परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों को फिर से लाने के लिए अक्टूबर में संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही केंद्र सरकार

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Centre Weighs October Parliament Session to Revive Delimitation and Women's Quota Bills

अप्रैल में संसद में हार के बाद नई कोशिश

भारत सरकार अक्टूबर 2026 के अंत में संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है, ताकि महिला आरक्षण को संसदीय सीटों के पुनर्वितरण से जोड़ने वाले विधेयक को फिर से आगे बढ़ाया जा सके। यह नई कोशिश 17 अप्रैल को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के गिरने के बाद हो रही है। इसके पक्ष में विरोध की तुलना में अधिक सदस्यों ने मतदान किया था।

विषय-सूची
  1. अप्रैल में संसद में हार के बाद नई कोशिश
  2. संसद की बैठक कब हो सकती है?
  3. साधारण बहुमत क्यों काफी नहीं
  4. अप्रैल के पैकेज में क्या बदलाव प्रस्तावित थे
  5. दक्षिणी राज्यों की चिंता क्यों
  6. सीटों में 50% बढ़ोतरी की गारंटी का मतलब
  7. महिलाओं के लिए जनगणना का समयक्रम क्यों अहम
  8. चुनावी नक्शा कौन बदलेगा?
  9. प्रदर्शन और आरक्षण की प्रतीक्षा कर रही महिलाएं
  10. मुख्य बिंदु

सरकारी सूत्रों का कहना है कि केंद्र को विश्वास है कि अब वह जरूरी समर्थन जुटा सकता है। बताया जा रहा है कि कुछ दलों का रुख सत्तापक्ष की ओर हुआ है और क्षेत्रीय दलों से बातचीत जारी है। जिन दलों से संपर्क किया जा रहा है, उनमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) भी शामिल है। उसके 22 सांसद नतीजे के लिए अहम हो सकते हैं। पार्टी परिसीमन का कड़ा विरोध करती रही है। परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसमें तय किया जाता है कि प्रत्येक राज्य को कितने निर्वाचन क्षेत्र मिलेंगे और उनकी सीमाएं कैसे तय होंगी।

दांव पर केवल यह नहीं है कि सरकार मतदान जीत सकती है या नहीं। अप्रैल में पेश पैकेज में सीटों के पुनर्वितरण के लिए 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करने, लोकसभा की सदस्य संख्या की संवैधानिक सीमा 550 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने की शर्तों में बदलाव का प्रस्ताव था।

महिला आरक्षण 2023 में 106वें संविधान संशोधन के जरिए कानून बना। हालांकि, इसे लागू करना अगली जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पर निर्भर है। सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले आरक्षण लागू करना चाहती है। विपक्षी दलों ने इस लक्ष्य को राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के बंटवारे में बदलाव से जोड़ने के फैसले पर सवाल उठाए हैं।

संसद की बैठक कब हो सकती है?

16 अक्टूबर तक बैठक की अंतिम तारीखों या विधेयक के संशोधित मसौदे की घोषणा नहीं हुई थी। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया कि अधिसूचना अगले सप्ताह जारी हो सकती है और संसद की बैठक से करीब एक सप्ताह पहले इसकी सूचना दी जा सकती है।

कार्यक्रम में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के लिए भी समय निकालना होगा। यह मंच 26 और 27 अक्टूबर को संविधान सदन में आयोजित होना तय है। महीने के आखिरी सप्ताह में संभावित सत्र का कार्यक्रम तैयार करते समय केंद्र के लिए यह एक व्यावहारिक पहलू है।

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मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ था, लेकिन उसे सत्रावसान के जरिए औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया। सत्रावसान से संसदीय सत्र औपचारिक रूप से खत्म होता है। यह कदम नहीं उठाए जाने के कारण संसद मौजूदा सत्र के तहत फिर से बैठक कर सकती है, भले ही इस बैठक को सार्वजनिक रूप से विशेष सत्र कहा जाए।

मुख्य तारीखों से पता चलता है कि विधेयक असफल मतदान के बाद एक और संभावित कोशिश की ओर कैसे बढ़ा है:

  • 2023: संसद ने 106वां संविधान संशोधन पारित किया, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।
  • 16 अप्रैल, 2026: सरकार ने संवैधानिक बदलावों, परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े प्रावधानों वाले तीन विधेयक पेश किए।
  • 17 अप्रैल, 2026: संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका।
  • 13 अगस्त, 2026: मानसून सत्र औपचारिक सत्रावसान के बिना समाप्त हुआ।
  • 26 और 27 अक्टूबर, 2026: संविधान सदन में ब्रिक्स संसदीय मंच आयोजित होना तय है।
  • 1 मार्च, 2027: अगली जनगणना की संदर्भ तारीख, जो महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा प्रक्रिया के लिए अहम है।

