आर्थिक वृद्धि लौटी, लेकिन परिवारों की बहाली अधूरी
श्रीलंका में 2024 और 2025, दोनों वर्षों में वास्तविक आर्थिक वृद्धि 5% रही। इसके बाद 2026 की पहली छमाही में वृद्धि 4.7% दर्ज की गई। फिर भी करीब दो-तिहाई कामगार अनौपचारिक रोजगार में हैं और 2025 में गरीबी का अनुमान 16.9% था। ये आंकड़े श्रीलंका के इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिसी स्टडीज की वार्षिक रिपोर्ट की केंद्रीय चुनौती को रेखांकित करते हैं: बहाल आर्थिक स्थिरता को आय, रोजगार और संकटों से निपटने की क्षमता में टिकाऊ सुधार में बदलना।
विषय-सूची
- आर्थिक वृद्धि लौटी, लेकिन परिवारों की बहाली अधूरी
- कड़ी वित्तीय सीमाओं के भीतर अलग विकास मॉडल
- निर्यात वृद्धि मुख्यतः मौजूदा उत्पादों पर निर्भर रही
- राजस्व बढ़ा, फिर भी निवेश पर दबाव
- अनौपचारिक रोजगार से बहाली का लाभ सीमित
- कृषि व्यवसाय रोजगार, निर्यात और खाद्य सुरक्षा को जोड़ते हैं
- जलवायु सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को निवेश योजना में शामिल करना जरूरी
- सामाजिक सहायता संकटों के सबसे अधिक जोखिम वाले कुछ परिवारों तक नहीं पहुंचती
- क्षेत्रीय योजना में अर्थव्यवस्था और जनसंख्या के बदलावों का तालमेल जरूरी
- मुख्य बिंदु
संस्थान की प्रमुख रिपोर्ट, Sri Lanka: State of the Economy 2026: Policy Choices for Durable Growth, का तर्क है कि देश खर्च के उन तौर-तरीकों पर वापस नहीं लौट सकता जिन्होंने 2022 के संकट से पहले उसे असुरक्षित बना दिया था। सरकारी खर्च बढ़ाने या विदेशी मुद्रा संसाधनों पर दबाव डालने की सीमित गुंजाइश के बीच, रिपोर्ट अधिक निजी निवेश, उच्च उत्पादकता और अधिक प्रतिस्पर्धी निर्यात की जरूरत बताती है।
विश्व बैंक का अक्टूबर 2026 का Sri Lanka Development Update, जिसका शीर्षक From Recovery to Transformation है, भी समानांतर आकलन पेश करता है। उसके अनुसार लगातार 12 तिमाहियों की वृद्धि के बाद वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद संकट से पहले के स्तर पर लौट आया है। मजबूत औद्योगिक गतिविधि, निवेश में वृद्धि और टिकाऊ सेवा क्षेत्र ने इस बहाली को सहारा दिया है।
हालांकि, विश्व बैंक इस बहाली को अधूरी और असमान बताता है। श्रम बाजार के संकेतक अब भी पीछे हैं, गरीबी संकट से पहले के स्तर से ऊपर बनी हुई है और महंगाई के नए दबावों ने परिवारों के कल्याण में हुए कुछ सुधारों को आंशिक रूप से मिटा दिया है। राष्ट्रीय उत्पादन का पहले के स्तर पर लौटना यह नहीं दर्शाता कि परिवारों की खरीद क्षमता या रोजगार सुरक्षा भी पहले जैसी हो गई है।
दोनों आकलनों को साथ पढ़ने पर खोए हुए उत्पादन की भरपाई और बेहतर जीवन स्तर कायम रखने में सक्षम अर्थव्यवस्था बनाने के बीच का फर्क सामने आता है। अगले चरण में श्रीलंका क्या उत्पादन करता है, कारोबार कैसे निवेश करते हैं और व्यवधान आने पर कामगारों व परिवारों को कैसे सुरक्षा मिलती है, इसमें बदलाव जरूरी हैं।
कड़ी वित्तीय सीमाओं के भीतर अलग विकास मॉडल
IPS का कहना है कि 2022 के शिखर के मुकाबले महंगाई में काफी कमी आई है, बाहरी ऋण का पुनर्गठन आगे बढ़ा है और विदेशी मुद्रा भंडार अधिक सहज स्तर पर पहुंचा है। इन उपलब्धियों से बेहतर शुरुआत मिलती है, लेकिन सार्वजनिक वित्त और आयात तथा विदेशी देनदारियों के भुगतान की देश की क्षमता को सुरक्षित रखने की जरूरत खत्म नहीं होती।
