पाकिस्तान ने बिजली दर में 2.56 रुपये प्रति यूनिट बढ़ोतरी मांगी, नवंबर के बिलों पर 32.7 अरब रुपये का असर अनुमानित

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Pakistan seeks Rs2.56 per unit power increase, with Rs32.7 billion impact projected for November bills

सितंबर की ईंधन लागत से नवंबर के बिजली बिलों पर दबाव

पाकिस्तान की सेंट्रल पावर परचेजिंग एजेंसी (CPPA) ने सितंबर के लिए 2.56 रुपये प्रति यूनिट का बिजली ईंधन समायोजन मांगा है, जबकि पावर डिवीजन का अनुमान है कि इस बढ़ोतरी से नवंबर 2026 के उपभोक्ता बिलों में 32.7 अरब रुपये जुड़ेंगे। नेशनल इलेक्ट्रिक पावर रेगुलेटरी अथॉरिटी (NEPRA) ने आवेदन पर सुनवाई 29 अक्टूबर को तय की है।

विषय-सूची
  1. सितंबर की ईंधन लागत से नवंबर के बिजली बिलों पर दबाव
  2. 2.56 रुपये का समायोजन कैसे तय हुआ
  3. सितंबर में ईंधन पर खर्च कहां हुआ
  4. सरकार ने बिजली कटौती क्यों की
  5. आयातित गैस की कीमत से भी मिली राहत
  6. तेल की कीमतों और आपूर्ति में रुकावट से बढ़ा दबाव
  7. सितंबर का शुल्क अगस्त से अधिक
  8. सुनवाई जारी, उद्योग ने खपत पैकेज को चुनौती दी
  9. मुख्य बातें

आवेदन में सितंबर की औसत ईंधन लागत 10.02 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है, जबकि इसके लिए 7.46 रुपये की दर निर्धारित थी। 2.56 रुपये का अंतर वह राशि है जिसे CPPA मासिक ईंधन समायोजन के जरिए वसूलना चाहती है। बिजली की एक यूनिट का अर्थ एक किलोवाट घंटा है, यानी उतनी ऊर्जा जितनी 1,000 वाट का उपकरण एक घंटे में इस्तेमाल करता है।

पावर डिवीजन ने 15 अक्टूबर को जारी बयान में कहा कि बिजली आपूर्ति में कटौती और घरेलू गैस की कीमतों पर आयातित गैस उपलब्ध कराने से प्रस्तावित समायोजन सीमित रहा। विभाग के मुताबिक, ऐसा न होने पर समायोजन 5 से 6 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच सकता था।

उपभोक्ताओं पर दो परस्पर जुड़ी लागतों का असर पड़ रहा है: बिजली का बढ़ा हुआ शुल्क और बिजली कटौती, जिसके बारे में सरकार का कहना है कि इससे महंगे बिजली संयंत्र चलाने की जरूरत कम हुई। अंतिम समायोजन, इसे चुकाने वाले उपभोक्ताओं की श्रेणियां और बिलिंग व्यवस्था NEPRA के नियामक फैसले पर निर्भर हैं।

2.56 रुपये का समायोजन कैसे तय हुआ

CPPA के आवेदन में बिजली शुल्क में पहले से शामिल ईंधन लागत की निर्धारित राशि की तुलना सितंबर में हुए वास्तविक ईंधन खर्च से की गई है। जब वास्तविक खर्च निर्धारित राशि से अधिक होता है, तो एजेंसी ईंधन लागत समायोजन के जरिए अतिरिक्त रकम वसूलने की मांग करती है। इसे ईंधन मूल्य समायोजन भी कहा जाता है।

7.46 रुपये से बढ़कर 10.02 रुपये होना, ईंधन लागत की निर्धारित राशि से लगभग 34.3% अधिक है। यह तुलना बिजली लागत के ईंधन वाले हिस्से से संबंधित है। उपभोक्ता के पूरे बिल में अन्य शुल्क भी शामिल होते हैं, इसलिए अंतिम बिल में प्रतिशत बदलाव उसकी पूरी गणना पर निर्भर करेगा।

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प्रस्तावित समायोजन के दायरे में आने वाली 300 यूनिट बिजली इस्तेमाल करने वाले ग्राहक को 768 रुपये का अतिरिक्त ईंधन शुल्क देना होगा। लागू होने वाली 500 यूनिट पर यह शुल्क 1,280 रुपये होगा। इन उदाहरणों में केवल प्रस्तावित 2.56 रुपये की दर लागू की गई है; कर और अन्य शुल्क स्वीकृत बिलिंग व्यवस्था पर निर्भर होंगे।

