विशाल निवेश के साथ यह विवाद भी कि लाभ किसे मिलेगा
विशाखापत्तनम में गूगल का 15 अरब डॉलर का प्रस्तावित कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र तीन स्थलों पर 600 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है। इनमें अकेले तारलुवाड़ा में 260 एकड़ से अधिक जमीन साफ की जा रही है। निवेश 2026 से 2030 के बीच किया जाना है और कुछ सुविधाओं के 2028 में काम शुरू करने की उम्मीद है। हालांकि, जिन किसानों की जमीन जा रही है, उनके लिए तात्कालिक बदलाव उस आमदनी के स्रोत का खत्म होना है जिससे उनके परिवारों का गुजारा चलता था।
विषय-सूची
- विशाल निवेश के साथ यह विवाद भी कि लाभ किसे मिलेगा
- मुआवजा परिवार की आजीविका की जगह नहीं ले सकता
- रोजगार के अनुमानों में अलग-अलग चीजें गिनी गई हैं
- पानी की कमी से तय होगा शीतलन का तरीका
- पानी की भरपाई और पेयजल कार्यक्रमों के लिए स्थानीय मापदंड जरूरी
- बिजली से जुड़े वादे सर्वर भवनों से आगे तक जाते हैं
- अदालत में पर्यावरण संबंधी चुनौती पर फैसला नहीं हुआ है
- सरकारी सब्सिडी पैकेज के ब्योरे में मतभेद बरकरार
- केबल और सामुदायिक कार्यक्रम निवेश का दायरा बढ़ाते हैं
- अगले पड़ाव: निर्माण, अदालत की समीक्षा और संचालन
- मुख्य बिंदु
यह परियोजना आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट भी पहुंच चुकी है। अदालत ने अनुमतियों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार जारी रहने के दौरान डेवलपर को अपने जोखिम और खर्च पर निर्माण जारी रखने की अनुमति दी है। यह मुकदमे के दौरान काम आगे बढ़ाने की इजाजत है, परियोजना को अंतिम न्यायिक मंजूरी नहीं।
गूगल की अक्टूबर 2025 की घोषणा के अनुसार, यह भारत में कंपनी का अब तक का सबसे बड़ा निवेश है। इस हब में कंप्यूटिंग ढांचे, अंतरराष्ट्रीय संचार केबल और नया ऊर्जा ढांचा शामिल होगा। इसके साझेदारों में अडानीकॉननेक्स और एयरटेल हैं। यहां ऐसे सर्वर होंगे जो एआई सिस्टम और अन्य डिजिटल सेवाएं चलाएंगे। वादे की गई कंप्यूटिंग क्षमता के साथ-साथ इनकी बिजली की मांग भी काफी होगी।
आंध्र प्रदेश इसे प्रौद्योगिकी कंपनियों और रोजगार के लिए आधार के रूप में देखता है। स्थानीय निवासी और अभियानकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये लाभ उन समुदायों तक पहुंचेंगे जो खेती की जमीन छोड़ रहे हैं या पहले से पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। इसलिए मुख्य विवाद केवल निवेश के आकार को लेकर नहीं है। सवाल यह है कि स्थायी नौकरियां, सरकारी रियायतें और संसाधनों से जुड़ी प्रतिबद्धताएं स्थानीय लोगों के नुकसान और जोखिमों के मुकाबले कैसी हैं।
मुआवजा परिवार की आजीविका की जगह नहीं ले सकता
तारलुवाड़ा में किसान बाली नरसिंहा राव ने बताया कि उन्हें एक एकड़ जमीन के लिए 17 लाख रुपये मिले, जो करीब 25,000 डॉलर बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि यही जमीन उनकी आजीविका का आधार थी:
"हमारी जमीन चली गई और वही हमारी आजीविका थी," उन्होंने कहा।
किसान चंदाला सदम्मा को आम और काजू के पेड़ों वाली दो एकड़ जमीन के लिए 82,000 डॉलर से अधिक मिले। 50 वर्षीय सदम्मा ने कहा कि मुआवजा मिलने के बावजूद साफ की गई जमीन देखकर उन्हें नुकसान का अहसास हुआ:
मेरा रोने का मन करता है।
ये भुगतान अलग-अलग जमीनों के लिए हैं और इनके आधार पर मुआवजे की कोई मानक दर तय नहीं की जा सकती। हालांकि, इनसे यह स्पष्ट होता है कि नकद मुआवजा और उपजाऊ जमीन का नुकसान दो अलग-अलग सवाल हैं। राज्य सरकार का कहना है कि नई आवासीय इकाइयां भी बनाई जा रही हैं और परियोजना स्थल पर रहने वाले लोगों को सौंपी जा रही हैं।
इंजीनियरिंग के छात्र बाली चरण तेजा को उम्मीद थी कि उन्हें परिवार की खेती की जमीन विरासत में मिलेगी, लेकिन अब वह बिक चुकी है। उन्हें संदेह है कि इस परियोजना से गांव के लोगों को ज्यादा रोजगार मिलेगा। किसान बाली सन्यास राव भी कहते हैं कि जमीन उनके परिवार की आजीविका और बच्चों की सुरक्षा का आधार है।
बदलाव अधिग्रहित भूखंडों तक सीमित नहीं हैं। भारत के रियल एस्टेट डेवलपर्स संघ के विशाखापत्तनम प्रमुख ई. अशोक कुमार का कहना है कि शहर की विकास योजनाएं सामने आने के बाद से जमीन की कीमतें 45% से अधिक बढ़ गई हैं। इससे संपत्ति मालिकों को लाभ हो सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि विस्थापित किसान वैसी ही जमीन खरीद सकते हैं या अपनी पुरानी आमदनी की भरपाई कर सकते हैं।
रोजगार के अनुमानों में अलग-अलग चीजें गिनी गई हैं
रोजगार के अनुमान काफी अलग-अलग हैं। राज्य के एक अनुमान के अनुसार, संबंधित प्रौद्योगिकी उद्योगों में अधिकतम 150,000 अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा हो सकती हैं और हर साल करीब 4,000 निर्माण कार्य से जुड़े रोजगार मिल सकते हैं। सरकार के एक अन्य ब्योरे में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मिलाकर 188,000 नौकरियों का अनुमान है। इन कुल आंकड़ों में सामंजस्य नहीं बताया गया है और अलग-अलग श्रेणियों के कारण इनकी सीधी तुलना संभव नहीं है।
गूगल का अनुमान है कि इससे हर साल स्थानीय अर्थव्यवस्था में करीब 688 मिलियन डॉलर की गतिविधि पैदा होगी। एशिया प्रशांत में गूगल के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा प्रमुख अलेक्जेंडर स्मिथ का कहना है कि इस तरह की एक परियोजना में आम तौर पर तीन से पांच साल तक हर साल करीब 4,200 निर्माण श्रमिक काम करते हैं। इसके बाद ऐसी सुविधाओं में सैकड़ों विशेषज्ञ पद होंगे जिन्हें कम से कम 20 साल तक चलाने के लिए बनाया गया है। हर साल निर्माण में मिलने वाले रोजगार को जोड़कर कुल संख्या को उतनी ही स्थायी नौकरियां बताना सही नहीं होगा।
स्मिथ यह भी कहते हैं कि गूगल के डेटा सेंटर में हर नौकरी से आसपास के समुदाय में नौ अतिरिक्त नौकरियों को मदद मिलती है। यह व्यापक आर्थिक प्रभाव का कंपनी का अनुमान है, गूगल में नौ प्रत्यक्ष नियुक्तियों का वादा नहीं। न ही यह गारंटी है कि ये पद विस्थापित निवासियों को मिलेंगे।
ह्यूमन राइट्स फोरम के गुट्टा रोहित का तर्क है कि यह परियोजना व्यापक रोजगार की जरूरत पूरी नहीं करती:
हमें बड़े पैमाने पर रोजगार और श्रम-प्रधान उद्योग चाहिए, न कि अधिक पूंजी वाले उद्योग।
