धारित प्रक्रियाएं, फ्लुइडाइज्ड-बेड से पॉलीसिलिकॉन बनाने की कुछ प्रौद्योगिकियां और चुनिंदा पेरोव्स्काइट एवं टैंडम सौर प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। एक माइक्रोमीटर, एक मिलीमीटर का एक हजारवां हिस्सा होता है; इसलिए ये वेफर सिलिकॉन की बेहद पतली परतें हैं।
पेरोव्स्काइट सेल ऐसे पदार्थ का इस्तेमाल करते हैं जो सूर्य के प्रकाश को कुशलता से सोख सकता है। टैंडम सेल में पेरोव्स्काइट और सिलिकॉन जैसी परतें जोड़ी जाती हैं, ताकि सूर्य के प्रकाश के अलग-अलग हिस्सों को ग्रहण कर उससे अधिक बिजली बनाई जा सके। फ्लुइडाइज्ड-बेड उत्पादन, शुद्ध सिलिकॉन बनाने का एक वैकल्पिक तरीका है, जिसमें पारंपरिक उत्पादन के मुकाबले कम ऊर्जा लग सकती है।
चुनिंदा TOPCon, हेटरोजंक्शन और बैक-कॉन्टैक्ट सेल प्रक्रियाओं के लिए लाइसेंस लेना होगा। इन डिजाइनों का मकसद पैनल के समान क्षेत्रफल से अधिक बिजली पैदा करना है। उन्नत क्रिस्टल खींचने, वेफर काटने और पॉलीसिलिकॉन संयंत्रों की कुछ इंजीनियरिंग पर भी प्रस्तावित नियंत्रण लागू होंगे।
व्यावहारिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी प्रक्रिया और उपकरण इस्तेमाल किए जा रहे हैं। कुछ हस्तांतरण प्रतिबंधित हो सकते हैं, जबकि अन्य अनुमति लेकर किए जा सकेंगे। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर अनुजेश द्विवेदी को उम्मीद है कि आयात के लिए लाइसेंस लेना एक विकल्प बना रहेगा, हालांकि उपकरणों की आपूर्ति में अधिक समय लग सकता है।
पैनल बनाना काम का सिर्फ एक हिस्सा क्यों है
सौर विनिर्माण की शुरुआत अत्यधिक शुद्ध सिलिकॉन यानी पॉलीसिलिकॉन से होती है। निर्माता इसे इंगट नाम के ठोस ब्लॉकों में बदलते हैं, फिर उन ब्लॉकों को काटकर वेफर बनाते हैं। वेफर को बिजली पैदा करने वाले सेल में बदला जाता है और फिर सेल को जोड़कर सुरक्षात्मक मॉड्यूल यानी पैनल बनाया जाता है।
पैनल असेंबली से आगे बढ़कर सेल, वेफर या पॉलीसिलिकॉन बनाने वाले भारतीय निर्माता बैकवर्ड इंटीग्रेशन यानी उत्पादन के पिछले चरणों को भी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे हैं। आसान शब्दों में, वे उन चीजों को खुद बना रहे हैं जिन्हें पहले दूसरों से खरीदते थे।
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट ने अनुमान लगाया कि 2025 में भारत की मॉड्यूल क्षमता करीब 120 गीगावाट, सेल क्षमता 30 गीगावाट और इंगट व वेफर क्षमता 2 गीगावाट थी; पॉलीसिलिकॉन का व्यावसायिक उत्पादन नहीं था। संस्थान के मुताबिक, वेफर और सेल विनिर्माण तथा मॉड्यूल असेंबली में इस्तेमाल होने वाले 70% से 100% उपकरण भारत आयात करता था।
क्षमता के आंकड़े इस बात के अनुसार अलग-अलग होते हैं कि उनकी गणना में क्या शामिल है। शाह के व्यापक अनुमान में मॉड्यूल क्षमता 262 गीगावाट और सेल क्षमता 37 गीगावाट है। इसके मुकाबले, 17 सितंबर 2026 को ALMM सूची I में मॉड्यूल क्षमता करीब 213 गीगावाट और सूची II में दर्ज सेल क्षमता लगभग 32 गीगावाट थी। स्वीकृत क्षमता और कारखानों की व्यापक क्षमता में अलग-अलग सुविधाएं शामिल होती हैं। शाह यह भी कहते हैं कि कुछ उत्पादन लाइनें बंद पड़ी हैं और स्थापित क्षमता का बड़ा हिस्सा पुरानी MONO PERC तकनीक इस्तेमाल करता है।
