पांच चालू संयंत्रों का मतलब पांच वेफर फैब नहीं
भारत का सेमीकंडक्टर विस्तार व्यावसायिक उत्पादन के चरण तक पहुंच गया है, लेकिन उसके पहले चालू संयंत्र सिलिकॉन चिप बनाने के बजाय उनकी पैकेजिंग और परीक्षण पर केंद्रित हैं। 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में SEMICON India में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच चालू सेमीकंडक्टर संयंत्रों की उपलब्धि का जश्न मनाया। यह अंतर महत्वपूर्ण है: इन इकाइयों में चिपों को जोड़ा, आपस में संपर्कित, सुरक्षित और जांचा जाता है; सिलिकॉन वेफर पर उनके इलेक्ट्रॉनिक सर्किट नहीं बनाए जाते।
विषय-सूची
- पांच चालू संयंत्रों का मतलब पांच वेफर फैब नहीं
- व्यापक कार्यक्रम की शुरुआत पैकेजिंग से
- उत्पादन की समयरेखा असल में क्या बताती है
- साणंद में परीक्षण से व्यावसायिक आपूर्ति तक
- Tata की असम इकाई और गुजरात फैब के काम अलग हैं
- चीन से आगे आपूर्तिकर्ता फैलाने का अर्थ सब कुछ स्थानीय बनाना नहीं
- ओडिशा की ग्लास परियोजना से तकनीकी महत्वाकांक्षा बढ़ी
- संयंत्रों के साथ श्रमिकों और उपकरण सहायता का भी विस्तार जरूरी
- अगले चरण में घरेलू मूल्य को मापना होगा
- मुख्य बिंदु
इन पांच चालू इकाइयों को उन पांच प्रमुख निवेश परियोजनाओं से अलग समझना चाहिए, जिन्हें अक्सर भारत के पैकेजिंग उद्योग की चर्चा में एक साथ रखा जाता है। सितंबर शिखर सम्मेलन की एक रिपोर्ट में CDIL Semiconductor की असेंबली, परीक्षण, मार्किंग और पैकेजिंग इकाई तथा Suchi Semicon की आउटसोर्स्ड असेंबली और परीक्षण इकाई को दो नवीनतम व्यावसायिक परियोजनाएं बताया गया। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सचिव एस कृष्णन ने पांच चालू इकाइयों की संख्या की पुष्टि की। Tata Electronics का असम संयंत्र और उत्तर प्रदेश में HCL तथा Foxconn की परियोजना समेत अन्य बड़ी परियोजनाएं विकास के अलग-अलग चरणों में थीं।
इससे भारत की प्रगति वास्तविक तो दिखती है, लेकिन पांच चिप संयंत्रों वाली सुर्खी से जितनी व्यापक तस्वीर बन सकती है, उससे सीमित है। आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्ट, यानी OSAT, सेमीकंडक्टर निर्माण का एक हिस्सा है। यह वेफर फैब्रिकेशन जैसा नहीं है, जिसमें सूक्ष्म सर्किट बनाए जाते हैं जो चिप की गणना करते हैं, जानकारी जमा करते हैं या विद्युत शक्ति नियंत्रित करते हैं।
इस अंतर का मतलब यह नहीं कि पैकेजिंग कोई छोटा कारोबार है। भारत की परियोजनाओं में पारंपरिक असेंबली से लेकर ऑटोमोटिव मॉड्यूल और उन्नत त्रि-आयामी एकीकरण तक शामिल हैं। मुख्य सवाल यह है कि फैब्रिकेशन परियोजनाओं, आपूर्तिकर्ताओं और कुशल श्रमिकों के आगे बढ़ने के दौरान ये संयंत्र कितनी तकनीकी क्षमता और घरेलू आर्थिक मूल्य विकसित कर सकते हैं।
व्यापक कार्यक्रम की शुरुआत पैकेजिंग से
India Semiconductor Mission के Semicon India कार्यक्रम के अनुसार केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2021 में 76,000 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी थी। इसके दायरे में सिलिकॉन और डिस्प्ले फैब्रिकेशन, सेमीकंडक्टर डिजाइन, पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, सिलिकॉन फोटोनिक्स और सेंसर शामिल हैं। इसलिए पैकेजिंग इस उद्योग में प्रवेश का एक समर्थित रास्ता है, कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य नहीं।