विशाखापत्तनम के सांसद श्रीभरत माथुकुमिल्ली इसके विपरीत विचार रखते हैं। उनका कहना है कि भारत के लिए डेटा सेंटर जरूरी हैं और वे बैंकों, वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों और एआई स्टार्टअप को आकर्षित कर सकते हैं। सॉफ्टवेयर डेवलपर और उद्यमी सुदीप पिल्लारिसेट्टी को उम्मीद है कि इस निवेश से इंजीनियरिंग और डेटा विज्ञान के अवसर बनेंगे, जिनमें भारतीय एआई मॉडल विकसित करने वाले स्टार्टअप को सहायता भी शामिल है। ये संभावित लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि हब के आसपास कारोबार बढ़े, न कि केवल वहां काम करने वाले कर्मचारियों पर।
पानी की कमी से तय होगा शीतलन का तरीका
निवासियों का कहना है कि कमजोर मानसून, सूखे, जलाशय का घटते स्तर और भूजल के गिरते स्तर के कारण पानी की आपूर्ति पहले से दबाव में है। वी. ज्योति रोजगार की संभावना का स्वागत करती हैं, लेकिन उन्हें पानी पर और दबाव पड़ने की चिंता है। दुकानदार गुब्बाला रमनम्मा भी कहती हैं कि पानी की कमी पहले से मौजूद समस्या है, यह केवल भविष्य की किसी सुविधा को लेकर आशंका नहीं है।
शहर के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, रोजाना करीब 410 मिलियन लीटर पानी की आपूर्ति होती है, जबकि अनुमानित मांग 480 मिलियन लीटर है। अगर ये अनुमान सही हैं और इनकी तुलना की जा सकती है, तो रोजाना 70 मिलियन लीटर की कमी है, यानी मांग का लगभग 15%। ये आंकड़े गूगल की परियोजना के लिए स्वतंत्र रूप से सत्यापित जल-बजट नहीं हैं, लेकिन अधिक जांच की मांग की वजह समझने में मदद करते हैं।
गूगल का कहना है कि उसके आकलन में स्थानीय जलग्रहण क्षेत्र पर दबाव की पहचान हुई। यह वह इलाका है जहां से पानी बहकर आपस में जुड़ी नदियों, जलाशयों और भूजल प्रणालियों में पहुंचता है। स्मिथ के अनुसार, इसी निष्कर्ष से पानी के बजाय उन्नत एयर कूलिंग इस्तेमाल करने का फैसला प्रभावित हुआ। गूगल का कहना है कि इसके चलते पानी की खपत मुख्य रूप से रसोई और शौचालयों तक सीमित रहेगी।
यह फर्क अहम है: पानी से शीतलन न करने पर सीधे पानी की खपत का एक बड़ा संभावित स्रोत टलता है। लेकिन इससे अकेले निर्माण या संचालन के दौरान परियोजना की कुल पानी की जरूरत साबित नहीं होती। इन प्रतिबद्धताओं का ब्योरा देने वाले विवरणों में परिसर के पानी के उपयोग का मात्रात्मक बजट सार्वजनिक नहीं किया गया है।
आंध्र प्रदेश के प्रौद्योगिकी मंत्री नारा लोकेश ने कहा है कि आवासीय जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी:
हमारे लोगों की पानी की जरूरतें हमेशा सबसे पहले आएंगी।
पर्यावरण अभियानकर्ता ई.ए.एस. शर्मा, जो बिजली और वित्त मंत्रालयों में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं, स्वतंत्र जल ऑडिट की मांग कर रहे हैं। इससे घरेलू आपूर्ति और शीतलन तकनीक से जुड़े वादों को वास्तविक खपत और शहर की व्यापक जरूरतों के आधार पर परखा जा सकेगा।
पानी की भरपाई और पेयजल कार्यक्रमों के लिए स्थानीय मापदंड जरूरी
गूगल का कहना है कि वह 2030 तक अपने सभी कामकाज में खपत हुए मीठे पानी के 120% की भरपाई के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें शीतलन के अलावा अन्य जरूरतों में इस्तेमाल पानी भी शामिल है। यह प्रतिबद्धता कंपनी के पूरे कामकाज के लिए है, न कि इस प्रकाशित गारंटी के रूप में कि विशाखापत्तनम में इस्तेमाल किया गया हर लीटर उसी जलग्रहण क्षेत्र में उसी समय वापस किया जाएगा।
