सर्वसम्मत मत से कोशी के नाम पर फिर विचार का रास्ता खुला
नेपाल की कोशी प्रांतीय विधानसभा ने नए कार्य-संचालन नियम सर्वसम्मति से अपनाए हैं। इनके तहत कुल सदस्यों के एक-तिहाई सदस्य प्रांत का नाम बदलने का प्रस्ताव दे सकते हैं। शनिवार को बिराटनगर में नौवें सत्र के समापन से पहले लिया गया यह फैसला विधानसभा की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाता है, लेकिन प्रांत का नाम क्या होना चाहिए, इस संवेदनशील राजनीतिक सवाल का हल नहीं करता।
विषय-सूची
- सर्वसम्मत मत से कोशी के नाम पर फिर विचार का रास्ता खुला
- नियम 212 प्रस्ताव को विधानसभा तक कैसे पहुंचाता है
- नाम को लेकर विवाद से व्यापक नियमों में हुई देरी
- पहली नियमावली से शनिवार के समझौते तक
- प्रक्रिया पर दलों का समर्थन नाम तय नहीं करता
- सदन के बाहर भी पहचान से जुड़ी मांगें जारी
- महिलाओं और पूर्व विधायकों के लिए नए मंच
- ऑनलाइन बैठकें और लंबित फैसले
- मुख्य बातें
मुख्य प्रावधान, नियम 212, बताता है कि नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 295(2) के तहत पहले से तय प्रांत के नाम में संशोधन कैसे मांगा जा सकता है। विधानसभा के कुल सदस्यों के एक-तिहाई के समर्थन वाला प्रस्ताव औपचारिक प्रक्रिया में आ सकता है, लेकिन नाम बदलने के लिए अब भी दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। बदलाव का प्रस्ताव देने की अनुमति मिलना किसी नए नाम की मंजूरी नहीं है।
नियमों में महिला विधायकों के लिए व्यवस्था, पूर्व सदस्यों से परामर्श और आपात स्थितियों में ऑनलाइन बैठकों का प्रावधान भी है। इनके अपनाए जाने तक नवंबर 2022 में चुनी गई विधानसभा अपने पहले कार्यकाल में बनाए गए नियमों के तहत काम कर रही थी।
मसौदा समिति के अध्यक्ष रेवती रमण भंडारी ने समिति की रिपोर्ट पेश की, जिसका नाम प्रांतीय विधानसभा नियम मसौदा समिति रिपोर्ट, 2083 बीएस बताया गया। विधायकों ने इसके सिद्धांतों पर चर्चा की और इसे सर्वसम्मति से मंजूर किया। सीपीएन (यूएमएल) के मुख्य सचेतक रमेश कुमार बस्नेत और नेपाली कांग्रेस के मुख्य सचेतक गोपाल तामांग ने भी इसका समर्थन किया।
रिपोर्टों में तारीख का उल्लेख अलग-अलग है: शुरुआती विवरण में असोज 24, जबकि बाद के विवरणों में असोज 25 दिया गया है। हालांकि, वे इस बात पर सहमत हैं कि मतदान शनिवार को नौवें सत्र के समापन से पहले हुआ। विवरणों के अनुसार, मसौदा तैयार करने में करीब चार साल लगे। सामाजिक विकास मंत्री गीता तिम्सिना ने भी चार साल के काम का उल्लेख किया।
नियम 212 प्रस्ताव को विधानसभा तक कैसे पहुंचाता है
नई प्रक्रिया विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई सदस्यों के समर्थन से शुरू होती है। वे विधायक प्रांत के नाम में बदलाव या संशोधन का प्रस्ताव विधानसभा सचिव को सौंप सकते हैं। इस सीमा का संबंध कुल सदस्य संख्या से है, न कि किसी खास बैठक में मौजूद विधायकों की संख्या से।
अगले चरण में सचिव प्रस्ताव अध्यक्ष के सामने रखते हैं। इसके बाद अध्यक्ष कार्य सलाहकार समिति से परामर्श करके चर्चा की तारीख और समय तय करते हैं। यह समिति विधानसभा के कामकाज की व्यवस्था करती है।