रिपोर्ट की घोषणा करते हुए आर्थिक नीति पर शोध करने वाले संस्थान IPS ने पिछले दृष्टिकोण की सीमाएं बताईं:
श्रीलंका अब विकास के कारक के रूप में ऋण से वित्तपोषित खर्च, कर रियायतों या आयात-प्रधान उपभोग पर निर्भर नहीं रह सकता।
विकल्प है उत्पादकता बढ़ाना, यानी श्रम, पूंजी और अन्य संसाधनों की एक निश्चित मात्रा से होने वाले उत्पादन को बढ़ाना। बेहतर कौशल, अधिक विश्वसनीय बुनियादी ढांचा और अधिक दक्ष कारोबार लगातार बढ़ते उधार पर निर्भर हुए बिना इस बदलाव को सहारा दे सकते हैं।
सीमित राजकोषीय और बाहरी गुंजाइश वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह फर्क अहम है। राजकोषीय गुंजाइश का अर्थ है ऋण की स्थिरता को नुकसान पहुंचाए बिना सरकार की खर्च करने की क्षमता। बाहरी गुंजाइश से आशय आयात के वित्तपोषण और विदेशों में देनदारियां चुकाने के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा संसाधनों से है। उधारी और आयात की मांग तेजी से बढ़ाने वाली वृद्धि बहाली पर फिर दबाव डाल सकती है।
विश्व बैंक ने 2026 में 4.4% और 2027 में 4.2% वृद्धि का अनुमान लगाया है। ये पूरे कैलेंडर वर्ष के अनुमान हैं, जबकि 2026 की पहली छमाही में 4.7% वृद्धि दर्ज की गई थी। ये अनुमान IPS के शोध में चर्चा किए गए 7% के मध्यम अवधि के विकास लक्ष्य से भी कम हैं।
- 2022: आर्थिक संकट ने राजकोषीय और बाहरी कमजोरियों को उजागर किया।
- 2024 और 2025: वास्तविक GDP में दोनों वर्षों में 5% की वृद्धि हुई।
- 2026 की पहली छमाही: उत्पादन में 4.7% वृद्धि हुई और लगातार 12 तिमाहियों की वृद्धि का क्रम पूरा हुआ।
- अक्टूबर 2026: IPS की वार्षिक रिपोर्ट और विश्व बैंक के अपडेट ने अगले चरण के केंद्र में निवेश, निर्यात और उत्पादकता को रखा।
- 2027: विश्व बैंक ने 4.2% वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि मौजूदा IMF कार्यक्रम उसी वर्ष समाप्त होने वाला है।
निर्यात वृद्धि मुख्यतः मौजूदा उत्पादों पर निर्भर रही
IPS के शोध का अनुमान है कि 2008 के बाद से श्रीलंका की निर्यात वृद्धि का लगभग 95% हिस्सा उसके मौजूदा निर्यात उत्पादों की अधिक बिक्री से आया है। उस अवधि में शुरू किए गए करीब 1,000 नए उत्पादों में से केवल 43 प्रतिस्पर्धी बन पाए।
शोध में दिए गए लगभग कुल आंकड़े के आधार पर देखें तो नए उत्पादों में यह हिस्सा करीब 4% है। ये आंकड़े बताते हैं कि निर्यात में विविधता लाने के लिए केवल नए उत्पाद शुरू करना पर्याप्त नहीं है: कारोबारों को विदेशी बाजारों में टिकाऊ ढंग से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता भी बनानी होगी।
शोध में व्यापार समझौतों और घरेलू टैरिफ सुधार की सिफारिश की गई है। इसमें तरजीही बाजार पहुंच पर निर्भर रहने के जोखिम बताए गए हैं, जिसे आय स्तर में बदलाव या शर्तों के अनुपालन के आधार पर वापस लिया जा सकता है। हालांकि, शोध नए समझौतों का समय तय नहीं करता और न ही यह सुनिश्चित करता है कि बातचीत से अनुकूल शर्तें मिलेंगी।
