200 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षा और बिजली का बिल
भारत एक समर्पित डेटा सेंटर नीति तैयार कर रहा है। सरकार इस क्षेत्र को 200 अरब डॉलर के अवसर के रूप में देखती है, साथ ही आम बिजली उपभोक्ताओं को बढ़े हुए बिलों से बचाना चाहती है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने 14 अक्टूबर, 2026 को नई दिल्ली में इस योजना की घोषणा की। यह घोषणा मुंबई के पास अमेज़न और विशाखापत्तनम में गूगल की प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर हो रहे विरोध के बीच हुई।
विषय-सूची
- 200 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षा और बिजली का बिल
- आज कौन से नियम लागू हैं?
- अतिरिक्त बिजली ढांचे का खर्च कौन उठाएगा?
- हरित बिजली भी निवेश की होड़ का हिस्सा
- मुंबई और विशाखापत्तनम में स्थानीय चिंताएं चर्चा के केंद्र में
- एआई बिजली का उपभोक्ता भी है और योजना बनाने का साधन भी
- क्षमता की चुनौती में चिप भी अहम
- मुख्य बातें
प्रसाद ने केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के ‘मेकिंग इंडियन पावर सेक्टर एआई इनेबल्ड’ कार्यक्रम में बात की। उनके संदेश में दो प्राथमिकताएं एक साथ जुड़ी थीं: बड़े कंप्यूटिंग केंद्रों को आकर्षित करना और उन्हें बिजली उपलब्ध कराना, बिना परिवारों पर अतिरिक्त दबाव डाले।
डेटा सेंटर ऐसी इमारतें होती हैं जिनमें जानकारी संग्रहित करने और डिजिटल सेवाएं चलाने वाले कंप्यूटर रखे जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कंप्यूटिंग क्षमता की मांग बढ़ती है, क्योंकि एआई प्रणालियों को विकसित करने और इस्तेमाल करने के लिए कंप्यूटरों को बहुत बड़ी मात्रा में गणना करनी पड़ती है। इन कंप्यूटरों को बिजली की जरूरत होती है, जबकि उन्हें उपयुक्त तापमान पर चालू रखने के लिए शीतलन उपकरण काम आते हैं।
प्रसाद ने भारत को उन सबसे बड़े केंद्रों के लिए एक आशाजनक स्थान बताया, जिन्हें अक्सर हाइपरस्केल डेटा सेंटर कहा जाता है। ये प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों समेत कई संस्थानों की विशाल कंप्यूटिंग जरूरतें पूरी करते हैं।
मंत्री ने सरकार की महत्वाकांक्षा इन शब्दों में रखी:
"हम डेटा सेंटरों के लिए नीति ला रहे हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि भारत हाइपरस्केल डेटा सेंटरों के लिए बहुत उपजाऊ जमीन है," प्रसाद ने कहा।
प्रसाद ने प्रस्तावित नीति का दायरा या इसे जारी करने की तारीख नहीं बताई। इसलिए इस घोषणा के बाद डेवलपर, बिजली आपूर्तिकर्ता और निवासी उन नियमों की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो निवेश की महत्वाकांक्षा को संसाधनों, बुनियादी ढांचे और उपभोक्ता लागत से जुड़े फैसलों के साथ जोड़ेंगे।
आज कौन से नियम लागू हैं?
भारत में फिलहाल डेटा सेंटरों के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय नीति नहीं है। परियोजनाएं मौजूदा पर्यावरण और भवन नियमों के तहत चलती हैं, जबकि कुछ राज्य अपने प्रोत्साहन देते हैं। प्रस्तावित नीति ऐसे क्षेत्र में लागू होगी जहां मंजूरियां और सहायता पहले से ही कई माध्यमों से मिलती हैं।
पर्यावरण और भवन संबंधी आवश्यकताएं तय करती हैं कि सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं या नहीं और किस तरह। राज्य निवेश आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन देते हैं। एक समर्पित राष्ट्रीय नीति इस क्षेत्र के लिए साझा रूपरेखा दे सकती है, हालांकि सरकार ने अभी यह नहीं बताया है कि उसका प्रस्ताव मौजूदा व्यवस्थाओं के साथ किस तरह काम करेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेटा सेंटरों को भारत के निवेश प्रस्ताव का हिस्सा बनाया है। उन्होंने दुनिया के डेटा को देश में रखने का न्योता दिया है और उनकी सरकार इस क्षेत्र को 200 अरब डॉलर के अवसर के रूप में देखती है।
इस महत्वाकांक्षा के कारण बिजली एक अहम आर्थिक मुद्दा बन जाती है। डेटा सेंटर को अपने ग्राहकों को सेवाएं देने के लिए भरोसेमंद बिजली आपूर्ति चाहिए। परिवार और अन्य व्यवसाय भी इसी व्यापक बिजली व्यवस्था पर निर्भर हैं। इसलिए कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्रों के साथ-साथ उन्हें बिजली देने वाले नेटवर्क पर भी ध्यान देना जरूरी है।
अतिरिक्त बिजली ढांचे का खर्च कौन उठाएगा?