नीति आयोग और CRISIL इंटेलिजेंस की अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट ने अनुमान लगाया कि सौर-ग्रेड पॉलीसिलिकॉन के लिए भारत की आयात निर्भरता करीब 100%, वेफर के लिए 90% से अधिक और सेल के लिए 60% से अधिक है। अधिक पैनल असेंबली लाइनें लगाने से उत्पादन के शुरुआती चरणों में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता खत्म नहीं होती।
उत्पादन के शुरुआती चरणों में चीन की स्थिति सबसे मजबूत
सौर विनिर्माण के शुरुआती चरणों में चीन की वैश्विक हिस्सेदारी और अधिक है। नीति आयोग के अनुमान के अनुसार, 2024 में पॉलीसिलिकॉन उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 93% से 98%, वेफर क्षमता में 95%, सेल क्षमता में 91% और मॉड्यूल क्षमता में 82% थी।
2024 में भारत के सौर सेल और मॉड्यूल आयात में चीन की हिस्सेदारी भी करीब 59% थी। 2025 वित्त वर्ष में भारत के सौर फोटोवोल्टाइक आयात का 14% वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया से आया, जिससे पता चलता है कि वैकल्पिक व्यापार साझेदारों की पहले से भूमिका है।
उपकरणों और प्रक्रिया संबंधी जानकारी पर निर्भरता एक और चुनौती है। कारखाने के लिए सिर्फ मशीनरी काफी नहीं होती: इंजीनियरों को उसे स्थापित करना, उत्पादन के मानक तय करना और खराब उत्पादों का अनुपात कम रखना होता है। कारखाने की इमारत और मशीनें तैयार होने के बाद भी तकनीकी सहायता में देरी से उपयोगी उत्पादन शुरू होने में देर हो सकती है।
स्वेलेक्ट एनर्जी सिस्टम्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक अरुलकुमार शनमुगसुंदरम ने इंगट को खास चिंता का विषय बताया है, क्योंकि उत्पादन और जरूरी उपकरणों, दोनों में चीन का लगभग एकाधिकार है। उनका कहना है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय उपकरण आपूर्तिकर्ता भी चीन में उत्पादन करते हैं, इसलिए आपूर्तिकर्ता बदलने के लिए मशीनें बनाने की जगह भी बदलनी पड़ सकती है।
भारत के स्रोत-नियमों की समय-सीमा की परीक्षा
सरकार समर्थित परियोजनाओं के लिए ALMM सूची II, 1 जून 2026 से अनिवार्य हुई। इसके बाद नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने 3 अक्टूबर के फैसले के जरिए कुछ परियोजनाओं को 31 दिसंबर 2026 तक अतिरिक्त समय दिया।
घरेलू सामग्री की अनिवार्यता यानी DCR सेल, वे सेल हैं जो स्थानीय स्रोत से खरीद के नियमों के दायरे वाली परियोजनाओं के लिए भारत में बने हों। अगर नई सेल फैक्ट्रियां देर से शुरू होती हैं, जबकि परियोजना डेवलपरों को घरेलू सेल खरीदने होते हैं, तो कम आपूर्ति से कीमतों, निर्माण की समय-सारणी और निर्माताओं के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
मुख्य तारीखें दिखाती हैं कि विनिर्माण निवेश और नियमन अब कितने करीब आ गए हैं:
- 1 जून 2026: सरकार समर्थित सौर परियोजनाओं के लिए ALMM सूची II अनिवार्य हुई।
- 3 अक्टूबर 2026: MNRE ने कुछ परियोजनाओं को 31 दिसंबर 2026 तक समय दिया।
- 16 अक्टूबर 2026: चीन ने सौर प्रौद्योगिकी पर प्रस्तावित निर्यात नियंत्रण जारी किए।
- 15 नवंबर 2026: चीन में सार्वजनिक परामर्श की अवधि समाप्त होगी।
- जून 2028: MNRE सचिव संतोष कुमार सारंगी के मुताबिक, भारत का लक्ष्य सौर आपूर्ति शृंखला में आत्मनिर्भरता हासिल करना और ALMM में इंगट तथा वेफर को शामिल करना है।
