निर्वाचित ग्राम परिषदें बहाल करने के लिए तीन महीने
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। साथ ही, इस अवधि में निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी है। फैसले में मौजूदा चुनावी ढांचे को बरकरार रखा गया है, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल है। इस बीच, अधिकारी नए आरक्षण अभ्यास के लिए साक्ष्य जुटाने के तरीके को लेकर जांच के दायरे में हैं।
विषय-सूची
- निर्वाचित ग्राम परिषदें बहाल करने के लिए तीन महीने
- अदालत ने क्या आदेश दिया
- खंडपीठ के सामने 11 याचिकाएं क्यों पहुंचीं
- निवर्तमान ग्राम प्रधान क्या कर सकते हैं
- आगरा के आंकड़ों से ओबीसी सर्वेक्षण पर सवाल
- ट्रिपल टेस्ट क्यों महत्वपूर्ण है
- कार्यक्रम तय करने की जिम्मेदारी किसकी है
- विवाद के पीछे की तारीखें
- सरकार के विकल्प और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
- मुख्य बिंदु
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने 11 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। इनमें छह जनहित याचिकाएं थीं। इन मामलों में चुनाव में देरी और मई 2026 में निर्वाचित पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी।
फैसला सुरक्षित रखने से पहले न्यायाधीशों ने करीब तीन घंटे तक दलीलें सुनीं। इसके बाद बुधवार को फैसला सुनाया गया। विस्तृत लिखित आदेश अभी अपलोड नहीं हुआ था और फैसला सुनाने की सटीक तारीख नहीं बताई गई। इसलिए चुनाव पूरा करने की निश्चित कैलेंडर तारीख अभी उपलब्ध नहीं है।
फैसले में दो परस्पर जुड़ी समस्याओं पर विचार किया गया है: निर्वाचित प्रतिनिधियों को कैसे बहाल किया जाए और मतदान पूरा होने तक गांवों की सेवाएं कैसे जारी रखी जाएं। अदालत ने प्रशासकों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं। उसने चुनावों के लिए समयसीमा तय करते हुए अस्थायी व्यवस्था जारी रखने की अनुमति दी।
उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारियां ओबीसी आरक्षण तय करने की प्रक्रिया के कारण अटकी हुई हैं। मतदाता सूची का काम पूरा हो चुका है, लेकिन आरक्षित सीटों के बारे में फैसले लंबित हैं। फैसले में सरकार और चुनाव अधिकारियों से आगे बढ़ने को कहा गया है, ताकि चुनाव का कार्यक्रम ओबीसी आयोग का जारी काम पूरा होने पर निर्भर न रहे।
अदालत ने क्या आदेश दिया
खंडपीठ ने मौजूदा नियमों और ढांचे के तहत चुनाव कराने का निर्देश दिया और 27 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था बरकरार रखी। ओबीसी आयोग बिना किसी बाधा के अपना काम जारी रख सकता है, लेकिन चुनाव कराने के लिए उसका काम पूरा होना अनिवार्य शर्त नहीं है।
आरक्षण का अर्थ है किसी खास समूह के पात्र उम्मीदवारों के लिए निर्वाचित पदों का एक तय हिस्सा अलग रखना। चुनाव अधिकारियों के लिए यह तय करना कि कौन-से पद आरक्षित होंगे, एक व्यावहारिक कदम है: नामांकन और मतदान की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले उम्मीदवारों को पात्रता के नियमों की जानकारी होनी चाहिए।
कार्यवाही में ग्राम प्रधानों, ब्लॉक स्तर की क्षेत्र पंचायतों के सदस्यों और जिला पंचायतों के सदस्यों के चुनाव शामिल थे। ये तीनों मिलकर राज्य में ग्रामीण स्थानीय शासन के तीन स्तर बनाते हैं। अस्थायी प्रशासकों को लेकर विवाद का बड़ा हिस्सा ग्राम पंचायतों से जुड़ा था, जहां निवर्तमान प्रधानों को प्रशासन का कामकाज जारी रखने के लिए नियुक्त किया गया था।
लिखित आदेश में आरक्षण की समयसीमा स्पष्ट किया जाना जरूरी है। अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन ने कहा कि चुनावों के लिए तय तीन महीने की अवधि में आरक्षण निर्धारण पूरा करना होगा, जबकि याचिकाकर्ता राय साहब यादव ने चुनाव के लिए तीन महीने के साथ आरक्षण तय करने के लिए छह महीने का जिक्र किया। चुनाव को लेकर मुख्य निर्देश स्पष्ट है: आयोग की व्यापक प्रक्रिया पूरी होने से स्वतंत्र रूप से, मौजूदा ढांचे के तहत तीन महीने के भीतर मतदान होना चाहिए।
