सात खेपों ने ईयू के ईंधन प्रतिबंधों की पड़ताल तेज की
ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) के अनुसार, गुजरात स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी से छह खेपें सितंबर 2026 में यूरोपीय संघ (ईयू) के बंदरगाहों पर पहुंचीं। रूसी कच्चे तेल से बने ईंधन के आयात पर ईयू के प्रतिबंध के आठ महीने बाद ये खेपें पहुंचीं। सातवीं खेप तुर्किये की तुप्रास इज़मित रिफाइनरी से आई।
विषय-सूची
ल्यूक विकेंडेन और इसाक लेवी द्वारा लिखे गए सीआरईए के सितंबर के प्रतिबंध विश्लेषण में इन खेपों को करीब 1 अरब यूरो (1.2 अरब डॉलर) के व्यापक व्यापार का हिस्सा बताया गया है। रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले देशों को भारत, तुर्किये और ब्रुनेई की उन रिफाइनरियों ने इतने मूल्य के तेल उत्पाद निर्यात किए, जो रूसी कच्चे तेल का प्रसंस्करण करती हैं। यह आंकड़ा अगस्त से 43% अधिक था।
इन उत्पादों में से 66.7 करोड़ यूरो का हिस्सा ईयू को मिला। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया को 16.8 करोड़ यूरो, अमेरिका को 15.4 करोड़ यूरो और न्यूजीलैंड को 1.9 करोड़ यूरो के उत्पाद मिले। सीआरईए का अनुमान था कि इन उत्पादों में से 29.5 करोड़ यूरो के उत्पाद रूसी कच्चे तेल से बने थे। यह निर्यात के कुल, मोटे तौर पर 1 अरब यूरो के आंकड़े का करीब तीन-दसवां हिस्सा है।
कच्चा तेल वह मूल पदार्थ है जिसे रिफाइनरियां डीजल, पेट्रोल और अन्य ईंधनों में बदलती हैं। एक रिफाइनरी कई देशों से कच्चा तेल खरीद सकती है, इसलिए निर्यात किए गए ईंधन में इस्तेमाल तेल का स्रोत प्रतिबंध लागू करने के लिहाज से अहम है। सीआरईए ने रूसी कच्चे तेल का प्रसंस्करण करने वाले संयंत्रों से आई खेपों को जांच की प्राथमिकता बताया है। उसके विश्लेषण में सितंबर में पहुंची सात खेपों पर किसी कार्रवाई का फैसला नहीं दिया गया है।
महीने के दौरान भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद इससे उलट दिशा में गई: 13% घटकर अप्रैल के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गई। ईंधन निर्यात बढ़ने और कच्चे तेल का आयात घटने की ये घटनाएं साथ-साथ हुईं। इससे रिफाइनरियों के व्यापार के तौर-तरीकों और पश्चिमी बाजारों तक पहुंच के नियमों, दोनों पर ध्यान गया है।
ईंधन कहां पहुंचा?
