चार झीलें, 2033 की समय-सीमा और एक अहम डिजाइन संबंधी फैसला
नेपाल चार हिमालयी हिमनदीय झीलों का जलस्तर घटाने, बाढ़ चेतावनी प्रणालियां लगाने और नीचे की ओर रहने वाले समुदायों की रक्षा के लिए लगभग 50 मिलियन डॉलर की परियोजना तैयार कर रहा है। इसमें उन नदियों के किनारे बसे समुदाय भी शामिल हैं जो भारत में बहती हैं। ये झीलें समुद्र तल से 4,050 से 5,483 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। यहां अस्थिर प्राकृतिक बांध, हिमस्खलन और कठिन कार्य परिस्थितियां खतरे को कम करना चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।
विषय-सूची
- चार झीलें, 2033 की समय-सीमा और एक अहम डिजाइन संबंधी फैसला
- पहाड़ी झील बाढ़ का खतरा कैसे बनती है
- खतरा भारत तक क्यों पहुंचता है
- क्या बनेगा और कब
- तीन मीटर की कटौती पर वैज्ञानिकों में मतभेद क्यों
- पहली जलनिकासी परियोजनाओं से नेपाल ने क्या सीखा
- चेतावनी प्रणालियों को नीचे के इलाकों के लोगों तक पहुंचना होगा
- खर्च कौन उठाएगा और लाभ किसे मिलेगा
- हाल की तबाही से कार्यक्रम की तात्कालिकता बढ़ी
- मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के आधिकारिक परियोजना रिकॉर्ड में थुलागी, लोअर बरुन, लुमडिंग त्शो और होंगु 2 को लक्षित झीलों के रूप में पहचाना गया है। इसमें परियोजना की नियोजित और वास्तविक शुरुआत की तारीख 11 मार्च 2026 दर्ज है, जबकि इसे 11 मार्च 2033 तक पूरा करने की योजना है। यूएनडीपी और नेपाल सरकार ग्रीन क्लाइमेट फंड के सहयोग से यह काम कर रहे हैं।
मुख्य इंजीनियरिंग फैसले पर अभी अध्ययन जारी है: हर झील का जलस्तर कितना घटाया जाए। परियोजना के शुरुआती विवरणों में होंगु 2 का जलस्तर एक मीटर और बाकी झीलों का तीन मीटर घटाने का प्रस्ताव था। राष्ट्रीय कार्यक्रम निदेशक राजन भट्टराई ने बाद में कहा कि जरूरी अध्ययन और संशोधित डिजाइन पहले तैयार होने चाहिए, इसलिए अंतिम कटौती अभी तय नहीं है।
इसलिए जीएलओएफ संजीवनी परियोजना के नाम से जाना जाने वाला यह कार्यक्रम केवल जलनिकासी नहरें खोदने तक सीमित नहीं है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हर झील के अनुरूप उपाय चुने जाएं, निकास मार्ग सुरक्षित रखे जाएं और नीचे रहने वाले लोगों को बाढ़ का पानी आने से पहले वहां से निकलने के लिए पर्याप्त चेतावनी मिले।
पहाड़ी झील बाढ़ का खतरा कैसे बनती है
हिमनदों की बर्फ पिघलने और पहाड़ी गर्तों में पानी जमा होने से हिमनदीय झीलें बनती हैं। इनमें से कुछ झीलों को मोरेन रोकते हैं। मोरेन चट्टानों, तलछट और कभी-कभी हिमनद के पीछे छूटी दबी हुई बर्फ से बनी एक कटक होती है। इंजीनियरों द्वारा बनाए गए बांध के उलट, इस प्राकृतिक अवरोध में कमजोर या अस्थिर हिस्से हो सकते हैं।
हिमस्खलन या भूस्खलन से पानी इस अवरोध के ऊपर बह सकता है। इसके बाद कटाव इसे काटकर पानी को तेजी से घाटी में छोड़ सकता है। भूकंप, मोरेन के भीतर बर्फ का पिघलना या निकास मार्ग के आसपास बदलाव भी झील को अस्थिर कर सकते हैं। पानी के इस अचानक बहाव को हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़, यानी जीएलओएफ, कहा जाता है।
नेपाल के जल विज्ञान एवं जल संसाधन अनुसंधान केंद्र के विशेषज्ञ सुभाष तुलाधर, जो इस परियोजना की निगरानी कर रहे हैं, ने इसका उद्देश्य बताया:
हमारा लक्ष्य झीलों के प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा और नीचे के इलाकों में बाढ़ का जोखिम कम करना है।
जलस्तर घटाने से प्राकृतिक अवरोध के ऊपरी हिस्से के नीचे पानी के लिए ज्यादा जगह बनती है और अचानक बहाव में निकल सकने वाले पानी की मात्रा कम होती है। सुरक्षा का असर झील की बनावट, गहराई, आसपास की ढलानों और बांध की स्थिति पर निर्भर करता है। इसीलिए मीटर में मापी गई समान कटौती का अलग-अलग झीलों पर असर भी अलग हो सकता है।
खतरा भारत तक क्यों पहुंचता है
थुलागी मनांग जिले में, लोअर बरुन संखुवासभा में और लुमडिंग त्शो सोलुखुम्बु में स्थित है। होंगु 2 के साथ ये झीलें कोशी और गंडकी नदी बेसिन में परियोजना का केंद्र हैं। इन नदी प्रणालियों से होकर बहने वाला बाढ़ का पानी झीलों से काफी नीचे स्थित बस्तियों, खेतों, सड़कों और बिजली ढांचे को प्रभावित कर सकता है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और यूएनडीपी के 2020 के आकलन में नेपाल, चीन और भारत में 47 संभावित रूप से खतरनाक हिमनदीय झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 21 नेपाल, 25 चीन और एक भारत में थी।
आकलन के मुताबिक, इन 47 झीलों में से 42 कोशी नदी प्रणाली में थीं। इनमें 24 चीन और 18 नेपाल में थीं। यह पहचानी गई कुल झीलों का लगभग 89 प्रतिशत है। चूंकि कोशी नेपाल से बिहार में बहती है, इसलिए इन झीलों का संकेंद्रण नेपाल के पर्वतीय जिलों से आगे भी इस परियोजना को अहम बनाता है।
ये आंकड़े नेपाल की चार झीलों पर केंद्रित कार्यक्रम की सीमाएं भी दिखाते हैं। कोशी के किनारे बाढ़ की तैयारी में पूरे व्यापक बेसिन से आने वाले पानी को ध्यान में रखना होगा, जिसमें चीन की सीमा पार स्थित झीलें भी शामिल हैं। स्थानीय इंजीनियरिंग और नीचे के इलाकों में चेतावनी की व्यवस्था साझा खतरे के अलग-अलग पहलुओं से निपटती हैं।
क्या बनेगा और कब
इंजीनियर ऐसी नहरें और गेट वाले निकास मार्ग बनाने की योजना बना रहे हैं, जिनसे पानी धीरे-धीरे पास की नदियों में छोड़ा जा सके। बताई गई योजना में विस्फोटकों का उपयोग नहीं होगा, बल्कि नियंत्रित जलनिकासी की जाएगी। निर्माण जोखिम घटाने के लिए श्रमिकों और तकनीकी तरीकों का चयन किया जाएगा।
भट्टराई ने कहा है कि यदि काम बिना रुकावट आगे बढ़ा तो तीन साल के भीतर जलस्तर घटाया जा सकता है। हालांकि, पहाड़ों में मौसम के कारण हर साल निर्माण के लिए केवल लगभग पांच या छह महीने मिलते हैं। श्रमिकों को लंबे समय तक अधिक ऊंचाई पर काम करने और अचानक बाढ़ आने की आशंका का भी सामना करना होगा।
जल विज्ञान एवं जल संसाधन अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक संजीव बराल ने इससे लंबा अनुमान दिया है: विस्तृत अध्ययन के बाद गेट वाली संरचनाओं से जलनिकासी में छह साल तक लग सकते हैं। 2033 की लक्ष्य-तिथि ऐसे कार्यक्रम के लिए समय देती है, जो अपनी शुरुआती प्रशासनिक शुरुआत से काफी आगे तक चलेगा।
मुख्य तारीखें पहले के अनुभव, परियोजना की तैयारी और निर्माण की संभावित अवधि को अलग-अलग दिखाती हैं:
- 2000: नेपाल ने त्शो रोल्पा का जलस्तर तीन मीटर घटाया।
- 2016: नेपाल ने इम्जा का जलस्तर लगभग 3.4 मीटर घटाया।