सरकार के मिशन के परिचय में इसी प्रतिबद्धता को लगभग 10 अरब डॉलर बताया गया है। इसमें महाराष्ट्र में प्रस्तावित 10 अरब डॉलर की फैब्रिकेशन परियोजना का भी उल्लेख है, जिसकी क्षमता 80,000 वेफर प्रति माह होने की उम्मीद है। साथ ही कहा गया है कि NXP Semiconductors ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार समेत क्षेत्रों में भारत में 1 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर रही है। ये बातें निवेश की योजनाएं बताती हैं, इस बात का प्रमाण नहीं कि प्रस्तावित वेफर क्षमता चालू हो चुकी है।
परिचय में अनुमान है कि 2026 तक भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 63 अरब डॉलर का हो जाएगा। यह बाजार का पूर्वानुमान है, घरेलू चिप उत्पादन का माप नहीं। सेमीकंडक्टर की मांग बढ़ सकती है, जबकि पैकेज्ड उत्पादों के भीतर लगे सर्किट विदेशों से आते रहें।
तारीखों और परियोजनाओं की संख्या को लेकर भी सावधानी जरूरी है। आधिकारिक कार्यक्रम पृष्ठ पर SEMICON India 2025 की तारीख 2–4 सितंबर और स्थान नई दिल्ली का यशोभूमि दिया गया है। 17 सितंबर की घोषणा रिपोर्ट के अनुसार 2026 के आयोजन से जुड़ी है, जो 17–19 सितंबर को उसी स्थल पर हुआ। अलग-अलग विवरण एक अवधि में छह राज्यों में मंजूर दस परियोजनाओं और अक्टूबर 2026 तक करीब 12 परियोजनाओं का भी जिक्र करते हैं। मंजूरी, पायलट उत्पादन और व्यावसायिक संचालन अलग-अलग पड़ाव हैं।
उत्पादन की समयरेखा असल में क्या बताती है
कई घटनाक्रम बताते हैं कि भारत पांच संयंत्रों की घोषणा तक कैसे पहुंचा। उनसे यह भी पता चलता है कि उद्घाटन की तारीख हमेशा वह तारीख नहीं होती जब उपकरण पहली बार चिपों की जांच शुरू करते हैं।
- 2021: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 76,000 करोड़ रुपये के Semicon India कार्यक्रम को मंजूरी दी।
- 2024: गुजरात के साणंद में CG Semi की इकाई की आधारशिला रखी गई।
- अगस्त 2025: प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार CG Semi ने चिपों की जांच शुरू की।
- फरवरी और मार्च 2026: रिपोर्टों में फरवरी में साणंद स्थित Micron इकाई और मार्च में साणंद स्थित Kaynes Semicon इकाई के उद्घाटन का जिक्र है।
- 4 जुलाई 2026: मोदी ने CG Semi की OSAT इकाई का उद्घाटन किया; व्यावसायिक पैकेजिंग शुरू हो चुकी थी।
- 17–19 सितंबर 2026: नई दिल्ली में SEMICON India का आयोजन हुआ और पांच चालू इकाइयों की खबर दी गई।
- 3 अक्टूबर: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि Tata का जगीरोड स्थित पहला क्लीन रूम तैयार है और चिपों का पायलट उत्पादन शुरू हो गया है।
- दिसंबर 2026 या जनवरी 2027: Tata की असम इकाई का औपचारिक उद्घाटन होने की उम्मीद है।
- 2028: Jewar में HCL और Foxconn की इकाई का संचालन शुरू करने का लक्ष्य है।