CPPA के मुताबिक, वितरण कंपनियों ने सितंबर में 12.76 अरब यूनिट बिजली बेची। इस मात्रा को 2.56 रुपये से गुणा करने पर लगभग 32.67 अरब रुपये बनते हैं, जो पावर डिवीजन के 32.7 अरब रुपये के अनुमान से मेल खाते हैं। ये आंकड़े प्रस्तावित दर और उपभोक्ताओं से वसूली जाने वाली अनुमानित राशि के बीच संबंध दिखाते हैं।

सितंबर में ईंधन पर खर्च कहां हुआ

CPPA ने सितंबर में बिजली उत्पादन की कुल ईंधन लागत 127.87 अरब रुपये बताई। आयातित कोयले पर 37.14 अरब रुपये और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) पर 31.93 अरब रुपये खर्च हुए। इन दोनों श्रेणियों की कुल लागत 69.07 अरब रुपये रही, जो बताई गई कुल राशि का लगभग 54% है।

आवेदन में घरेलू गैस पर 13.89 अरब रुपये, डीजल पर 13.26 अरब रुपये, फर्नेस ऑयल पर 11.81 अरब रुपये और घरेलू कोयले पर 7.95 अरब रुपये खर्च होने की जानकारी भी दी गई। डीजल और फर्नेस ऑयल पर कुल 25.07 अरब रुपये खर्च हुए, जो ईंधन के कुल बिल का लगभग पांचवां हिस्सा है।

आयातित कोयले पर खर्च घरेलू कोयले के खर्च से लगभग 4.7 गुना था। ये खर्च की कुल रकम हैं; हर ईंधन से प्रति यूनिट बिजली उत्पादन की लागत निकालने के लिए प्रत्येक श्रेणी से जुड़े बिजली उत्पादन के आंकड़े भी चाहिए होंगे।

सूचीबद्ध छह श्रेणियों का कुल खर्च 115.98 अरब रुपये है। इस तरह बताई गई कुल राशि में से 11.89 अरब रुपये का विस्तृत ब्योरा जारी आंकड़ों में नहीं दिया गया। NEPRA की समीक्षा तय करेगी कि वसूली के लिए किन लागतों को स्वीकार किया जाएगा।

कुल ईंधन लागत और बिजली बिक्री के आंकड़े भी मांगी गई दर को समझने में मदद करते हैं: 127.87 अरब रुपये को 12.76 अरब यूनिट से भाग देने पर लगभग 10.02 रुपये प्रति यूनिट आते हैं, जो आवेदन में बताई गई औसत दर है।

सरकार ने बिजली कटौती क्यों की

पावर डिवीजन ने कहा कि सितंबर में लगभग दो से ढाई घंटे तक की लक्षित बिजली कटौती से फर्नेस ऑयल और डीजल से बिजली बनाने की जरूरत कम हुई। लोड मैनेजमेंट का अर्थ है परिचालन संबंधी सीमाओं के भीतर मांग को उपलब्ध आपूर्ति के स्तर पर रखने के लिए जानबूझकर बिजली की आपूर्ति सीमित करना।

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मंत्रालय ने कहा कि इस कदम और अन्य उपायों से प्रति यूनिट 3.44 रुपये तक का अतिरिक्त समायोजन टाला गया। इस कथित बचत को प्रस्तावित 2.56 रुपये में जोड़ने पर 6 रुपये प्रति यूनिट बनते हैं, जो हस्तक्षेप न होने पर समायोजन के मंत्रालय के अनुमान की ऊपरी सीमा है।

पावर डिवीजन ने अपने बयान में कथित बचत का ब्यौरा दिया:

लक्षित लोड मैनेजमेंट और अन्य उपायों से बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले महंगे ईंधन का असर सीमित रखने में मदद मिली और उपभोक्ताओं को प्रति यूनिट 3.44 रुपये तक के अतिरिक्त बोझ से बचाया गया।

सरकार ने ईंधन खर्च सीमित करने की कोशिश की, जबकि घरों और कारोबारों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा। घरों में बिजली कटने से उपकरण ग्रिड की बिजली पर नहीं चल पाते। कारोबारों में इससे कामकाज बाधित हो सकता है या बिजली के किसी दूसरे स्रोत की जरूरत पड़ सकती है। मंत्रालय की बताई बचत बिजली टैरिफ के उस शुल्क को मापती है जिससे बचा जा सका; आपूर्ति बाधित होने की व्यावहारिक लागत भी उपभोक्ताओं को उठानी पड़ती है।

आयातित गैस की कीमत से भी मिली राहत

पावर डिवीजन ने कहा कि बिजली उत्पादकों को आयातित रीगैसीफाइड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (RLNG) घरेलू गैस की कीमतों पर देने से संभावित बोझ में प्रति यूनिट 83 पैसे की और कमी आई। एक रुपये में 100 पैसे होते हैं, इसलिए बताई गई राहत प्रति यूनिट 0.83 रुपये है।

