जब युद्ध भारत के तट तक पहुंचा
4 मार्च, 2026 को इज़राइल-ईरान युद्ध हिंद महासागर तक ऐसे तरीके से पहुंचा, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता था। श्रीलंका के पास अमेरिका ने ईरानी नौसैनिक पोत IRIS Dena को डुबो दिया। यह पोत विशाखापत्तनम में भारत द्वारा आयोजित MILAN अंतरराष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा में हिस्सा लेकर लौट रहा था। इस घटना ने भारतीय रक्षा योजनाकारों के सामने एक कड़वी हकीकत उजागर की: हिंद महासागर क्षेत्र अब बड़ी शक्तियों के टकराव के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं है। पोत निहत्था था और एक कूटनीतिक अभ्यास से लौट रहा था, फिर भी उसे डुबो दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि आधुनिक युद्ध में मुठभेड़ के नियम कितनी तेजी से बदल रहे हैं। नई दिल्ली के लिए यह संघर्ष अब दूर की भू-राजनीतिक चिंता भर नहीं है। यह एक सक्रिय प्रयोगशाला बन गया है, जहां दुनिया भर की हथियार प्रणालियों को युद्ध की परिस्थितियों में परखा जा रहा है। इससे भारत को दुर्लभ जानकारी मिल रही है कि भविष्य के भीषण संघर्षों में उसका विविध सैन्य शस्त्रागार कैसा प्रदर्शन कर सकता है। खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय नागरिकों और भारत के कच्चे तेल के 80 प्रतिशत से अधिक आयात के पश्चिम एशिया से आने के कारण, इस युद्ध के राष्ट्रीय सुरक्षा पर तत्काल प्रभाव हैं, जो सैन्य पर्यवेक्षण से कहीं आगे तक जाते हैं।
विषय-सूची
भारत के सैन्य आधुनिकीकरण प्रयासों के लिहाज से इस संघर्ष का समय विशेष रूप से अहम है। पाकिस्तान के साथ हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर के हवाई संघर्षों में दृश्य सीमा से परे मिसाइल मुकाबले और बड़े पैमाने पर ड्रोन युद्ध देखने को मिला था। भारतीय योजनाकार पहले ही भीषण युद्ध से मिले सबक का विश्लेषण कर रहे हैं। साथ ही इज़राइल-ईरान युद्ध को देखने से यह तुलना करने का अनूठा अवसर मिलता है कि पश्चिमी, रूसी और स्वदेशी प्रणालियां आधुनिक रक्षा प्रणालियों के सामने कैसा प्रदर्शन करती हैं। भारत की सेना के पास दुनिया के सबसे विविध शस्त्रागारों में से एक है, जिसमें रूसी, अमेरिकी, फ्रांसीसी, इज़राइली और घरेलू स्रोतों से प्राप्त प्रणालियां शामिल हैं। इस विविधता के चलते खाड़ी संघर्ष का लगभग हर पहलू भारतीय सैन्य बलों की योजना के लिए प्रासंगिक जानकारी देता है, जिसमें स्टील्थ विमानों के अभियान, ड्रोन झुंड की रणनीति और बहुस्तरीय मिसाइल रक्षा शामिल हैं।
आधुनिक युद्ध की प्रयोगशाला
भारत के रक्षा योजनाकारों के लिए मौजूदा खाड़ी संघर्ष यह देखने का अभूतपूर्व अवसर है कि उन्नत सैन्य प्रणालियां वास्तविक युद्ध के दबाव में कैसा प्रदर्शन करती हैं। ऐसा पहले भी हो चुका है। 1991 का खाड़ी युद्ध दुनिया भर में सैन्य आधुनिकीकरण के लिए इसी तरह का उत्प्रेरक बना था और भारत, चीन समेत कई देशों को अपनी रक्षा रणनीतियों पर फिर से विचार करने के लिए प्रेरित किया था। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के विश्लेषण के अनुसार, 1991 के संघर्ष ने सटीक मार करने वाले हथियारों, संयुक्त अभियानों और वायु शक्ति के ऐसे मानक स्थापित किए, जो आज भी सैन्य योजना को प्रभावित करते हैं। मौजूदा संघर्ष इन सबकों को नए क्षेत्रों तक ले जाता है, खासकर मानवरहित प्रणालियों, निर्देशित ऊर्जा हथियारों और नेटवर्क से जुड़ी वायु रक्षा संरचनाओं के एकीकरण के मामले में।