प्रसाद की चिंता स्पष्ट थी: विस्तार के कारण आम उपभोक्ताओं को बिजली के लिए अधिक भुगतान न करना पड़े। उन्होंने दूसरे देशों के ऐसे हालात का जिक्र किया जहां डेटा सेंटरों की मांग ने उपभोक्ताओं के लिए पहले से उपलब्ध बिजली पर दबाव डाला था।
मंत्री ने बताया कि भारत को किस स्थिति से बचना चाहिए:
"कुछ देशों में डेटा सेंटर उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बिजली ले रहे हैं। वहां नतीजा यह होता है कि उपभोक्ताओं को बिजली के लिए अधिक भुगतान करना पड़ता है। हम ऐसी स्थिति में नहीं जाना चाहते," उन्होंने कहा।
बिजली की लागत में केवल उसका उत्पादन शामिल नहीं होता। बिजली को ट्रांसमिशन लाइनों, सबस्टेशनों और स्थानीय नेटवर्क से भी होकर गुजरना पड़ता है। कोई बड़ा नया उपभोक्ता अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की जरूरत पैदा कर सकता है, इसलिए उस खर्च का बंटवारा भी बहस का हिस्सा है।
यहां एक अहम फर्क उन सुधारों के बीच है जो पूरी बिजली व्यवस्था के काम आते हैं और उन संपत्तियों के बीच जिनकी जरूरत मुख्य रूप से किसी खास परियोजना के लिए होती है। व्यापक लाभ देने वाले बुनियादी ढांचे का खर्च सभी उपयोगकर्ताओं में बांटा जा सकता है। जहां जरूरत का बड़ा हिस्सा किसी परियोजना के कारण पैदा हो, वहां उस लागत का अधिक हिस्सा उसी परियोजना से वसूलने पर खर्च उस मांग के करीब रहेगा जिसने उसे जन्म दिया।
परिवारों के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या उनके बिल में उस बुनियादी ढांचे का हिस्सा शामिल होगा जो मुख्य रूप से किसी बड़ी व्यावसायिक सुविधा को बिजली देने के लिए बनाया गया है। डेवलपर के लिए सवाल यह है कि भरोसेमंद नेटवर्क से जुड़ने के लिए उसे कितना भुगतान करना होगा। उपभोक्ताओं की रक्षा करने का प्रसाद का वादा इन दोनों पहलुओं को नीति चर्चा में लाता है।
हरित बिजली भी निवेश की होड़ का हिस्सा
प्रसाद ने यह भी चेताया कि बिजली उत्पादन, खासकर हरित बिजली, एआई और उससे जुड़ी प्रौद्योगिकियों की उभरती जरूरतों जितनी तेजी से नहीं बढ़ रहा है। उनकी टिप्पणी ने भारत की डेटा सेंटर योजनाओं को बिजली आपूर्ति में निवेश की गति से जोड़ा।
मंत्री ने प्रौद्योगिकी के विकास और भविष्य की बिजली जरूरतों के बीच अंतर को इन शब्दों में बताया:
"प्रौद्योगिकी तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन बिजली उत्पादन, खासकर हरित बिजली, भविष्य में आने वाली जरूरतों जितनी तेजी से नहीं बढ़ रहा है," उन्होंने कहा।
हरित बिजली से आम तौर पर सौर और पवन जैसे स्रोतों से मिलने वाली बिजली का मतलब होता है, जिसके उत्पादन में जीवाश्म ईंधन नहीं जलाए जाते। डेटा सेंटरों के विस्तार के लिए पर्याप्त आपूर्ति तैयार करना और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जरूरत पड़ने पर बिजली व्यवस्था केंद्रों तक भरोसेमंद ढंग से बिजली पहुंचा सके।
प्रसाद ने कहा कि जिन देशों में हरित बिजली उत्पादन होगा, उन्हें इन प्रौद्योगिकियों में निवेश आकर्षित करने में बढ़त मिलेगी। इससे बड़ी प्रौद्योगिकी परियोजनाओं को आकर्षित करने की भारत की कोशिश में बिजली आपूर्ति, जमीन, कंप्यूटिंग उपकरणों और अन्य संसाधनों जितनी ही अहम हो जाती है।
उन्होंने इस प्रतिस्पर्धी बढ़त को भारत की अपनी योजनाओं से जोड़ा:
"जिस देश में हरित बिजली उत्पादन होगा, उसे इन प्रौद्योगिकियों में बढ़त मिलेगी," उन्होंने कहा।
प्रसाद ने यह भरोसा भी जताया कि भारत उत्पादन बढ़ाएगा। उनकी टिप्पणियों ने विस्तार की दिशा तय की, जबकि उत्पादन की गति को लेकर उनकी चेतावनी ने दिखाया कि ऊर्जा योजना प्रौद्योगिकी निवेश के एजेंडे का हिस्सा क्यों बन रही है।
मुंबई और विशाखापत्तनम में स्थानीय चिंताएं चर्चा के केंद्र में