ईयू के बंदरगाहों पर उतारी गई सात खेपों में से तीन इटली, दो रोमानिया और एक-एक स्पेन तथा साइप्रस गणराज्य पहुंचीं। छह खेपें जामनगर से भेजी गई थीं, जिससे सीआरईए की सितंबर की गिनती में यह भारतीय रिफाइनरी मुख्य प्रस्थान स्थल रही।
ईयू के बंदरगाहों के लिए नियत बताए गए निर्यात का मूल्य अगस्त के मुकाबले 80% बढ़ा। इस आंकड़े में जामनगर से भेजी गई 1,04,000 टन गैसऑयल, यानी डीजल, की एक खेप भी शामिल थी, जो सितंबर के अंत में अभी रॉटरडैम की ओर जा रही थी। इसलिए ईयू का आंकड़ा ऐसे व्यापार प्रवाह को दर्शाता है जिसमें समुद्र में मौजूद खेप भी शामिल है, जबकि सात खेपों का आंकड़ा खास तौर पर महीने के दौरान पहुंची खेपों से जुड़ा है।
सीआरईए के अनुसार, जामनगर ने अमेरिका को भी 12.2 करोड़ यूरो के उत्पाद भेजे। तुर्किये की एसटीएआर रिफाइनरी ने 3.3 करोड़ यूरो के उत्पाद भेजे। जामनगर की खेपों का मूल्य अमेरिका के कुल 15.4 करोड़ यूरो के मोटे आंकड़े का करीब चार-पांचवां हिस्सा था।
विश्लेषण में शामिल रिफाइनरियों से अमेरिका की खरीद अगस्त के मुकाबले 16% घटी, जबकि ऑस्ट्रेलिया जाने वाला निर्यात 12% बढ़ा। इस तरह प्रतिबंध लगाने वाले बाजारों में कुल 43% की बढ़ोतरी के पीछे अलग-अलग खरीदारों के रुझान थे। यूरोप के लिए नियत खेपों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई।
ईयू प्रतिबंध का दायरा
सीआरईए के अनुसार, रूसी कच्चे तेल से बने तेल उत्पादों के आयात पर ईयू का प्रतिबंध 21 जनवरी 2026 से लागू हुआ। यह उस व्यापार मार्ग पर लागू होता है जिसमें रूसी तेल को रूस से बाहर रिफाइन करके तैयार ईंधन ईयू में बेचा जाता है।
यूरोपीय आयोग के रिफाइंड उत्पादों पर प्रतिबंध संबंधी दिशानिर्देश में कानूनी प्रावधान को परिषद विनियम 833/2014 के अनुच्छेद 3ma के रूप में चिह्नित किया गया है। इसमें रूसी कच्चे तेल से बने वे पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं जो सीमा शुल्क कोड CN 2710 के अंतर्गत आते हैं; रूसी कच्चा तेल CN 2709 00 के अंतर्गत आता है। आयातकों से अपेक्षा है कि वे सीमा शुल्क अधिकारियों को ऐसा प्रमाण दें जिसमें उस देश की पहचान हो जहां ईंधन बनाने में इस्तेमाल कच्चा तेल निकाला गया था। परिशिष्ट LI में सूचीबद्ध साझेदार देशों से होने वाले आयात इसके अपवाद हैं। दिशानिर्देशों में भारत, तुर्किये और चीन से आने वाली खेपों पर अधिक जांच-पड़ताल की बात कही गई है, क्योंकि इन देशों ने रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है।
रूसी और अन्य कच्चे तेल, दोनों का प्रसंस्करण करने वाली रिफाइनरियों के लिए दिशानिर्देश ईयू में ऐसे गैर-रूसी उत्पादों के आयात की अनुमति देते हैं जो अलग से प्रसंस्कृत और प्रलेखित उत्पादन लाइन से आए हों। सहायक जांच में घरेलू या गैर-ईयू बाजारों के लिए उत्पादन करने वाली लाइन की क्षमता के मुकाबले रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति की लगातार 60 दिनों की तुलना शामिल है। इसके साथ यह स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण भी होना चाहिए कि उत्पादन लाइनें और उनकी लॉजिस्टिक्स अलग-अलग