कोरिया के आखिरी सैकदोंग करघे के भीतर: उद्योग के खत्म होने के बाद भी कायम रही धारियां

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कोरिया के आखिरी सैकदोंग करघे के भीतर: उद्योग के खत्म होने के बाद भी कायम रही धारियां

गोंगजू में एक दुर्लभ शिल्प अब भी जीवित

दक्षिण चुंगचियोंग प्रांत के गोंगजू के बाहरी इलाके में स्थित एक साधारण कारखाने में करघों की लयबद्ध खटखट एक दुर्लभ कहानी कहती है। संस्थापक और सीईओ हान दू-ह्युम, जो अब 73 वर्ष के हैं, उस कार्यशाला की देखरेख करते हैं जिसे कोरिया की आखिरी पारंपरिक इकाई माना जाता है जहां अब भी असली सैकदोंग बुना जाता है। यह धारीदार कपड़ा अपनी चटख, खड़ी रंगीन पट्टियों से तुरंत पहचाना जाता है। उनकी कंपनी, डोंगवॉन टेक्सटाइल, उस शिल्प का आखिरी गढ़ बन गई है जिसे कभी देश भर में बुना जाता था और कोरियाई बच्चों की कई पीढ़ियां उत्सव के कपड़ों में पहनती थीं।

विषय-सूची
  1. गोंगजू में एक दुर्लभ शिल्प अब भी जीवित
  2. सैकदोंग क्या है और रंग क्यों मायने रखते हैं
  3. ओबांगसैक में रंगों का प्रतीकवाद
  4. रेशम से आधुनिक रेशों तक
  5. शाही बच्चों के कमरों से शादी के बिस्तरों तक: एक संक्षिप्त इतिहास
  6. छपी हुई और बुनी हुई धारियां
  7. डोंगवॉन टेक्सटाइल के करघा-कक्ष के भीतर
  8. बुना हुआ सैकदोंग अलग क्यों लगता है
  9. परिवार को सौंपना यह शिल्प
  10. आधुनिक नए रूपों से लौट रही हैं धारियां
  11. आज भी कहां दिखता है सैकदोंग
  12. संरक्षण और कारोबार की हकीकत
  13. डिजाइनर और शिक्षक कैसे मदद कर सकते हैं
  14. मुख्य बातें

सैकदोंग में रंगों से कहीं अधिक है। इसका पैटर्न ओबांगसैक से प्रेरित है, जो पूर्वी एशियाई ब्रह्मांड-विज्ञान के पांच मूल रंगों की पारंपरिक रंग-योजना है। इससे एक ऐसी दृश्य भाषा बनती है जिसे कोरियाई लोग लंबे समय से सामंजस्य, संतुलन और सौभाग्य से जोड़ते आए हैं। सदियों तक ये धारियां उत्सव और बच्चों की रक्षा का प्रतीक रहीं। जन्मदिनों और त्योहारों पर पहनी जाने वाली जैकेटों और ओवरकोटों में इनका इस्तेमाल होता था। इसे बनाने में समय लगता था और यह महंगा था, इसलिए पुराने दौर में यह विरासत में संभालकर रखा जाने वाला कपड़ा था।