मुंबई के बाहर अमेज़न की प्रस्तावित साइट के पास रहने वाले लोगों ने बिजली और पानी की आपूर्ति पर संभावित दबाव के साथ-साथ शोर को लेकर विरोध किया है। उनकी आपत्तियां राष्ट्रीय निवेश बहस को किसी खास परियोजना के आसपास की सेवाओं और रहन-सहन की स्थितियों से जोड़ती हैं।
गूगल की प्रस्तावित 15 अरब डॉलर की परियोजना को लेकर विशाखापत्तनम में दूसरी तरह की चिंताएं हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह विकास वन्यजीवों के लिए खतरा है और मंदिर की जमीन का अनुचित इस्तेमाल करता है। ये आरोप परियोजना की जगह और भूमि उपयोग के साथ-साथ उसे चलाने के लिए जरूरी संसाधनों से भी जुड़े हैं।
परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों को चुनौती देने वाली तीन याचिकाएं राष्ट्रीय हरित अधिकरण में दायर की गई हैं। इनमें पर्यावरण और जल संबंधी जोखिमों का पर्याप्त आकलन न किए जाने का आरोप लगाया गया है। तारलुवाडा के कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि पर्याप्त सूचना दिए बिना जमीन ली गई। आंध्र प्रदेश सरकार जबरन अधिग्रहण के आरोपों से इनकार करती है और कहती है कि पात्र निवासियों को मुआवजा दिया गया।
गूगल और अमेज़न ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है। दोनों कंपनियों का कहना है कि चिंताएं निराधार हैं और उन्होंने संसाधनों का इस्तेमाल कम करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों का हवाला दिया है।
एशिया-प्रशांत के लिए गूगल के इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रमुख अलेक्जेंडर स्मिथ ने कहा कि कंपनी ने स्थानीय जलग्रहण क्षेत्र का आकलन किया और स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव का पता चलने के बाद पानी-आधारित प्रणालियों के बजाय एयर कूलिंग चुनी। गूगल का यह भी कहना है कि वह बिजली ढांचे में जरूरी सुधारों का खर्च उठाएगी और विशाखापत्तनम में अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश करेगी।
ये विवाद दिखाते हैं कि अधिकारियों के सामने किस तरह के फैसले हैं। राष्ट्रीय बिजली योजना आपूर्ति और कीमतों से जुड़ी है, जबकि स्थानीय स्तर पर पानी, शोर, वन्यजीव और जमीन की जांच होती है। निवासियों को ये सभी मुद्दे एक साथ प्रभावित करते हैं, भले ही वे अलग-अलग मंजूरी प्रक्रियाओं के दायरे में आते हों।
संसाधनों का कुशल इस्तेमाल कंपनियों की प्रतिक्रिया का हिस्सा है। समुदायों के लिए व्यावहारिक चिंता यह है कि किसी सुविधा की मांग स्थानीय मौजूदा आपूर्ति के साथ किस तरह मेल खाती है और क्या उसके संचालन से आसपास के हालात बदलते हैं। भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र के विस्तार के लिए नियम बनाते समय ये हित अहम बने रहेंगे।
एआई बिजली का उपभोक्ता भी है और योजना बनाने का साधन भी
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का सम्मेलन डेटा सेंटरों के विकास को बिजली क्षेत्र में हो रहे व्यापक बदलाव के संदर्भ में रखता है। फिक्की के आधिकारिक सम्मेलन विवरण में डेटा सेंटरों के विस्तार के साथ नवीकरणीय ऊर्जा, परिवहन और उद्योग का विद्युतीकरण तथा कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को बदलाव के कारकों के रूप में गिनाया गया है।
विवरण में यह भी बताया गया है कि बिजली व्यवस्था चलाने में एआई कैसे मदद कर सकता है: बदलती परिस्थितियों के साथ मांग का पूर्वानुमान लगाना, उपकरणों को कब रखरखाव की जरूरत पड़ सकती है यह अनुमान लगाना, और उपलब्ध बिजली उत्पादन का इस्तेमाल कैसे किया जाए यह तय करना। सरल शब्दों में, सॉफ्टवेयर बिजली संचालकों को जरूरतों का अनुमान लगाने और आपूर्ति में तालमेल बैठाने में मदद कर सकता है।
कार्यक्रम की रूपरेखा प्रसाद की घोषणा को दो दिनों तक चलने वाली चर्चा के संदर्भ में रखती है:
- 14 अक्टूबर, 2026: प्रसाद ने घोषणा की कि भारत डेटा सेंटर नीति तैयार कर रहा है और बिजली की लागत तथा हरित बिजली उत्पादन की गति को लेकर चेताया।
- 14 से 15 अक्टूबर, 2026: नई दिल्ली में सीईए सम्मेलन में बिजली क्षेत्र की योजना और संचालन में एआई को शामिल करने पर चर्चा होनी थी।
फिक्की के विवरण के अनुसार, इस सम्मेलन में नीति निर्माता, नियामक, उद्योग जगत के नेता, निवेशक, शोधकर्ता और प्रौद्योगिकी प्रदाता बिजली क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल की व्यावहारिक योजना पर चर्चा करने के लिए जुटेंगे। एजेंडे में उपयोग, निवेश और नीति शामिल हैं।
इस तरह एआई बिजली की चुनौती के दोनों पक्षों में है। कंप्यूटिंग सुविधाएं मांग बढ़ाती हैं, जबकि एआई उपकरण उस मांग को पूरा करने वाली व्यवस्था के संचालन में मदद कर सकते हैं। योजना बनाते समय डिजिटल बुनियादी ढांचे की बिजली खपत के साथ-साथ प्रौद्योगिकी से मिलने वाले संचालन संबंधी लाभों को भी ध्यान में रखना होगा।
क्षमता की चुनौती में चिप भी अहम
प्रसाद ने दूसरे देशों के साथ सहयोग जारी रखते हुए घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमता मजबूत करने की भी मांग की। सेमीकंडक्टर वे चिप होते हैं जो कंप्यूटरों और कई अन्य उत्पादों में गणना और नियंत्रण का काम करते हैं।
मंत्री ने कोविड-19 महामारी के दौरान चिप की कमी का जिक्र किया, जिससे वाहन उत्पादन प्रभावित हुआ था। इस उदाहरण ने दिखाया कि एक छोटे पुर्जे की कमी से बहुत बड़ा विनिर्माण कार्य बाधित हो सकता है।
भारत की प्रौद्योगिकी संबंधी महत्वाकांक्षाओं के लिए उनकी टिप्पणियां दो भौतिक जरूरतों को जोड़ती हैं: जानकारी संसाधित करने के लिए कंप्यूटरों को चिप चाहिए और चलने के लिए बिजली। घरेलू क्षमता विकसित करने से विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटती है, जबकि बिजली उत्पादन बढ़ाने से कंप्यूटिंग उपकरणों के इस्तेमाल के लिए जरूरी संसाधन मिलते हैं।
नीति की घोषणा अब इन महत्वाकांक्षाओं को ऐसी चर्चा में ले आई है जिसके उपभोक्ताओं और समुदायों पर सीधे असर पड़ सकते हैं। भारत का घोषित लक्ष्य परिवारों के लिए बिजली सस्ती रखते हुए बड़े डेटा सेंटर निवेश को आकर्षित करना है। बिजली आपूर्ति, बुनियादी ढांचे की लागत और स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़े फैसले तय करेंगे कि यह विस्तार किस तरह आगे बढ़ेगा।
मुख्य बातें
- जितिन प्रसाद ने 14 अक्टूबर, 2026 को नई दिल्ली में समर्पित डेटा सेंटर नीति तैयार किए जाने की घोषणा की।
- भारत फिलहाल मौजूदा पर्यावरण और भवन नियमों पर निर्भर है, जबकि कुछ राज्य प्रोत्साहन देते हैं।
- सरकार डेटा सेंटरों को 200 अरब डॉलर के अवसर के रूप में देखती है।
- प्रसाद ने कहा कि विस्तार से आम उपभोक्ताओं की बिजली लागत नहीं बढ़नी चाहिए। उन्होंने चेताया कि हरित बिजली उत्पादन भविष्य की प्रौद्योगिकी मांग से पीछे है।
- मुंबई के बाहर अमेज़न की प्रस्तावित साइट के पास रहने वाले लोगों ने बिजली, पानी और शोर को लेकर चिंताएं जताई हैं।
- पर्यावरणविदों ने वन्यजीवों और मंदिर की जमीन को लेकर गूगल की 15 अरब डॉलर की विशाखापत्तनम परियोजना को चुनौती दी है; गूगल और अमेज़न ने गलत काम से इनकार किया है।
- गूगल का कहना है कि स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव का आकलन करने के बाद उसने एयर कूलिंग चुनी और विशाखापत्तनम में बिजली ढांचे के सुधारों तथा अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं का खर्च उठाएगी।
- सीईए सम्मेलन में बिजली योजना और संचालन बेहतर बनाने के लिए एआई के इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया गया।