ऐसे युद्ध को देखने का महत्व इस बात में है कि इससे सैद्धांतिक क्षमताओं और युद्धक्षेत्र की वास्तविकता के बीच की खाई का पता चलता है। शांतिकालीन मूल्यांकन अक्सर यह नहीं दिखा पाते कि दृढ़ संकल्प वाले विरोधियों की असममित रणनीतियों के सामने प्रणालियां कैसा प्रदर्शन करेंगी। IRIS Dena का डूबना दिखाता है कि समुद्री मुठभेड़ कितनी तेजी से बढ़ सकती है, जबकि हवाई अभियान बताते हैं कि एकीकृत वायु रक्षा प्रणालियों के सामने स्टील्थ विमान कितने प्रभावी हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो स्वदेशी क्षमताएं विकसित करने के साथ-साथ प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बीच रणनीतिक संतुलन बनाए रखता है, ये अवलोकन खरीद संबंधी फैसलों और सैन्य सिद्धांतों के विकास के लिए महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। यह संघर्ष दिखाता है कि युद्धक्षेत्र में सफलता किसी एक हथियार प्रणाली से कम और अलग-अलग क्षमताओं को जोड़कर व्यापक अभियानगत प्रभाव पैदा करने की कुशलता पर अधिक निर्भर करती है।
स्टील्थ और लंबी दूरी की मिसाइलों के दौर में हवाई युद्ध
मध्य पूर्व के ऊपर चल रहा हवाई युद्ध भारतीय वायु सेना के लिए कुछ सबसे उपयोगी सबक देता है। Lockheed Martin F-35 Lightning II और F-22 Raptor जैसे स्टील्थ विमान बेहद चुनौतीपूर्ण हवाई क्षेत्र में अभियान चला रहे हैं। इससे यह समझने का दुर्लभ अवसर मिल रहा है कि आधुनिक एकीकृत वायु रक्षा प्रणालियों के सामने कम दृश्यता वाले विमान कैसा प्रदर्शन करते हैं। भारत का अग्रिम पंक्ति का लड़ाकू विमान Dassault Rafale उन्नत एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं वाला शक्तिशाली चौथी पीढ़ी का प्लेटफॉर्म है। हालांकि, Rafale स्टील्थ विमान नहीं है। इस क्षमता की कमी को दूर करने के लिए एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के तहत स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित किया जा रहा है। ऐसे विमान उपलब्ध होने तक भारतीय वायु सेना भारी हमले वाले अभियानों के लिए Sukhoi Su-30MKI पर निर्भर है। इसकी भूमिका मोटे तौर पर F-15E Strike Eagle जैसी है, लेकिन इसमें हाल के अमेरिकी उन्नयन में दिखने वाली सेंसर फ्यूज़न और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की प्रगति नहीं है।
रणनीतिक बमवर्षकों की श्रेणी में इससे भी बड़ी कमी है। इस संघर्ष में Northrop Grumman B-2 Spirit और Boeing B-52 Stratofortress ने लंबी दूरी के हमले किए हैं। दोनों भारी पारंपरिक हथियारों को दुश्मन के रक्षा घेरे के भीतर तक ले जाने में सक्षम हैं। भारत के पास फिलहाल ऐसा कोई तुलनीय भारी बमवर्षक नहीं है और न ही इस क्षमता को हासिल करने का कोई सक्रिय कार्यक्रम है। इस कमी के कारण मानवयुक्त लड़ाकू विमानों को जोखिम में डाले बिना अंतरमहाद्वीपीय दूरी पर रणनीतिक हमले करने की क्षमता सीमित रहती है।
ऑपरेशन सिंदूर के हालिया युद्ध अनुभव इन अवलोकनों में एक और पहलू जोड़ते हैं। मई 2025 में पाकिस्तान के साथ हवाई संघर्षों के दौरान भारतीय बलों ने दृश्य सीमा से परे युद्ध की हकीकत का सामना किया, जहां लड़ाकू विमानों की पारंपरिक गतिशीलता की तुलना में सेंसर क्षमता और मिसाइल का प्रदर्शन अधिक निर्णायक साबित हुआ। पाकिस्तानी J-10 विमान से दागी गई चीनी डिजाइन की PL-15 मिसाइल से Rafale को मार गिराए जाने की आशंका, इस उन्नत फ्रांसीसी विमान का दुनिया में पहला युद्धक नुकसान है। पश्चिमी रक्षा विश्लेषक Rafale से दागी जाने वाली Meteor मिसाइल को सेवा में मौजूद सबसे सक्षम हवा-से-हवा हथियार मानते थे, लेकिन इस टकराव से पता चला कि चीनी मिसाइल तकनीक पहले के अनुमान से अधिक उन्नत हो सकती है। इससे संकेत मिलता है कि हवाई युद्ध में बढ़त अब अलग-अलग विमानों के कच्चे प्रदर्शन से अधिक सॉफ्टवेयर, सेंसर एकीकरण और आंकड़ों के आधार पर मानव निर्णय लेने की क्षमता पर निर्भर होती जा रही है।