औद्योगिक बदलाव ने इसकी हैसियत बदल दी। 20वीं सदी में कृत्रिम रेशों ने धारियों वाले कपड़ों को सस्ता और अधिक सुलभ बना दिया। बुने हुए सैकदोंग का इस्तेमाल कपड़ों, बिस्तर की चादरों और स्मृति-चिह्नों में होने लगा। 1970 और 1980 के दशकों में, चटख धारियों वाले शादी के बिस्तर प्रांतीय शहरों में दुल्हनों के दहेज का अहम हिस्सा थे, खासकर उन इलाकों में जहां कपड़ा-बुनाई की मजबूत परंपरा थी। फिर लोगों की पसंद बदल गई। पश्चिमी शैली के बिस्तरों ने मोटी शादी की रजाइयों की जगह ले ली और मशीन से छपी धारियों का चलन बुने हुए असली कपड़े से कहीं आगे निकल गया। हान ने 1987 में डोंगवॉन टेक्सटाइल शुरू की, ठीक उस समय जब उद्योग सिमट रहा था। वह करघे के साथ जुड़े रहे, क्योंकि उनका मानना था कि असली बुना हुआ सैकदोंग छपे हुए कपड़े से अधिक गहरे रंग और लंबी टिकाऊ उम्र देता है। आज उनकी कार्यशाला उन थोक विक्रेताओं को कपड़ा देती है जो पूरे कोरिया में हानबोक बनाने वालों और शिल्पकारों को आपूर्ति करते हैं। विरासत में नई दिलचस्पी और पारंपरिक पैटर्नों को संदर्भित करने वाले वैश्विक फैशन के चलन ने असली बुने हुए कपड़े की ओर ध्यान लौटाना शुरू कर दिया है। हान अगली पीढ़ी को धीरे-धीरे प्रशिक्षित कर रहे हैं। इनमें उनके बेटे और बहू भी शामिल हैं, ताकि करघे चलते रहें।

सैकदोंग क्या है और रंग क्यों मायने रखते हैं

सैकदोंग पांच से सात रंगीन पट्टियों से बना धारीदार कपड़ा है, जिनका क्रम आम तौर पर दोहराया जाता है। इसकी रंग-योजना ओबांगसैक से आती है, पांच रंगों की वह व्यवस्था जो ब्रह्मांड-विज्ञान को रोजमर्रा के सौंदर्य-बोध से जोड़ती है। अधिकांश ऐतिहासिक परिधानों में सैकदोंग बच्चों की जैकेट या ओवरकोट पर दिखता है, जहां चटख रंग उत्सव और अच्छे स्वास्थ्य की कामना का संकेत देते हैं।

ओबांगसैक में रंगों का प्रतीकवाद

पांच मूल रंग महज सजावट नहीं हैं। पारंपरिक व्यवस्था में नीला पूर्व और वसंत से, लाल दक्षिण और ग्रीष्म से, पीला केंद्र और धरती से, सफेद पश्चिम और पतझड़ से तथा काला उत्तर और शीत ऋतु से जुड़ा है। ये रंग अक्सर संतुलित क्रम में दिखाई देते हैं। इससे एक ऐसी लय बनती है जिसे पारंपरिक दर्शक प्रकृति के अनुशासन और पारिवारिक जीवन के कल्याण से जोड़ते हैं। कई आधुनिक बुनकर रंग-योजना में दो रंग और जोड़कर सात रंगों तक पहुंचते हैं। इससे संतुलन का पारंपरिक भाव बनाए रखते हुए कंट्रास्ट और चमक बढ़ सकती है।

रेशम से आधुनिक रेशों तक

पहले सैकदोंग रेशम या रामी जैसे महीन पौधों के रेशों से बुना जाता था। रंगाई के लिए पौधों और खनिजों से निकाले गए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता था। कपड़ा प्रौद्योगिकी आगे बढ़ने के साथ कारीगरों ने टिकाऊपन, लागत और रंग की स्थिरता के लिए रेयॉन और पॉलिएस्टर अपनाए। कपड़े की धारियां इस बात से बनती हैं कि करघे पर धागे कैसे लगाए जाते हैं। ताना धागे लंबाई की दिशा में चलते हैं और रंगीन पट्टियां बनाते हैं। बाना धागे चौड़ाई में एक-दूसरे के साथ गूंथे जाते हैं। जब बुनकर रंगीन ताने के हिस्सों को क्रम से लगाता है, तो करघा कपड़े में आर-पार जाने वाली साफ खड़ी धारियां बनाता है। यह तैयार कपड़े पर रंग छापने से अलग है, जिसमें रंग कपड़े की बनावट में गहराई तक शामिल होने के बजाय उसकी सतह पर स्याही के रूप में रहता है।

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शाही बच्चों के कमरों से शादी के बिस्तरों तक: एक संक्षिप्त इतिहास

