ढाका सबसे शुष्क अवधि में सुरक्षा चाहता है
बांग्लादेश चाहता है कि 12 दिसंबर, 2026 को मौजूदा समझौता समाप्त होने से पहले भारत के साथ गंगा जल संधि नई हो या संशोधित की जाए। इसमें ऐसी सुरक्षा होनी चाहिए कि नदी का प्रवाह घटने पर उसके हिस्से में भारी कटौती न हो। उसकी मुख्य मांग 1977 के समझौते के उस प्रावधान को बहाल करना है, जिसके तहत असाधारण रूप से कम प्रवाह के दौरान बांग्लादेश को उसके निर्धारित हिस्से का कम से कम 80% मिलता था।
विषय-सूची
- ढाका सबसे शुष्क अवधि में सुरक्षा चाहता है
- पानी की गारंटी के दो अलग रूप
- मौजूदा आवंटन सूत्र कैसे काम करता है
- दो दशकों के माप से क्या पता चलता है
- समयसीमा तक पहुंचाने वाले समझौते
- बातचीत जारी, लेकिन शर्तें तय नहीं
- बिहार ने अपनी जल जरूरतों की मांग उठाई
- नेपाल का प्रस्ताव नदी के स्वास्थ्य पर ध्यान दिलाता है
- अन्य साझा नदियां अब भी समझौते के दायरे से बाहर
- मुख्य बिंदु
बातचीत पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज से 1 जनवरी से 31 मई तक के शुष्क मौसम में छोड़े जाने वाले पानी को लेकर है। मौजूदा संधि पर 12 दिसंबर, 1996 को भारतीय प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे। यह 30 साल के लिए है। बांग्लादेश और भारत 54 नदियां साझा करते हैं, लेकिन द्विपक्षीय जल-बंटवारा समझौते के दायरे में केवल गंगा आती है।
जल संसाधन मंत्री शहीदुद्दीन चौधरी आनी ने कहा है कि ढाका केवल संधि को बढ़ाने के बजाय उसमें ठोस बदलाव चाहता है। अक्टूबर में जल प्रशासन पर एक सेमिनार के बाद उन्होंने पहले की सुरक्षा व्यवस्था को सरकार की बातचीत की मुख्य प्राथमिकता बताया।
"हमारी मुख्य प्राथमिकता 1977 के समझौते में शामिल गारंटी प्रावधान को बहाल करना होगी," उन्होंने कहा।
इस संधि का महत्व उसके शब्दों तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश में हुए अध्ययनों का अनुमान है कि देश के 17 करोड़ लोगों में से लगभग एक तिहाई आजीविका, जैव विविधता और जलापूर्ति के लिए नदी तंत्र पर निर्भर हैं। इन अध्ययनों में दिए गए जनसंख्या आंकड़े के आधार पर यह संख्या करीब 5.7 करोड़ बैठती है।
वार्ताकारों को भारत के भीतर परस्पर विरोधी मांगों, नेपाल को शामिल करने के प्रस्तावों और इस बात के प्रमाणों से भी जूझना होगा कि मौजूदा आवंटन सूत्र उन महीनों में तेज उतार-चढ़ाव ला सकता है, जब पानी की सबसे अधिक जरूरत होती है।
पानी की गारंटी के दो अलग रूप
गारंटी प्रावधान की व्याख्या सावधानी से करना जरूरी है, क्योंकि 1996 की संधि में पहले से ही बारी-बारी से मिलने वाले न्यूनतम आवंटन का प्रावधान है। यह उस सुरक्षा से अलग है, जिसे बांग्लादेश अब बहाल कराना चाहता है।
1977 के समझौते के तहत, फरक्का का प्रवाह असाधारण रूप से कम होने पर बांग्लादेश को उसके निर्धारित आवंटन का कम से कम 80% देने की गारंटी थी। यह सुरक्षा बांग्लादेश के निर्धारित हिस्से से जुड़ी थी, न कि दोनों देशों को बारी-बारी से दिए जाने वाले पानी की किसी तय मात्रा से। वह समझौता पांच साल तक चला और 1982 में समाप्त हो गया।