LNG प्राकृतिक गैस को ठंडा करके तरल रूप में बदली गई गैस है, ताकि उसे जहाज से ले जाया जा सके। पाइपलाइन और बिजली संयंत्रों में इस्तेमाल के लिए इसे दोबारा गैस में बदलने पर यह RLNG कहलाती है। मंत्रालय का यह उपाय उस आयातित ईंधन के लिए बिजली उत्पादकों से ली जाने वाली कीमत से संबंधित था।

मंत्रालय ने सितंबर का समायोजन सीमित रखने के उपायों में गैस की कम कीमत को भी शामिल किया। उसके बयान में गैस मूल्य से मिली राहत का अलग आंकड़ा दिया गया, साथ ही लोड मैनेजमेंट और अन्य उपायों से हुई बचत का भी जिक्र किया गया, लेकिन यह स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया कि ये अनुमान आपस में कैसे जुड़े हैं।

गैस की उपलब्धता का असर इस बात पर भी पड़ता है कि किन बिजली संयंत्रों को चलाना पड़ेगा। पावर डिवीजन ने चेतावनी दी कि RLNG की आपूर्ति और कम हुई तो अधिक महंगे ईंधन पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे बिजली शुल्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। इसलिए गैस की आपूर्ति बनाए रखना बिजली उत्पादन और उससे जुड़े ईंधन बिल, दोनों के लिए अहम है।

तेल की कीमतों और आपूर्ति में रुकावट से बढ़ा दबाव

पावर डिवीजन ने अंतरराष्ट्रीय ईंधन लागत में बढ़ोतरी के लिए क्षेत्रीय संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के बाद आपूर्ति श्रृंखलाओं में आई रुकावट को जिम्मेदार ठहराया। विभाग ने कहा कि ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई थी, जबकि पाकिस्तान का आधार बिजली टैरिफ तय करते समय लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल का मानक इस्तेमाल किया गया था।

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इन आंकड़ों के मुताबिक कीमत में प्रति बैरल 50 डॉलर से अधिक, यानी मानक से 71% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इससे समझ आता है कि पहले तय की गई लागत सीमा तब कम क्यों पड़ सकती है, जब बिजली उत्पादकों को बाजार में ऊंची कीमतों पर ईंधन खरीदना पड़े।

इस दबाव में फर्नेस ऑयल और डीजल खास तौर पर प्रासंगिक हैं, क्योंकि दोनों पेट्रोलियम ईंधन हैं। सितंबर में इन श्रेणियों पर कुल 25.07 अरब रुपये का खर्च जारी ईंधन बिल में उनकी भूमिका का पैमाना दिखाता है, जबकि मंत्रालय ने कहा कि आपूर्ति कटौती से इनका इस्तेमाल कम हुआ।

पावर डिवीजन ने कतर की ओर से फोर्स मेज्योर घोषित किए जाने का भी हवाला दिया। आपूर्ति अनुबंधों में इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर ऐसी असाधारण घटना के लिए किया जाता है, जिसके कारण अनुबंध की जिम्मेदारियां पूरी करना संभव न हो। मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान उपलब्ध अनुबंधित आपूर्ति और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त स्पॉट कार्गो के जरिए RLNG हासिल करने की कोशिश जारी रखे हुए है।

स्पॉट कार्गो नियमित अनुबंधित आपूर्ति से अलग की गई एकमुश्त खरीद होती है। अपेक्षित खेपों में रुकावट आने पर इनकी उपलब्धता और कीमत अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। मंत्रालय ने कहा कि वह बिजली उपभोक्ताओं पर असर सीमित करने की कोशिश के साथ ईंधन बाजारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नजर रख रहा है।

सितंबर का शुल्क अगस्त से अधिक

सितंबर के लिए प्रस्तावित 2.56 रुपये का समायोजन अगस्त के 1.11 रुपये के समायोजन से प्रति यूनिट 1.45 रुपये अधिक है। इस शुल्क के दायरे में आने वाली 300 यूनिट पर दोनों दरों का अंतर 435 रुपये होगा। लागू होने वाली 500 यूनिट पर यह अंतर 725 रुपये होगा।

पावर डिवीजन ने यह भी कहा कि जनवरी से अगस्त 2026 तक ईंधन समायोजन और तिमाही टैरिफ समायोजन का संयुक्त असर प्रति यूनिट 65 पैसे तक सीमित रहा, जो आधार टैरिफ का 1.9% है। ईंधन समायोजन ईंधन खर्च में बदलाव को दर्शाते हैं, जबकि तिमाही समायोजन एक अलग नियामक प्रक्रिया के तहत बिजली क्षेत्र की अन्य पात्र लागतों को शामिल करते हैं।