- 2020: आईसीआईएमओडी और यूएनडीपी के आकलन में तीन देशों की 47 संभावित रूप से खतरनाक झीलों की पहचान की गई।
- 11 मार्च 2026: आधिकारिक परियोजना रिकॉर्ड में कार्यक्रम की शुरुआत की तारीख दर्ज है।
- जुलाई 2027 के मध्य में समाप्त होने वाला वित्त वर्ष: अधिकारियों ने डिजाइन कार्य और विस्तृत अध्ययन का कार्यक्रम तय किया है।
- 11 मार्च 2033: आधिकारिक रिकॉर्ड में परियोजना की नियोजित समाप्ति की तारीख दर्ज है।
भट्टराई ने कहा है कि 2026 में निर्माण शुरू होने की उम्मीद नहीं है। इस दौरान परामर्शदाता नियुक्त किए जाएंगे, पर्यावरणीय आकलन पूरा होगा और डिजाइन को बेहतर बनाया जाएगा। कार्यक्रम शुरू होना और खुदाई शुरू होना अलग-अलग चरण हैं।
तीन मीटर की कटौती पर वैज्ञानिकों में मतभेद क्यों
त्शो रोल्पा और इम्जा में नेपाल के अनुभव के कारण लगभग तीन मीटर की कटौती एक परिचित मानक बन गई है। वैज्ञानिकों में इस बात पर मतभेद है कि इससे नई चुनी गई चार झीलों में कितना संरक्षण मिलेगा।
हिमनदों, हिमनदीय झीलों और विस्फोट बाढ़ के विशेषज्ञ तथा आईसीआईएमओडी के सेवानिवृत्त विशेषज्ञ सम्ज्वल रत्न बज्राचार्य ने कहा है कि झीलों का जलस्तर तीन मीटर घटाने से खतरा काफी कम होगा। अन्य शोधकर्ताओं का तर्क है कि जरूरी गहराई हर झील के विस्तृत आकलन से तय होनी चाहिए, न कि पहले के निर्माण लक्ष्यों के आधार पर।
नेपाल की हिमनदीय झीलों का दशकों से अध्ययन कर रहे पर्वतीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ एल्टन सी. बायर्स ने पहले के मानक पर सवाल उठाया:
तीन मीटर की कटौती का यह विचार त्शो रोल्पा पर आधारित है, और यह पर्याप्त नहीं है।
बायर्स ने कहा कि त्शो रोल्पा की मूल योजना में झील का जलस्तर 20 मीटर तक घटाने की कल्पना थी, लेकिन धन की कमी के कारण काम तीन मीटर तक सीमित रहा। इम्जा, लोअर बरुन और थुलागी का अध्ययन कर चुके अमेरिकी वैज्ञानिक जेफ्री एस. कार्गेल ने कहा कि इम्जा में कम से कम 10 मीटर की कटौती की सिफारिश की गई थी। जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग के बाढ़ पूर्वानुमान अनुभाग के प्रमुख बिनोद पराजुली ने वहां कम से कम 20 मीटर की कटौती के पक्ष में वैज्ञानिक सलाह का हवाला दिया।
मतभेद इस बात को लेकर है कि किसी खास निवेश से कितना संरक्षण मिलता है। उपयुक्त अध्ययन में झील की गहराई और जल-आयतन मापा जाएगा, प्राकृतिक अवरोध की जांच होगी और अलग-अलग मात्रा में पानी छोड़े जाने पर नीचे की घाटियों में उसके बहाव का मॉडल बनाया जाएगा। इसके बाद इंजीनियर पानी का स्तर घटाने, अवरोध को मजबूत करने और चेतावनी प्रणालियां बेहतर बनाने के विकल्पों की तुलना कर सकेंगे और देख सकेंगे कि हर विकल्प कितना नुकसान रोक सकता है।
पहली जलनिकासी परियोजनाओं से नेपाल ने क्या सीखा
इम्जा का उदाहरण दिखाता है कि महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करना क्यों कठिन हो सकता है। पराजुली ने कहा कि बुलडोजर और अन्य उपकरण हेलीकॉप्टर से वहां पहुंचाने पड़े। काम नेपाली सेना को सौंपने का फैसला होने से पहले निविदा के तीन प्रयास सफल नहीं हुए।
पराजुली ने ठेके देने की समस्या बताते हुए कहा:
अंतरराष्ट्रीय ठेकेदारों ने बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई।