कोरियाई इतिहास में धारीदार कपड़े के संदर्भ प्राचीन राज्यों के समय से मिलते हैं और जोसॉन काल में यह पैटर्न आम तौर पर पहचाना जाने लगा। आम लोगों की स्मृतियों में सैकदोंग अक्सर बच्चों के हानबोक की याद दिलाता है। कई कोरियाई लोगों को धारीदार आस्तीन वाली जोगोरी जैकेट पहने बच्चा या सर्दियों में पहना जाने वाला काच्ची तुरुमागी ओवरकोट याद आता है। इसे नए साल के समारोहों या पहले जन्मदिन पर पहना जाता था, जिसे तोलजांची कहा जाता है। समय के साथ ये धारियां बिस्तर के कपड़ों और उत्सवी साज-सामान तक भी पहुंचीं और कुलीनों की परंपराओं तथा पारिवारिक जीवन के बीच सेतु बनीं।

20वीं सदी के आखिरी दशकों में कहानी ने अलग मोड़ लिया। 1970 और 1980 के दशकों में सैकदोंग वाले चमकीले शादी के बिस्तरों का चलन बढ़ा, फिर 1990 के दशक में घरों के साज-सज्जा के तौर-तरीके बदलने के साथ मांग घट गई। छपाई करने वाले इससे मिलती-जुलती धारियां तेजी से और सस्ते में बना सकते थे। कई परिवारों ने अपनी परंपराओं में बदलाव किया और छपी हुई रजाइयां चुनीं या रस्मी बिस्तर का इस्तेमाल ही छोड़ दिया। कई बुनाई कारखाने बंद हो गए या उन्होंने अपनी मशीनों को दूसरे उत्पाद बनाने के लिए बदल दिया।

छपी हुई और बुनी हुई धारियां

छपे हुए सैकदोंग में आधार कपड़े की सतह पर रंगद्रव्य लगाकर पैटर्न बनाया जाता है। इसे जल्दी और कम लागत में बनाया जा सकता है, इसलिए यह स्मृति-चिह्नों या घर में इस्तेमाल होने वाली हल्की चीजों के लिए मुफीद है। बुने हुए सैकदोंग में रंगीन धागों से धारियां बनती हैं। रंग खुद धागे में होता है, जिससे कपड़े पर रोशनी पड़ने पर गहराई दिखती है और धोने तथा रोजमर्रा के इस्तेमाल के दौरान कपड़ा अधिक टिकता है। हर पट्टी के किनारे भी अधिक स्पष्ट दिखते हैं, क्योंकि रंग का बदलाव ताने के हिस्सों के मिलने पर, एक-एक धागे के स्तर पर होता है।

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डोंगवॉन टेक्सटाइल के करघा-कक्ष के भीतर

हान का उत्पादन-कक्ष तकलियों, रोलरों और शटल से बने एक छोटे ऑर्केस्ट्रा जैसा दिखता है। वह पहले ताने के रोलर पर छह या सात रंग लपेटते हैं। हर रंग की मात्रा इस तरह मापी जाती है कि साफ और दोहराया जाने वाला क्रम बने। करघे में धागे डालने के बाद मशीन रंगीन ताने के आर-पार बिना रंग का बाना गूंथती है और धारियों को कपड़े की बनावट में बांध देती है। ऑर्डर घटते-बढ़ते रहते हैं, इसलिए करघे रोज नहीं चलते। इसके बजाय हान तय चौड़ाइयों और रंग-संयोजनों में स्टॉक तैयार रखते हैं, ताकि हानबोक बनाने वालों या शिल्प स्टूडियो से मांग आने पर वे जल्दी भेज सकें।