साधारण बहुमत क्यों काफी नहीं

संविधान संशोधन के लिए साधारण विधेयक से अधिक समर्थन की जरूरत होती है। प्रत्येक सदन में इसे कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित होकर मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मत मिलने चाहिए। इसलिए सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास साधारण संख्यात्मक बढ़त होना विधेयक पारित होने की गारंटी नहीं है।

सरकार की तैयारियों से जुड़े विवरण के मुताबिक लोकसभा में फिलहाल 540 सदस्य हैं। यदि सभी 540 मतदान करें, तो दो-तिहाई की शर्त पूरी करने के लिए 360 मत चाहिए होंगे। सटीक संख्या उपस्थिति और मतदान पर निर्भर करेगी। साथ ही, कुल सदस्य संख्या के बहुमत की शर्त भी लागू होगी।

अप्रैल में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पर विचार करने के प्रस्ताव के दौरान हार हुई थी। विधेयक के पक्ष में विरोध से अधिक सदस्य थे, लेकिन विशेष बहुमत नहीं मिला। यही वजह है कि सरकार दोबारा कोशिश करने से पहले अपने नियमित संसदीय समर्थकों से आगे भी समर्थन की प्रतिबद्धताएं चाहती है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि पिछले सत्र के बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद सत्तापक्ष की ओर आए हैं। इन कथित बदलावों में कुल 26 सांसद शामिल हैं। लोकसभा में केंद्र का भरोसा होने के बावजूद एक अलग चुनौती बनी हुई है: किसी भी संविधान संशोधन को राज्यसभा में भी जरूरी बहुमत हासिल करना होगा।

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अप्रैल के पैकेज में क्या बदलाव प्रस्तावित थे

विधेयकों की जांच करने वाली स्वतंत्र संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने अपने परिसीमन विधेयक के विश्लेषण में तीन उपायों का जिक्र किया है: संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026; केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026; और परिसीमन विधेयक, 2026। तीनों 16 अप्रैल को पेश किए गए थे और 17 अप्रैल को लोकसभा में निष्प्रभावी हो गए। इसका अर्थ है कि संविधान संशोधन विधेयक विफल होने के बाद पैकेज उस रूप में आगे नहीं बढ़ सकता था।

संवैधानिक प्रस्ताव के तहत संसद कानून बनाकर तय कर सकती थी कि परिसीमन कब होगा और इसके लिए किस जनगणना का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ में पेश परिसीमन विधेयक में आयोग के गठन के समय प्रकाशित नवीनतम जनगणना इस्तेमाल करने का प्रावधान था। पीआरएस के विश्लेषण वाले समयक्रम के अनुसार, इसका मतलब 2011 की जनगणना का इस्तेमाल होता।

पैकेज में यह शर्त हटाने का भी प्रस्ताव था कि महिला आरक्षण 2023 के संशोधन के बाद होने वाली पहली जनगणना पर आधारित होना चाहिए। केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े विधेयक के जरिए दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं पर भी संबंधित प्रावधान लागू होते।

लोकसभा की प्रस्तावित 850 सदस्य संख्या की सीमा में राज्यों के अधिकतम 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के 35 प्रतिनिधि शामिल थे। मौजूदा संवैधानिक सीमा 550 है, जिसमें राज्यों के अधिकतम 530 और केंद्र शासित प्रदेशों के 20 प्रतिनिधि हो सकते हैं। ये सीमाएं लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटों के मौजूदा आवंटन और मौजूदा सदस्य संख्या 540 से अलग हैं।

दक्षिणी राज्यों की चिंता क्यों

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना ने आबादी के आधार पर सीटें आवंटित करने पर चिंता जताई है। उनकी मुख्य चिंता आनुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर है: पूरे सदन की तुलना में किसी राज्य के सांसदों का कितना प्रभाव होगा।

संवैधानिक रोक के तहत राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन अब भी 1971 की जनगणना से जुड़ा है। 42वें संशोधन ने 1976 में यह रोक लगाई थी और 84वें संशोधन ने 2001 में इसे 2026 के बाद की पहली जनगणना प्रकाशित होने तक बढ़ा दिया। इस विस्तार का उद्देश्य राज्यों को संसदीय प्रतिनिधित्व खोए बिना जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए समय देना था।

पीआरएस के अनुमान के मुताबिक, 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर बड़े बदलाव होंगे। सदन का व्यापक विस्तार न होने की स्थिति में तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर 32 और केरल की 20 से घटकर 15 रह जाएंगी। उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 89, बिहार की 40 से 46 और राजस्थान की 25 से 30 हो जाएंगी।