उन्होंने कहा कि कुछ इच्छुक ठेकेदारों ने उपलब्ध बजट से अधिक कीमतें बताईं। परिवहन, काम के छोटे मौसम और ऊंचाई पर भारी उपकरण चलाने की कठिनाई, पानी का हर अतिरिक्त मीटर निकालने की लागत बढ़ाते हैं।
इसके बावजूद पराजुली ने पूरे किए गए काम के महत्व का समर्थन किया और कहा कि मामूली स्तर तक पानी घटाने से भी प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा कम होता है। कार्गेल ने भी कहा कि त्शो रोल्पा के निकास मार्ग को स्थिर करना और झील का जलस्तर तीन मीटर घटाना प्रभावी रहा।
खुदाई पूरी होने के बाद भी निकास मार्ग का प्रबंधन जरूरी रहता है। कार्गेल ने बताया कि जब झील में आने वाला पानी बढ़ता है या दबी हुई बर्फ पिघलने से निकास मार्ग नीचे खिसकता है, तब नियंत्रित बहाव मदद करता है। इम्जा में ऐसी नियमन व्यवस्था है। इन संरचनाओं का रखरखाव बदलती झील के प्रबंधन का हिस्सा है; काम को लक्ष्य जलस्तर हासिल होते ही समाप्त मानना ठीक नहीं।
चेतावनी प्रणालियों को नीचे के इलाकों के लोगों तक पहुंचना होगा
यूएनडीपी की आधिकारिक परियोजना के विवरण में इंजीनियरिंग के साथ शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और संस्थागत क्षमता मजबूत करने का काम भी शामिल है। अधिकारियों ने सेंसर, बाढ़ पूर्वानुमान, सामुदायिक तैयारी और नीचे की बस्तियों को बाढ़ सहने में सक्षम बनाने वाले उपायों का भी उल्लेख किया है।
सेंसर झील या नदी के किनारे होने वाले बदलावों का पता लगा सकते हैं। पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणालियां इन जानकारियों को अलर्ट में बदलती हैं। इसके बाद समुदायों को व्यावहारिक प्रतिक्रिया की जरूरत होती है, जिसमें चेतावनी पहुंचाने और लोगों को संभावित बाढ़ मार्गों से हटाने की व्यवस्था शामिल है।
पराजुली ने जोर दिया है कि झील का जलस्तर घटाने के बाद भी उसमें हिमस्खलन गिरना खतरनाक हो सकता है। हिमनदों और हिमनदीय झीलों के विशेषज्ञ तथा काठमांडू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिजन भक्त कायस्थ ने व्यापक बात कही:
झील का जलस्तर घटाने का अर्थ खतरा खत्म करना नहीं है।
कार्गेल ने नेपाल और भारत में संभावित बाढ़ मार्गों के पास सड़कें, जलविद्युत केंद्र और अन्य महंगे ढांचे बनाने के मामले में अधिक सावधानी बरतने की अपील की है। कम जोखिम वाली जगह चुनने से बार-बार होने वाली तबाही और पुनर्निर्माण को रोका जा सकता है, जबकि चेतावनियां उन लोगों की सुरक्षा में मदद करती हैं जो पहले से नीचे के इलाकों में रहते या काम करते हैं।
नेपाल में 2,000 से अधिक हिमनदीय झीलें हैं और अब तक केवल दो का जलस्तर घटाया गया है। कायस्थ ने कहा कि ज्यादातर झीलों का अध्ययन नहीं हुआ है। इसलिए निर्माण के लिए चुनी गई चार झीलें निगरानी और तैयारी की कहीं बड़ी चुनौती का केवल एक हिस्सा हैं।
खर्च कौन उठाएगा और लाभ किसे मिलेगा
परियोजना के लिए बताए गए वित्तपोषण में ग्रीन क्लाइमेट फंड से 36.16 मिलियन डॉलर का अनुदान और नेपाल सरकार व साझेदार संगठनों से 13.8 मिलियन डॉलर शामिल हैं। दोनों को मिलाकर कुल राशि 49.96 मिलियन डॉलर होती है, इसी वजह से कार्यक्रम को लगभग 50 मिलियन डॉलर का बताया जाता है।
ग्रीन क्लाइमेट फंड संयुक्त राष्ट्र जलवायु ढांचे के तहत काम करता है। उसका अनुदान बताई गई कुल राशि का लगभग 72 प्रतिशत है, जबकि बाकी धन सरकार और साझेदारों के योगदान से आएगा।
जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग ने पर्वतीय बाढ़ के जोखिम वाले इलाकों में रहने वाले लाभार्थियों की अनुमानित संख्या लगभग 2.3 मिलियन बताई है। परियोजना के पहले के विवरणों में यह अनुमान 3.8 मिलियन से अधिक था। विभाग का आंकड़ा अधिक हालिया नियोजन अनुमान है, जबकि दोनों आंकड़ों का अंतर बताता है कि लाभार्थियों की सटीक संख्या और दायरा अभी स्पष्ट नहीं है।
परियोजना के पहले के विवरण में संभावित आर्थिक नुकसान को 2.12 अरब रुपये तक कम करने का अनुमान भी दिया गया था। व्यावहारिक लाभों में घरों और खेतों को कम नुकसान, सुरक्षित परिवहन संपर्क और बिजली उत्पादन तथा स्थानीय आजीविका में कम व्यवधान शामिल होंगे।
हाल की तबाही से कार्यक्रम की तात्कालिकता बढ़ी
भोटेकोशी क्षेत्र में अगस्त की बाढ़ ने उन आपदाओं को लेकर चिंता फिर बढ़ा दी, जो ऊंचे पहाड़ों में शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ते हुए विनाशकारी रूप ले सकती हैं। आपदा के अक्टूबर 2026 के विवरण में बताया गया कि चीनी सीमा के पास हिमनद ढहने, भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ के बाद 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई और 5,000 से अधिक लापता थे।
अधिकारियों ने कहा कि बाढ़ से एक दर्जन जलविद्युत संयंत्रों के साथ सड़कें, पुल, खेत और बस्तियां क्षतिग्रस्त हुईं। उनका अनुमान था कि शुरुआती पुनर्बहाली के लिए करीब 5 अरब डॉलर की जरूरत होगी, जो चार झीलों वाली नियोजित परियोजना की लागत से लगभग 100 गुना है।
नेपाल में चार दशकों के दौरान हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ की लगभग 26 घटनाएं दर्ज की गई हैं। देश में हर तरह की चरम जलवायु घटनाओं से औसतन हर साल 300 से अधिक लोगों की मौत होती है। यह व्यापक आंकड़ा हिमनदीय झीलों के अलावा अन्य खतरों से होने वाली मौतों को भी शामिल करता है।
अगले ठोस कदम पर्यावरणीय आकलन, झीलों के विस्तृत अध्ययन और संशोधित इंजीनियरिंग डिजाइन हैं, जिन्हें जुलाई 2027 के मध्य में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के भीतर पूरा करने की योजना है। इन्हीं फैसलों से तय होगा कि कितना पानी निकाला जाए, निकास मार्ग कैसे बनाए जाएं और निर्माण को पहाड़ों के छोटे कार्य-मौसम में कैसे समेटा जाए। नीचे के समुदायों की सुरक्षा जलनिकासी के काम के साथ-साथ चेतावनी और तैयारी पर भी निर्भर करेगी।
मुख्य बातें
- नेपाल थुलागी, लोअर बरुन, लुमडिंग त्शो और होंगु 2 का जलस्तर घटाने की योजना बना रहा है। कार्यक्रम मार्च 2033 में पूरा होना है।
- लगभग 50 मिलियन डॉलर की इस परियोजना में नियंत्रित जलनिकासी, चेतावनी प्रणालियां और सामुदायिक तैयारी शामिल हैं।
- जलस्तर में अंतिम कटौती विस्तृत अध्ययन के बाद तय होगी; शुरुआती प्रस्ताव एक से तीन मीटर तक के थे।
- वैज्ञानिकों में इस बात पर मतभेद है कि लगभग तीन मीटर की कटौती पर्याप्त सुरक्षा देगी या नहीं।
- 2020 के क्षेत्रीय आकलन में 47 संभावित रूप से खतरनाक झीलों में से 42 कोशी नदी प्रणाली में पाई गईं, जो बिहार में बहती है।
- आगे होने वाले नुकसान को घटाने के लिए डिजाइन संबंधी अध्ययन, निकास मार्गों का सुरक्षित प्रबंधन और नीचे के इलाकों में चेतावनी व्यवस्था अहम हैं।






