सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र तक पहुंचता दमन
अफ़ग़ान महिलाओं के नेतृत्व वाले 74 संगठनों में से 61 के बंद होने का खतरा है, जीवित प्राणियों की तस्वीरों के प्रसारण पर पाबंदियां अब अफ़ग़ानिस्तान के 34 में से 25 प्रांतों तक पहुंच गई हैं और काबुल में शिया शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक संस्थान बंद कर दिए गए हैं। ये घटनाक्रम मिलकर दिखाते हैं कि तालिबान उन जगहों को कैसे सीमित कर रहा है जहां अफ़ग़ान मदद मांग सकते हैं, सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं और सत्ता में बैठे लोगों को चुनौती दे सकते हैं।
विषय-सूची
- सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र तक पहुंचता दमन
- महिला संगठन काम करने के साधन खो रहे हैं
- मीडिया बंदी नियंत्रण की व्यापक व्यवस्था बन रही है
- छापों और गिरफ्तारियों से समाचारों का प्रवाह बाधित
- नियम तय करते हैं कि कौन खबर बता सकता है और कैसे
- शिया संस्थानों पर बंदी और हिरासत की कार्रवाई
- महिलाएं छद्म नामों से विरोध जारी रखे हुए हैं
- अभिव्यक्ति का जोखिम न्यूज़रूम से बाहर तक
- संयुक्त राष्ट्र की निगरानी 2027 तक जारी
- मुख्य बिंदु
अगस्त, सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान दबाव तेज हुआ। मीडिया कार्यालयों पर छापे पड़े, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और काबुल तथा ग़ज़नी में संचालित एक विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया। 13 अक्टूबर को तालिबान ने पुष्टि की कि अफ़ग़ानिस्तान में एफएम ट्रांसमीटरों से बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रमों का प्रसारण निलंबित कर दिया गया है। प्रदर्शन पर तालिबान के पुलिस कानून के तहत पूरी तरह रोक के बावजूद महिलाओं ने छोटी सभाओं और ऑनलाइन अभियानों के ज़रिये विरोध जारी रखा।
अफ़ग़ानिस्तान में नागरिक स्वतंत्रता का दायरा, यानी लोगों को संगठित होने, बोलने और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने की आज़ादी, अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता पर कब्ज़े के बाद से बंद है। हाल के उपायों का असर राजनीतिक बहस से कहीं आगे तक है। वे शिक्षा में बाधा डालते हैं, हिंसा से बचे लोगों के लिए सेवाएं घटाते हैं और उन संगठनों को कमजोर करते हैं जिनके ज़रिये अल्पसंख्यक समुदाय प्रतिनिधित्व की मांग करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टुर्क ने चेतावनी दी कि तालिबान के 200 से अधिक फरमानों और निर्देशों ने महिलाओं के दमन को संस्थागत रूप दिया है। 42 देशों और यूरोपीय संघ ने अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव तथा दमन की निंदा की। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अफ़ग़ान महिला संयुक्त राष्ट्र कर्मचारियों को उनके कार्यस्थलों में प्रवेश से रोकने वाली पाबंदियां हटाने की मांग की। उन्होंने इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत बताया और चेतावनी दी कि इनसे जीवनरक्षक सहायता कमजोर होती है।
महिला संगठन काम करने के साधन खो रहे हैं
संयुक्त राष्ट्र महिला की 74 संगठनों पर की गई एक पड़ताल में पाया गया कि 61, यानी 82 प्रतिशत, के बंद होने का खतरा है। 40 संगठनों को आशंका थी कि अगले एक साल में उनका काम निलंबित हो सकता है या वे बंद हो सकते हैं। यह सर्वेक्षण में शामिल सभी संगठनों के आधे से अधिक हैं, इसलिए उनकी सेवाओं पर निर्भर लोगों के लिए यह खतरा तत्काल चिंता का विषय है।