ड्रोन क्रांति और झुंड रणनीतियां
हवाई युद्ध महत्वपूर्ण सबक देता है, लेकिन ड्रोन युद्ध रूपांतरकारी साबित हो रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले सबकों के बाद, खाड़ी संघर्ष ने आधुनिक युद्ध में मानवरहित प्रणालियों की केंद्रीय भूमिका को और पुख्ता किया है। General Atomics MQ-9 Reaper ने लगातार निगरानी और सटीक हमले की क्षमताओं को मिलाने की प्रभावशीलता एक बार फिर दिखाई है। भारत ने MQ-9B SeaGuardian और SkyGuardian संस्करणों की 31 इकाइयों का ऑर्डर दिया है, हालांकि उनकी आपूर्ति अभी शुरू नहीं हुई है। यह देरी खरीद प्रक्रिया की उन चुनौतियों को उजागर करती है, जिनसे अहम समय पर समुद्री निगरानी और हमले की क्षमताओं में कमी रह सकती है।
Shahed-136 डिजाइन से प्रेरित कम लागत वाले, एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले हमलावर ड्रोनों का प्रसार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कम कीमत वाले ड्रोनों के झुंड से उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को निष्प्रभावी करना इस संघर्ष की पहचान बन गया है। भारत के पास इज़राइली मूल का IAI Harop है, जो कई मायनों में अधिक सक्षम प्रणाली है, लेकिन इसकी संख्या तुलनात्मक रूप से कम है। स्वदेशी ड्रोन और मंडराते गोला-बारूद के कार्यक्रम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन खाड़ी संघर्ष से सामने आए पैमाने और तात्कालिकता का असर भारतीय बलों में इन्हें शामिल करने की गति में अभी पूरी तरह नहीं दिखा है। यह संघर्ष बताता है कि भविष्य के युद्धों में केवल उच्च क्षमता वाले मानवरहित प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे प्रणालियों की भी जरूरत होगी जिन्हें नुकसान पहुंचने के बावजूद स्वीकार किया जा सके और जो दुश्मन की रक्षा को संतृप्त कर सकें।
मिसाइल युद्ध और बहुस्तरीय वायु रक्षा
मिसाइल प्रणालियों ने इस संघर्ष में बड़ी भूमिका निभाई है और भारत की क्षमताओं से उनकी तुलना के कई अवसर दिए हैं। भारत की BrahMos क्रूज मिसाइल दुनिया की सबसे तेज परिचालन क्रूज मिसाइलों में से एक है, जो Mach 2.8 के करीब गति से उड़ती है। यह गति दूसरे देशों की कई सबसोनिक क्रूज मिसाइलों पर बढ़त देती है, हालांकि इसे अमेरिकी बमवर्षकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली AGM-158 JASSM जैसी प्रणालियों की स्टील्थ विशेषताओं के साथ संतुलित करना पड़ता है। भारत ने Rudram-1 भी विकसित की है, जिसका उद्देश्य दुश्मन के रडार तंत्रों को निशाना बनाना और भारतीय वायु सेना को AGM-88 HARM जैसी शत्रु वायु रक्षा दमन क्षमता देना है।
बैलिस्टिक मिसाइलों के क्षेत्र में, भारत की Agni मिसाइल श्रृंखला को ईरान की Shahab और Ghadr जैसी मिसाइलों की तुलना में अधिक जीवित रहने योग्य माना जाता है, क्योंकि इन्हें कैनिस्टर में रखने और सड़क मार्ग से चलित प्रक्षेपण व्यवस्था में इस्तेमाल करने की क्षमता है। आगे चलकर भारत की Shaurya और ईरान की Fattah मिसाइलों की भी तुलना हो सकती है। ये प्रणालियां दिखाती हैं कि उपग्रह निगरानी के दौर में गतिशीलता और छिपाव रणनीतिक प्रतिरोध में कैसे योगदान देते हैं।
