पीड़ितों के डरने पर कार्रवाई का अधिकार चाहती है पुलिस
बांग्लादेश अपने आपराधिक कानून में ऐसे बदलावों पर विचार कर रहा है, जिनसे पुलिस भयभीत पीड़ितों की शिकायत का इंतजार किए बिना जबरन वसूली के मामले दर्ज कर सकेगी। प्रस्तावों में अधिकारियों के लिए अनिवार्य बॉडी कैमरे, अदालत में साक्ष्य के रूप में रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल और नियमित अदालतों के जरिए अभियोजन शामिल हैं।
विषय-सूची
- पीड़ितों के डरने पर कार्रवाई का अधिकार चाहती है पुलिस
- प्रस्तावित कानून से क्या बदलेगा
- साक्ष्य व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे कैमरे
- नियमित अदालतों और कड़ी सजा का प्रस्ताव
- सामुदायिक पुलिसिंग की जवाबदेही की भी होगी परीक्षा
- खुलना की बैठक में जनविश्वास पर जोर
- कानूनी प्रस्तावों के साथ संयुक्त अभियान
- अपराध का आकलन और फैसलों का क्रम
- मुख्य बिंदु
पुलिस महानिरीक्षक मोहम्मद अली हुसैन फकीर ने शनिवार, 24 अक्टूबर को बोयरा स्थित खुलना मेट्रोपॉलिटन पुलिस लाइन्स में सामुदायिक पुलिसिंग बैठक के बाद इस पहल की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने गृह मंत्री से ऐसा नया कानून बनाने का अनुरोध किया है, जिसके तहत पुलिस डिजिटल या अन्य साक्ष्यों के आधार पर जबरन वसूली के मामले शुरू कर सके।
यह घोषणा 15 अक्टूबर को संसदीय समिति में हुई चर्चा के बाद आई। उस बैठक में गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने दो संभावित रास्ते बताए थे: मौजूदा दंड संहिता में बदलाव करना या जबरन वसूली के खिलाफ अलग कानून लाना। मुख्य उद्देश्य यह है कि जांच तब भी शुरू हो सके, जब धमकी का सामना कर रहा व्यक्ति पुलिस थाने जाने को तैयार न हो।
फकीर ने कहा कि प्रभावशाली लोग, अपराधी और सत्ता से जुड़े लोग जबरन वसूली में शामिल थे, जिससे पीड़ित शिकायत करने और गवाही देने, दोनों से डरते थे। जबरन वसूली का अर्थ है धमकी या डर दिखाकर किसी से पैसे या कोई अन्य मूल्यवान चीज लेना।
ऐसी मांगों का सामना कर रहे व्यक्ति के लिए प्रस्तावित बदलाव मामले की शुरुआत करने की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपेगा। अधिकारी उस व्यक्ति के पहले औपचारिक कदम उठाने पर निर्भर रहने के बजाय, अपने हाथ लगे साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई कर सकेंगे।
प्रस्तावित कानून से क्या बदलेगा
फकीर ने कहा कि खुलना रवाना होने से पहले उन्होंने गृह मंत्री के सामने यह प्रस्ताव रखा था। उन्हें जल्द कानून बनने की उम्मीद थी। उन्होंने ऐसी व्यवस्था का जिक्र किया, जिसमें पुलिस शिकायतकर्ता बनकर खुद कार्रवाई आगे बढ़ा सकेगी।
व्यावहारिक रूप से शिकायतकर्ता वह व्यक्ति या प्राधिकरण होता है, जो किसी कथित अपराध की औपचारिक जानकारी न्याय व्यवस्था को देता है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जबरन वसूली के मामले में कोई अधिकारी यह भूमिका निभा सकेगा और पुलिस की कार्रवाई के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों का इस्तेमाल कर सकेगा।
15 अक्टूबर की चर्चा जातीय संसद भवन में गृह मंत्रालय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की बैठक के दौरान हुई, जिसकी अध्यक्षता जॉय्नुल आबेदीन ने की। अहमद ने समिति से कहा कि सुधारों से मौजूदा दंड संहिता की सीमाओं का समाधान होगा।