खबरों के अनुसार सितंबर शिखर सम्मेलन में 52 देशों की 600 से अधिक कंपनियों और 40,000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिनमें 300 विदेशी कंपनियां थीं। Infineon ने भारत में अपने कार्यबल में 28% विस्तार की घोषणा की। ये व्यावसायिक रुचि के संकेत हैं, लेकिन सम्मेलन में भागीदारी या भर्ती की घोषणाएं यह नहीं बतातीं कि कोई संयंत्र कितने मानक-अनुरूप उत्पाद बना सकता है।
तीसरी इकाई के बारे में दिए गए विवरण भी अलग-अलग हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ने जुलाई में CG Semi को तीसरी बड़ी इकाई कहा, जबकि एक अन्य विवरण में Tata की प्रस्तावित असम इकाई को भारत की तीसरी OSAT इकाई बताया गया। उपलब्ध विवरणों से गिनती का कोई साझा तरीका स्पष्ट नहीं होता, इसलिए इन नामों को चालू इकाइयों का एक सुसंगत क्रम नहीं माना जा सकता।
साणंद में परीक्षण से व्यावसायिक आपूर्ति तक
प्रधानमंत्री कार्यालय के 4 जुलाई 2026 के CG Semi उद्घाटन बयान के अनुसार साणंद इकाई में चिपों की व्यावसायिक पैकेजिंग शुरू हो गई थी। इसमें सालाना उत्पादन क्षमता 20 करोड़ इकाइयां, यानी 200 मिलियन, बताई गई है और लक्ष्य 500 करोड़ इकाइयों, यानी पांच अरब, का है। लक्ष्य बताई गई शुरुआती सालाना क्षमता से 25 गुना है।
उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हुए मोदी ने पैकेजिंग से आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा का जिक्र किया।
हमारा लक्ष्य भारत में चिप डिजाइन से लेकर फैब्रिकेशन और पैकेजिंग तक एक संपूर्ण सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है।
CG Semi की 7,600 करोड़ रुपये की परियोजना में CG Power, जापान की Renesas Electronics और थाईलैंड की Stars Microelectronics शामिल हैं। खबरों के अनुसार इसका ध्यान ऑटोमोटिव माइक्रोकंट्रोलर पर है, जो वाहनों के भीतर विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं। Renesas सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता देती है, जबकि Stars पैकेजिंग तकनीक और प्रशिक्षण सहायता उपलब्ध कराती है।
अलग-अलग विवरणों में क्षमता के आंकड़े अलग हैं। रिपोर्टों में रोजाना 1.5 करोड़ इकाइयों का लक्ष्य और 2026 के अंत तक रोजाना 1.45 करोड़ इकाइयों का लक्ष्य रखने वाले दूसरे विस्तार चरण का जिक्र है। ये आंकड़े सरकार के सालाना आंकड़ों से सीधे मेल नहीं खाते। संचालन के दिनों, संयंत्र के चरणों और उत्पादों के मिश्रण की साझा परिभाषा के बिना इन्हें जोड़कर एक क्षमता अनुमान नहीं बनाया जाना चाहिए।
साणंद में Micron का 2.75 अरब डॉलर का असेंबली, परीक्षण, मार्किंग और पैकेजिंग संयंत्र भी है। खबरों के अनुसार 5,00,000 वर्ग फुट से अधिक के इसके क्लीन रूम क्षेत्र से संयंत्र खुलने के कुछ ही सप्ताह में Dell और HP को व्यावसायिक आपूर्ति संभव हुई। Kaynes Semicon की 3,307 करोड़ रुपये की इकाई का लक्ष्य रोजाना करीब 63.3 लाख चिप बनाना है। कंपनी ने जून 2025 में 1.38 करोड़ डॉलर में Fujitsu की पावर मॉड्यूल उत्पादन लाइनें खरीदीं और फ्लिप चिप तथा त्रि-आयामी पैकेजिंग अनुसंधान पर IBM के साथ काम कर रही है।
Tata की असम इकाई और गुजरात फैब के काम अलग हैं