रखी गई हैं। केवल मात्रा पर आधारित यह जांच गैर-रूसी स्रोत साबित नहीं करती। यदि कच्चे तेल को अलग से प्रसंस्कृत नहीं किया जा सकता, तो खेप के बिल ऑफ लैडिंग से पहले के 60 दिनों में उत्पादन लाइन को रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति या उसका प्रसंस्करण न होने का प्रमाण आयात के समर्थन में दिया जा सकता है। अलगाव या अलग प्रसंस्करण का उचित आश्वासन न होने पर आयात की अनुमति नहीं है। यह दावा स्वीकार नहीं किया जाता कि रूसी कच्चा तेल घरेलू खपत के लिए और अन्य कच्चा तेल निर्यात के लिए इस्तेमाल होता है, यदि यह दावा केवल कुल हिसाब-किताब पर आधारित हो।
जुलाई से सितंबर के बीच जामनगर के कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 32% थी। सीआरईए ने ईयू सदस्य देशों के अधिकारियों से रूसी कच्चे तेल का प्रसंस्करण करने वाली रिफाइनरियों से भेजे गए ईंधन की खेपों की जांच करने को कहा है। इसमें उन बंदरगाहों से रवाना हुई खेपें भी शामिल हैं जिनका इन संयंत्रों से संबंध है।
इस प्रतिबंध के तहत शुद्ध कच्चा तेल निर्यातक देशों, यानी ऐसे देशों को जो आयात से अधिक कच्चा तेल निर्यात करते हैं, वहां से आए उत्पादों के बारे में यह धारणा बनाई जाती है कि वे रूसी कच्चे तेल के बजाय घरेलू तेल से बने हैं। सीआरईए का तर्क है कि इससे एक खामी पैदा होती है: कोई देश विदेश में अपनी खरीद से अधिक कच्चा तेल बेच सकता है, फिर भी उसकी कुछ रिफाइनरियां रूसी तेल आयात कर सकती हैं। किसी देश का कुल व्यापार संतुलन और किसी एक रिफाइनरी की खरीद आपूर्ति शृंखला के अलग-अलग पहलुओं को बताते हैं।
आयोग के दिशानिर्देशों के तहत, इस धारणा का सहारा लेने वाले आयातकों को इस्तेमाल किए गए कच्चे तेल का स्रोत नहीं, बल्कि तैयार उत्पाद का स्रोत साबित करना होता है। यदि रूसी कच्चे तेल के इस्तेमाल का संदेह करने के उचित आधार हों और उनके समर्थन में ठोस प्रमाण हों, तो अधिकारी इस धारणा को खारिज कर सकते हैं और कच्चे तेल के बारे में सबूत मांग सकते हैं। ऐसे आधारों में किसी देश या रिफाइनरी को रूसी कच्चे तेल की बड़ी या असंगत मात्रा में आपूर्ति, या ऐसे संकेत शामिल हो सकते हैं कि किसी शुद्ध निर्यातक देश का इस्तेमाल कहीं और बने उत्पादों पर झूठा स्रोत बताने के केंद्र के रूप में हो रहा है।
सीआरईए ने पिछले छह महीनों में रूसी कच्चे तेल का प्रसंस्करण करने वाली किसी भी रिफाइनरी के उत्पादों पर रोक लगाने की सिफारिश की है, चाहे तैयार ईंधन का घोषित स्रोत कुछ भी हो। यह शोध और पैरवी करने वाले समूह का प्रस्ताव है, मौजूदा ईयू नीति नहीं। इससे जांच का आधार रिफाइनरी की हालिया कच्चे तेल खरीद पर आ जाएगा और बाजार में प्रवेश चाहने वाले निर्यातकों को उस इतिहास का हिसाब देना होगा।
उत्तरी साइप्रस को अलग क्यों गिना गया
सितंबर में उत्तरी साइप्रस के कालेजिक बंदरगाह पर तीन और खेपें उतारी गईं। सीआरईए ने इन्हें ईयू के ईंधन प्रतिबंध के तहत गिनी गई सात खेपों में शामिल नहीं किया, क्योंकि द्वीप के उत्तरी हिस्से में ईयू कानून का लागू होना निलंबित है।