सरकार संशोधन और अलग कानून, दोनों विकल्पों पर विचार कर रही थी। घोषणाओं में कानून का अंतिम रास्ता, प्रकाशित विधेयक, सजा का सटीक प्रावधान या इसे पारित करने की तारीख नहीं बताई गई। इसलिए फकीर की जल्द कार्रवाई की उम्मीद के बावजूद समयसीमा तय नहीं है।
साक्ष्य व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे कैमरे
अहमद ने कानून-व्यवस्था लागू करने वाले कर्मियों के लिए बॉडी कैमरे अनिवार्य करने के प्रस्ताव का जिक्र किया। अधिकारी जबरन वसूली की घटनाओं का ऑडियो और वीडियो रिकॉर्ड करेंगे और रिकॉर्डिंग प्राथमिक फॉरेंसिक साक्ष्य के रूप में सीधे अदालतों में जमा की जाएगी।
फॉरेंसिक साक्ष्य वह सामग्री है जिसकी जांच से यह तय करने में मदद मिलती है कि क्या हुआ और कौन शामिल था। इस प्रस्ताव के तहत रिकॉर्डिंग से जांचकर्ताओं और अदालतों को घटनाओं का ऐसा विवरण मिलेगा, जिसकी वे अन्य साक्ष्यों के साथ जांच कर सकेंगे।
मंत्री ने कहा कि फुटेज के जरिए मौके पर मांग करने वाले लोगों और उनके पीछे मौजूद प्रभावशाली संरक्षकों की पहचान की जाएगी। इसलिए इस प्रस्ताव का दायरा केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जो खुद पैसे वसूलता है।
खुलना में फकीर की व्याख्या कैमरा प्रस्ताव से व्यापक थी। उन्होंने कहा कि डिजिटल और अन्य प्रकार के साक्ष्यों के आधार पर पुलिस कार्रवाई कर सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। दोनों घोषणाएं इस दिशा में बदलाव का संकेत देती हैं कि ऐसे साक्ष्य जुटाए जाएं, जिनके आधार पर पीड़ित के डर से चुप रहने पर भी अधिकारी कार्रवाई कर सकें।
नियमित अदालतों और कड़ी सजा का प्रस्ताव
संसदीय चर्चा में यह भी विचार किया गया कि जबरन वसूली के मामलों में अभियोजन कैसे चलाया जाएगा। अहमद ने हल्की-फुल्की संक्षिप्त सुनवाई और मोबाइल अदालतों द्वारा लगाए जाने वाले छोटे जुर्माने के बजाय नियमित न्यायिक अदालतों में मामले चलाने और कानून के तहत अधिकतम कैद की सजा मांगने की योजना बताई।
संक्षिप्त सुनवाई कानूनी प्रक्रिया का छोटा रूप है। मोबाइल अदालतें पारंपरिक अदालत से बाहर कुछ अपराधों पर सुनवाई कर सकती हैं। सरकार की चिंता थी कि मामूली सजाओं से पर्याप्त निवारक असर नहीं पड़ता और आदतन अपराधी जल्दी ही फिर आपराधिक गतिविधियों में लौट सकते हैं।
खुलना में फकीर ने भी यही चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कानून के दायरे में लाए जाने के बाद कुछ अपराधी फिर से अपनी गतिविधियां शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस इसे रोकने के लिए नीतियां बना रही है।
ये प्रस्ताव एक ही समस्या के अलग-अलग चरणों को संबोधित करते हैं: जब कोई शिकायत करने के लिए खुद को सुरक्षित महसूस न करे तब मामला शुरू करना, इस्तेमाल योग्य साक्ष्य जुटाना और अदालतों के जरिए सजा दिलाना। इनका व्यावहारिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून में इन चरणों को कैसे लिखा और लागू किया जाता है।
सामुदायिक पुलिसिंग की जवाबदेही की भी होगी परीक्षा
फकीर ने सामुदायिक पुलिसिंग को पुलिस की एक शाखा के रूप में काम करने की अनुमति देने वाले कानूनी ढांचे पर काम की भी घोषणा की। उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए तैयार किए जा रहे इस ढांचे को गृह और वित्त मंत्रालयों ने मंजूरी दे दी है।
सामुदायिक पुलिसिंग के तहत पड़ोस की सुरक्षा के लिए पुलिस और स्थानीय निवासियों के बीच संपर्क बढ़ाया जाता है। हालांकि खुलना में फकीर ने माना कि सामुदायिक पुलिसिंग से जुड़े कुछ लोगों पर निर्दोष निवासियों को परेशान करने, डराने-धमकाने और धमकियों के जरिए पैसे वसूलने के आरोप लगे हैं।