निवासियों के लिए इसका मतलब है कि राष्ट्रीय कानूनों और नीतियों पर संसद के फैसलों में उनके राज्य की आवाज कितनी मजबूत होगी। बड़े सदन में किसी राज्य के सांसदों की संख्या बढ़ सकती है, जबकि वहां डाले गए कुल मतों में राज्य का अनुपात घट सकता है।

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सीटों में 50% बढ़ोतरी की गारंटी का मतलब

बताया जा रहा है कि सरकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। पार्टी के आठ सांसद हैं। इसके लिए भरोसा दिया जा रहा है कि कानून के तहत सभी राज्यों में सीटें 50% बढ़ाई जाएंगी। पार्टी नेता सुप्रिया सुले ने संकेत दिया था कि अगर इस बढ़ोतरी की गारंटी दी जाए तो वह प्रस्ताव पर चर्चा के लिए तैयार हैं।

प्रस्ताव की भाषा अहम है। हर राज्य की सीटों में समान रूप से 50% बढ़ोतरी से उनके आपसी अनुपात में बदलाव नहीं होगा, हालांकि पूर्ण सीटें आवंटित करने के लिए कुछ समायोजन जरूरी हो सकते हैं। आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करते हुए सदन को करीब 50% बढ़ाना एक अलग नतीजा देगा।

पीआरएस 813 सीटों वाले अनुमान में दूसरी प्रक्रिया का उदाहरण देता है। तमिलनाडु के सांसदों की संख्या 39 से बढ़कर 48 होगी, लेकिन सदन में उसकी हिस्सेदारी 7.18% से घटकर 5.90% रह जाएगी। केरल के सांसदों की संख्या दो बढ़कर 20 से 22 होगी, जबकि सदन में उसकी हिस्सेदारी 3.68% से घटकर 2.71% रह जाएगी।

उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 133 होंगी और सदन में उसकी हिस्सेदारी 14.73% से बढ़कर 16.36% हो जाएगी। बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 69 होंगी और उसकी हिस्सेदारी 7.37% से बढ़कर 8.49% हो जाएगी। ये आंकड़े बताते हैं कि केवल अधिक सीटों का वादा क्षेत्रीय दलों की चिंता दूर नहीं कर सकता: अतिरिक्त सीटों का बंटवारा तय करेगा कि किसका प्रभाव बढ़ेगा।

डीएमके का रुख खास अहमियत रखता है। तमिलनाडु चुनावों के बाद कांग्रेस से कथित मतभेद और विपक्षी इंडिया गठबंधन से उसके अलग होने के बाद सरकार ने पार्टी से संपर्क किया है। उसके 22 सांसद समर्थन का बड़ा संभावित आधार हैं, लेकिन परिसीमन का लंबे समय से विरोध करने के कारण बातचीत में सीटों की गारंटी की वास्तविक शर्तें निर्णायक होंगी।

महिलाओं के लिए जनगणना का समयक्रम क्यों अहम

2023 का कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन इसे जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जोड़ता है। इस क्रम के कारण आरक्षण लागू करने का समय एक लंबी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर हो जाता है।

पीआरएस का कहना है कि 1 मार्च, 2027 की संदर्भ तारीख वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन 2029 के चुनाव से पहले पूरा होने की संभावना नहीं है। पिछला परिसीमन आयोग 2002 में गठित हुआ था और उसने 2008 में अपने आदेशों को अंतिम रूप दिया था। इससे पता चलता है कि ऐसी प्रक्रिया में कितना समय लग सकता है।

सरकार के अप्रैल के प्रस्ताव में पहले की जनगणना का इस्तेमाल करने और 2023 के कानून के बाद पहली जनगणना तक इंतजार करने की शर्त हटाने की मांग थी। कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने इसके बजाय प्रस्तावित सीट पुनर्वितरण से जोड़े बिना महिला आरक्षण लागू करने की मांग की।

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पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने सरकार के रुख का बचाव करते हुए कहा कि आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन और निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। राज्यसभा सदस्य और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार ने 2023 में बाद की जनगणना कराने, फिर परिसीमन करने और उसके बाद आरक्षण लागू करने की प्रतिबद्धता जताई थी। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सवाल किया कि मौजूदा 543 सीटों के भीतर आरक्षण क्यों नहीं लागू किया जा सकता।

इसलिए मतभेद में दो फैसले शामिल हैं: महिलाओं को आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र कब मिलें और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का बंटवारा कैसे हो। महिला आरक्षण के समर्थन से सरकार की चुनी हुई प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन पाई है।

चुनावी नक्शा कौन बदलेगा?