एक प्रस्तावित सुधार पैरा-टैरिफ हटाना है। ये सामान्य सीमा शुल्क के अलावा आयात पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्क हैं। IPS के शोध के अनुसार, इन शुल्कों से आयात VAT की गणना का आधार बढ़ जाता है और वास्तविक बोझ वैधानिक 18% VAT दर से अधिक हो जाता है।
इन शुल्कों को सरल बनाने से लागत घट सकती है और व्यापार नियमों को समझना आसान हो सकता है। राजस्व में होने वाली कमी को बजट अनुमानों में शामिल करना होगा और बढ़ती आयात प्रतिस्पर्धा का सामना करने वाले कारोबारों को बदलाव के दौरान सहायता देनी होगी। शोध व्यापार समायोजन सहायता की सिफारिश करता है, क्योंकि आयात शुल्क में बदलाव से छोटी घरेलू कंपनियों की नौकरियां और आय जोखिम में पड़ सकती हैं।
राजस्व बढ़ा, फिर भी निवेश पर दबाव
IPS के शोध में चर्चा किए गए आंकड़ों के अनुसार, सरकारी राजस्व 2022 में GDP के 8.2% से बढ़कर 2025 में 16.6% हो गया। यह 8.4 प्रतिशत अंक की वृद्धि है और अर्थव्यवस्था में राजस्व की हिस्सेदारी पहले के स्तर से दोगुने से कुछ अधिक हो गई।
हालांकि, राजकोषीय समायोजन के दौरान सार्वजनिक निवेश GDP के 5% से घटकर 3% रह गया। दो प्रतिशत अंक की यह गिरावट अर्थव्यवस्था में उसकी हिस्सेदारी में 40% की कमी दर्शाती है। यह अंतर दिखाता है कि केवल राजस्व संग्रह बढ़ने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि उत्पादकता को सहारा देने वाले बुनियादी ढांचे और अन्य निवेशों के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध होगा।
शोध में कर दरों को और बढ़ाने की सिफारिश नहीं की गई है, लेकिन अनुपालन में असमानता, अनौपचारिकता और छूटों के कारण करों में कटौती को भी जल्दबाजी बताया गया है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का अनुपात 40:60 बताया गया है। प्रत्यक्ष कर आम तौर पर आय या संपत्ति पर लगाए जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च के जरिए वसूले जाते हैं।
2027 में IMF कार्यक्रम समाप्त होने के बाद की अवधि के लिए प्रस्तावों में कर आधार को व्यापक बनाना, छूट घटाना, स्वरोजगार करने वाले लोगों और अधिक आय वालों के बीच अनुपालन सुधारना तथा डिजिटल कर प्रशासन का उपयोग शामिल है। ये नीतिगत सिफारिशें हैं, सरकार की घोषित कर योजना नहीं।
सार्वजनिक निवेश की गुणवत्ता भी एक प्राथमिकता है। सीमित धन का बेहतर उपयोग करने के लिए परियोजनाओं का विश्वसनीय मूल्यांकन, पारदर्शी खरीद प्रक्रिया, प्रभावी क्रियान्वयन और मापने योग्य परिणाम जरूरी हैं। परियोजनाओं के चयन और कार्यान्वयन में सुधार किए बिना अधिक खर्च करने से जरूरी नहीं कि बेहतर बुनियादी ढांचा या तेज वृद्धि हासिल हो।
अनौपचारिक रोजगार से बहाली का लाभ सीमित
करीब दो-तिहाई कामगारों के अनौपचारिक रोजगार में होने के व्यापक अनुमान को IPS के शोध का अधिक सटीक आंकड़ा समर्थन देता है: 2024 में कुल रोजगार का 66.5%। दोनों विवरण एक-दूसरे के अनुरूप हैं: एक को गोल करके बताया गया है, जबकि दूसरे में वर्ष और प्रतिशत दिया गया है।
IPS के अनुसार, अनौपचारिक कामगारों के पास औपचारिक अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा का कवरेज नहीं होता। ऐसे रोजगार से लोगों को आय तो मिल सकती है, लेकिन औपचारिक नौकरियों से जुड़े संरक्षण नहीं। इसलिए राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ने पर भी कई कामगारों की आय बाधित होने और सीमित सहायता मिलने का जोखिम बना रहता है।