करघे की तैयारी में एक शांत कलात्मकता है। रंगों का क्रम कपड़े का मिजाज बदल देता है और हर पट्टी में तनाव बराबर होना चाहिए, ताकि कपड़ा लहरदार न हो। कपड़े की अंतिम फिनिश भी मायने रखती है। डोंगवॉन का बुना हुआ सैकदोंग कपड़ों और सजावटी वस्तुओं के लिए काफी मजबूत है। कारीगरों को यह इस वजह से पसंद है कि इसकी सिलाइयां सपाट बैठती हैं और किनारे आकार बनाए रखते हैं। ज्यादातर उत्पादन थोक विक्रेताओं को जाता है। इससे छोटी-छोटी मांगों की पूर्ति पूरे देश में होती रहती है और कारखाने पर खुदरा बिक्री से जुड़ी व्यवस्थाओं का बोझ नहीं पड़ता।

बुना हुआ सैकदोंग अलग क्यों लगता है

जब लोग बुने हुए सैकदोंग की तुलना छपे हुए कपड़े से करते हैं, तो फर्क उन्हें जल्दी समझ आ जाता है। रंग अधिक गहरा दिखता है, क्योंकि उसका रंगीनपन स्याही की परत से नहीं, रंगे हुए रेशों से आता है। सतह पर ताने और बाने के मिलने से बनी छोटी-छोटी उभारदार रेखाएं दिखती हैं। इससे ऐसी हल्की बनावट बनती है जिसे कपड़ों और घरेलू सामान, दोनों में गुणवत्ता का संकेत माना जाता है। समय के साथ धारियां समान रूप से घिसती हैं, क्योंकि रंग पूरे धागे में होता है। यही एक अहम वजह है कि पारंपरिक कारीगर बुने हुए तरीके की अहमियत पर जोर देते हैं।

परिवार को सौंपना यह शिल्प

पारंपरिक बुनाई प्रशिक्षुता के जरिए सीखा जाने वाला शिल्प है। हान अपने बेटे और बहू को ताना लगाने, तनाव संतुलित करने और रंगों के क्रम को परखने का तरीका सिखा रहे हैं। परिवार के भीतर प्रशिक्षण से तकनीक बची रहती है। साथ ही, छोटे कारोबार में जोखिम भी बंटता है, जहां मशीनें दुरुस्त रखने और ऑर्डर पूरे करने के लिए भरोसेमंद और सावधान हाथों की जरूरत होती है।

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आधुनिक नए रूपों से लौट रही हैं धारियां

बदलता सांस्कृतिक माहौल सैकदोंग के पक्ष में काम कर रहा है। कोरियाई विरासत को दुनिया भर में नई पहचान मिल रही है और डिजाइनर पारंपरिक रूपांकनों को फिर से देख रहे हैं। हाल के फैशन सीजन में अंतरराष्ट्रीय फैशन कंपनियों ने सैकदोंग की रंग-योजना से प्रेरित चीजें पेश कीं। कोरिया में हुए सहयोगों ने इन धारियों को लोकप्रिय संस्कृति के रूपांकनों के साथ मिलाकर बटुए, पाउच और छोटे सामानों में जगह दी है, जिनसे युवा खरीदार जुड़ रहे हैं। सियोल में एक बड़े लग्जरी ब्रांड ने हाल ही में नया बहुउद्देशीय स्थल खोला है। उसकी दीर्घाओं और सीढ़ियों के भीतर हल्की खड़ी धारियां हैं, जो स्थानीय शिल्प की ओर सूक्ष्म इशारा करती हैं और मंजिलों के बीच आते-जाते आगंतुकों का ध्यान खींचती हैं।