परिसीमन विधेयक केंद्र सरकार को एक आयोग गठित करने का अधिकार देता, जिसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय का कोई मौजूदा या पूर्व न्यायाधीश करता। आयोग के अन्य सदस्यों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते। अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र करता।

पीआरएस फैसले लेने के अधिकारों के व्यापक हस्तांतरण की ओर भी इशारा करता है। संवैधानिक प्रस्ताव के तहत संसद साधारण कानून बनाकर परिसीमन का समय और इस्तेमाल की जाने वाली जनगणना चुन सकती थी। ये फैसले फिर संविधान संशोधन के बजाय साधारण विधेयकों पर लागू मतदान नियमों के तहत लिए जाते।

लोकसभा के विस्तार का असर अन्य संस्थाओं पर भी पड़ता। राज्यसभा की संवैधानिक अधिकतम सदस्य संख्या 250 ही रहती, जिससे निचले सदन की तुलना में उसका आकार छोटा हो जाता। पीआरएस के मुताबिक लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 815 होने पर दोनों सदनों का अनुपात करीब 2.2:1 से बदलकर करीब 3.3:1 हो जाएगा।

इस बदलाव से साधारण कानूनों पर संयुक्त बैठक और उपराष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा का संख्यात्मक महत्व बढ़ जाएगा। केंद्रीय मंत्रियों की संख्या की सीमा, जो लोकसभा की सदस्य संख्या के 15% पर तय है, वह भी बढ़ जाएगी। पीआरएस के अनुसार, सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 815 होने पर अनुमत संख्या 81 से बढ़कर 122 हो जाएगी।

प्रदर्शन और आरक्षण की प्रतीक्षा कर रही महिलाएं

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष के प्रदर्शन प्रस्तावित सत्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि हैं। एसआईआर मतदाता सूचियों की जांच और उन्हें अद्यतन करने की गहन प्रक्रिया है। विपक्ष की मांगों में कुमार का इस्तीफा और उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव शामिल हो सकता है।

नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद और छात्र प्रदर्शनों पर कार्रवाई के कारण मानसून सत्र के दौरान विधेयक को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिशें बाधित हुईं। प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता के आरोप फिर से सरकार के विधायी एजेंडे से ध्यान हटा सकते हैं।

राजनीति में करियर बनाने पर विचार कर रही महिलाओं की अपनी चिंताएं हैं कि आरक्षण किस तरह काम करेगा। नोएडा के एक निजी स्कूल में शिक्षिका सुष्मिता राय ने महिलाओं के मतदान से आगे बढ़कर नीति-निर्माण में शामिल होने की संभावना का स्वागत किया। साथ ही उन्होंने चिंता जताई कि ज्यादातर अवसर राजनीतिक परिवारों की महिलाओं को मिल सकते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य की स्नातकोत्तर छात्रा दीप्ति श्रीवास्तव ने कहा कि आरक्षण उनके जैसी महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित कर सकता है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि निर्वाचित महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने चाहिए। उनके मुताबिक अधिक प्रतिनिधित्व से सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और कार्यस्थल पर समानता पर अधिक चर्चा का अवसर मिलेगा।

सरकार के सामने तात्कालिक चुनौती बातचीत को दोनों सदनों में पर्याप्त मतों में बदलने की है। आरक्षित सीटों की प्रतीक्षा कर रही महिलाओं और अपने प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी को लेकर चिंतित राज्यों के लिए निर्णायक पहलू हैं: लागू करने का समयक्रम, चुनी गई जनगणना और सीटों के बंटवारे का सूत्र।

मुख्य बिंदु

  • केंद्र अक्टूबर 2026 के अंत में संसद का सत्र बुलाकर परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों को फिर से आगे बढ़ाने पर विचार कर रहा है।
  • संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 17 अप्रैल को जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका।
  • अप्रैल के पैकेज में 2011 की जनगणना इस्तेमाल करने और लोकसभा की संवैधानिक सदस्य संख्या की सीमा 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था।
  • सरकार डीएमके और छोटे विपक्षी दलों से संपर्क कर रही है। बातचीत में सीटों में 50% बढ़ोतरी की संभावित गारंटी अहम है।
  • पीआरएस के अनुमानों से पता चलता है कि बड़े सदन में राज्यों के सांसदों की संख्या बढ़ने के बावजूद प्रतिनिधित्व में उनकी हिस्सेदारी घट सकती है।
  • पीआरएस के अनुसार, जनगणना और परिसीमन की मौजूदा समयसीमा के कारण 2029 के चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू होने की संभावना नहीं है।
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