ये प्रावधान प्रस्ताव सौंपने का रास्ता और बहस का समय तय करने वाले प्राधिकारी, दोनों को स्पष्ट करते हैं। इससे अलग नाम चाहने वाले विधायकों को एक निर्धारित संसदीय प्रक्रिया मिलती है और उनकी मांग केवल राजनीतिक बातचीत या सदन के बाहर प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रहती।
संख्यात्मक अंतर अब भी निर्णायक है। प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक-तिहाई समर्थन पर्याप्त है, जबकि अंतिम फैसले के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए। यह संख्या पहली सीमा से दोगुनी है। यानी प्रस्ताव देने के लिए पर्याप्त बड़ा समूह भी नाम बदलने के लिए काफी व्यापक समर्थन जुटाए बिना सफल नहीं हो सकता।
इसलिए कार्य-संचालन नियमों पर सर्वसम्मत मतदान को कोशी का नाम बदलने के पक्ष में सर्वसम्मति नहीं माना जाना चाहिए। विधायकों ने ऐसी प्रक्रिया पर सहमति जताई जिसके जरिये मुद्दा उठाया जा सकता है। उस मतदान में किसी वैकल्पिक नाम को मंजूरी नहीं मिली और रिपोर्टों में नाम संशोधन का कोई प्रस्ताव सौंपे जाने या उस पर बहस की तारीख तय होने की जानकारी नहीं है।
नाम को लेकर विवाद से व्यापक नियमों में हुई देरी
विधानसभा नए नियम अपनाने में इसलिए भी मुश्किल में रही क्योंकि इस पर मतभेद था कि प्रांत के नाम पर फिर विचार किया जा सकता है या नहीं। यूएमएल का कहना था कि नाम तय हो चुका है और नियमों में उसे बदलने का प्रावधान जरूरी नहीं है। कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक चाहते थे कि विधानसभा में नाम बदलने पर चर्चा का रास्ता हो।
माघ 23, 2079 बीएस को विधायक लीलाबल्लभ अधिकारी की अगुवाई में 11 सदस्यीय समिति बनाई गई। उसने मसौदा तैयार किया, लेकिन दल संशोधनों पर सहमत नहीं हो सके। बाद में भंडारी के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय कार्यदल ने पाठ में संशोधन किया और विवादित प्रावधानों पर सहमति बनाने की दिशा में काम किया।
भंडारी के साथ नामित अन्य चार सदस्य खगेश्वरी पौडेल, नारायण बहादुर मगर, निमसरी राजवंशी और निर्मला लिम्बू थे। भंडारी ने कहा कि अंतिम नियम दलों के बीच आम सहमति को दर्शाते हैं और उनका मकसद विधानसभा के कामकाज की अस्पष्टताएं दूर करना है।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पहले के एक प्रस्ताव में कहा गया था कि यदि 25 प्रतिशत विधायक चाहें तो नाम के मुद्दे पर चर्चा हो सकेगी। अपनाए गए प्रावधान में नाम संशोधन का प्रस्ताव देने के लिए एक-तिहाई, यानी लगभग 33.3 प्रतिशत, सदस्यों का समर्थन जरूरी है। यह पहले सुझाई गई सीमा से करीब 8.3 प्रतिशत अंक अधिक है, हालांकि दोनों प्रस्तावों को अलग-अलग प्रक्रियात्मक शब्दों में बताया गया था।
मतदान से पहले अध्यक्ष अम्बर बहादुर बिष्ट ने बताया था कि प्रयास असहमत दलों के खिलाफ बहुमत के दम पर नियम पारित करने के बजाय सर्वसम्मति बनाने पर केंद्रित थे। अधिकारी ने कहा कि सत्तारूढ़ गठबंधनों में बदलाव के बाद दलों के रुख बदलने से भी कुछ मुश्किलें आईं। अंतिम मतदान से उस प्रक्रियात्मक असहमति का हल निकला जिसने व्यापक दस्तावेज को अटका रखा था।