सार्वजनिक डिजाइन संस्थाएं भी समकालीन शिल्प को बढ़ावा दे रही हैं। हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय डिजाइन मेले में सियोल डिजाइन फाउंडेशन ने उन युवा स्टूडियो को प्रमुखता दी जिन्होंने रोजमर्रा के सामानों के लिए विरासत के पारंपरिक संकेतों को नए रूप में पेश किया। एक ब्रांड ने घर में इस्तेमाल के लिए सैकदोंग से प्रेरित कपड़ों पर ध्यान दिया, जिनमें गर्माहट देने वाले शॉल से लेकर रचनात्मक रसोई सामान तक शामिल थे। इससे साबित हुआ कि ये धारियां हानबोक से आगे बढ़कर रोजमर्रा की जिंदगी में भी जगह पा सकती हैं। कोरिया के संग्रहालयों की दुकानों में सैकदोंग की रंग-योजना से खेलते बैग और घरेलू वस्तुएं बिकती हैं। इनमें बच्चों की जोगोरी से लिया गया रिबन लगाकर बांधा जाने वाला गद्देदार टोट बैग और ज्यामितीय कटआउट पैटर्न वाला कंधे पर टांगने का बैग शामिल हैं। धारियों वाले पैनल से बने क्राउडफंडिंग से वित्तपोषित स्नीकर्स और सैकदोंग के रंगों में लिपटे छोटे फर्नीचर, जैसे स्टूल और लैंप, ने भी लोगों का ध्यान खींचा है।

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आज भी कहां दिखता है सैकदोंग

बच्चों के हानबोक में ये धारियां अब भी सबसे आम हैं। सियोल के विशेष खुदरा दुकानों और प्रमुख पारंपरिक बाजारों में त्योहारों और पहले जन्मदिन के लिए बहुरंगी आस्तीन वाली जैकेटें मिलती हैं। खरीदारों को संग्रहालयों की उपहार दुकानों में भी सैकदोंग मिलता है, जहां इससे बने कपड़े के बैग और छोटे सामान खूब बिकते हैं। आंतरिक साज-सज्जा के डिजाइनरों ने छोटे सामानों में इस रंग-योजना का इस्तेमाल शुरू किया है। ऊन से ढके स्टूल से लेकर रंगीन पट्टियों की छपाई वाले हांजी कागज के शेड से बने लैंप तक, ये चीजें बैठक और कार्यस्थलों में कोरियाईपन की हल्की झलक जोड़ती हैं।

शिल्प की दुनिया में सैकदोंग का मेल जोगाकबो से होता है। यह कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर रजाई जैसी वस्तुएं बनाने की परंपरा है, जिसमें बचा हुआ रेशम कलात्मक आवरण-कपड़ों में बदल जाता है। कारीगर चमकीले आयताकार टुकड़ों को सटीक संतुलन वाले खानों में सिलते हैं और कभी-कभी असली बुने हुए सैकदोंग को सादे रंगीन टुकड़ों के साथ मिलाते हैं। इससे बनी चीजें एक साथ ऐतिहासिक और आधुनिक लगती हैं। वे सुंदरता को सावधानी, अनुशासन और मितव्ययिता से गढ़ने की कोरियाई परंपरा के प्रति सच्ची रहती हैं।

संरक्षण और कारोबार की हकीकत

किसी विशिष्ट उत्पादन लाइन को जीवित रखना कठिन काम है। छपी हुई धारियां तेजी से आयात की जा सकती हैं और बहुत से ग्राहक पहली नजर में दोनों के बीच फर्क नहीं बता पाते। बुने हुए सैकदोंग को बनाने में समय और कौशल लगता है। इसकी लागत अधिक है और ऑर्डर का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से हान अपनी मशीनों को अलग-अलग काम के लिए तैयार रखते हैं और उन थोक विक्रेताओं के जरिए बिक्री करते हैं जिनके हानबोक स्टूडियो और छोटे ब्रांडों से करीबी संबंध हैं। यह नेटवर्क गुणवत्ता और परंपरा को महत्व देता है।

स्थानीय समुदाय अपनी कपड़ा-बुनाई की जड़ों को फिर से सामने ला रहे हैं। हान के शहर में एक छोटा प्रदर्शनी कक्ष क्षेत्रीय कपड़ा व्यापार की याद को जीवित रखता है और आगंतुकों को समझाता है कि कभी कपड़े ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को कैसे गति दी थी। स्कूली बच्चों के समूह और पर्यटक वहां आते हैं और उनका ध्यान इस शिल्प को जीवित रखने में मदद करता है। ऐतिहासिक सटीकता चाहने वाले फिल्म और टेलीविजन निर्माण, बच्चों को पारंपरिक कपड़े पहनाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और धारियों की कहानी बताने वाली चुनिंदा खुदरा दुकानें, सभी करघों को थोड़ा-थोड़ा, लेकिन वास्तविक सहारा देती हैं।