पड़ताल में कई तरह की सहायता में कटौती दर्ज की गई। हिंसा से बचे लोगों के लिए केस प्रबंधन और रेफरल सेवाएं घटने या निलंबित होने की सूचना 76 प्रतिशत संगठनों ने दी। इन सेवाओं से किसी व्यक्ति को अपनी ज़रूरतें समझने और चिकित्सा, कानूनी या अन्य सहायता पाने में मदद मिलती है। सुरक्षित ठिकानों की सेवाएं घटने या उपलब्ध न होने की सूचना 70 प्रतिशत ने दी, जबकि 68 प्रतिशत ने महिलाओं की आजीविका में मदद करने वाली सेवाओं में बाधा की जानकारी दी।
अफ़ग़ान महिलाओं के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों में काम करने पर तालिबान की पाबंदी और अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण में गिरावट ने इन समूहों पर दबाव बढ़ा दिया है। महिला कर्मचारियों पर लगी पाबंदियां उन महिलाओं तक पहुंचना भी मुश्किल बनाती हैं जिनकी आवाजाही या परिवार से बाहर पुरुषों के साथ संपर्क पर रोक है।
अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन यूएनएएमए ने पहनावे के नियमों और पुरुष अभिभावक के बिना यात्रा करने पर गिरफ्तारियों को लेकर चिंता जताई। मदद मांगने वाली महिलाओं के लिए ऐसी पाबंदियां सेवा तक पहुंचने के सफर को ही जोखिम का एक और स्रोत बना सकती हैं। संगठनों के लिए कर्मचारी, वित्तपोषण और बैठक की जगहें खोने से वे नेटवर्क भी कमजोर होते हैं जिनके ज़रिये महिलाएं जानकारी साझा करती हैं और बदलाव की मांग करती हैं।
मीडिया बंदी नियंत्रण की व्यापक व्यवस्था बन रही है
अफ़ग़ानिस्तान जर्नलिस्ट्स सेंटर ने 12 महीने की रिपोर्टिंग अवधि में मीडिया और पत्रकारों की स्वतंत्रता के 102 उल्लंघन दर्ज किए, जिनमें 15 पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों को हिरासत में लेना शामिल है। तीन अन्य पत्रकार और मीडिया कार्यकर्ता पहले ही एक साल से अधिक समय से जेल में थे और अपनी सज़ाएं काट रहे थे। इस अवधि में कम से कम 29 मीडिया संस्थान, संगठन और प्रतिष्ठान बंद कर दिए गए या उनके संचालन लाइसेंस रद्द कर दिए गए।
जीवित प्राणियों की तस्वीरों पर पाबंदियां 34 में से 25 प्रांतों में लागू थीं, यानी देश के लगभग तीन-चौथाई प्रांतों में। कुछ टीवी चैनलों ने प्रसारण रोक दिया या रेडियो में बदल गए। तालिबान के आदेशों का पालन न करने के बाद कम से कम पांच मीडिया संस्थानों ने काम बंद कर दिया। वहीं, महिलाओं को फोन के ज़रिये सीधे प्रसारित कार्यक्रमों में शामिल करने के बाद कम से कम दो रेडियो स्टेशनों ने प्रसारण रोक दिया।
पत्रकारों की सुरक्षा समिति ने अपने अगस्त 2026 के बयान में व्यापक नियंत्रण का वर्णन किया। 2024 में अधिकारियों ने इंटरव्यू देने की अनुमति केवल 68 स्वीकृत विश्लेषकों तक सीमित कर दी और नंगरहार में 14 मीडिया संस्थानों के लाइसेंस निलंबित कर दिए। 2025 तक तालिबान लगभग 15 बड़े मीडिया संस्थान और मंच संचालित कर रहा था।
समिति के अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान प्रतिनिधि वलीउल्लाह रहमानी ने पत्रकारों के हालात का वर्णन किया:
पत्रकारों पर निगरानी रखी जाती है, उन्हें हिरासत में लिया जाता है, पीटा जाता है, सेंसर किया जाता है या निर्वासन के लिए मजबूर किया जाता है। महिला पत्रकारों को अतिरिक्त भेदभाव का सामना करना पड़ता है और लोग कुछ भी बोलने से लगातार अधिक डर रहे हैं।
छापों और गिरफ्तारियों से समाचारों का प्रवाह बाधित