खंडपीठ के सामने 11 याचिकाएं क्यों पहुंचीं
इम्तियाज हुसैन की याचिका में विस्तृत चुनाव कार्यक्रम मांगा गया था, ताकि मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जाए। इसमें कहा गया था कि चुनाव 26 मई 2026 तक या उससे पहले होने चाहिए थे। दशरथ यादव, अनिल कुमार, अकबर अंसारी और हेमचंद्र भी याचिकाकर्ताओं में शामिल थे।
11 में से छह मामले जनहित याचिकाएं थे। इसका अर्थ है कि वे केवल किसी व्यक्ति के विवाद के बजाय जनता को प्रभावित करने वाले मुद्दे पर अदालत के हस्तक्षेप की मांग कर रहे थे। इन याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की गई, क्योंकि वे चुनाव में देरी और प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित थीं।
याचिकाओं में सरकार के 25 मई के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। हुसैन ने कहा कि याचिकाओं का उद्देश्य समय पर चुनाव कराकर निर्वाचित प्रतिनिधित्व बहाल करना था। अदालत ने प्रशासक नियुक्तियों और वैधानिक व्यवस्था की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं, साथ ही अधिकारियों को चुनाव पूरा करने का निर्देश दिया।
निवर्तमान ग्राम प्रधान क्या कर सकते हैं
सरकार की प्रशासक व्यवस्था 27 मई 2026 से लागू होनी थी। नए पंचायतों के गठन तक या अधिकतम छह महीने के लिए जिलाधिकारियों को निवर्तमान ग्राम प्रधानों की औपचारिक नियुक्ति का अधिकार दिया गया था। फैसले के तहत निवर्तमान प्रधान चुनावों के लिए तय तीन महीने की अवधि में प्रशासक बने रह सकते हैं।
प्रशासकों को नियमित काम करने की अनुमति थी। इसमें स्वच्छता बनाए रखना, पेयजल सेवाएं और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करना, छोटे प्रशासनिक मामलों को संभालना और सरकारी योजनाओं की सामान्य निगरानी करना शामिल था। उन्हें बड़े नीतिगत फैसले लेने, नई योजनाएं शुरू करने और बड़े वित्तीय निर्णय लेने से रोका गया था।
निवासियों के लिए इसका मतलब है कि पहले ग्राम परिषदों का संचालन करने वाले लोग मतदान की तैयारियां जारी रहने के दौरान रोजमर्रा की सेवाओं से जुड़े काम संभालते रह सकते हैं। उनकी अस्थायी भूमिका में नए निर्वाचित जनादेश की तुलना में कम अधिकार हैं, खासकर नई नीतियों और बड़े खर्च के मामलों में।
अदालत के फैसले से चुनावों के लिए अनिश्चितकालीन इंतजार को स्वीकार किए बिना प्रशासनिक निरंतरता बनी रहती है। नियुक्तियों पर लागू सीमाओं के अधीन, मौजूदा प्रशासनिक काम और विकास गतिविधियां जारी रह सकती हैं, जबकि सरकार और निर्वाचन आयोग निर्वाचित परिषदों की वापसी के लिए चुनाव आयोजित करेंगे।
आगरा के आंकड़ों से ओबीसी सर्वेक्षण पर सवाल
आरक्षण प्रक्रिया को लेकर खंडपीठ की चिंताओं का सबसे स्पष्ट उदाहरण आगरा जिले से सामने आया। 9 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत ने सवाल उठाया कि आयोग ने 3 लाख से अधिक ओबीसी आबादी का आकलन कैसे किया, जबकि अखबारों में विज्ञापन के बाद सिर्फ 179 लोग उसके पास पहुंचे और केवल 29 लोगों के बयान दर्ज किए गए।
इन आंकड़ों से न्यायाधीशों की चिंता का पैमाना सामने आता है। 179 प्रतिभागी बताई गई आबादी के 0.06 प्रतिशत से भी कम थे, जबकि दर्ज किए गए 29 बयान आयोग तक पहुंचे लोगों के करीब 16 प्रतिशत के थे। खंडपीठ ने पूछा कि इस प्रक्रिया से विभिन्न समुदायों के बारे में पर्याप्त साक्ष्य कैसे जुट सकते हैं।
न्यायाधीशों ने मैदानी अध्ययन न होने पर सवाल उठाए और पूछा कि रिपोर्ट कार्यालय में बैठकर तैयार की गई प्रतीत क्यों होती है। वे जानना चाहते थे कि आयोग जाति के आधार पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन कैसे कर रहा है, बजाय इसके कि सार्वजनिक सूचनाओं के जवाब में आए कुछ ही लोगों की प्रतिक्रियाएं जुटाई जाएं।