डिजाइनर और शिक्षक कैसे मदद कर सकते हैं

परंपरा और आज के बाजार को जोड़ने के लिए सरल, व्यावहारिक कदम उठाए जा रहे हैं। नीचे दिए गए तरीके कार्यशालाओं और डिजाइन स्टूडियो में कारगर साबित हुए हैं। इनके लिए बड़े बजट से अधिक सहयोग की जरूरत है।

  • सीमित अवधि के छोटे संग्रह, जिनमें स्रोत का पता लगाया जा सकने वाला बुना सैकदोंग हो और रेशे, रंगाई तथा निर्माण-स्थान की स्पष्ट जानकारी वाले लेबल लगे हों
  • ऐसी रेजिडेंसी, जिनमें युवा डिजाइनर कुछ हफ्तों के लिए सक्रिय करघा-कक्ष में रहें और स्टूडियो में प्रयोग को कारखाने की व्यावहारिक सीमाओं के साथ जोड़ें
  • सीमित मात्रा में बने घरेलू उत्पाद, जैसे कुशन, टेबल रनर और लैंपशेड, जिनमें छोटे उत्पादन से बुने हुए रंगों की गहराई उभरकर आए
  • शिक्षकों के लिए डिजिटल शिक्षण-सामग्री, जिसमें ओबांगसैक और बुनाई की बुनियादी अवधारणाएं समझाई गई हों, ताकि स्कूल परियोजनाओं में इन धारियों की कहानी बताई जा सके
  • मरम्मत और बदलाव की सेवाएं, जिनसे सैकदोंग के कपड़े लंबे समय तक इस्तेमाल में रहें, ग्राहकों की निष्ठा बढ़े और कचरा घटे
  • सांस्कृतिक संस्थानों के लिए मौसमी ऑर्डर, जिनमें प्रदर्शनियों को कारीगरों के बनाए ऐसे उत्पादों से जोड़ा जाए जिन्हें आम लोग खरीद सकें

मुख्य बातें

  • गोंगजू की डोंगवॉन टेक्सटाइल को कोरिया में बुना हुआ सैकदोंग बनाने वाली आखिरी पारंपरिक इकाई माना जाता है
  • संस्थापक हान दू ह्युम ने 73 वर्ष की उम्र में 1987 में कंपनी शुरू की थी और वह इसे आगे बढ़ाने के लिए अपने बेटे और बहू को प्रशिक्षित कर रहे हैं
  • सैकदोंग की पांच से सात धारियां ओबांगसैक से प्रेरित हैं, जो दिशाओं, मौसमों और संतुलन से जुड़ी रंग-व्यवस्था है
  • बुनी हुई धारियों में रंग कपड़े की बनावट का हिस्सा होता है, जबकि छपे हुए संस्करणों में स्याही सतह पर लगाई जाती है
  • 1970 और 1980 के दशकों में शादी के बिस्तरों से मांग बढ़ी, फिर पश्चिमी शैली के बिस्तरों और छपी धारियों का चलन फैलने के साथ घट गई
  • वैश्विक फैशन, संग्रहालयों की दुकानें और डिजाइन ब्रांड सैकदोंग से प्रेरित उत्पादों और साज-सज्जा के जरिए इसमें फिर दिलचस्पी जगा रहे हैं
  • आज ऑर्डर मुख्य रूप से हानबोक बनाने वालों, शिल्पकारों और छोटे ब्रांडों से आते हैं, अक्सर थोक विक्रेताओं के जरिए
  • सामुदायिक प्रदर्शनियां, स्कूलों के दौरे और सहयोग करघों को चालू रखने और इस शिल्प को लोगों की नजर में बनाए रखने में मदद करते हैं
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