रिपोर्ट में 2003 के परिग्रहण अधिनियम के प्रोटोकॉल नंबर 10 के अनुच्छेद 1(1) का हवाला दिया गया है। यह प्रावधान उन इलाकों से संबंधित है जहां साइप्रस गणराज्य की सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है। इसलिए साइप्रस गणराज्य के लिए गिनी गई खेप और कालेजिक पहुंची तीन खेपें अलग-अलग कानूनी श्रेणियों में आती हैं।
सीआरईए यह भी कहता है कि कानून का निलंबन कालेजिक से जुड़े लेन-देन में भाग लेने वाले ईयू नागरिकों या कंपनियों को ईयू प्रतिबंधों से पूरी छूट नहीं देता। इन खेपों का कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए गंतव्य के साथ-साथ लेन-देन में शामिल लोगों और कंपनियों पर लागू दायित्व भी प्रासंगिक हैं।
भारत ने कम खरीदा रूसी कच्चा तेल
रूसी कच्चे तेल के आयात में भारत की 13% गिरावट लगातार दूसरी मासिक कमी थी। भारत की तीन सबसे बड़ी आयातक रिफाइनरियों ने अपनी खरीद घटाई, लेकिन अलग-अलग दरों से: जामनगर की खरीद 27% घटी, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन की पारादीप रिफाइनरी में 21% की गिरावट दर्ज हुई और नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी में 8% की कमी आई।
वाडिनार में कम गिरावट के चलते भारत के बड़े खरीदारों की रैंकिंग बदल गई। इस व्यापार पर नजर रखने वाले संगठन सीआरईए ने अपने मासिक विश्लेषण में कहा:
गिरावट के बावजूद, वाडिनार भारत में रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक बनकर जामनगर से आगे निकल गया।
कई छोटी रिफाइनरियों को भी रूसी कच्चे तेल की कम आपूर्ति मिली। एचएमईएल मुंद्रा ऑयल टर्मिनल में इसकी आवक 74% घटी, जबकि कोच्चि रिफाइनरी में अगस्त की तुलना में 32% की कमी दर्ज हुई।
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के मुंद्रा ऑयल टर्मिनल का रुझान उलट रहा: अगस्त में कोई आपूर्ति नहीं मिली थी, जबकि सितंबर में वहां 5,70,000 टन तेल पहुंचा। इस टर्मिनल पर बढ़ोतरी सीआरईए द्वारा पहचाने गए अधिकांश अन्य संयंत्रों में गिरावट के साथ हुई। यह यह भी दिखाता है कि राष्ट्रीय कुल आंकड़ा घटने के बावजूद अलग-अलग केंद्रों के आंकड़ों में तेज बदलाव हो सकता है।
रूस के कच्चे तेल व्यापार पर भारत और चीन का दबदबा
सितंबर में भारत रूस का दूसरा सबसे बड़ा जीवाश्म ईंधन खरीदार बना रहा और उसने रूसी हाइड्रोकार्बन पर 4.1 अरब यूरो खर्च किए। इसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी 88% थी, जिसका मूल्य 3.6 अरब यूरो था। कोयले पर 30.9 करोड़ यूरो और तेल उत्पादों पर 16.1 करोड़ यूरो खर्च हुए।
चीन ही उससे बड़ा खरीदार था। उसने महीने के दौरान 9.1 अरब यूरो के रूसी जीवाश्म ईंधन खरीदे, जिनमें 6 अरब यूरो का कच्चा तेल शामिल था। उसकी कुल खरीद भारत के 4.1 अरब यूरो से दोगुने से अधिक थी।
लंबे समय के व्यापार के आंकड़े बताते हैं कि रूस की कच्चे तेल की बिक्री कितनी केंद्रित हो गई है। सीआरईए के अनुसार, 5 दिसंबर 2022 से सितंबर 2026 तक चीन ने रूस के कच्चे तेल निर्यात का 50% और भारत ने 37% खरीदा। दोनों ने मिलकर 87% हिस्सा खरीदा, जबकि बाकी सभी खरीदारों की हिस्सेदारी 13% रही।