सारंगी का कहना है कि भारत के पास सेल और मॉड्यूल बनाने की पर्याप्त क्षमता पहले से है। वहीं, शाह ने चेतावनी दी है कि उपयोग योग्य सेल क्षमता को उत्पादन में लाने में देरी से मॉड्यूल की कमी, परियोजनाओं में विलंब और बिजली दरों पर दबाव पड़ सकता है। परियोजना डेवलपरों के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या उनके ऑर्डर के लिए सेल उपलब्ध कराने वाले चालू कारखानों तक पहुंच है।
उत्पादन के शुरुआती चरणों से जुड़ी समय-सीमा स्पष्ट होनी बाकी है। सारंगी ने इंगट और वेफर को ALMM के दायरे में लाने के लिए जून 2028 की समय-सीमा दी है, जबकि उद्योग जगत के एक विवरण में घरेलू विनिर्माण की अनिवार्यता के लिए फरवरी 2028 का जिक्र है। चीन के अंतिम प्रतिबंध, लाइसेंस प्रक्रिया और लागू होने की तारीख भी तय नहीं हैं। परामर्श अवधि के दौरान संबंधित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए अस्थायी पंजीकरण की शर्त पहले से लागू है।
नई फैक्ट्रियों को वित्तीय जोखिम अधिक क्यों है
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के निदेशक भानु पटनी का कहना है कि जिन कंपनियों ने आपूर्ति पहले ही सुनिश्चित कर ली है, उनके मुकाबले बड़े निवेश की शुरुआत कर रहे कारोबारों पर जोखिम कम है। वे विनिर्माण के शुरुआती चरणों में विस्तार के जोखिम को इस तरह बताते हैं:
प्रस्ताव लागू होने पर, उत्पादन के शुरुआती चरणों में विस्तार धीमा पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने आपूर्ति पहले ही सुनिश्चित कर ली है, उन पर अब पूंजीगत व्यय के दौर में प्रवेश की योजना बना रही कंपनियों के मुकाबले असर पड़ने की आशंका कम है। इंगट और वेफर में बैकवर्ड इंटीग्रेशन में भी देरी और/या लागत बढ़ सकती है।
पूंजीगत व्यय, जिसे अक्सर capex कहा जाता है, इमारतों, मशीनरी और अन्य टिकाऊ संपत्तियों पर खर्च होने वाला धन है। उपकरण देर से पहुंचने या उत्पादन को लक्ष्य तक पहुंचने में अधिक समय लगने पर निर्माता का पैसा फंसा रहता है और अपेक्षित बिक्री से आमदनी नहीं होती।
पटनी का कहना है कि नीतिगत समर्थन जारी रहना जरूरी है, क्योंकि इन निवेशों में भारी खर्च लगता है और कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त मुनाफा चाहिए। इसलिए लाइसेंस मिलने में देरी निर्माण की समय-सारणी और कारखाने के कर्ज की किस्तें चुकाने के लिए उपलब्ध नकदी, दोनों को प्रभावित कर सकती है।
फुजियामा पावर सिस्टम्स इसका ठोस उदाहरण है कि पहले से पहुंच चुके उपकरण किस तरह सुरक्षा दे सकते हैं। कंपनी का कहना है कि मध्य प्रदेश के रतलाम में उसकी प्रस्तावित 1.2 गीगावाट DCR सेल इकाई की मशीनरी पहुंच चुकी है। उसे 2027-28 वित्त वर्ष की पहली तिमाही, यानी अप्रैल से जून 2027 के बीच, चालू होने की उम्मीद है।
फुजियामा को परियोजना की लागत या समय-सारणी में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है। कंपनी का कहना है कि उसका कामकाज जारी विदेशी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर निर्भर नहीं है। रतलाम में उसका 2 गीगावाट का मॉड्यूल संयंत्र मई में चालू हुआ। कंपनी ने पैनल के पुर्जे बनाने के लिए सहयोगी कंपनी जायो एनर्जी में 5.01 करोड़ रुपये का निवेश भी किया है। इनमें रिबन वायर, बसबार और सोल्डर उत्पाद शामिल हैं।
चालू कारखानों पर तुरंत दबाव कम पड़ सकता है