यह समस्या बहुत छोटे कार्यस्थलों में खास तौर पर केंद्रित है। शोध के अनुसार, अनौपचारिक वेतनभोगी कर्मचारियों में करीब 60% ऐसे प्रतिष्ठानों में काम करते हैं जहां पांच से कम नियमित कर्मचारी हैं। प्रशासनिक क्षमता की कमी और श्रम व सामाजिक सुरक्षा दायित्वों का सीमित अनुपालन इस स्तर पर सुधार को कठिन बनाते हैं।
प्रस्तावों में सरल कर व्यवस्था, डिजिटल पंजीकरण, छोटी कंपनियों के अनुकूल अंशदान नियम, ऋण तक बेहतर पहुंच और नियमों का पालन न करने पर कड़े दंड शामिल हैं। इनका साझा उद्देश्य औपचारिक रोजगार शुरू करना आसान बनाना और उससे जुड़े संरक्षणों को अधिक भरोसेमंद करना है।
कौशल एक अलग बाधा है। श्रम बल सर्वेक्षण 2024 के आधार पर IPS का अनुमान है कि ज्ञान-आधारित कामगारों में केवल 34.1% के पास तृतीयक शिक्षा की योग्यता है। सुझाए गए उपायों में तकनीकी कामगारों के लिए कम अवधि के तृतीयक कार्यक्रम, विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा, छात्रों के लिए वित्तीय सहायता और कुशल कामगारों को श्रीलंका में बने रहने के प्रोत्साहन शामिल हैं।
कृषि व्यवसाय रोजगार, निर्यात और खाद्य सुरक्षा को जोड़ते हैं
विश्व बैंक कृषि व्यवसाय को विकास, रोजगार, निर्यात और गरीबी घटाने का संभावित कारक मानता है। उसके आंकड़े बताते हैं कि खेती से आगे भी यह क्षेत्र क्यों अहम है: प्राथमिक कृषि का GDP में हिस्सा 8% है, जबकि व्यापक कृषि-खाद्य प्रणाली उत्पादन में करीब छठा हिस्सा, रोजगार में 40% से अधिक और वस्तु निर्यात में लगभग एक-तिहाई योगदान देती है।
कृषि-खाद्य प्रणाली में खेतों में उत्पादन के अलावा प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और वितरण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इसका उत्पादन में योगदान प्राथमिक कृषि के हिस्से से लगभग दोगुना है। इससे पता चलता है कि उत्पादन और अंतिम बिक्री के बीच की गतिविधियों पर कितनी आर्थिक गतिविधि निर्भर करती है।
विश्व बैंक नीतिगत विकृतियों, निवेश के कमजोर प्रोत्साहनों, सीमित मूल्यवर्धन, बुनियादी ढांचे की कमियों और भूमि व वित्त तक सीमित पहुंच को बाधाएं बताता है। वह चाय, नारियल, दालचीनी, समुद्री खाद्य और रबर-आधारित विनिर्माण में सफलता का भी उल्लेख करता है।
मूल्यवर्धन का अर्थ किसी उत्पाद को इस तरह संसाधित या बेहतर करना है कि उससे सामान्य कच्चे माल के मुकाबले अधिक कमाई हो। ऐसी गतिविधियों में आगे बढ़ने से आय बढ़ सकती है, लेकिन इस बदलाव के लिए कारोबारों को निवेश, भरोसेमंद बुनियादी ढांचे और बाजारों तक पहुंच की जरूरत है।
IPS के शोध का अनुमान है कि पिछले दशक में कृषि की कुल कारक उत्पादकता सालाना केवल 0.3% बढ़ी, जबकि पूरे दक्षिण एशिया में यह वृद्धि 1.6% थी। यह माप बताता है कि श्रम, भूमि, पूंजी और अन्य संसाधनों का संयुक्त उपयोग कितनी दक्षता से होता है। श्रीलंका की दर 1.3 प्रतिशत अंक कम थी, जो दक्षता वृद्धि में बड़े अंतर को दर्शाती है।