पानी की भरपाई का आम तौर पर मतलब पानी के स्रोतों को बहाल करने या उनकी रक्षा करने वाली गतिविधियों को समर्थन देना होता है। इसे सूखे के दौरान नगर निगम की आपूर्ति के स्वतः विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। आसपास के निवासियों के लिए इन गतिविधियों का लाभ आंकने में उनका स्थान, समय और मापने योग्य नतीजे अहम होंगे।
गूगल ने अपने आधिकारिक सामुदायिक प्रभाव संबंधी अपडेट में कहा है कि उसने वाटरशेड प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र बहाली और पेयजल प्रणालियों के लिए स्पंज कोलैबोरेटिव के साथ साझेदारी की है। प्रस्तावित सुविधाओं में रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्र शामिल हैं, जो पानी में घुले प्रदूषकों को छानते हैं, और पानी देने के केंद्र, जिन्हें वाटर एटीएम कहा गया है।
इस अपडेट में परिसरों के पास जलवैज्ञानिक दबाव और तटीय संवेदनशीलता को स्वीकार किया गया है। इसमें अनुमानित खपत, पानी की भरपाई की मात्रा या हर पेयजल परियोजना की शुरुआत की तारीख का पूरा संख्यात्मक ब्योरा नहीं है। इन जानकारियों से हब की अपनी संसाधन जरूरतों और अलग सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिए किए गए लाभ के वादों में फर्क स्पष्ट हो सकेगा।
बिजली से जुड़े वादे सर्वर भवनों से आगे तक जाते हैं
इस हब को एक गीगावाट की परियोजना बताया गया है, हालांकि गूगल ने अलग-अलग स्थलों की बिजली क्षमता के विस्तृत आंकड़े नहीं दिए हैं। एक गीगावाट, 1,000 मेगावाट के बराबर होता है। क्षमता से बिजली की मांग या बुनियादी ढांचे का पैमाना पता चलता है, न कि साल भर में खपत हुई बिजली की मात्रा।
अडानी की साझेदारी की घोषणा में, जो 14 अक्टूबर 2025 की है, कहा गया है कि निवेश में आंध्र प्रदेश में नई ट्रांसमिशन लाइनें, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा भंडारण शामिल हैं। अडानीकॉननेक्स, अडानी एंटरप्राइजेज और एजकॉननेक्स के समान हिस्सेदारी वाले संयुक्त उद्यम के रूप में काम करता है।
स्मिथ का कहना है कि गूगल अपने लिए जरूरी बिजली ढांचे के उन्नयन का पूरा खर्च उठाता है और विशाखापत्तनम में अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बना रहा है। उन्होंने कंपनी की जगह चुनने की शर्त भी बताई:
अगर किसी जगह पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं है या डेटा सेंटर चलाने का मतलब किसी समुदाय की बिजली छीनना होगा, तो गूगल या तो अधिक बिजली पैदा करने के तरीके ढूंढेगा, या वहां निर्माण नहीं करेगा।
हब को बिजली देने वाले ऊर्जा स्रोतों के मिश्रण, आपूर्ति की समय-सारणी और बैकअप व्यवस्था का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। राज्य में 1.2 गीगावाट के छह परमाणु संयंत्रों की योजना कुल 7.2 गीगावाट होगी, लेकिन इन प्रस्तावों को पहले से उपलब्ध बिजली या गूगल के लिए तय आपूर्ति नहीं माना जाना चाहिए।
10 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद में हुई चर्चा में सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के. बाबू राव ने बैकअप जनरेटर, उत्सर्जन, गर्मी और शोर को लेकर चिंता जताई। पर्यावरणविद् सागर धारा ने निवासियों की अगुवाई में पर्यावरण आकलन का प्रस्ताव रखा। उनके बयान डेटा सेंटरों को लेकर चिंताएं जाहिर करते हैं; वे विशाखापत्तनम हब में उपकरणों की संरचना या मापे गए उत्सर्जन को स्थापित नहीं करते। गूगल का अलग से कहना है कि सुविधा की सीमा पर शोर 55 डेसीबल से कम रहेगा।