26 अगस्त को खुफिया अधिकारियों ने मोबि मीडिया समूह से संबद्ध लैपिस का काबुल कार्यालय बंद कर दिया और कंप्यूटर तथा स्टोरेज डिवाइस जब्त कर लिए। अधिकारियों ने ऐसी सामग्री की जांच का हवाला दिया जो कथित तौर पर स्थानीय मूल्यों के विपरीत थी और पश्चिमी विचारों को बढ़ावा देती थी। 6 सितंबर को तालिबान सुरक्षा बलों ने रह-ए-फ़र्दा टीवी बंद कर दिया और उसके मालिक सलमान अखलाकी को हिरासत में ले लिया।
रह-ए-फ़र्दा को इसी साल पहले भी हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा था। पत्रकारों की सुरक्षा समिति ने बताया कि खुफिया एजेंटों ने स्टेशन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया था। बाद में तालिबान से लाइसेंस प्राप्त नए मालिक के तहत उसने प्रसारण फिर शुरू किया। अन्य बड़ी कार्रवाइयों में मई में टोलो न्यूज़ के दो पत्रकारों को हिरासत में लेना और फिर स्टेशन पर छापा मारना तथा जून में तमादोन टीवी को जबरन बंद करना शामिल था। तमादोन शिया कार्यक्रम प्रसारित करने वाले आखिरी टीवी चैनलों में से एक था।
7 सितंबर को तालिबान की नैतिकता पुलिस ने खोस्त में पुस्तक प्रदर्शनी की रिपोर्टिंग कर रहे 12 पत्रकारों को हिरासत में लिया और उनके कैमरे जब्त कर लिए। 24 सितंबर को अधिकारियों ने अफ़ग़ान वॉइस एजेंसी के काबुल कार्यालय पर छापा मारा, उपकरण और दस्तावेज़ जब्त किए, परिसर को सील किया और उसके सुरक्षा प्रबंधक को हिरासत में ले लिया। अगले दिन समन का जवाब देने के बाद रिपोर्टर ज़मीन अली चावोशी समेत पांच लोगों को हिरासत में लिया गया। पत्रकारों की सुरक्षा समिति ने सभी छह लोगों को रिहा करने और कार्यालय फिर से खोलने की मांग की।
13 अक्टूबर को एफएम ट्रांसमीटरों पर बीबीसी के कार्यक्रमों का प्रसारण निलंबित कर दिया गया। बीबीसी ने कहा कि वह अन्य मंचों के ज़रिये दरी, पश्तो और अंग्रेज़ी में श्रोताओं तक पहुंचता रहा। इंटरनेट तक पहुंच भी असुरक्षित रही है: सितंबर 2025 में देशव्यापी इंटरनेट बंदी लगभग 48 घंटे चली, जिससे पत्रकारों द्वारा जानकारी जुटाने और प्रसारित करने के माध्यम बाधित हुए।
नियम तय करते हैं कि कौन खबर बता सकता है और कैसे
तालिबान के अगस्त 2024 के सदाचार के प्रचार और अनैतिकता की रोकथाम संबंधी कानून के तहत मीडिया सामग्री को शरिया यानी इस्लामी कानून के अनुरूप होना ज़रूरी है और जीवित प्राणियों की तस्वीरें दिखाने पर रोक है। ह्यूमन राइट्स वॉच के अक्टूबर 2025 के निष्कर्षों में निगरानी, सेंसरशिप और कथित आलोचना के लिए सज़ा का वर्णन किया गया। ये निष्कर्ष अफ़ग़ानिस्तान में दूर से किए गए 18 इंटरव्यू और तुर्किये में आमने-सामने किए गए 13 इंटरव्यू पर आधारित थे। अधिकांश इंटरव्यू अगस्त 2025 में हुए।
ह्यूमन राइट्स वॉच की अफ़ग़ानिस्तान शोधकर्ता फ़रिश्ता अब्बासी ने बताया कि दबाव रोज़मर्रा की रिपोर्टिंग को कैसे प्रभावित करता है:
अफ़ग़ानिस्तान के सभी पत्रकार प्रभावित हुए हैं और कई देश छोड़कर भाग गए हैं, लेकिन महिला पत्रकार सबसे अधिक प्रभावित लोगों में रही हैं।
मीडिया में काम करने वाली महिलाओं की संख्या 2021 से पहले 1,400 तक थी, जो 2024 में घटकर 600 रह गई। इन आंकड़ों के आधार पर यह करीब 57 प्रतिशत की गिरावट है। मीडिया में काम करने वाले पुरुषों की संख्या 2022 में लगभग 4,000 से घटकर 2,000 रह गई। अलग-अलग वर्षों के ये आंकड़े दिखाते हैं कि तालिबान शासन के शुरुआती वर्षों में दोनों समूहों पर असर पड़ा।
महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने, अधिकारियों का इंटरव्यू लेने और घर से बाहर काम करने पर पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। सरकारी कार्यालयों में स्मार्टफोन पर रोक से जानकारी तक उनकी पहुंच और सीमित होती है। जनवरी 2025 में पत्रकारों को कथित तौर पर महिलाओं की शिक्षा पर रोक को लेकर आंतरिक मतभेदों के बारे में सवाल पूछने से मना किया गया था।
पत्रकारों ने यह भी बताया कि प्रांतों और एजेंसियों के बीच नियम अलग-अलग होते हैं, इसलिए किसी अधिकारी से काम की मंज़ूरी मिलने पर भी वे जोखिम में रहते हैं। सैकड़ों पत्रकार देश छोड़कर भाग चुके हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि 2025 के मध्य तक पाकिस्तान में 150 से अधिक अफ़ग़ान पत्रकारों के जबरन वापस भेजे जाने का खतरा माना जा रहा था। तुर्किये और अमेरिका में पत्रकारों को भी असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा था।
शिया संस्थानों पर बंदी और हिरासत की कार्रवाई
रिपोर्टों के अनुसार, 13 सितंबर को हाई शिया कमीशन के पांच सदस्यों को काबुल में हिरासत में लिया गया। आरोप है कि न्याय मंत्रालय ने आयोग को गैरकानूनी घोषित कर भंग कर दिया और सदस्यता कार्ड जब्त कर लिए। इस कार्रवाई ने उस व्यवस्था को कमजोर किया जिसके ज़रिये शिया समुदाय प्रतिनिधित्व की मांग कर सकते थे।
16 सितंबर को उच्च शिक्षा मंत्रालय ने खातम अल-नबीयीन विश्वविद्यालय का संचालन लाइसेंस रद्द कर दिया और काबुल तथा ग़ज़नी परिसरों को बंद करने का आदेश दिया। अधिकारियों ने मंत्रालय की नीतियों के उल्लंघन का आरोप लगाया, लेकिन इसका विस्तृत साक्ष्य नहीं दिया। विश्वविद्यालय के मालिक ने आरोपों को खारिज किया।
यह बंदी इससे संबद्ध एक मदरसे को लेकर हुए टकराव के बाद आई। संपत्ति के विवादित दावे के कारण उसे खाली कराया गया और लोगों को हिरासत में लिया गया। 5 सितंबर को निवासियों ने प्रस्तावित बेदखली के खिलाफ प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के अनुसार, तालिबान बलों ने छात्रों और शिक्षकों के साथ हिंसा की। 28 लोगों को हिरासत में लिया गया; बाद में चार को रिहा कर दिया गया और उस समय की जानकारी के अनुसार 24 लोग हिरासत में थे। मदरसे को 7 सितंबर को खाली कराया गया।
21 सितंबर को खुफिया बलों ने कथित तौर पर पश्चिमी काबुल में स्थित अलग खातम-उल-अंबिया धार्मिक स्कूल पर छापा मारा, छात्रों और कर्मचारियों को बाहर निकाला, परिसर के कुछ हिस्सों को सील किया और इसके प्रमुख तथा कई शिक्षकों को हिरासत में लिया। 29 सितंबर को न्याय मंत्रालय ने काबुल स्थित शिया धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन तेबयान सांस्कृतिक केंद्र बंद कर दिया।
इन कार्रवाइयों से एक साथ अलग-अलग तरह के सामुदायिक ढांचे हटते हैं: प्रतिनिधित्व का एक मंच, शिक्षा के स्थान और एक सांस्कृतिक केंद्र। इसका असर उन छात्रों, शिक्षकों और परिवारों पर भी पड़ता है जो इन पर निर्भर थे, साथ ही हिरासत में लिए गए लोगों पर भी।
महिलाएं छद्म नामों से विरोध जारी रखे हुए हैं
तालिबान ने पुलिस कानून के तहत प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक का बचाव करते हुए कहा कि प्रदर्शन लोकतंत्र या गणतंत्र जैसी राजनीतिक व्यवस्थाओं का हिस्सा हैं। अफ़ग़ान महिलाओं के स्वतःस्फूर्त आंदोलन ने इस प्रतिबंध की निंदा की और बताया कि महिलाएं छोटी सभाओं, प्रतीकात्मक कार्रवाइयों तथा ऑनलाइन पोस्ट के ज़रिये विरोध जारी रख रही हैं।