इसके विपरीत, 1996 की संधि में 11 मार्च से 10 मई के बीच बारी-बारी से चलने वाली अवधियों में प्रत्येक देश को 35,000 क्यूसेक पानी देने की गारंटी है। एक क्यूसेक का अर्थ है प्रति सेकंड एक घन फुट बहता पानी। 35,000 क्यूसेक लगभग 991 घन मीटर प्रति सेकंड के बराबर है।
यह अंतर बताता है कि अधिकारी मौजूदा संधि को गारंटी-विहीन क्यों कह सकते हैं, जबकि एक अकादमिक आकलन उसमें गारंटीकृत आवंटन का उल्लेख करता है। जो सुरक्षा इसमें नहीं है, वह पानी की कमी के दौरान लागू होने वाला व्यापक 80% प्रावधान है, न कि बारी-बारी से मिलने वाले 35,000 क्यूसेक का प्रावधान।
एक अधिकारी ने 1977 के समझौते के अनुच्छेद III में मौजूद एक और सुरक्षा का जिक्र किया: बांग्लादेश के लिए फरक्का से छोड़े गए पानी की बीच के रास्ते में मात्रा कम नहीं की जानी चाहिए। अपवाद के तौर पर, भारत के उचित उपयोग के लिए अधिकतम 200 क्यूसेक की छूट थी, उस हिस्से से पहले जहां गंगा के दोनों किनारे बांग्लादेश के भीतर आते हैं। यह एक अलग मुद्दे से जुड़ा है: ऊपर की ओर छोड़े गए पानी और निचले प्रवाह वाले देश तक पहुंचने वाले पानी के बीच का अंतर।
अकादमिक आकलन में 1996 की संधि के एक प्रावधान की भी पहचान की गई है। इसके तहत, यदि जरूरी समायोजन पर सहमति नहीं बनती है, तो समीक्षा प्रक्रिया के दौरान बांग्लादेश को निर्धारित प्रवाह का कम से कम 90% मिल सकता है। समीक्षा से जुड़ी इस सशर्त व्यवस्था को असाधारण रूप से कम प्रवाह के लिए पहले की गारंटी से अलग समझना चाहिए।
मौजूदा आवंटन सूत्र कैसे काम करता है
1996 की संधि शुष्क मौसम को 15 आवंटन अवधियों में बांटती है, जिन्हें आम तौर पर 10-10 दिन के चक्र के रूप में बताया जाता है। इसका सूत्र फरक्का पर उपलब्ध प्रवाह का बंटवारा करता है, जबकि एक सांकेतिक समय-सारणी ऐतिहासिक नदी माप के आधार पर संदर्भ देती है।
जब प्रवाह 70,000 क्यूसेक से कम होता है, तो मूल सूत्र के तहत दोनों देशों को बराबर हिस्सा मिलता है। 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक और बाकी पानी भारत को मिलता है। 11 मार्च से 10 मई के दौरान बारी-बारी से मिलने वाले 35,000 क्यूसेक की गारंटी एक अतिरिक्त शर्त है, जो इन आवंटनों को प्रभावित करती है।
अनुच्छेद II के तहत, अगर किसी आवंटन अवधि में फरक्का का प्रवाह 50,000 क्यूसेक से नीचे गिरता है, तो तत्काल परामर्श करना जरूरी है। इसके बाद दोनों सरकारों को समानता, निष्पक्षता और किसी भी पक्ष को नुकसान से बचाने के आधार पर आपातकालीन समायोजन की कोशिश करनी होती है। हालांकि, परामर्श अपने आप में बांग्लादेश की मांग वाली 80% की न्यूनतम सीमा तय नहीं करता।
गणना से मुश्किल साफ होती है। कुल प्रवाह 50,000 क्यूसेक होने पर एक देश को 35,000 क्यूसेक देने के बाद, किसी भी बातचीत से तय समायोजन से पहले दूसरे देश के लिए केवल 15,000 क्यूसेक बचते हैं। यह कमी के दौरान सूत्र पर पड़ने वाले दबाव का उदाहरण है, किसी खास दर्ज आवंटन का दावा नहीं।
दो दशकों के माप से क्या पता चलता है
वाटर पॉलिसी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन, गंगा जल-बंटवारे की समीक्षा, में 1997 से 2016 तक के मापों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि महत्वपूर्ण शुष्क अवधियों के दौरान 65% दर्ज मापों में बांग्लादेश को उसका गारंटीकृत हिस्सा नहीं मिला। यह निष्कर्ष अध्ययन द्वारा तय की गई अवधियों और ऐतिहासिक आंकड़ों से संबंधित है; इसे साल भर के हर आवंटन या 2026 की स्थिति पर लागू नहीं किया जा सकता।