प्रीमियर एनर्जीज के मुख्य व्यवसाय अधिकारी विनय रुस्तगी को उम्मीद है कि मौजूदा सेल उत्पादन लाइनें आयातित वेफर से चलती रह सकती हैं, इसलिए तुरंत व्यवधान सीमित होगा। उन्हें निकट भविष्य में सेल और मॉड्यूल की कीमतों पर असर की भी आशंका नहीं है। उनके मुताबिक, बड़ा जोखिम कुछ साल बाद सामने आएगा, जब निर्माता नई प्रक्रियाएं अपनाएंगे और शुरुआती चरणों में विस्तार करेंगे।
रुस्तगी ने चालू उत्पादन के बारे में अपना आकलन इस तरह बताया:
"हमें मौजूदा कारोबार पर कोई प्रतिबंध लगने की उम्मीद नहीं है और वेफर आयात करके सेल उत्पादन लाइनें चलाई जा सकती हैं। आगे भी अगले दो से तीन साल तक इस क्षेत्र पर किसी तरह का अल्पकालिक असर नहीं होगा," उन्होंने कहा।
एक अन्य आकलन में रुस्तगी ने अधिक एकीकरण और नई प्रौद्योगिकियों के असर की अवधि तीन से पांच साल बताई। उनकी टिप्पणी का जोर मौजूदा कारखाने चालू रखने और भविष्य के निवेश के लिए विकल्प तैयार करने पर है।
इंडिया रेटिंग्स का ध्यान नई क्षमता के क्रियान्वयन से जुड़े जोखिम पर अधिक है। दोनों आकलन एक साथ सही हो सकते हैं: चालू कारखाना पैनल बेचना जारी रख सकता है, जबकि प्रस्तावित वेफर संयंत्र को मंजूरी में देरी, अधिक लागत या देर से शुरुआत का सामना करना पड़ सकता है।
जेएम फाइनेंशियल का मानना है कि अगर ये नियंत्रण भारत को अधिक एकीकृत उद्योग बनाने के लिए प्रेरित करें, तो लंबे समय में फायदा हो सकता है। उसका अनुमान है कि इस बदलाव के दौरान व्यवधान होगा, न कि वारी एनर्जीज, प्रीमियर एनर्जीज और एमवी फोटोवोल्टाइक जैसे निर्माताओं को तुरंत मुनाफा बढ़ेगा।
उद्योग को अधिक समय और वैकल्पिक प्रौद्योगिकी साझेदार चाहिए
शाह ने ALMM-II की अवधि कम से कम 12 महीने बढ़ाने और इस व्यवस्था को सभी तरह की सौर परियोजनाओं पर लागू करने की मांग की है। उनका कहना है कि अतिरिक्त समय से निर्माता मौजूदा ऑर्डर पूरे करते हुए सेल उत्पादन स्थापित कर सकेंगे। यह उद्योग की मांग है, सरकार की घोषित नीति में बदलाव नहीं।
वोल्ट्स एनर्जी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पीयूष गोयल घरेलू उपकरणों के लिए सरकारी मिशन, प्रौद्योगिकी के स्वामित्व से जुड़ी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना और सेल उत्पादन लाइन चलाने में कुशल इंजीनियरों की बड़ी संख्या चाहते हैं।
शाह उपकरणों, कलपुर्जों और उपभोग्य सामग्रियों के लिए अलग उत्पादन आधारित प्रोत्साहन या पूंजीगत सब्सिडी का भी प्रस्ताव देते हैं। उन्होंने भारतीय पूंजीगत सामान कंपनियों, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद की प्रयोगशालाओं और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को संभावित साझेदार बताया है।
इंडियन सोलर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव अमित मनोहर ने उपकरणों, सामग्री और उन्नत सेल विशेषज्ञता के लिए जर्मनी, जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका को संभावित स्रोत बताया है। शाह ने पहले से अनुबंधित और क्रियान्वयन के चरण में मौजूद ऑर्डर सुरक्षित रखने के लिए चीन के साथ कूटनीतिक बातचीत की भी मांग की है।
सनकाइंड इंडिया के प्रबंध निदेशक हनीश गुप्ता का कहना है कि असर अंतिम नियमों, लाइसेंस प्रावधानों और वैकल्पिक प्रौद्योगिकी साझेदारों तक पहुंच पर निर्भर करेगा। वे इस प्रस्ताव को आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और घरेलू प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए "चेतावनी" बताते हैं।