पहली नियमावली से शनिवार के समझौते तक
नाम का सवाल और विधानसभा की विरासत में मिली कार्य-संचालन नियमावली को बदलने की कोशिश साथ-साथ आगे बढ़ी। पहली विधानसभा प्रांत का नाम तय नहीं कर पाई, जबकि दूसरी ने कोशी नाम अपनाया और फिर इस बात पर सहमति बनाने में कठिनाई हुई कि उस फैसले पर दोबारा विचार कैसे किया जा सकता है।
मुख्य पड़ाव इस प्रकार रहे:
- 2074 बीएस: पहली प्रांतीय विधानसभा ने अपने कार्य-संचालन नियम अपनाए, लेकिन अपने कार्यकाल में प्रांत का नाम तय नहीं किया।
- चैत्र 10, 2075 बीएस: मूल कार्य-संचालन नियमों में संशोधन किया गया।
- 20 नवंबर 2022: चुनाव के बाद दूसरी प्रांतीय विधानसभा बनी।
- माघ 23, 2079 बीएस: लीलाबल्लभ अधिकारी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय मसौदा समिति गठित की गई।
- 1 मार्च 2023, या फाल्गुन 17, 2079 बीएस: विधानसभा ने दो-तिहाई से अधिक बहुमत से पूर्व प्रांत 1 का नाम कोशी रखा।
- फाल्गुन 19, 2081 बीएस: नियमों पर सहमति बनाने के लिए अध्यक्ष को दलों के नेताओं, सचेतकों और आंतरिक मामलों एवं कानून मंत्री की बैठक बुलाने की सलाह दी गई।
- शनिवार, नौवें सत्र के समापन से पहले: विधानसभा ने नाम संशोधन की प्रक्रिया समेत नए नियम सर्वसम्मति से अपनाए।
यह सिलसिला दिखाता है कि नए नियम नियमित प्रशासन से आगे क्यों अहम हैं। विधानसभा ने पहले भारी बहुमत से नाम तय किया, फिर कई साल इस पर बातचीत की कि उसकी अपनी प्रक्रियाओं में उस फैसले पर दोबारा विचार की स्पष्ट अनुमति होनी चाहिए या नहीं।
प्रक्रिया पर दलों का समर्थन नाम तय नहीं करता
यूएमएल और कांग्रेस के मुख्य सचेतकों का समर्थन नियमों को सर्वसम्मति से पारित कराने में अहम रहा। उनके समर्थन से सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल उन नियमों के पक्ष में साथ आए, जिन पर पहले मतभेद के कारण सहमति नहीं बन पाई थी।
यूएमएल के मुख्य सचेतक रमेश कुमार बस्नेत ने विधायकों से कहा कि वे पहली विधानसभा के नियमों पर निर्भर रहने के बजाय अपने कार्यकाल में तैयार नियमावली को मंजूरी दें। उन्होंने सर्वसम्मत स्वीकृति का समर्थन किया:
"मौजूदा संदर्भ में ये नियम प्रासंगिक हैं। आइए, विधानसभा का काम पहली विधानसभा के बनाए नियमों के बजाय हमारे बनाए नियमों से चलाने की व्यवस्था करें। इसे सर्वसम्मति से मंजूरी दें," उन्होंने कहा।
कांग्रेस के मुख्य सचेतक गोपाल तामांग ने याद किया कि देरी की मुख्य वजह पहचान से जुड़ी चिंताएं और यह मांग थी कि विधायकों को सदन में नाम बदलने का प्रस्ताव देने की अनुमति कम से कम मिलनी चाहिए। उनके बयान में नई प्रक्रिया समझौते का मुख्य आधार थी, न कि मसौदे में किया गया कोई मामूली बदलाव।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के संसदीय नेता इंद्र बहादुर आंग्बो ने नाम बदलने के मुद्दे को शामिल किए जाने को अहम उपलब्धि बताया। पर्यटन, वन और पर्यावरण मंत्री खिनु लांग्वा ने भी कहा कि संशोधित नियम आगे प्रयास किए जाने पर सुधार या नाम बदलना संभव बनाते हैं।