असम के जगीरोड में Tata Electronics की 27,000 करोड़ रुपये की परियोजना रोजाना 4.8 करोड़ सेमीकंडक्टर इकाइयों तक बनाने के लिए तैयार की जा रही है। इसका पहला क्लीन रूम और पायलट गतिविधि व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में प्रगति है, लेकिन पायलट उत्पादन से यह साबित नहीं होता कि संयंत्र अपनी नियोजित क्षमता तक पहुंच गया है।
एक विवरण में उत्पादन दिसंबर में शुरू होने की उम्मीद जताई गई, लेकिन साल नहीं बताया गया। अक्टूबर में पायलट उत्पादन की घोषणा के बाद आए एक अन्य विवरण में औपचारिक उद्घाटन दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 में होने की बात कही गई। इन पड़ावों में विरोधाभास जरूरी नहीं: पायलट असेंबली, व्यावसायिक उत्पादन और औपचारिक उद्घाटन अलग-अलग समय पर हो सकते हैं। पुष्टि की गई व्यावसायिक शुरुआत और हासिल उत्पादन, उद्घाटन के पूर्वानुमान से अलग बातें हैं।
जगीरोड इकाई में वायर बॉन्ड, फ्लिप चिप और इंटीग्रेटेड सिस्टम्स पैकेजिंग तकनीकों का इस्तेमाल होगा। वायर बॉन्डिंग में पतले तारों से चिप को उसके पैकेज से जोड़ा जाता है। फ्लिप चिप तकनीक में चिप की सतह पर मौजूद संपर्कों के जरिए उसे जोड़ा जाता है। दोनों ही तरीके फैब्रिकेट किए गए चिप को बड़े इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद में इस्तेमाल योग्य बनाते हैं।
Tata और Qualcomm Technologies की योजना जगीरोड में भारतीय और वैश्विक वाहन निर्माताओं के लिए Qualcomm Automotive Modules बनाने की है। इनमें डिजिटल कॉकपिट, इंफोटेनमेंट, कनेक्टिविटी और स्मार्ट वाहन प्रणालियों के लिए Snapdragon Digital Chassis चिपों को अन्य घटकों के साथ जोड़ा जाता है। Tata वहां Nexperia के डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर उत्पादों की असेंबली और जांच भी करेगी। ये ऐसे उपकरण हैं जो अलग-अलग विद्युत कार्य करते हैं।
गुजरात में Tata की धोलेरा परियोजना की भूमिका अलग है: यह प्रस्तावित 300 मिमी वेफर फैब्रिकेशन संयंत्र है, जिसमें ताइवान की PSMC प्रक्रिया प्रौद्योगिकी साझेदार और ASML लिथोग्राफी उपकरण आपूर्तिकर्ता है। Tata और Nexperia वहां Nexperia के MOSFET उत्पादों का उत्पादन तैयार कर रही हैं। MOSFET ऐसे ट्रांजिस्टर हैं जिनका इस्तेमाल आमतौर पर विद्युत शक्ति को चालू-बंद करने या नियंत्रित करने के लिए होता है। असम में Nexperia उत्पादों की पैकेजिंग और गुजरात में उनका फैब्रिकेशन, उत्पादन श्रृंखला के दो अलग-अलग चरण होंगे।
चीन से आगे आपूर्तिकर्ता फैलाने का अर्थ सब कुछ स्थानीय बनाना नहीं
भारत की उभरती पैकेजिंग परियोजनाएं चीन के बाहर आपूर्तिकर्ता नेटवर्क बना रही हैं। रिपोर्टों का अनुमान है कि OSAT आपूर्ति श्रृंखलाओं में आम तौर पर 55–60% आपूर्तिकर्ता चीन से आते हैं। यह आंकड़ा आपूर्तिकर्ताओं के संकेंद्रण से जुड़ा है, जरूरी नहीं कि हर संयंत्र के कुल खरीद खर्च में चीन की हिस्सेदारी भी यही हो।
खबरों के अनुसार Tata ने जगीरोड के लिए चीन के बाहर के कम से कम नौ आपूर्तिकर्ताओं के साथ समझौते किए हैं। इनमें सिंगापुर की ASMPT, नीदरलैंड की Nexperia, जापान की Fujifilm और मलेशिया की Kelington शामिल हैं। यह नेटवर्क उपकरण, सामग्री और विनिर्माण सहायता उपलब्ध कराएगा। Kaynes पैकेजिंग विशेषज्ञता के लिए जापान की AOI Electronics और जापानी सामग्री जुटाने के लिए Mitsui & Co. के साथ काम कर रही है।