अदालत में पर्यावरण संबंधी चुनौती पर फैसला नहीं हुआ है
हाई कोर्ट की कार्यवाही से उस पहले के विवरण में और जानकारी जुड़ती है, जिसमें कहा गया था कि अगस्त में अदालत में चुनौती के बावजूद निर्माण नहीं रुका। 5 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल और न्यायमूर्ति चल्ला गुणरंजन ने मंजूरियों को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई 6 अक्टूबर के लिए तय की। पीठ ने कहा कि पर्यावरणीय शर्तों में ढील नहीं दी जा सकती और दोनों पक्षों को एक-दूसरे के दावों पर जवाब सहित संबंधित दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया।
बाद में आए एक आदेश में अडानी इंफ्रा के स्वामित्व वाली विकास कंपनी विजाग हाइपरस्केल डेटा सेंटर पार्क लिमिटेड को अपने जोखिम और खर्च पर काम जारी रखने की अनुमति दी गई। लंबित मामले के दौरान खर्च की गई रकम को आधार बनाकर डेवलपर किसी प्रतिकूल अंतिम फैसले से परियोजना को बचा नहीं सकता।
यह याचिका पर्यावरण कार्यकर्ता बोलेसेट्टी सत्यनारायण ने दायर की थी। उनके वकील विराग गुप्ता ने श्रेणी बी/बी2 वर्गीकरण को चुनौती दी और बताया कि स्थल कंबालाकोंडा वन्यजीव अभयारण्य से 0.86 किलोमीटर दूर है।
भारत की पर्यावरण मंजूरी व्यवस्था के तहत श्रेणी ए की परियोजनाओं का आकलन केंद्र स्तर पर होता है, जबकि श्रेणी बी की परियोजनाएं आम तौर पर राज्य प्राधिकरणों के दायरे में आती हैं। बी2 परियोजनाओं के लिए आम तौर पर विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन जरूरी नहीं होता। याचिकाकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह वर्गीकरण बड़े डेटा सेंटर के संचालन के नतीजों को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखता है। राज्य निर्मित क्षेत्र के आधार पर भवन और निर्माण श्रेणी के तहत किए गए अपने आकलन का बचाव कर रहा है।
अभयारण्य से बताई गई नजदीकी अधिक जांच की मांग का आधार है, पारिस्थितिक नुकसान का सबूत नहीं। रिपोर्टों में अभयारण्य को स्वतंत्र रूप से पुष्ट किसी नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। अदालत की एक अन्य रिपोर्ट में मंजूरी को चुनौती देने के मामले में अल्फाबेट की सहायक कंपनी राइडेन इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड का नाम है, जबकि काम जारी रखने का आदेश अडानी की विकास कंपनी से संबंधित है। इन कंपनियों की भूमिकाओं को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
मामले में सिम्हाचलम देवस्थानम की 160 एकड़ जमीन का विवाद भी शामिल है। याचिकाकर्ता इस व्यवस्था को चुनौती देते हैं। राज्य का कहना है कि जमीन का हस्तांतरण नहीं हुआ, बल्कि आंध्र प्रदेश औद्योगिक बुनियादी ढांचा निगम के जरिए पट्टे पर दी गई है और इससे मंदिर को सालाना करीब 26 करोड़ रुपये मिलते हैं।
सरकारी सब्सिडी पैकेज के ब्योरे में मतभेद बरकरार
प्रोत्साहनों के विस्तृत विवरण के अनुसार, 480 एकड़ जमीन की कीमत में 25% छूट, औद्योगिक पानी पर 25% छूट, बिजली शुल्क से छूट, बिजली दर में एक रुपये की छूट और निर्माण के दौरान राज्य वस्तु एवं सेवा कर की भरपाई शामिल है। इस भरपाई की अधिकतम सीमा 2,245 करोड़ रुपये है।