विश्लेषण में फरक्का और बांग्लादेश के हार्डिंग ब्रिज पर नदी माप, बांग्लादेश के जल संसाधन योजना संगठन और संयुक्त नदी आयोग के जल-बंटवारा रिकॉर्ड तथा नदी बेसिन के भीतर भारत के 14 मौसम विज्ञान उपखंडों के वर्षा आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
अध्ययन में सांकेतिक आवंटनों से काफी अंतर दर्ज किया गया। 2010 में 21 से 31 मार्च के दौरान बांग्लादेश को सांकेतिक 841 के मुकाबले 474 घन मीटर प्रति सेकंड पानी मिला, यानी करीब 44% की कमी। 2016 में इसी अवधि में उसे 442 घन मीटर प्रति सेकंड मिला, जो उस मानक से लगभग 47% कम था।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि संधि के बाद पानी की औसत उपलब्धता मोटे तौर पर उसकी सांकेतिक समय-सारणी से मेल खाती थी, लेकिन अलग-अलग शुष्क वर्षों में प्रवाह बार-बार बहुत कम रहा। कई वर्षों का औसत स्थिति का वर्णन कर सकता है, लेकिन उन खास हफ्तों की कमी छिपा सकता है जब किसानों और अन्य उपयोगकर्ताओं को पानी की जरूरत होती है।
अध्ययन की सिफारिश ढाका की मौजूदा राजनीतिक मांग से अलग है। उसका तर्क है कि 991 घन मीटर प्रति सेकंड का बारी-बारी से मिलने वाला तय आवंटन दोनों देशों के हिस्से में तेज बढ़ोतरी और गिरावट लाता है, इसलिए इस शर्त को हटाया जाना चाहिए। बांग्लादेश के मंत्री पहले की आनुपातिक सुरक्षा बहाल करना चाहते हैं। ये अलग-अलग कमजोरियों को दूर करने के दो अलग प्रस्ताव हैं, न कि किसी एक उपाय पर बनी सहमति।
शोधकर्ता भविष्य में भरोसेमंद उपलब्धता का अनुमान लगाने के लिए बेहतर माप और मॉडल तैयार करने की सिफारिश करते हैं। उनके निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि उपलब्ध पानी के अनुमानों को संशोधित किए बिना केवल गारंटी बदलने से बार-बार होने वाली कमी का समाधान नहीं होगा।
समयसीमा तक पहुंचाने वाले समझौते
मौजूदा बातचीत दशकों की अस्थायी व्यवस्थाओं, समझौते के दायरे से बाहर रहे समयखंडों और फरक्का के प्रभावों को संभालने की कोशिशों के बाद हो रही है। पानी को हुगली की ओर मोड़ने, गाद हटाने और कोलकाता बंदरगाह में नौवहन बनाए रखने के लिए बैराज 1975 में चालू हुआ था।
जल-बंटवारे की बातचीत के मुख्य पड़ाव ये रहे:
- 1975: बांग्लादेश और भारत ने 41 दिनों तक चलने वाले अस्थायी आवंटन समझौते पर सहमति जताई।
- 1976: बांग्लादेश ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फरक्का का मुद्दा उठाया।
- नवंबर 1977: दोनों देशों ने 80% सुरक्षा प्रावधान वाला पांच साल का समझौता किया।
- 1982: 1977 का समझौता समाप्त हुआ। इसके बाद हुए समझौता ज्ञापनों में वह सुरक्षा शामिल नहीं थी।
- 1989 से 1996: अकादमिक समीक्षा के अनुसार, इस अवधि में कोई परिचालन जल-बंटवारा तंत्र नहीं था।
- 12 दिसंबर, 1996: दोनों सरकारों ने मौजूदा 30 साल की संधि पर हस्ताक्षर किए।
- 12 दिसंबर, 2026: मौजूदा संधि समाप्त होने वाली है।
बीच की अवधि के समझौता ज्ञापनों की तारीखों को लेकर रिपोर्टों में अंतर है। एक कानूनी विवरण में 1982 और 1985 के समझौतों का उल्लेख है, जबकि अकादमिक समीक्षा 1983 से 1988 के बीच की व्यवस्थाओं का वर्णन करती है। दोनों आज की बातचीत के लिए प्रासंगिक मूल बिंदु पर सहमत हैं: 1977 की न्यूनतम सुरक्षा हटा दी गई थी।