भारतीय विश्लेषकों के लिए शायद सबसे उपयोगी सबक वायु और मिसाइल रक्षा के मुकाबले से मिल रहे हैं। Iron Dome, David Sling और Terminal High Altitude Area Defence प्रणाली से मिलकर बना इज़राइल का बहुस्तरीय रक्षा नेटवर्क रॉकेट, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों समेत वास्तविक खतरों के सामने परखा जा रहा है। भारत Akashteer नेटवर्क के जरिए इसी तरह की बहुस्तरीय व्यवस्था विकसित कर रहा है, जो Akash-NG जैसी प्रणालियों को एकीकृत ढांचे में जोड़ता है। लंबी दूरी के स्तर पर भारत S-400 Triumf का संचालन करता है, जबकि स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रयासों में Prithvi Air Defence और Advanced Air Defence जैसी प्रणालियां शामिल हैं।
निर्देशित ऊर्जा से होने वाली रक्षा एक और उभरता हुआ क्षेत्र है। इज़राइल के Iron Beam ने पारंपरिक अवरोधकों की तुलना में काफी कम लागत पर ड्रोन, रॉकेट और मिसाइलों को रोकने की क्षमता दिखाई है। भारत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित की जा रही Surya Directed Energy Weapon के जरिए ऐसी ही अवधारणा पर काम कर रहा है। 300 kW की प्रस्तावित प्रणाली से 20 किलोमीटर तक की मारक दूरी हासिल होने की उम्मीद है। यह ड्रोन, मिसाइल और अन्य हवाई खतरों को लगभग तुरंत निष्क्रिय कर सकती है। ऐसी क्षमताएं रक्षात्मक अर्थव्यवस्था में संभावित बड़ा बदलाव दर्शाती हैं: मिसाइल अवरोधकों पर प्रति अवरोध लाखों डॉलर के बजाय लेजर से दागे गए शॉट की लागत महज कुछ डॉलर हो सकती है।
नौसैनिक शक्ति और पानी के नीचे की कमजोरियां
इस संघर्ष ने सतही युद्ध से आगे की नौसैनिक क्षमताओं में महत्वपूर्ण कमियों को उजागर किया है। USS Nimitz और USS Gerald R. Ford जैसे अमेरिकी विमानवाहक पोत भारत के INS Vikramaditya और INS Vikrant की मौजूदा क्षमता से कहीं बड़े पैमाने पर हवाई अभियान जारी रखे हुए हैं। भारत के विमानवाहक पोत छोटे रनवे से उड़ान भरने की व्यवस्था इस्तेमाल करते हैं। इससे अमेरिकी पोतों पर इस्तेमाल होने वाली कैटापल्ट-सहायता प्राप्त प्रक्षेपण प्रणालियों की तुलना में विमानों का टेकऑफ वजन सीमित रहता है। इससे नौसैनिक विमानों की हथियार ले जाने की क्षमता और दूरी घटती है तथा विमानवाहक पोतों के युद्ध समूहों की लड़ाकू त्रिज्या और प्रहार क्षमता कम हो जाती है।
पानी के नीचे की क्षमताओं में इससे भी गंभीर कमी है। अमेरिकी नौसेना की Virginia श्रेणी की पनडुब्बियां पूरे युद्धक्षेत्र में गुप्त अभियान चला रही हैं। भारत के पास फिलहाल कोई परिचालन योग्य स्वदेशी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमला पनडुब्बी नहीं है और वह मुख्यतः प्रशिक्षण के लिए रूस से ऐसी पनडुब्बियां पट्टे पर लेता है। हिंद महासागर में भविष्य में संघर्ष होने पर परिचालन योग्य SSN बेड़े की अनुपस्थिति बड़ी रणनीतिक सीमा बन सकती है, जिससे भारतीय नौसेना समुद्री मार्गों को चुनौती देने या दुश्मन के सतही बेड़ों को प्रभावी ढंग से खतरा पहुंचाने में असमर्थ हो सकती है।
परंपरागत नौसैनिक युद्ध से परे, इस संघर्ष ने वैश्विक इंटरनेट यातायात को ले जाने वाले समुद्र के भीतर के केबल नेटवर्क की कमजोरियां उजागर की हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य केवल तेल टैंकरों के लिए अवरोध बिंदु नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व को जोड़ने वाले फाइबर ऑप्टिक केबलों का मार्ग भी है। भारत के लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय डेटा यातायात के इन केबलों से गुजरने के कारण, नौसैनिक गतिविधियों, जहाजों के लंगर से टकराने या जानबूझकर की गई तोड़फोड़ से होने वाला कोई भी नुकसान संचार और वित्तीय लेन-देन ठप कर सकता है। सुरक्षा चिंताओं के कारण इस क्षेत्र से केबल मरम्मत वाले पोतों के रवाना होने से खतरे बढ़ गए हैं। इससे समुद्री सुरक्षा का एक छिपा हुआ पहलू सामने आया है, जिसे योजनाकार अब अनदेखा नहीं कर सकते।