फ्री विमेन्स नेटवर्क के सदस्यों ने 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस पर आज़ादी, न्याय और समानता के लिए प्रदर्शन किया। 6 अक्टूबर को विमेन्स फ्रीडम नेटवर्क ने शिक्षकों और लड़कियों को काम तथा शिक्षा तक पहुंचने से रोकने वाली पाबंदियों के खिलाफ प्रदर्शन किया।
परवान की 28 वर्षीय कार्यकर्ता गुलसूम (एक छद्म नाम) काबुल क्रिटिकल थिंकिंग मूवमेंट से जुड़ी हैं। उन्होंने पहले कानून की पढ़ाई की और एक निजी स्कूल में पढ़ाया। उन्होंने बताया कि दो साल पहले आंदोलन से जुड़ने के बाद धीरे-धीरे उसके बयानों को देखने से आगे बढ़कर ऑनलाइन बैठकों और अभियानों में हिस्सा लेने लगीं।
यह आंदोलन अपने फ़ेसबुक पेज पर बयान, तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित करता है। पहचान का खतरा घटाने के लिए सदस्य अभियान की सामग्री अपने निजी खातों पर साझा नहीं करते और छद्म नामों, ढके हुए चेहरों तथा सोच-समझकर चुनी गई रिकॉर्डिंग की जगहों का इस्तेमाल करते हैं। गुलसूम को यह डर भी है कि उनकी सक्रियता का पता चलने पर उनका परिवार उन पर पाबंदियां लगा सकता है।
गुलसूम ने बताया कि इन आशंकाओं के बावजूद वे विरोध क्यों जारी रखती हैं:
मेरा मानना है कि न्याय के लिए उठाई गई कोई आवाज़ बेकार नहीं जाती। बदलाव शायद आज न हो। लेकिन अगर कोई नहीं बोलेगा, तो कल के लिए कोई उम्मीद नहीं बचेगी।
अभिव्यक्ति का जोखिम न्यूज़रूम से बाहर तक
नागरिक समाज और शिक्षा कार्यकर्ता एहसान सादात को कथित तौर पर 12 सितंबर को रिहा किया गया। उन्हें 6 अगस्त को खोस्त में अधिकारियों के खिलाफ दुष्प्रचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उनकी रिहाई से पहले खबरें आई थीं कि उन्हें बुरी तरह यातना दी गई और वे कोमा में चले गए थे। रिहाई के बाद उनकी स्थिति की पुष्टि नहीं हुई।
पत्रकार शकीब अहमद नाज़री को तालिबान की हिरासत में 405 दिन बिताने के बाद 1 सितंबर को रिहा किया गया। खुफिया एजेंसी से जुड़ी एक सैन्य अदालत ने उन्हें दुष्प्रचार और निर्वासन में रह रहे मीडिया के साथ सहयोग के आरोपों में तीन साल जेल की सज़ा सुनाई थी। तवाना न्यूज़ एजेंसी के निदेशक अबुज़र सरेम सर-ए-पुली हिरासत में रहे।
गायक और दंबूरा वादक सैयद ग़फ़्फ़ार आगा को कथित तौर पर 25 अगस्त को काबुल में हिरासत में लिया गया। उन्होंने नेशनल रेज़िस्टेंस फ़्रंट के एक कमांडर के शोक में वीडियो पोस्ट किया था। 30 सितंबर के आसपास कवयित्री और स्कूल शिक्षिका मुज़्दा उज़्बेक को तालिबान की आलोचना करती कविताओं और एक पूर्व सीनेटर से कथित संबंधों के चलते तख़ार में गिरफ्तार किए जाने की खबर आई। उनका ठिकाना और स्थिति अज्ञात थी।
22 सितंबर को तालिबान अधिकारियों ने ग़ज़नी में एक युवक को सोशल मीडिया पोस्ट के लिए हिरासत में लिया, जो कथित तौर पर संगठन की आलोचना करते थे। संगीतकारों, कवियों, शिक्षकों और आम सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को निशाना बनाने से दबाव उन लोगों से आगे तक फैलता है जिन्हें खबरें देने का काम सौंपा गया है। किसी सार्वजनिक पोस्ट या कविता के लिए उसके लेखक और परिवार को नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की निगरानी 2027 तक जारी
अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक रिचर्ड बेनेट ने 28 अगस्त 2026 को रिपोर्ट A/HRC/63/22 प्रकाशित की। मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव 60/2 के तहत पेश की गई यह रिपोर्ट नवंबर 2025 से अगस्त 2026 तक के घटनाक्रम को शामिल करती है और तालिबान की पांच साल की नीतियों की समीक्षा करती है। इसमें बच्चों के अधिकारों पर खास ध्यान दिया गया है।