जलवायु-सहिष्णु खेती, जल प्रबंधन, भंडारण और वितरण से उत्पादन के नुकसान और उपभोक्ताओं तक खाद्य पहुंचाने, दोनों से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान दिया जा सकता है। ये निवेश उत्पादकता के एजेंडे को जलवायु व्यवधानों से सुरक्षा से जोड़ते हैं, बजाय इसके कि कृषि सुधार और आपदा तैयारी को अलग-अलग काम माना जाए।
जलवायु सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को निवेश योजना में शामिल करना जरूरी
IPS ने चक्रवात दितवाह और वैश्विक ऊर्जा झटकों का उल्लेख करते हुए कहा है कि घरेलू वित्तीय नीतियों के दायरे से बाहर की घटनाएं भी आर्थिक स्थिरता को कमजोर कर सकती हैं। आपदा से उत्पादन और परिवहन बाधित हो सकते हैं, कृषि उत्पादन घट सकता है और विकास प्राथमिकताओं के लिए रखा सार्वजनिक धन आपातकालीन बहाली में लग सकता है।
संस्थान ने नवीकरणीय ऊर्जा, खाद्य प्रणालियों, बुनियादी ढांचे और आपदा तैयारी को निवेश की प्राथमिकताएं बताया है। नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने से अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर घट सकता है। निवेश के फैसले लेने वाले विनिर्माताओं, किसानों, पर्यटन कारोबारों और निर्यातकों के लिए भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा भी महत्वपूर्ण है।
केवल नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। IPS का शोध ऊर्जा बदलाव के दौरान बिजली पारेषण में निवेश सुरक्षित रखने की भी सिफारिश करता है। पारेषण नेटवर्क बिजली उत्पादन केंद्रों से उन जगहों तक बिजली पहुंचाते हैं जहां उसका उपयोग होता है। इसलिए अतिरिक्त क्षमता से परिवारों और कारोबारों को बिजली देने के लिए ये जरूरी हैं।
इन प्रस्तावों में वित्तपोषित निर्माण कार्यक्रम, खरीद की समय-सारणी या विशिष्ट परियोजनाओं को पूरा करने की तारीख तय नहीं की गई है। इनकी व्यावहारिक कसौटी यह है कि परियोजनाओं का चयन, वित्तपोषण और क्रियान्वयन उन कमजोरियों को दूर करता है या नहीं जो उत्पादन और परिवारों की आय को झटकों के जोखिम में डालती हैं।
सामाजिक सहायता संकटों के सबसे अधिक जोखिम वाले कुछ परिवारों तक नहीं पहुंचती
IPS का शोध श्रीलंका की सामाजिक सहायता योजना अस्वेसुमा के दायरे में एक असंगति बताता है। सबसे गरीब 20% परिवारों में, संकटों के सबसे अधिक जोखिम वाले परिवारों तक सहायता की पहुंच 55% है, जबकि सबसे कम जोखिम वाले परिवारों में यह 63% है।
आठ प्रतिशत अंक का यह अंतर बताता है कि अधिक जोखिम वाला समूह ज्यादा असुरक्षित होने के बावजूद कम कवरेज में है। यह सहायता को बेहतर ढंग से लक्षित करने की ठोस वजह है, बजाय इसके कि केवल गरीबी की स्थिति से आपदा में नुकसान की आशंका का सही अंदाजा मान लिया जाए।
प्रस्तावों में एकीकृत कल्याण प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करना और एक व्यापक, नियमित रूप से अद्यतन सामाजिक रजिस्ट्री बनाना शामिल है। परिवारों की जानकारी को आपदा जोखिम और जलवायु आंकड़ों से जोड़ने पर संकट आने पर सहायता की जरूरत वाले लोगों की पहचान में मदद मिल सकती है।
IPS का शोध पहले से वित्तपोषण की व्यवस्था करने और आपात स्थिति में लाभ बढ़ाने के लिए पूर्व-निर्धारित संकेतक व प्रक्रियाएं बनाने की भी सिफारिश करता है। इसका उद्देश्य नुकसान हो जाने के बाद हर बार नए वित्तपोषण के फैसले की शुरुआत करने के बजाय सहायता को समय पर उपलब्ध कराना है।