पुलिस प्रमुख ने कहा कि इन गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए जा रहे कानूनी ढांचे के तहत उन पर नियंत्रण रखा जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था इन आरोपों से कैसे निपटेगी, यह बताते हुए उन्होंने कहा:
"ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होनी चाहिए। इन दुरुपयोगों को रोकने के लिए सामुदायिक पुलिसिंग की गतिविधियां कानूनी ढांचे के तहत संचालित होंगी," उन्होंने कहा।
ये आरोप सुधारों में निगरानी को एक ठोस मुद्दा बनाते हैं। जबरन वसूली का सामना कर रहे निवासियों को अपराधियों से सुरक्षा चाहिए, वहीं स्थानीय पुलिसिंग में शामिल लोगों को भी अपने पद का इस्तेमाल करने के तरीके के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। फकीर ने कहा कि सामुदायिक पुलिसिंग की शक्तियों का इस्तेमाल कर लोगों को परेशान करने या पैसे वसूलने की कोशिशों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
खुलना की बैठक में जनविश्वास पर जोर
बैठक की अध्यक्षता खुलना मेट्रोपॉलिटन पुलिस आयुक्त मोहम्मद शज्जादुर रहमान ने की। इसमें नशीले पदार्थों, आतंकवाद, जबरन वसूली, किशोर गिरोहों और उग्रवाद पर चर्चा हुई। खुलना रेंज के उपमहानिरीक्षक मोहम्मद रेजाउल करीम और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र के कमांडेंट, उपमहानिरीक्षक एकेएम मुशर्रफ हुसैन मियाज़े विशेष अतिथि के तौर पर शामिल हुए। स्थानीय गणमान्य व्यक्ति और नागरिक समाज के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
फकीर ने कहा कि पिछले 17 वर्षों में पुलिस की गतिविधियों के कारण बल और जनता के बीच दूरी पैदा हुई थी। जनता का भरोसा बहाल करना उनकी यात्रा के उद्देश्यों में से एक था। उन्होंने पुलिस और जनता के बीच बनाए जाने वाले रिश्ते का वर्णन किया:
"हम पुलिस में जनता का विश्वास फिर से कायम करना और लोगों के साथ भरोसे का रिश्ता बनाना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य अधिक मानवीय और जनहितैषी पुलिस बल बनना है," उन्होंने कहा।
पुलिस प्रमुख ने खुलना में लोगों के डर को भी स्वीकार किया और उन हत्याओं का जिक्र किया जिनमें उनके अनुसार अपराधी शामिल थे। उन्होंने कहा कि बल को आलोचना का सामना करना पड़ता है: बल प्रयोग करे तो उसे तानाशाही कहा जाता है और न करे तो कमजोर।
उनकी प्रस्तावित प्रतिक्रिया में अधिक प्रभावी कार्रवाई के साथ निवासियों से नजदीकी रिश्ता बनाने की बात शामिल थी। यह जबरन वसूली की पहल के लिए सीधे तौर पर अहम है: कानून अधिकारियों को मामला शुरू करने की अनुमति दे सकता है, जबकि जनता का सहयोग उन्हें धमकियों को समझने, संदिग्धों की पहचान करने और घटनाओं की जांच में मदद कर सकता है।
कानूनी प्रस्तावों के साथ संयुक्त अभियान
फकीर ने कहा कि किशोर गिरोहों, जबरन वसूली करने वालों, नशीले पदार्थों के कारोबारियों और आतंकवादियों के खिलाफ देशभर में संयुक्त अभियान पहले से चल रहे हैं। उन्होंने नशीले पदार्थों के प्रति सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति का जिक्र किया और इन अपराधों से निपटने के लिए सहयोग की अपील की।