पानी की उपलब्धता का अनुमान लगाने के लिए भी समझौतों में अलग-अलग तरीके अपनाए गए। 1977 की समय-सारणी 1948 से 1973 के बीच दर्ज प्रवाह और अपेक्षाकृत भरोसेमंद जलापूर्ति को दर्शाने के उद्देश्य से तय उपलब्धता मानक पर आधारित थी। 1996 की सांकेतिक समय-सारणी में 1949 से 1988 तक के औसत प्रवाह का इस्तेमाल किया गया, जिसमें फरक्का के चालू होने से पहले और बाद के वर्ष शामिल थे।
यह अंतर इसलिए मायने रखता है, क्योंकि औसत स्थितियों पर आधारित समय-सारणी किसी खास सूखे वर्ष में दोनों में से किसी भी देश की सुरक्षा जरूरी नहीं बनाती। अकादमिक समीक्षा में प्रवाह के अनुमानों और आवंटन नियमों को बार-बार होने वाली कमी के कारणों में शामिल किया गया है।
बातचीत जारी, लेकिन शर्तें तय नहीं
विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि बांग्लादेश की वार्ता समिति तैयार है और भारत के अंतिम जवाब का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा कि संधि को नवीनीकृत करने या उसकी जगह नया समझौता करने का फैसला राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखकर होगा।
"हमारी समिति तैयार है। हम बस अपने भारतीय समकक्षों के अंतिम जवाब का इंतजार कर रहे हैं। इसलिए हां, हमें उम्मीद है," उन्होंने कहा।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि गंगा संधि और साझा नदियों से जुड़े अन्य मुद्दों पर संयुक्त नदी आयोग के जरिए चर्चा होगी। संधि पर तकनीकी बैठकें जारी हैं। आनी ने भी 12 दिसंबर से पहले समझौता पूरा होने की उम्मीद जताई है।
मौजूदा संधि का अनुच्छेद VII विवाद निपटाने की चरणबद्ध प्रक्रिया तय करता है: मतभेद पहले संयुक्त समिति के पास जाते हैं, फिर संयुक्त नदी आयोग के पास और अंत में तत्काल चर्चा के लिए दोनों सरकारों के पास। इसमें मध्यस्थता की व्यवस्था नहीं है। एक कानूनी विश्लेषण में न्यूनतम सुरक्षा और मध्यस्थता, दोनों की मांग के लिए अनुच्छेद X की समीक्षा प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश की गई है, लेकिन किसी भी बदलाव को बातचीत के सहमत नतीजे के रूप में घोषित नहीं किया गया है।
बांग्लादेश सेंटर फॉर इंडो-पैसिफिक अफेयर्स के कार्यकारी निदेशक प्रो. शहाब एनाम खान संधि में संशोधन और आयोग को फिर सक्रिय करने के पक्ष में हैं। वह आंकड़ों के पारदर्शी और जवाबदेह बंटवारे तथा कूटनीति के साथ इंजीनियरिंग, विज्ञान और अर्थशास्त्र से निर्देशित बातचीत की भी मांग करते हैं।
खबरों के अनुसार, अगर समझौता हो जाता है तो बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संधि पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। यात्रा या हस्ताक्षर की कोई तारीख तय होने की पुष्टि नहीं हुई है। तय समयसीमा 12 दिसंबर ही है।
बिहार ने अपनी जल जरूरतों की मांग उठाई
भारत में जनता दल (यूनाइटेड) ने किसी भी नवीनीकरण से पहले बिहार की भविष्य की जल जरूरतों की सुरक्षा की मांग की है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा का कहना है कि राज्य को 2050 तक उद्योग, पेयजल आपूर्ति और सिंचाई के लिए गंगा के पानी की जरूरत है।