2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के आक्रमण से पहले भारत अपेक्षाकृत छोटा खरीदार था। पश्चिमी ग्राहकों के हटने और रूस की ओर से भारी छूट दिए जाने के बाद भारत की खरीद बढ़ी। सितंबर के आंकड़े दिखाते हैं कि मासिक खरीद घटने के बावजूद रूस के निर्यात बाजार में भारत की अहम भूमिका बनी रही।
खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा के बावजूद छूट बरकरार
सितंबर में रूस के यूराल्स कच्चे तेल का औसत मूल्य 90.70 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट से 23 डॉलर कम था। यह छूट अगस्त जितनी ही थी। इन आंकड़ों के आधार पर ब्रेंट का अनुमानित मूल्य करीब 113.70 डॉलर था, यानी यूराल्स लगभग 20% सस्ता था।
रिफाइनरी के लिए सस्ता कच्चा तेल ईंधन उत्पादन की लागत घटा सकता है। अंतिम व्यावसायिक नतीजा परिवहन और प्रसंस्करण खर्चों तथा तैयार उत्पादों के खरीदारों द्वारा चुकाई गई कीमत पर भी निर्भर करता है। सितंबर में छूट बरकरार रहने से यह समझने में मदद मिलती है कि अतिरिक्त प्रतिबंधों की जांच-पड़ताल के बावजूद रूसी आपूर्ति आकर्षक क्यों बनी हुई है।
केप्लर के विश्लेषकों ने भारत के कम आयात की वजह आंशिक रूप से सीमित आपूर्ति और चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा को बताया। उन्होंने अमेरिकी दबाव का भी उल्लेख किया। उनका आकलन व्यापार को प्रभावित करने वाली राजनीतिक ताकतों के साथ-साथ खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा और व्यावसायिक उपलब्धता को भी सामने रखता है।
केप्लर को उम्मीद थी कि अक्टूबर में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 18 लाख से 19 लाख बैरल प्रतिदिन के बीच रहेगा। यह अनुमान सितंबर की गिरावट के बाद भी खरीद काफी ऊंचे स्तर पर जारी रहने का संकेत था।
सीआरईए ने यह भी बताया कि यूराल्स का औसत मूल्य 44.10 डॉलर प्रति बैरल की ईयू और ब्रिटेन की मूल्य सीमा के दोगुने से अधिक था। यह मूल्य सीमा रूसी तेल के लिए निर्धारित समुद्री सेवाओं के इस्तेमाल को नियंत्रित करती है, जबकि ईयू का ईंधन आयात प्रतिबंध तय करता है कि कौन से उत्पाद उसके बाजार में प्रवेश कर सकते हैं। दोनों रूस के तेल व्यापार को सीमित करने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन आपूर्ति की अलग-अलग अवस्थाओं पर लागू होते हैं।
मात्रा घटने पर भी रूस की कमाई बड़ी
सितंबर में रूस के कुल जीवाश्म ईंधन निर्यात से रोजाना औसतन 62.5 करोड़ यूरो की कमाई हुई। निर्यात की मात्रा 6% घटने के बावजूद यह आंकड़ा अगस्त से लगभग अपरिवर्तित रहा। कच्चे तेल के निर्यात से आय 8% घटकर रोजाना 33.9 करोड़ यूरो रही, जबकि कच्चे तेल की मात्रा 11% कम हुई।
ऊर्जा की अन्य बिक्री ने कुल आय को सहारा दिया। तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) से राजस्व 68% बढ़कर रोजाना 7.5 करोड़ यूरो पहुंच गया, जो जनवरी 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था। एलएनजी प्राकृतिक गैस को ठंडा करके तरल रूप में बदली गई गैस है, ताकि जहाज इसे लंबी दूरी तक ले जा सकें।