इन प्रतिक्रियाओं से एक ही मतदान की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आती हैं। कोशी नाम पर फिर विचार के समर्थकों को अपनी मांग आगे बढ़ाने का अवसर दिखता है। यूएमएल का समर्थन विधानसभा की प्रक्रिया पर सहमति दर्शाता है, लेकिन अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पार्टी किसी दूसरे नाम के पक्ष में मतदान करेगी।
मुख्यमंत्री हिकमत कुमार कार्की ने उसी शनिवार को पारित सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होने वाली भाषाओं से संबंधित एक अलग विधेयक का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया। रिपोर्टों में नाम संशोधन के प्रावधान पर उनका कोई संबंधित सार्वजनिक बयान नहीं मिला। इस तरह का बयान न होना भविष्य के किसी प्रस्ताव पर उनके रुख को साबित नहीं करता।
सदन के बाहर भी पहचान से जुड़ी मांगें जारी
मार्च 2023 में नाम तय किए जाने के बाद क्षेत्र की जातीय और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाने वाले नाम की मांग करने वाले संगठनों ने विरोध किया। समूहों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया और प्रांत के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ काठमांडू में प्रदर्शन किए।
उस समय के माओवादी सेंटर, जिसे बाद के विवरणों में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का हिस्सा बताया गया, ने कोशी नाम के फैसले का समर्थन किया था। बाद में उसने अपनी उस स्थिति को गलती माना और फैसले पर फिर विचार का समर्थन करने का वादा किया। विधानसभा के मतदान के बाद भी उसने पार्टी कार्यक्रमों में प्रांत 1 नाम का इस्तेमाल जारी रखा और अपना विरोध जाहिर किया।
रिपोर्टों के अनुसार, जेन ज़ी आंदोलन के बाद विरोध अभियान कमजोर पड़ा, लेकिन कोशी नाम का विरोध जारी रहा। नियम अपनाए जाने से एक दिन पहले शुक्रवार को किरात राय यायोक्खा के आम सम्मेलन के उद्घाटन से पहले बिराटनगर में हुई रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विरोध जताया।
नए नियम इस जारी मांग को संभावित विधायी प्रक्रिया से जोड़ते हैं। वे यह गारंटी नहीं देते कि प्रदर्शनकारी संगठन विधानसभा में पर्याप्त समर्थन जुटा लेंगे और न ही यह तय करते हैं कि विधायक कौन-सा वैकल्पिक नाम रख सकते हैं।
व्यावहारिक बदलाव सीमित, लेकिन स्पष्ट है: विधायकों के पास अब नाम संशोधन का प्रस्ताव देने और उस पर चर्चा तय कराने का स्पष्ट रास्ता है। तय प्रक्रिया के जरिये विवाद सदन में आ सकता है, जबकि नाम को लेकर राजनीतिक बहस अनसुलझी बनी हुई है।
महिलाओं और पूर्व विधायकों के लिए नए मंच
अपनाए गए नियम नाम के सवाल तक सीमित नहीं हैं। इनमें महिला समन्वय समिति बनाने का प्रावधान है, जिसमें प्रांतीय विधानसभा की सभी महिला सदस्य शामिल होंगी। इसके काम में महिला विधायकों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर चर्चा और उनकी क्षमता बढ़ाने में मदद करना शामिल है।
यदि उपाध्यक्ष महिला हैं, तो वे स्वतः समिति की समन्वयक होंगी। यदि महिला उपाध्यक्ष नहीं हैं, तो समिति के सदस्य अपने बीच से समन्वयक चुनेंगे। इससे मंच की सदस्यता और नेतृत्व की व्यवस्था तय होती है।