इस विवरण में बिजली रियायतों की अवधि करीब 15 साल और पानी की रियायतों की अवधि 10 साल बताई गई है। अन्य रिपोर्टों में पानी और बिजली की कम दरें 10 साल तक मिलने की बात कही गई है। बिजली रियायत की अवधि में इस अंतर का समाधान नहीं बताया गया है।
इसी प्रोत्साहन विवरण में डेटा सेंटर का निवेश 87,520 करोड़ रुपये यानी 10 अरब डॉलर बताया गया है, जबकि गूगल की आधिकारिक घोषणा में ऊर्जा और कनेक्टिविटी के बुनियादी ढांचे समेत व्यापक हब के लिए 15 अरब डॉलर का आंकड़ा है। संभव है कि ये अलग-अलग दायरे को दर्शाते हों, लेकिन इस फर्क का कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इसी तरह, जमीन पर बताई गई छूट के दायरे में आने वाले 480 एकड़ को तीनों स्थलों की 600 एकड़ से अधिक जमीन के बराबर नहीं मानना चाहिए।
रिपोर्ट में बताई गई कर भरपाई की अधिकतम सीमा, 87,520 करोड़ रुपये के घोषित निवेश का करीब 2.6% है। यह अधिकतम सीमा है, इस बात का प्रमाण नहीं कि पूरी रकम का भुगतान होगा। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे ने आंध्र प्रदेश की इन रियायतों का खर्च उठाने की क्षमता पर सवाल उठाया है। कर्नाटक से तुलना में बेंगलुरु अर्बन के बाहर जमीन पर 10% सब्सिडी का जिक्र है, जिसकी सीमा 10 एकड़ है। इससे सब्सिडी की दर और पात्र जमीन, दोनों में अंतर दिखाई देता है।
सामुदायिक आयोजक दीक्षा वंगुरु का तर्क है कि सार्वजनिक संसाधनों से पहले स्कूल और अस्पताल जैसी जरूरतें पूरी होनी चाहिए। राज्य के समर्थकों का कहना है कि इन रियायतों से लंबे समय तक आर्थिक लाभ मिलेगा। पूरा आकलन करने के लिए केवल निवेश और रोजगार के अनुमान नहीं, बल्कि सब्सिडी की वास्तविक लागत और सार्वजनिक राजस्व की जानकारी जरूरी होगी।
केबल और सामुदायिक कार्यक्रम निवेश का दायरा बढ़ाते हैं
गूगल की आधिकारिक योजनाओं में विशाखापत्तनम में नया अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल केबल गेटवे शामिल है, जो मुंबई और चेन्नई के मौजूदा लैंडिंग केंद्रों के पूरक के रूप में केबल मार्ग जोड़ेगा। रिपोर्टों में तट के पास तीन केबल बिछाने की बात है, जबकि गूगल की घोषणाओं में व्यापक रूप से कई अंतरराष्ट्रीय केबल का जिक्र है। स्मिथ का कहना है कि दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया की ओर कनेक्शन से आंध्र प्रदेश भारत का तीसरा बड़ा समुद्रतल केबल हब बन सकता है।
अलग-अलग मार्गों से नेटवर्क की विश्वसनीयता बढ़ सकती है, क्योंकि इससे एक ही केबल गलियारे पर निर्भरता घटती है। डेटा सेंटर की इमारतों से आगे बढ़कर यह कनेक्टिविटी निवेश का ठोस हिस्सा है। गूगल ने एक्सेस पार्टनरशिप के एक अध्ययन का भी हवाला दिया है, जिसके अनुसार 2026 से 2030 के बीच अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में कम से कम 15 अरब डॉलर की वृद्धि का अनुमान है। यह अनुमान अमेरिका की आर्थिक गतिविधि का है, इसे विशाखापत्तनम के निवासियों की आमदनी के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर गूगल का कहना है कि संभाव फाउंडेशन के साथ उसकी साझेदारी का लक्ष्य 1,000 से अधिक मछुआरों को दिशा-निर्देश और मौसम संबंधी औजार तथा प्रशिक्षण देना है। उसका नारी शक्ति कार्यक्रम छोटे कारोबार शुरू करने वाली 10,000 से अधिक महिलाओं की मदद करने का लक्ष्य रखता है। प्रशिक्षण साझेदारियों का लक्ष्य 1,000 से अधिक स्थानीय कामगारों और 1,200 से अधिक विद्यार्थियों तथा शिक्षकों तक पहुंचना है। वहीं, गूगल उड़ान इंडिया फंड अनुदान के जरिए सामुदायिक परियोजनाओं को समर्थन देगा।