सितंबर में ईयू रूस का तीसरा सबसे बड़ा जीवाश्म ईंधन खरीदार भी बन गया और उसने रूस से सीधे 1.7 अरब यूरो की खरीद की। पाइपलाइन गैस का मूल्य 81.7 करोड़ यूरो, एलएनजी का 61.5 करोड़ यूरो और ड्रुज़बा पाइपलाइन के जरिए स्लोवाकिया तथा हंगरी पहुंचाए गए कच्चे तेल का 29 करोड़ यूरो था। यह व्यापार प्रवाह भारत, तुर्किये और ब्रुनेई की रिफाइनरियों से मिले 66.7 करोड़ यूरो के रिफाइंड उत्पादों से अलग है।
तारीखें भारत की भूमिका और ईयू के प्रतिबंधों के विकास का क्रम दिखाती हैं:
- 2022: यूक्रेन पर आक्रमण और पश्चिमी खरीदारों के हटने के बाद भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ी।
- 5 दिसंबर 2022: सीआरईए के संचयी आंकड़ों की अवधि शुरू हुई, जिनके अनुसार चीन और भारत ने रूस के कच्चे तेल निर्यात का 87% खरीदा।
- 21 जनवरी 2026: रूसी कच्चे तेल से बने तेल उत्पादों पर ईयू का प्रतिबंध लागू हुआ।
- जुलाई से सितंबर 2026: जामनगर के कच्चे तेल आयात में रूसी आपूर्ति की हिस्सेदारी 32% रही।
- सितंबर 2026: रूसी कच्चे तेल का प्रसंस्करण करने वाली रिफाइनरियों से सात खेपें ईयू बंदरगाहों पर उतारी गईं, जबकि भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 13% घटा।
- अक्टूबर 2026: केप्लर को उम्मीद थी कि भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 18 लाख से 19 लाख बैरल प्रतिदिन के बीच रहेगा।
ईयू की प्रवर्तन एजेंसियों के लिए सीआरईए की तात्कालिक सिफारिश है कि वे खेपों और उनकी रिफाइनरियों से कड़ियों की जांच करें। भारतीय रिफाइनरियों के लिए ये आंकड़े एक जारी व्यावसायिक संतुलन दिखाते हैं: रूसी कच्चे तेल पर छूट बनी हुई है, आपूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा तेज है, और बड़े ईंधन बाजारों तक पहुंच तेजी से उन नियमों पर निर्भर हो रही है जो इन उत्पादों को बनाने में इस्तेमाल तेल पर लागू होते हैं।
मुख्य बिंदु
- रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली भारत, तुर्किये और ब्रुनेई की रिफाइनरियों ने सितंबर में प्रतिबंध लगाने वाले देशों को करीब 1 अरब यूरो का ईंधन निर्यात किया, जो अगस्त से 43% अधिक था।
- ईयू को 66.7 करोड़ यूरो के उत्पाद मिले। ईयू के बंदरगाहों पर उतारी गई सात में से छह खेपें जामनगर से आई थीं।
- सीआरईए का अनुमान था कि कुल निर्यात में से 29.5 करोड़ यूरो के उत्पाद रूसी कच्चे तेल से बने थे।
- परिषद विनियम 833/2014 के अनुच्छेद 3ma के तहत ईयू का ईंधन प्रतिबंध 21 जनवरी 2026 से लागू हुआ। शुद्ध कच्चा तेल निर्यातक देशों से आए उत्पादों को घरेलू कच्चे तेल के इस्तेमाल की ऐसी धारणा का लाभ मिलता है जिसे खारिज किया जा सकता है; यह पूरी छूट नहीं है। रिफाइनरी के पिछले छह महीनों के कच्चे तेल के इस्तेमाल पर आधारित सीआरईए का प्रस्ताव मौजूदा नीति नहीं है।
- भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 13% घटा, लेकिन रूस से 4.1 अरब यूरो की जीवाश्म ईंधन खरीद के साथ वह रूस का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा।
- यूराल्स कच्चा तेल ब्रेंट से 23 डॉलर प्रति बैरल सस्ता रहा, जबकि केप्लर को अक्टूबर में भारत की बड़ी खरीद जारी रहने की उम्मीद थी।