श्रम सुधार के साथ यह पहल इसलिए भी अहम है। सीमित रोजगार सुरक्षा वाले कामगार और आपदा से प्रभावित परिवारों को एक साथ कई तरह के नुकसान झेलने पड़ सकते हैं। बेहतर लक्ष्यीकरण और तेज सहायता, सामाजिक सुरक्षा को विकास रणनीति से अलग रखे बिना, परिवारों को अधिक सुरक्षा दे सकती है।
क्षेत्रीय योजना में अर्थव्यवस्था और जनसंख्या के बदलावों का तालमेल जरूरी
IPS की रिपोर्ट अधिक समावेशी विकास रणनीति के हिस्से के रूप में बुनियादी ढांचे में निवेश, क्षेत्रीय विकास, शहरीकरण और बदलती जनसंख्या के रुझानों की जांच करती है। रोजगार के अवसरों, परिवहन और जरूरी सेवाओं को लोगों के रहने और काम करने की जगहों के अनुरूप बनाने के लिए समन्वित योजना जरूरी है।
2024 की जनगणना में जनसंख्या घनत्व और बुनियादी ढांचे तक पहुंच के मानकों का उपयोग करते हुए IPS ने पश्चिमी प्रांत की शहरी आबादी का अनुमान लगभग 61% लगाया है। यह उन मानकों पर आधारित शोध अनुमान है, न कि ऐसा आंकड़ा जिसे अपने आप प्रांत के आधिकारिक शहरी वर्गीकरण के रूप में माना जाना चाहिए।
चर्चित प्रस्तावों में कोलंबो में स्वचालित नंबर प्लेट पहचान और डिजिटल भुगतान के जरिए भीड़भाड़ शुल्क लगाना शामिल है। ऐसी व्यवस्था में तय भीड़भाड़ वाली सड़कों या क्षेत्रों का उपयोग करने वाले वाहनों से शुल्क लिया जाएगा। यह एक सिफारिश है, घोषित योजना नहीं; इसकी सीमाएं, शुल्क या शुरुआत की तारीख तय नहीं की गई है।
वार्षिक रिपोर्ट की सिफारिशों में व्यापार, राजकोषीय प्रबंधन, श्रम बाजार, शहरीकरण, ऊर्जा, कृषि, सामाजिक सुरक्षा और मानव पूंजी विकास शामिल हैं। इनका साझा उद्देश्य उत्पादक क्षमता बढ़ाना और यह जोखिम घटाना है कि 2022 के बाद हुई प्रगति किसी नए झटके से उलट जाए।
अभी यह तय नहीं है कि सिफारिशें वित्तपोषित कार्यक्रमों, लागू किए गए सुधारों या क्रियान्वयन की समय-सीमाओं में कैसे बदलेंगी। अगली तय समय-सीमाएं 2027 के लिए विश्व बैंक का विकास अनुमान और उसी वर्ष मौजूदा IMF कार्यक्रम की निर्धारित समाप्ति हैं। ये योजना बनाने की समयावधि बताते हैं, IPS के एजेंडे को अपनाने की समय-सारणी नहीं।
मुख्य बिंदु
- 2024 और 2025, दोनों वर्षों में वास्तविक GDP 5% बढ़ा और 2026 की पहली छमाही में 4.7% की वृद्धि हुई।
- विश्व बैंक ने 2026 में 4.4% और 2027 में 4.2% वृद्धि का अनुमान लगाया है। 2025 में गरीबी का अनुमान 16.9% था।
- IPS ने उधारी और आयात मांग पर फिर निर्भर होने के बजाय निजी निवेश, उत्पादकता वृद्धि और प्रतिस्पर्धी निर्यात की सिफारिश की है।
- 2024 में 66.5% नौकरियां अनौपचारिक रोजगार में थीं, जिससे रोजगार सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण सीमित होते हैं।
- IPS के शोध के अनुसार, 2008 के बाद से निर्यात वृद्धि का लगभग 95% हिस्सा मौजूदा उत्पादों से आया।
- व्यापक कृषि-खाद्य प्रणाली 40% से अधिक रोजगार और वस्तु निर्यात के करीब एक-तिहाई हिस्से को सहारा देती है।
- जलवायु तैयारी, ऊर्जा निवेश और बेहतर लक्ष्यीकरण वाली सहायता प्रमुख सिफारिशें हैं, लेकिन क्रियान्वयन की तारीखें तय नहीं हैं।