मंत्रालय ने इस नतीजे का कुछ श्रेय टैरिफ व्यवस्था में हुए बदलावों और औद्योगिक तथा कृषि उपभोक्ताओं के लिए बिजली खपत पैकेज को दिया। उसके मुताबिक, इस पैकेज ने इन उपभोक्ताओं को राष्ट्रीय ग्रिड से अधिक बिजली इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस पहले के दौर के बाद सितंबर के प्रस्ताव से मासिक ईंधन शुल्क में बड़ी बढ़ोतरी होगी। खर्च की योजना बना रहे उपभोक्ताओं के लिए तत्काल अहम आंकड़े हैं: प्रस्तावित 2.56 रुपये की दर, सितंबर की खपत में लागू होने वाली यूनिटों की संख्या और बिलिंग पर NEPRA का अंतिम फैसला।

सुनवाई जारी, उद्योग ने खपत पैकेज को चुनौती दी

औद्योगिक उपभोक्ताओं ने खपत पैकेज के लाभों को लेकर सरकार के दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि 22.96 रुपये प्रति यूनिट की सीमांत दर से लाभ सीमित समूह को मिलता है, जबकि वास्तविक सीमांत लागत लगभग 34 रुपये प्रति यूनिट है। सीमांत लागत का मतलब बिजली की एक अतिरिक्त यूनिट की आपूर्ति से जुड़ी लागत है।

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इन दोनों आंकड़ों का अंतर 11.04 रुपये प्रति यूनिट है। औद्योगिक उपभोक्ताओं का तर्क है कि लगभग 11 रुपये औसत उपभोक्ता टैरिफ में शामिल किए जा रहे हैं, जिससे यह लागत दूसरे उपयोगकर्ताओं में बंट जाती है। पावर डिवीजन का कहना है कि पैकेज ने औद्योगिक और कृषि उपभोक्ताओं को ग्रिड से अधिक बिजली लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

NEPRA ने इस पैकेज में संशोधन या इसे निलंबित करने पर सार्वजनिक सुनवाई की है; फैसला लंबित है। पैकेज की समीक्षा अतिरिक्त खपत की कीमत से जुड़ी है, जबकि CPPA का सितंबर आवेदन मासिक ईंधन लागत के अंतर की वसूली के लिए है।

तत्काल समय-सारणी में पहले से इस्तेमाल की गई बिजली, प्रस्तावित वसूली और नियामक की अगली सुनवाई शामिल हैं:

  • जनवरी से अगस्त 2026: पावर डिवीजन के मुताबिक, ईंधन और तिमाही टैरिफ समायोजन मिलाकर प्रति यूनिट 65 पैसे जुड़े।
  • सितंबर 2026: CPPA ने प्रति यूनिट 10.02 रुपये की औसत ईंधन लागत दर्ज की, जबकि निर्धारित राशि 7.46 रुपये थी।
  • 15 अक्टूबर: पावर डिवीजन ने 2.56 रुपये के समायोजन और नवंबर के बिलों पर 32.7 अरब रुपये के असर का अनुमान दिया।
  • 29 अक्टूबर: NEPRA में सितंबर के ईंधन समायोजन के CPPA आवेदन पर सुनवाई तय है।
  • नवंबर 2026: पावर डिवीजन को उम्मीद है कि स्वीकृत सितंबर समायोजन बिलों में शामिल होगा।

मुख्य बातें

  • CPPA ने सितंबर के लिए प्रति यूनिट 2.56 रुपये का ईंधन समायोजन मांगा है; NEPRA में सुनवाई 29 अक्टूबर को तय है।
  • पावर डिवीजन का अनुमान है कि नवंबर 2026 के बिजली बिलों पर 32.7 अरब रुपये का असर पड़ेगा।
  • CPPA के मुताबिक, सितंबर की औसत ईंधन लागत 10.02 रुपये प्रति यूनिट थी, जबकि निर्धारित राशि 7.46 रुपये थी।
  • ईंधन पर कुल खर्च 127.87 अरब रुपये रहा; आयातित कोयले और LNG का हिस्सा लगभग 54% था।
  • सरकार का कहना है कि लक्षित बिजली कटौती और आयातित गैस की कीमतों से संभावित बढ़ोतरी कम हुई।
  • औद्योगिक उपभोक्ता अतिरिक्त खपत पैकेज के लाभों पर असहमति जता रहे हैं; नियामक भी इसकी समीक्षा कर रहा है।
  • अंतिम समायोजन और बिलिंग व्यवस्था NEPRA के फैसले पर निर्भर करेगी।
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