झा ने कहा कि जनवरी से मई के बीच बांग्लादेश को लगभग 1,500 घन मीटर प्रति सेकंड, यानी 53,000 क्यूसेक पानी मिलता है। इसमें करीब 1,100 घन मीटर प्रति सेकंड योगदान बिहार का है। उनके आंकड़ों के अनुसार, बिहार का योगदान इस प्रवाह का लगभग 73% होगा।
ये आंकड़े झा का आकलन हैं, संधि में तय कोई निश्चित आवंटन नहीं। इन्हें बारी-बारी से मिलने वाले 35,000 क्यूसेक के न्यूनतम हिस्से या अलग-अलग शुष्क अवधियों के लिए अकादमिक अध्ययन में दर्ज मापों के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। ये अलग-अलग मात्रा और समयावधियों से संबंधित हैं।
जेडीयू का ‘नीतीश संवाद’ अभियान गंगा के किनारे बसे 12 जिलों में चलाने की योजना है। पार्टी का कहना है कि संधि पर हस्ताक्षर के समय बिहार के हितों की अनदेखी हुई थी और राज्य की जरूरतों की गारंटी मिलने तक नवीनीकरण नहीं होना चाहिए।
यह अभियान फरक्का के ऊपर की ओर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताओं पर भी आधारित है। बिहार सरकार द्वारा 2016 में आयोजित एक बैठक में गाद जमाव, बाढ़ और पारिस्थितिक असंतुलन पर चर्चा हुई थी। पटना घोषणा-पत्र में गाद हटाने पर राष्ट्रीय नीति बनाने की सिफारिश की गई। ये चिंताएं भारत की घरेलू बहस का दायरा सीमा पार जाने वाले पानी की मात्रा से आगे बढ़ाती हैं।
नेपाल का प्रस्ताव नदी के स्वास्थ्य पर ध्यान दिलाता है
बांग्लादेश के राष्ट्रीय नदी संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष मंजूर ए. चौधरी मौजूदा संधि की जगह तीन साल का अंतरिम समझौता करने और उसके बाद नेपाल को शामिल करते हुए बेहतर शोध पर आधारित व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव देते हैं।
6 अक्टूबर, 2026 को चौधरी ने कहा कि मौजूदा संधि में पारिस्थितिक प्रवाह और जलवायु परिवर्तन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। पारिस्थितिक प्रवाह से तात्पर्य उस पानी से है, जो नदी के आवासों और प्राकृतिक कार्यों को बनाए रखने के लिए जरूरी है। इसका मतलब यह है कि उपलब्ध पूरे पानी को उपयोगकर्ताओं में बांटने योग्य आपूर्ति न माना जाए।
उन्होंने घाघरा, गंडकी और कोसी नदियों का उल्लेख किया, जिनके जरिए नेपाल से हिमालय की बर्फ पिघलने का पानी गंगा तक पहुंचता है। कम प्रवाह वाले महीनों में यह योगदान खास तौर पर महत्वपूर्ण है। उनके प्रस्ताव में इन ऊपरी प्रवाहों को निगरानी और योजना के एक व्यापक ढांचे में शामिल किया जाएगा।
खबरों के अनुसार, भारत संयुक्त क्षेत्रीय संधि के बजाय अलग-अलग द्विपक्षीय व्यवस्थाओं को तरजीह देता है। महाकाली संधि और कोसी तथा गंडक समझौतों के तहत नेपाल के साथ पहले से जल सहयोग के ढांचे मौजूद हैं। गंगा पर बातचीत में नेपाल को शामिल करने का कोई फैसला घोषित नहीं हुआ है।
अकादमिक समीक्षा नदी के मापन बिंदुओं के बीच के हिस्से की पड़ताल करने का एक और कारण बताती है। फरक्का से पहले, हार्डिंग ब्रिज पर शुष्क मौसम का औसत प्रवाह फरक्का की तुलना में लगभग 16% अधिक था। यह अंतर सहायक नदियों के प्रवाह, बड़े जलग्रहण क्षेत्र, वर्षा और भूजल के योगदान को दर्शाता है। बैराज के बाद यह अंतर घटकर करीब 9% और संधि के बाद 8% रह गया।