इन विकल्पों का उद्देश्य निर्यात प्रतिबंधों, शुल्कों को लेकर अनिश्चितता और आपूर्ति में रुकावटों का जोखिम घटाना है। वे एक क्षेत्र पर निर्भरता की जगह व्यापक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क लाते हैं, आयात पर निर्भरता खत्म नहीं करते।
खबरों के अनुसार सामग्री का हिस्सा OSAT उत्पादन खर्च में 45–50% है, जिसमें से 60–70% अब भी अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से आता है। तांबे के लीड फ्रेम मुख्यतः कोरिया और फिलीपींस से मिलते हैं। बॉन्डिंग वायर जापान की Tanaka Precious Metals और जर्मनी की Heraeus Electronics समेत कंपनियां देती हैं। पैकेज्ड चिपों की सुरक्षा करने वाले एपॉक्सी मोल्डिंग कंपाउंड दक्षिण-पूर्व एशिया से आते हैं और इनके लिए प्रशीतित परिवहन जरूरी होता है।
स्थानीय परियोजनाएं धीरे-धीरे इस संतुलन को बदल सकती हैं। INOX Air Products साणंद में शुद्धिकरण इकाइयां और धोलेरा में विशेष गैस केंद्र बना रही है। Linde ने साणंद में जमीन खरीदी है, जबकि HySpec Chemicals ने सेमीकंडक्टर गैसों और रसायनों के लिए 750 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। नए आपूर्तिकर्ताओं को मानक-अनुरूप साबित होने में आम तौर पर एक से दो साल लगते हैं; ऑटोमोटिव पुर्जों के लिए इससे भी अधिक समय लग सकता है। CG Semi का अनुमान है कि स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था बनाने में कम से कम तीन साल लगेंगे; व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के विकास की अवधि 10–15 साल बताई गई है।
ओडिशा की ग्लास परियोजना से तकनीकी महत्वाकांक्षा बढ़ी
भुवनेश्वर में अमेरिका स्थित 3D Glass Solutions की अगुवाई वाली 1,934 करोड़ रुपये की परियोजना दिखाती है कि पैकेजिंग को तकनीक के एक ही स्तर के रूप में नहीं देखना चाहिए। Intel, Lockheed Martin और अन्य फंडों के निवेश से समर्थित इस परियोजना का उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G, रक्षा और डेटा केंद्रों के लिए ग्लास सब्सट्रेट पैनल तथा उन्नत त्रि-आयामी विषम एकीकरण मॉड्यूल बनाना है।
विषम एकीकरण में प्रोसेसर, मेमोरी और सेंसर जैसे अलग-अलग प्रकार के चिपों को एक असेंबली में जोड़ा जाता है। त्रि-आयामी पैकेजिंग में घटकों को एक-दूसरे के ऊपर रखा जा सकता है। सब्सट्रेट इन घटकों को सहारा देता और जोड़ता है; ग्लास से स्थिरता, सटीकता और सिग्नल प्रदर्शन में संभावित लाभ मिलते हैं। इन तरीकों का लक्ष्य हर ट्रांजिस्टर को छोटा करने पर ही निर्भर हुए बिना असेंबल किए गए सिस्टम का प्रदर्शन बेहतर करना है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सचिव एस कृष्णन ने आधारशिला समारोह में इस परियोजना को मिशन के पहले चरण का एक विशिष्ट हिस्सा बताया।
India Semiconductor Mission के तहत अब तक मंजूर की गई सभी दस परियोजनाओं में से यह एक ऐसी परियोजना है जो वास्तव में उन्नत पैकेजिंग का प्रतिनिधित्व करती है। यह नई और अनूठी तकनीक है,