सुलगते क्षेत्र में कूटनीतिक संतुलन
इस संघर्ष से जुड़े सैन्य सबक नई दिल्ली के सामने गंभीर कूटनीतिक चुनौतियों के बीच सामने आ रहे हैं। यह युद्ध ईरान के रास्ते भारत की संपर्क परियोजनाओं, खासकर चाबहार बंदरगाह को बाधित करने का खतरा पैदा करता है। यह बंदरगाह भारतीय कारोबार के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया का एकमात्र प्रवेश द्वार है। ईरान के निष्क्रिय हो जाने से यह संपर्क टूट जाएगा और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिए चीन को अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव की जगह लेने का मौका मिलेगा। इस संघर्ष से खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले 90 लाख भारतीय नागरिकों को भी खतरा है, जिनकी ओर से भेजी गई धनराशि भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देती है।
ऊर्जा सुरक्षा भी एक तात्कालिक चिंता है। भारत के कच्चे तेल के 80 प्रतिशत से अधिक आयात पश्चिम एशिया से आते हैं, जिनमें ईरान और खाड़ी के अन्य देश शामिल हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने या कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि तनाव बढ़ने पर तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है, जिससे महंगाई बढ़ेगी और भारत का चालू खाते का घाटा दबाव में आएगा। सरकार ने पहले ही यात्रा संबंधी परामर्श जारी किए हैं और नागरिकों की सुरक्षा पर नजर रख रही है। साथ ही, कोच्चि पहुंचे IRIS Lavan जैसे संकटग्रस्त ईरानी पोतों के आगमन का प्रबंधन भी कर रही है। इस व्यवस्था के तहत सभी पक्षों की सुरक्षा चिंताओं को संतुष्ट करने के लिए पोतों के चालक दल को सैन्य संपत्तियों से अलग रखा जा रहा है।
अमेरिका और खाड़ी के राजतंत्रों के साथ संबंध संभालते हुए इज़राइल और ईरान दोनों से रिश्ते बनाए रखने के लिए लगातार संतुलन साधना पड़ता है। नई दिल्ली के अधिकारियों की सावधानी से संतुलित विदेश नीति ऐसे संघर्ष में किसी एक पक्ष को चुनने से बचने का प्रयास करती है, जिसमें रणनीतिक साझेदार एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। इस संतुलन को साधना अहम है, क्योंकि भारत किसी बड़ी शक्ति को नाराज किए बिना क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना और रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहता है। यह दृष्टिकोण इस समझ को दर्शाता है कि किसी एक शक्ति के साथ स्वतः जुड़ने के बजाय स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भारत के दीर्घकालीन हितों के लिए सबसे बेहतर है।
स्वदेशी क्षमता की दिशा में प्रयास
शायद इस संघर्ष का सबसे गहरा सबक यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी दूसरों को नहीं सौंपी जा सकती। खाड़ी देश समझ रहे हैं कि जब अहम हितों में मतभेद हो तो अमेरिकी सुरक्षा की गारंटी भ्रामक साबित हो सकती है। खबरों के मुताबिक, क्षेत्र में मिसाइल अवरोधक खत्म हो गए हैं, जबकि अमेरिका ने इज़राइल को फिर से आपूर्ति देने को प्राथमिकता दी है। इससे 1999 के कारगिल युद्ध के बाद से भारतीय रक्षा नीति का मार्गदर्शन करने वाली आत्मनिर्भरता की प्राथमिकता की पुष्टि होती है। उस समय आयात पर निर्भरता ने महत्वपूर्ण कमजोरियां उजागर की थीं।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और निजी उद्योग साझेदारों ने विदेशी हथियारों पर निर्भरता घटाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। BrahMos मिसाइल, Tejas लड़ाकू विमान, तोपें और विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद जैसे प्रमुख स्वदेशी हथियार प्लेटफॉर्म की अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग है। 