ये माप अपने आप में बदलाव के हर कारण की पहचान नहीं करते। वे बताते हैं कि वार्ताकारों को फरक्का पर उपलब्ध पानी, वहां से छोड़े गए पानी और नीचे की ओर आगे मापे गए पानी के बीच अंतर समझने की जरूरत है। आवंटन का कोई एक आंकड़ा इन तीनों का वर्णन नहीं कर सकता।
अन्य साझा नदियां अब भी समझौते के दायरे से बाहर
गंगा संधि की समयसीमा के साथ तीस्ता को लेकर अनसुलझी चिंताएं भी जुड़ी हैं। आनी ने इसे उत्तरी बांग्लादेश के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण बताया। इसके मौसमी स्वरूप के कारण शुष्क महीनों में पानी की कमी होती है, जबकि मानसून में कटाव और बाढ़ का सामना करना पड़ता है।
आनी ने कहा कि तीस्ता परियोजना के लिए व्यवहार्यता अध्ययन और तकनीकी सहायता का काम चल रहा है। ये गतिविधियां नदी प्रबंधन से जुड़ी हैं; इनसे यह साबित नहीं होता कि तीस्ता के पानी के बंटवारे पर द्विपक्षीय समझौता हो चुका है। 54 साझा नदियों में गंगा अब भी एकमात्र नदी है, जिसके लिए ऐसा समझौता है।
बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में शामिल हो चुका है, जबकि डेल्टा योजना 2100 और राष्ट्रीय नदी प्रबंधन पहल व्यापक योजना ढांचे उपलब्ध कराते हैं। कबीर ने कहा कि जल-बंटवारे की चर्चाओं में अंतरराष्ट्रीय कानून पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और वैज्ञानिक सहयोग की भी मांग की। किसी अंतरराष्ट्रीय ढांचे में भागीदारी से अपने आप फरक्का पर पानी का आवंटन तय नहीं होता।
विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर ने कहा है कि नई या संशोधित संधि को लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना चाहिए और अगले 25 से 50 वर्षों तक संबंधों को मजबूत बनाना चाहिए। टिकाऊ व्यवस्था की उनकी मांग, चौधरी के तीन साल के अंतरिम समझौते के प्रस्ताव से अलग है, हालांकि दोनों भविष्य के सहयोग के लिए बेहतर आधार चाहते हैं।
तत्काल कई ठोस सवाल अनसुलझे हैं: समझौते में संशोधन होगा या उसकी जगह नया समझौता आएगा, पानी की कमी के दौरान कौन-सी सुरक्षा लागू होगी, भरोसेमंद प्रवाह का हिसाब कैसे लगाया जाएगा और असहमतियों का समाधान कैसे होगा। कोई अंतिम मसौदा, सहमत गारंटी स्तर या हस्ताक्षर की पुष्टि की गई तारीख घोषित नहीं हुई है। बांग्लादेश की मांग स्पष्ट है; भारत ने उसे स्वीकार नहीं किया है।
मुख्य बिंदु
- 1996 की गंगा जल-बंटवारा संधि 12 दिसंबर, 2026 को समाप्त होगी।
- बांग्लादेश असाधारण रूप से कम प्रवाह के दौरान अपने निर्धारित हिस्से का कम से कम 80% सुरक्षित रखने वाला 1977 का प्रावधान बहाल करना चाहता है।
- मौजूदा संधि में बारी-बारी से मिलने वाला 35,000 क्यूसेक का आवंटन गारंटी का अलग रूप है।
- 1997 से 2016 के अध्ययन में पाया गया कि महत्वपूर्ण शुष्क अवधियों के 65% मापों में बांग्लादेश को उसका गारंटीकृत हिस्सा नहीं मिला।
- द्विपक्षीय तंत्रों के जरिए तकनीकी बातचीत जारी है, लेकिन किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है।
- बिहार की जल मांगें, नदी का स्वास्थ्य और नेपाल को शामिल करने का प्रस्ताव बातचीत में और मुद्दे जोड़ते हैं।
- 54 साझा नदियों में गंगा अब भी एकमात्र नदी है, जिसके लिए द्विपक्षीय जल-बंटवारा समझौता है।