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने सालाना 70,000 ग्लास पैनल और 5 करोड़ असेंबल इकाइयों के उत्पादन के साथ करीब 2,500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का अनुमान दिया। विवरण में करीब 13,000 उन्नत एकीकरण मॉड्यूल का भी जिक्र है। पैनल, असेंबल इकाइयां और मॉड्यूल अलग-अलग उत्पाद हैं, इन्हें जोड़कर कुल संख्या नहीं बनानी चाहिए।
यह परियोजना अभी विकास की प्रतिबद्धता है, व्यावसायिक क्षमता का प्रमाण नहीं। इसका महत्व इस तरह की पैकेजिंग में है जिसमें भारत महारत हासिल करना चाहता है, न कि केवल राष्ट्रीय गिनती में एक और कारखाना जोड़ने में।
संयंत्रों के साथ श्रमिकों और उपकरण सहायता का भी विस्तार जरूरी
नई फैक्ट्रियों को स्नातकों के साथ अनुभवी इंजीनियरों, तकनीशियनों और ऑपरेटरों की भी जरूरत है। India Electronics and Semiconductor Association के प्रमुख अशोक चंडक का कहना है कि शिक्षा को विनिर्माण के व्यावहारिक कौशल में बदलना होगा।
प्राथमिकता उद्योग के लिए तैयार प्रतिभाओं की श्रृंखला बनाने की होनी चाहिए, केवल स्नातकों की संख्या बढ़ाने की नहीं। उतना ही जरूरी कुशल तकनीशियन, ऑपरेटर और डिप्लोमा धारक प्रतिभाएं हैं, जो विनिर्माण संचालन की रीढ़ बनेंगे,
श्रमबल की जरूरत घटक आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रसायन और गैस इकाइयों तथा लॉजिस्टिक्स तक फैली है। विदेशों में काम कर रहे भारतीय मूल के अनुभवी इंजीनियरों को भर्ती करने से नई टीमों को उत्पादन प्रक्रियाएं सीखने में मदद मिल सकती है, जबकि कॉलेज और प्रशिक्षण संस्थान लगातार श्रमिक तैयार कर सकते हैं।
CG Semi के उद्घाटन पर मोदी ने आदिवासी समुदायों की उन युवतियों का जिक्र किया जो औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों से आगे बढ़कर मलेशिया में तकनीकी प्रशिक्षण तक पहुंचीं। यह उदाहरण दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के जरिए संचालन कौशल कैसे विकसित किया जा सकता है।
उपकरणों का रखरखाव भी उभरते उद्योग का हिस्सा है। Canon India के अध्यक्ष और CEO तोशियाकी नोमुरा ने कहा कि कंपनी ने प्रमुख निर्माताओं के साथ परियोजनाओं पर चर्चा की है और अपनी लिथोग्राफी तकनीक के लिए स्थानीय सहायता देने की योजना बनाई है। फैब्रिकेशन के दौरान लिथोग्राफी से वेफर पर सर्किट के पैटर्न बनाए जाते हैं।
नोमुरा ने बताया कि परियोजनाओं की पुष्टि होने पर समर्पित सेवा ढांचा तैयार किया जाएगा।
परियोजना की पुष्टि होने के बाद, जाहिर है हमें चिप निर्माता को 24x7 सहायता देनी होगी। इसी लिहाज से हम भारत में अपनी तकनीक और सेवा केंद्र लाएंगे। हमारी यही योजना है,
इन चर्चाओं का अर्थ उपकरणों के पक्के ऑर्डर नहीं है। फिर भी वे दिखाती हैं कि फैब्रिकेशन इकाइयां स्थापित करने के लिए मशीनों के साथ रखरखाव और तकनीकी सहायता भी जरूरी है।
अगले चरण में घरेलू मूल्य को मापना होगा
University of Illinois के प्रोफेसर और The Chip Age के लेखक राकेश कुमार का कहना है कि मध्यम अवधि में भारत को पैकेजिंग, परीक्षण, डिजाइन और पुराने लेकिन स्थापित तकनीक वाले चिपों के निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसे चिपों में स्थापित उत्पादन तकनीकों का इस्तेमाल होता है और वे ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों के लिए अब भी अहम हैं।