आयोग ने अदालत को बताया कि 40 जिलों में आंकड़े जुटाने का काम पूरा हो गया है और बाकी जिलों में काम आगे होगा। खंडपीठ ने यह भी कहा कि आयोग के गठन के बाद बनाई गई सलाहकार समिति ने उससे कोई बैठक नहीं की थी, जबकि इस प्रक्रिया को शुरू हुए करीब पांच महीने हो चुके थे।
न्यायाधीशों ने 14 अक्टूबर दोपहर तक आगरा में किए गए काम का विस्तृत ब्योरा मांगा। इस निर्देश से आंकड़ों के पीछे की पद्धति पर ध्यान गया: आयोग ने किन लोगों से संपर्क किया, कौन-से साक्ष्य जुटाए और तय समय में उनका आकलन करने की क्या योजना बनाई।
ट्रिपल टेस्ट क्यों महत्वपूर्ण है
स्थानीय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट की जरूरतों पर आयोग से सवाल करते समय खंडपीठ ने डॉ. के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ और सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
सरल शब्दों में, ट्रिपल टेस्ट के तहत एक समर्पित आयोग को स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में पिछड़ेपन का अध्ययन करना होता है, संबंधित स्थानीय निकायों में आरक्षण तय करने के लिए सिफारिशें देनी होती हैं और कुल आरक्षण पर निर्धारित सीमा का पालन सुनिश्चित करना होता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य आरक्षित पदों को स्थानीय शासन में प्रतिनिधित्व के साक्ष्यों से जोड़ना है।
न्यायाधीशों ने पूछा कि आयोग ने अनुभवजन्य आंकड़े कैसे जुटाए और उनका आकलन कैसे करेगा। अनुभवजन्य आंकड़ों से आशय अवलोकन, सर्वेक्षण, अभिलेखों या वास्तविक परिस्थितियों से जुड़े अन्य साक्ष्यों के माध्यम से जुटाई गई जानकारी से है। यहां सवाल यह था कि आयोग के काम में विभिन्न क्षेत्रों के ओबीसी समुदायों की परिस्थितियां किस तरह दर्ज हुईं।
आगरा की आबादी और भागीदारी के आंकड़ों ने इस मुद्दे को ठोस रूप दिया। लाखों निवासियों का अध्ययन कर रहे आयोग को उन समुदायों तक पहुंचने और उनका आकलन करने की पद्धति चाहिए, जो अखबार में सूचना देखकर जवाब देने वाले छोटे समूह से आगे जाती हो। अदालत ने उस पद्धति का ब्योरा मांगा, साथ ही व्यापक प्रक्रिया को चुनाव से अलग जारी रखने की अनुमति दी।
कार्यक्रम तय करने की जिम्मेदारी किसकी है
हुसैन ने संविधान के अनुच्छेद 243ई का हवाला देते हुए दलील दी कि पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पांच साल से अधिक नहीं हो सकता और चुनाव समय पर पूरे होने चाहिए। उनकी याचिका में मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने से पहले कार्यक्रम मांगा गया था, न कि ऐसी व्यवस्था जो निर्वाचित परिषदों का कार्यकाल खत्म होने के बाद ही शुरू हो।
राज्य निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12-बीबी का हवाला दिया। उसका तर्क था कि ग्राम प्रधानों के आम चुनाव या उपचुनाव की तारीख तय करने वाली अधिसूचना जारी करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और यह काम आयोग से परामर्श करके किया जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें व्यावहारिक सहयोग की जरूरत दिखाती हैं। सरकार को उसे सौंपे गए अधिसूचना और आरक्षण संबंधी फैसले लेने होंगे, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव प्रक्रिया आयोजित करनी होगी। अदालत ने इससे पहले आयोग से अपनी तैयारियों का हलफनामा मांगा था और अगली सुनवाई से पहले पूरा चुनाव कार्यक्रम रिकॉर्ड पर रखने की अपेक्षा की थी।
आरक्षण की तैयारी के लिए ओबीसी आयोग से इतर प्रशासनिक काम भी जरूरी है। कार्यवाही के दौरान पंचायती राज विभाग ने आरक्षण तय करने के लिए समिति बनाने का काम शुरू नहीं किया था, जबकि निर्वाचन आयोग ने इसका अनुरोध किया था। बताया गया कि इस प्रक्रिया में करीब दो महीने लगेंगे और 2026 के लिए पद तय करने में 2015 तथा 2021 की आरक्षण व्यवस्थाओं का इस्तेमाल होगा।
विवाद के पीछे की तारीखें