बेनेट ने यौन आचरण से जुड़े नियमों को लेकर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अदालतों के लिए तालिबान की दंड संहिता सहमति से बने यौन संबंध और यौन हिंसा में फर्क नहीं करती, जिससे हिंसा से बचे लोगों को अपराधियों जैसी सज़ा का खतरा है। उन्होंने एलजीबीटीक्यू लोगों को बेहद असुरक्षित बताया और कहा कि संहिता में पुरुषों के बीच यौन संबंध के लिए जेल की सज़ा तथा कुछ यौन कृत्य बार-बार करने पर मौत की सज़ा का प्रावधान है।
5 अक्टूबर को मानवाधिकार परिषद ने बिना मतदान के सर्वसम्मति से प्रस्ताव A/HRC/63/L.8 पारित कर बेनेट का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया। अगले तय कदमों में जून 2027 में लैंगिक चिंताओं पर केंद्रित चर्चा और अल्पसंख्यकों पर बेनेट की मांगी गई रिपोर्ट शामिल है, जो सितंबर 2027 में देय है।
अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने भी महिलाओं, लड़कियों, तालिबान की लैंगिक नीतियों से असंगत समझे जाने वाले लोगों और महिला अधिकारों के कथित समर्थकों के उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े चार गिरफ्तारी वारंट सार्वजनिक किए। इन कार्यवाहियों में संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों के लगातार दस्तावेज़ीकरण के साथ-साथ व्यक्तियों की आपराधिक जवाबदेही का पहलू भी शामिल है।
हाल की घटनाओं का सिलसिला दिखाता है कि संस्थानों में दबाव कितनी तेज़ी से फैला:
- 26 अगस्त 2026: खुफिया अधिकारियों ने लैपिस का काबुल कार्यालय बंद किया।
- 5 से 16 सितंबर: मदरसे को लेकर प्रदर्शन, उसे खाली कराए जाने और गिरफ्तारियों के बाद खातम अल-नबीयीन विश्वविद्यालय बंद हुआ।
- 21 से 29 सितंबर: अधिकारियों ने एक धार्मिक स्कूल, अफ़ग़ान वॉइस एजेंसी और तेबयान सांस्कृतिक केंद्र को निशाना बनाया।
- 5 अक्टूबर: मानवाधिकार परिषद ने बेनेट का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया।
- 13 अक्टूबर: तालिबान ने एफएम ट्रांसमीटरों पर बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रमों का प्रसारण निलंबित करने की पुष्टि की।
अफ़ग़ानों के लिए इन सबका मिला-जुला असर यह है कि पढ़ाई करने, दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज कराने, मदद पाने या प्रतिक्रिया के लिए संगठित होने के स्थान कम हो गए हैं। महिला संगठन काम करने की क्षमता खो रहे हैं, जबकि पत्रकारों और सामुदायिक संस्थानों पर लगी पाबंदियों के कारण इन नुकसानों का दस्तावेज़ीकरण करना और सार्वजनिक रूप से उन्हें चुनौती देना और कठिन हो गया है।
मुख्य बिंदु
- संयुक्त राष्ट्र महिला की पड़ताल में महिलाओं के नेतृत्व वाले 74 संगठनों में से 61 के बंद होने का खतरा पाया गया।
- मीडिया निगरानी संस्था ने 12 महीनों में प्रेस स्वतंत्रता के 102 उल्लंघन दर्ज किए, जिनमें 15 लोगों को हिरासत में लेना शामिल है।
- जीवित प्राणियों की तस्वीरों पर पाबंदियां अफ़ग़ानिस्तान के 34 में से 25 प्रांतों तक पहुंच गईं।
- छापों, बंदियों और गिरफ्तारियों से मीडिया संस्थान, शिया संस्थान, कार्यकर्ता और सांस्कृतिक हस्तियां प्रभावित हुए।
- प्रदर्शन पर रोक के बावजूद महिलाओं ने छोटी सभाओं और ऑनलाइन अभियानों के ज़रिये विरोध जारी रखा।
- संयुक्त राष्ट्र की निगरानी जारी रहेगी: जून 2027 में लैंगिक मुद्दों पर चर्चा और सितंबर 2027 में अल्पसंख्यकों पर एक अध्ययन पेश होना है।