ये कार्यक्रमों के लक्ष्य हैं, रोजगार के पूरे हो चुके नतीजे नहीं। गूगल स्थानीय खरीद के साथ एआई कॉरिडोर का भी प्रस्ताव रखता है। इस बीच, रिलायंस इंडस्ट्रीज, ब्रुकफील्ड और डिजिटल रियल्टी का 11 अरब डॉलर का एआई डेटा सेंटर निवेश बताता है कि अभियानकर्ता आंध्र प्रदेश में नई मंजूरियों पर तब तक रोक क्यों मांग रहे हैं, जब तक स्वतंत्र पर्यावरणीय और सामाजिक आकलन प्रकाशित न हों। उनकी चिंता कई विकास परियोजनाओं की मिलीजुली संसाधन मांग को लेकर है।
अगले पड़ाव: निर्माण, अदालत की समीक्षा और संचालन
इस परियोजना में निवेश की तय अवधि के साथ कानूनी और संसाधनों से जुड़े अनसुलझे सवाल भी शामिल हैं। रिपोर्ट किए गए प्रमुख पड़ाव ये हैं:
- 14 अक्टूबर 2025: गूगल और अडानी ने साझेदारी और 2026 से 2030 के बीच प्रस्तावित निवेश की घोषणा की।
- अप्रैल में भूमिपूजन: निर्माण की औपचारिक शुरुआत हुई और राज्य के समर्थन तथा सामुदायिक कार्यक्रमों का ब्योरा दिया गया।
- अगस्त में अदालत में चुनौती: काम रोकने की पहले की कोशिश से निर्माण नहीं रुका।
- 5 अक्टूबर 2026: हाई कोर्ट ने मंजूरी को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई 6 अक्टूबर के लिए तय की और दोनों पक्षों से संबंधित दस्तावेज मांगे।
- इसके बाद अदालत का आदेश: डेवलपर को अपने जोखिम और खर्च पर काम जारी रखने की अनुमति मिली।
- 2028: कुछ सुविधाओं के काम शुरू करने की उम्मीद है।
- 2030: घोषित निवेश अवधि समाप्त होगी और पानी की भरपाई का गूगल का लक्ष्य पूरा होना है।
रिपोर्ट की गई अदालती कार्यवाही में अंतिम फैसला या अगली सुनवाई की पुष्ट तारीख नहीं बताई गई है। जिन बातों के आंकड़े अब भी स्पष्ट नहीं हैं, उनमें परिसर का जल-बजट, बिजली आपूर्ति के स्रोतों का मिश्रण, सरकारी रियायतों का अंतिम खर्च और आसपास के समुदायों तक पहुंचने वाले स्थायी रोजगार का हिस्सा शामिल हैं। इन्हीं आंकड़ों से तय होगा कि निवेश के वादे उसकी स्थानीय लागत के मुकाबले कैसे हैं।
मुख्य बिंदु
- गूगल 2026 से 2030 के बीच विशाखापत्तनम में 15 अरब डॉलर के एआई हब में निवेश की योजना बना रहा है।
- यह परियोजना 600 एकड़ से अधिक जमीन में फैली है। कुछ सुविधाओं के 2028 में चालू होने की उम्मीद है।
- किसानों का कहना है कि मुआवजे से आजीविका और परिवार की सुरक्षा का नुकसान पूरा नहीं हुआ है।
- गूगल का कहना है कि एयर कूलिंग से पानी का इस्तेमाल सीमित रहेगा और बिजली ढांचे के जरूरी उन्नयन का खर्च वह उठाएगा।
- रोजगार के बड़े अनुमानों में अप्रत्यक्ष नौकरियां शामिल हैं; सुविधाओं में स्थायी पदों की संख्या सैकड़ों में रहने की उम्मीद है।
- पर्यावरण संबंधी याचिका लंबित रहने के दौरान डेवलपर अपने जोखिम और खर्च पर निर्माण जारी रख सकता है।
- पानी की मांग, बिजली आपूर्ति का ब्योरा और सरकारी रियायतों की अंतिम लागत अब भी स्पष्ट नहीं है।