मुकदमेबाजी की शुरुआत पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराने की मांग के साथ हुई। बाद में इसमें निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने के सरकार के फैसले और ओबीसी आयोग के काम की गुणवत्ता का मुद्दा भी शामिल हो गया।
- 17 मार्च: अदालत ने तैयारियों और संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव पूरे हो पाने के बारे में राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।
- 25 मई 2026: सरकार ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का फैसला किया।
- 26 मई 2026: हुसैन की याचिका में इसे चुनाव पूरा करने की अंतिम तारीख बताया गया।
- 27 मई 2026: प्रशासक व्यवस्था लागू होनी थी।
- 9 अक्टूबर: खंडपीठ ने ओबीसी आयोग के मैदानी काम और आगरा में दर्ज सीमित भागीदारी पर सवाल उठाए।
- 14 अक्टूबर, दोपहर: अदालत ने आयोग से आगरा में किए गए काम की विस्तृत जानकारी मांगी।
- इसके बाद बुधवार को सुनाया गया फैसला: खंडपीठ ने तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया और इस अवधि में निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बने रहने की अनुमति दी।
घटनाक्रम से पता चलता है कि अंतिम निर्देश केवल मतदान की समयसीमा तय करने तक सीमित नहीं है। खंडपीठ के फैसले तक विवाद में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होना, अस्थायी प्रशासन और आरक्षण पर अधूरा काम, तीनों शामिल हो चुके थे।
सरकार के विकल्प और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। सरकार तीन महीने के निर्देश का पालन कर सकती है, सुप्रीम कोर्ट से राहत मांग सकती है या समयसीमा खत्म होने से पहले हाईकोर्ट से अधिक समय देने का अनुरोध कर सकती है।
विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) के जरिए सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती पर विचार करने का अनुरोध किया जाता है। सरकार स्थगनादेश मांग सकती है, जिससे संबंधित निर्देश पर रोक लग जाएगी, या अतिरिक्त समय देने का अनुरोध कर सकती है। इसके बजाय हाईकोर्ट में आवेदन देकर उसके आदेश में संशोधन या समीक्षा की मांग की जा सकती है। किसी भी बदलाव के लिए अदालत का फैसला जरूरी होगा।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि चुनाव मार्च या अप्रैल में हो जाने चाहिए थे और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पार्टी को हार का डर था। उनकी टिप्पणियां फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया थीं, जबकि मंत्री ने फैसले का स्वागत किया था।
अब तत्काल काम स्पष्ट हैं: मौजूदा ढांचे के लिए जरूरी आरक्षण व्यवस्था तय करना, आवश्यक अधिसूचना जारी करना और अदालत की समयसीमा के अनुरूप कार्यक्रम प्रकाशित करना। ओबीसी आयोग इसी दौरान साक्ष्य जुटाने का काम जारी रख सकता है। चुनाव पूरे होने तक ग्राम प्रशासन निवर्तमान प्रधानों के हाथों में रहेगा और उनकी अस्थायी शक्तियों पर लागू सीमाओं के तहत नियमित सेवाएं जारी रहेंगी।
मुख्य बिंदु
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव पूरे कराने का निर्देश दिया।
- न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने 11 याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें छह जनहित याचिकाएं थीं।
- चुनाव मौजूदा ढांचे के तहत होंगे और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रहेगा।
- ओबीसी आयोग चुनाव प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से अपना काम जारी रख सकता है।
- निवर्तमान ग्राम प्रधान चुनाव अवधि में प्रशासक बने रह सकते हैं, लेकिन बड़े नीतिगत और वित्तीय फैसले नहीं ले सकते।
- अदालत ने आगरा की सर्वेक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठाए: 3 लाख से अधिक ओबीसी निवासी, 179 प्रतिभागी और 29 दर्ज बयान।
- आरक्षण की समयसीमा को स्पष्ट करने समेत विस्तृत लिखित आदेश का इंतजार था।
- सरकार सुप्रीम कोर्ट से राहत मांग सकती है या हाईकोर्ट से समय बढ़ाने का अनुरोध कर सकती है।