सुरक्षा से जुड़े सवालों के जवाब में उन्होंने 5 अगस्त 2024 के बाद पैदा हुई अव्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौरान पुलिस अनुपस्थित थी और आपराधिक गतिविधियां फैल रही थीं। उन्होंने कहा कि इसके बाद बल ने फिर से अपनी स्थिति मजबूत की और देशभर में अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है।
फकीर ने कहा कि हालात में सुधार हुआ है, हालांकि उन्होंने माना कि बेरोजगारी समेत समस्याएं रातोंरात हल नहीं हो सकतीं। उनके बयान में मौजूदा कार्रवाई अभियान को पुलिस व्यवस्था और जनविश्वास बहाल करने की व्यापक कोशिश से जोड़ा गया।
संसदीय समिति में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। पिछली बैठक के कार्यवृत्त का हवाला देते हुए फकीर ने चेतावनी दी कि मेडिकल और इंजीनियरिंग विश्वविद्यालयों के छात्रावासों में विद्यार्थियों को यह कहकर याबा के सेवन की ओर खींचा जा रहा है कि इससे वे रातभर पढ़ सकते हैं। उन्होंने परिसरों में रोकथाम अभियान और लक्षित कार्रवाई की अपील की।
अपराध का आकलन और फैसलों का क्रम
गृह मंत्रालय ने संसदीय समिति के सामने जनवरी से सितंबर 2026 तक का अपराध सूचकांक पेश किया, जिसमें इस अवधि की तुलना पिछले वर्ष के उन्हीं महीनों से की गई। इसमें हत्या, डकैती, लूट, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और पुलिस पर हमलों में कमी दर्ज की गई।
डकैती एक कानूनी शब्द है, जिसका इस्तेमाल समूह द्वारा की गई लूट के लिए होता है। मंत्रालय के आकलन में बलात्कार के आरोपों, नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों और सेंधमारी के मामलों में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। इन बढ़ोतरी के बावजूद समिति ने व्यापक सुरक्षा स्थिति पर संतोष जताया।
आंकड़ों में अपराध की विभिन्न श्रेणियों में अलग-अलग रुझान दिखे। जबरन वसूली कानून बनाने की एक खास प्राथमिकता बनी रही, क्योंकि अधिकारियों ने कहा कि डराने-धमकाने के कारण पीड़ित शिकायत नहीं कर पा रहे थे। घोषणाओं का क्रम इस प्रकार रहा:
- जनवरी से सितंबर 2026: गृह मंत्रालय ने अपराध का आकलन तैयार किया, जिसे बाद में संसदीय समिति के सामने पेश किया गया।
- 15 अक्टूबर: समिति ने कैमरा साक्ष्य और अभियोजन प्रस्तावों के साथ दंड संहिता में बदलाव या जबरन वसूली पर अलग कानून लाने पर चर्चा की।
- 24 अक्टूबर: फकीर ने खुलना की बैठक में पुलिस के मामला शुरू करने के अधिकारों की रूपरेखा बताई और प्रस्तावित सामुदायिक पुलिसिंग ढांचे पर चर्चा की।
निवासियों के लिए मुख्य वादा सीधा है: साक्ष्य उपलब्ध होने पर पुलिस जबरन वसूली का मामला शुरू करने की जिम्मेदारी लेगी, भले ही डर के कारण पीड़ित शिकायत न कर पाए। साथ ही यह वादा भी है कि पुलिसिंग में शामिल लोगों पर ऐसे नियम और निगरानी लागू होंगे, जो उन्हें उन्हीं समुदायों को डराने से रोकेंगे जिनकी रक्षा करना उनका काम है।
मुख्य बिंदु
- बांग्लादेश दंड संहिता में संशोधन या अलग कानून पर विचार कर रहा है, जिसके तहत पीड़ित की शिकायत के बिना पुलिस जबरन वसूली का मामला शुरू कर सकेगी।
- प्रस्तावों में अधिकारियों के लिए अनिवार्य बॉडी कैमरे और रिकॉर्डिंग को अदालत में साक्ष्य के रूप में पेश करना शामिल है।
- सरकार जबरन वसूली के मामलों में नियमित अदालतों के जरिए सुनवाई और कड़ी सजा चाहती है।
- फकीर ने सामुदायिक पुलिसिंग के कुछ सदस्यों पर डराने-धमकाने और जबरन वसूली के आरोपों को स्वीकार किया और कड़ी निगरानी का वादा किया।
- कानून पारित करने की कोई निश्चित तारीख या अंतिम विधायी मसौदा घोषित नहीं किया गया।