आपूर्ति की अधिक सुरक्षा की कीमत चुकानी पड़ सकती है
वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता भारत को प्रौद्योगिकी की अधिक भरोसेमंद पहुंच दे सकते हैं, लेकिन उनका उत्पादन पैमाना छोटा होने से उपकरण और विनिर्माण महंगे हो सकते हैं। रुस्तगी को उम्मीद है कि आपूर्ति के स्रोत बदलने से लागत बढ़ेगी। हालांकि, उनका कहना है कि बैटरी के साथ इस्तेमाल करने पर भी सौर बिजली पारंपरिक बिजली के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बनी रहती है।
अंतरराष्ट्रीय कीमतों की मौजूदा तुलना से उन लागतों का पता चलता है जिनका निर्माताओं को सामना करना है। 2026 में, बड़े बिजली प्रोजेक्टों के लिए भारतीय TOPCon मॉड्यूल की कीमत निर्यात बंदरगाह पर चीनी मॉड्यूल के मुकाबले कम से कम 0.14 डॉलर प्रति वाट अधिक थी। आपूर्तिकर्ताओं की एक तुलना में तुर्की के मॉड्यूल की कीमत भी समकक्ष चीनी आपूर्ति से करीब दोगुनी बताई गई।
ये तैयार मॉड्यूल की कीमतें हैं। नियंत्रित विनिर्माण प्रक्रियाओं के विकल्प तलाशने के लिए मशीनरी, लाइसेंस, इंजीनियरिंग सहायता और उत्पादन के प्रदर्शन पर अलग से बातचीत करनी होगी। भारतीय कंपनियों को उपकरणों की खरीद कीमत के साथ-साथ कारखाने को भरोसेमंद ढंग से चालू करने की कुल लागत की तुलना करनी होगी।
अब तीन व्यावहारिक नतीजे चीन के अंतिम नियमों पर निर्भर हैं। कामचलाऊ लाइसेंस प्रक्रिया के साथ चुनिंदा नियंत्रण लागू हुए तो स्वीकृत परियोजनाएं आगे बढ़ सकती हैं। मंजूरी में देरी से उत्पादन टल सकता है और खर्च बढ़ सकता है। उन्नत प्रक्रियाओं तक पहुंच सीमित हुई तो भारतीय कारखानों को अधिक खर्च करना पड़ सकता है और उन्हें तैयार चीनी उत्पादों से मुकाबला करना होगा।
इसलिए जून 2028 तक भारत का लक्ष्य सिर्फ घोषित कारखाना क्षमता पर निर्भर नहीं है। उपकरणों की समय पर आपूर्ति, प्रशिक्षित इंजीनियर, चालू उत्पादन लाइनें और प्रौद्योगिकी तक भरोसेमंद पहुंच तय करेगी कि देश सौर आपूर्ति शृंखला का कितना हिस्सा खुद चला सकता है।
मुख्य बिंदु
- चीन ने सौर विनिर्माण की 12 प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण का प्रस्ताव दिया है; परामर्श 15 नवंबर 2026 को समाप्त होगा।
- कुछ प्रौद्योगिकियों के निर्यात पर रोक होगी, जबकि अन्य के लिए लाइसेंस लेना पड़ेगा।
- भारत की मॉड्यूल क्षमता उसकी सेल क्षमता से काफी अधिक है, जबकि इंगट, वेफर और पॉलीसिलिकॉन का उत्पादन सीमित है।
- इंडिया रेटिंग्स ने नई क्षमता बनाने वाले निर्माताओं के लिए देरी और लागत बढ़ने की चेतावनी दी है।
- प्रीमियर एनर्जीज को मौजूदा उत्पादन में तुरंत सीमित व्यवधान और निकट भविष्य में सेल या मॉड्यूल की कीमतों पर असर की आशंका नहीं है।
- फुजियामा का कहना है कि उपकरण पहुंच जाने से रतलाम में उसका प्रस्तावित 1.2 गीगावाट सेल कारखाना तय समय पर शुरू होगा।
- उद्योग के प्रस्तावों में ALMM-II के लिए अधिक समय, घरेलू उपकरणों को समर्थन और चीन से बाहर के साझेदारों के साथ सहयोग शामिल हैं।
- MNRE सचिव संतोष कुमार सारंगी ने जून 2028 को भारत की सौर आपूर्ति शृंखला में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य बताया है।