2024-25 वित्तीय वर्ष में रक्षा निर्यात लगभग 2.78 अरब डॉलर तक पहुंच गया। आयात का प्रतिशत घटकर 25 से 30 के बीच आ गया है, जो घरेलू उत्पादन की ओर सोच-समझकर किए गए बदलाव को दर्शाता है। संयुक्त अरब अमीरात का उदाहरण भी प्रासंगिक है। 1991 के खाड़ी युद्ध से मिले सबकों के बाद वहां के Edge रक्षा समूह ने गोलियों से लेकर उपग्रहों तक, कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर क्षमता विकसित की है। यह इस बात का एक समानांतर उदाहरण है कि क्षेत्रीय संघर्ष कैसे औद्योगिक आत्मनिर्भरता को गति दे सकते हैं।
हालांकि, सबसे उन्नत प्रणालियों को विकसित करने में चुनौतियां बनी हुई हैं। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमला पनडुब्बियों और रणनीतिक बमवर्षकों की कमी उन क्षेत्रों को दर्शाती है जहां स्वदेशी विकास की समयसीमा तत्काल जरूरतों से पीछे है। मौजूदा संघर्ष का सबक है कि मौजूदा क्षमताओं का एकीकरण नई क्षमताएं विकसित करने जितना ही महत्वपूर्ण है। सेंसर, हथियार प्रणालियों और कमान केंद्रों को एकीकृत संरचना में जोड़ने वाली नेटवर्क आधारित प्रणालियां, अलग-अलग प्लेटफॉर्म से अधिक युद्धक्षेत्र के नतीजे तय करेंगी। भारत के लिए रूसी, पश्चिमी और घरेलू प्रणालियों के विविध शस्त्रागार में यह एकीकरण हासिल करना आने वाले दशक की सबसे बड़ी चुनौती है।
क्या जानें
- 4 मार्च को श्रीलंका के पास ईरानी पोत IRIS Dena के डूबने से इज़राइल-ईरान युद्ध हिंद महासागर तक पहुंच गया और भारत के तात्कालिक सुरक्षा माहौल पर असर पड़ा।
- यह संघर्ष स्टील्थ विमानों, ड्रोन झुंड और बहुस्तरीय मिसाइल रक्षा समेत उन्नत सैन्य प्रणालियों के लिए वास्तविक युद्ध-परीक्षण का मैदान है। इससे भारत के विविध शस्त्रागार के लिए प्रासंगिक अभियानगत जानकारी मिल रही है।
- भारतीय वायु सेना उन्नत चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान चलाती है, लेकिन उसके पास खाड़ी के ऊपर युद्ध में दिखने वाली स्टील्थ और रणनीतिक बमवर्षक क्षमताएं नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ हालिया युद्ध ने दृश्य सीमा से परे मिसाइल तकनीक का महत्व भी उजागर किया।
- ड्रोन युद्ध रूपांतरकारी तत्व बनकर उभरा है। भारत MQ-9B प्रणालियों की आपूर्ति का इंतजार कर रहा है और कम लागत वाले झुंड हमलों का मुकाबला करने के लिए स्वदेशी मंडराते गोला-बारूद के कार्यक्रमों का विस्तार कर रहा है।
- S-400 और स्वदेशी अवरोधकों समेत भारत के बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा नेटवर्क के सामने बड़े पैमाने पर हमलों की नई चुनौतियां हैं। इससे Surya लेजर प्रणाली जैसे निर्देशित ऊर्जा हथियारों में रुचि बढ़ रही है।
- भारतीय नौसेना के पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमला पनडुब्बियां नहीं हैं और अमेरिकी मानकों की तुलना में विमानवाहक पोतों से हवाई अभियान चलाने की क्षमता सीमित है। समुद्र के भीतर के केबलों की कमजोरियों से इंटरनेट की अहम कनेक्टिविटी को खतरा है।
- खाड़ी क्षेत्र में 90 लाख भारतीय नागरिकों और भारत के 80 प्रतिशत तेल आयात के इसी क्षेत्र से आने के कारण, युद्ध से ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और चाबहार बंदरगाह जैसी संपर्क परियोजनाओं को खतरा है।
- यह संघर्ष रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का महत्व रेखांकित करता है। BrahMos और Tejas जैसी स्वदेशी प्रणालियां आयात पर निर्भरता घटा रही हैं और सालाना 2.78 अरब डॉलर तक पहुंचे निर्यात को बढ़ावा दे रही हैं।