नियम पूर्व विधायकों के अनुभव और सुझावों का लाभ लेने के लिए पूर्व सदस्य समन्वय समिति बनाने की भी अनुमति देते हैं। पूर्व सदस्य अपना समन्वयक खुद चुनेंगे। भंडारी ने इस व्यवस्था को ऐसा अनौपचारिक मंच बताया जो उनके अनुभव को विधानसभा से जोड़ता है।
ये व्यवस्थाएं अलग-अलग समूहों के लिए हैं: महिला समिति मौजूदा विधायकों को एक साथ लाती है, जबकि पूर्व सदस्यों की समिति पद छोड़ चुके लोगों से सलाह लेने का माध्यम बनाती है। इनमें से किसी को भी विधानसभा की निर्णय लेने की शक्ति का विकल्प नहीं बताया गया है। रिपोर्टों में बैठकों के कार्यक्रम, बजट या समितियों के काम शुरू करने के समय की जानकारी नहीं है।
ऑनलाइन बैठकें और लंबित फैसले
नियमों के तहत महामारी, आपदा या ऐसी परिस्थितियों में सूचना प्रौद्योगिकी के जरिये बैठकें की जा सकती हैं, जब सदस्यों का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना संभव न हो। इससे विधायकों के आमने-सामने नहीं मिल पाने की स्थिति में विधानसभा का कामकाज जारी रखने की व्यवस्था होती है।
आपातकालीन प्रावधान, विधानसभा के कामकाज की अस्पष्टताएं दूर करने के भंडारी के घोषित उद्देश्य के साथ जुड़ा है। यह नाम बदलने की प्रक्रिया से अलग प्रशासनिक बदलाव है। इसे शामिल किए जाने से पता चलता है कि अपनाया गया दस्तावेज संस्था के कामकाज के साथ-साथ उन मुद्दों को भी देखता है जिन पर वह चर्चा कर सकती है।
रिपोर्टों में किसी ऑनलाइन बैठक मंच, उपस्थिति सत्यापन या मतदान व्यवस्था का विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए दूरस्थ बैठकों के लिए कानूनी आधार को इस बात के प्रमाण से अलग समझना चाहिए कि कोई खास तकनीकी प्रणाली पहले से इस्तेमाल हो रही है।
नाम के मुद्दे पर अगला ठोस कदम कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई के समर्थन वाला नोटिस सचिव को सौंपना होगा। इसके बाद अध्यक्ष कार्य सलाहकार समिति के साथ चर्चा करके समय तय करेंगे। नियम पारित होने के विवरणों में प्रस्ताव दाखिल करने की कोई समय-सीमा, नाम पर चर्चा की तय तारीख या अंतिम मतदान की तारीख घोषित नहीं की गई है।
नतीजा प्रक्रिया पर पूरा हुआ समझौता है, जबकि ठोस फैसले अभी बाकी हैं। प्रांत का नाम कोशी ही है। इसे बदलने की किसी भी कोशिश को नई निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा और दो-तिहाई बहुमत हासिल करना होगा।
मुख्य बातें
- कोशी प्रांतीय विधानसभा ने अपने नौवें सत्र के समापन से पहले नए कार्य-संचालन नियम सर्वसम्मति से अपनाए।
- नियम 212 के तहत कुल सदस्यों के एक-तिहाई सदस्य प्रांत का नाम बदलने का प्रस्ताव देने के लिए नोटिस सौंप सकते हैं।
- नाम बदलने के अंतिम फैसले के लिए अब भी दो-तिहाई बहुमत जरूरी है।
- सचिव प्रस्ताव अध्यक्ष को भेजते हैं, जो कार्य सलाहकार समिति से परामर्श करके चर्चा का समय तय करते हैं।
- नियमों में महिला विधायकों और पूर्व सदस्यों की समितियों के साथ आपात स्थितियों में ऑनलाइन बैठकों का प्रावधान है।
- किसी वैकल्पिक नाम, सौंपे गए संशोधन प्रस्ताव या नाम पर चर्चा की तारीख की जानकारी नहीं है।