कुमार चीन के अनुभव को लगातार निवेश का उदाहरण और विदेशी उपकरणों पर निर्भरता की चेतावनी, दोनों मानते हैं।
चीन एक अच्छा आदर्श भी है और सावधान करने वाला उदाहरण भी,
उनका तर्क है कि केवल खर्च करने से उन्नत तकनीक तक पहुंच की गारंटी नहीं मिलती, खासकर जब निर्यात नियंत्रण जरूरी आपूर्ति रोक सकते हैं। वह घरेलू मांग और तरजीही पहुंच तथा शुल्क जैसी नीतियों के सहारे पुराने चिपों के निर्माण के लिए 10–20 साल की प्रतिबद्धता की सिफारिश करते हैं। उनका यह भी कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से डिजाइन के काम में बदलाव आने के साथ भारत की ऐसी चिप डिजाइन कंपनियां जरूरी होंगी जो प्रतिस्पर्धा कर सकें।
सरकारी सब्सिडी के मामले में कुमार स्थानीय मूल्यवर्धन, रोजगार, कर राजस्व और सुरक्षा लाभों को तौलने का सुझाव देते हैं। 3 अरब डॉलर की फाउंड्री के लिए 2.5 अरब डॉलर की सरकारी सहायता की उनकी काल्पनिक मिसाल इसी संतुलन को दिखाती है; यह भारत में घोषित परियोजना नहीं है।
अगले मिशन चरण का विवरण अलग-अलग रिपोर्टों में अलग है। एक रिपोर्ट में 1.27 लाख करोड़ रुपये का बजट बताया गया है, जबकि दूसरी में करीब 11 अरब डॉलर के संभावित कार्यक्रम का जिक्र है। इन आंकड़ों को एक पक्के आवंटन के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। खबरों के अनुसार कृष्णन की प्राथमिकताओं में डिजाइन, पैकेजिंग, परीक्षण, सामग्री और आपूर्ति एकीकरण शामिल हैं।
अगले ठोस पड़ावों में 2026 के अंत तक CG Semi का विस्तार लक्ष्य, दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 में Tata की असम इकाई का संभावित उद्घाटन और Jewar परियोजना का 2028 तक संचालन लक्ष्य शामिल हैं। Jewar में हर महीने 20,000 वेफर बनाने की योजना है। वास्तविक व्यावसायिक उत्पादन, आपूर्तिकर्ताओं की मानक-अनुरूपता और फैब्रिकेशन परियोजनाओं में प्रगति, केवल फैक्ट्रियों की गिनती से भारत की क्षमताओं का कहीं बेहतर माप देंगे।
मुख्य बिंदु
- सितंबर 2026 में घोषित भारत के पांच चालू सेमीकंडक्टर संयंत्र असेंबली, पैकेजिंग और परीक्षण पर केंद्रित थे, बड़े पैमाने के वेफर फैब्रिकेशन पर नहीं।
- 2021 में मंजूर 76,000 करोड़ रुपये का कार्यक्रम फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, डिजाइन और अन्य सेमीकंडक्टर तकनीकों को समर्थन देता है।
- CG Semi, Micron और Kaynes ने साणंद में उत्पादन आगे बढ़ाया है, जबकि असम में Tata की परियोजना पायलट चरण में पहुंच गई है।
- जगीरोड में Tata की पैकेजिंग इकाई और धोलेरा का वेफर फैब, सेमीकंडक्टर निर्माण के अलग-अलग चरणों में काम करेंगे।
- चीन से बाहर आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने से किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता घटती है, लेकिन आयातित सामग्री और उपकरणों पर निर्भरता काफी बनी रहती है।
- ओडिशा की ग्लास सब्सट्रेट परियोजना उन्नत पैकेजिंग क्षमता स्थापित करना चाहती है; व्यावसायिक प्रदर्शन अभी साबित होना बाकी है।
- कुशल श्रमिक, मानक-अनुरूप आपूर्तिकर्ता और मापने योग्य घरेलू मूल्य तय करेंगे कि चालू संयंत्र व्यापक सेमीकंडक्टर उद्योग में कितना योगदान देते हैं।






