इतिहास से गढ़ी जीवंत सांस्कृतिक विविधता
ताशकंद में विक्टर पाक का जीवन दिखाता है कि निजी कहानियां किस तरह राष्ट्रीय बदलाव की झलक बन सकती हैं। पाक कोरियाई मूल के हैं। शैशवावस्था में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया और उनका पालन-पोषण एक उज्बेक परिवार ने किया। उनकी दादी उन सोवियत निर्वासनों का हिस्सा थीं, जिनके तहत 1930 के दशक के उत्तरार्ध में हज़ारों कोरियाई लोगों को मध्य एशिया भेजा गया था। आज कोर्यो साराम के नाम से जाना जाने वाला यह समुदाय पूरे उज्बेकिस्तान में बस गया। पाक उज्बेक आत्मीयता और कोरियाई परंपराओं के बीच पले-बढ़े। अब वह उज्बेकिस्तान में कोरियाई सांस्कृतिक केंद्रों के संघ का नेतृत्व करते हैं और अक्सर बताते हैं कि दो संस्कृतियों से जुड़ाव गर्व और मेल-जोल का स्रोत है। उनका अनुभव न्यू उज्बेकिस्तान के एक केंद्रीय विचार को दर्शाता है: सांस्कृतिक विविधता को सार्वजनिक संपदा और सामाजिक एकजुटता का आधार मानने वाली नीतिगत पहल।
विषय-सूची
- इतिहास से गढ़ी जीवंत सांस्कृतिक विविधता
- नीति से अमल तक: विविधता को कैसे मिलता है समर्थन
- पड़ोसियों को करीब लाने वाले उत्सव और रोज़मर्रा की रस्में
- भाषा शिक्षा और विरासत का संरक्षण
- क्षेत्रीय संदर्भ: सहयोग और तुलना
- जमीनी स्तर पर क्या काम करता है और क्या मुश्किल बना हुआ है
- उज्बेकिस्तान से परे भी क्यों अहम है यह
- निष्कर्ष
यह विचार अब साझा आयोजनों के व्यस्त कैलेंडर और लोगों को जोड़ने वाले संस्थानों के नेटवर्क में दिखाई देता है। देशभर में 157 राष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र सक्रिय हैं। वे भाषा कक्षाएं, संगीत प्रस्तुतियां, प्रदर्शनियां और सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। 35 जातीय पृष्ठभूमियों के लगभग 5,000 सरकारी कर्मचारी राज्य सेवा में काम करते हैं। जातीय अल्पसंख्यक राष्ट्रीय और स्थानीय विधायिकाओं में भी शामिल हैं। 2021 से उज्बेकिस्तान 30 जुलाई को जन मैत्री दिवस मनाता है, जिस पर शहर-स्तरीय उत्सव आयोजित होता है। इस वर्ष 22 मंडपों में बेलारूसी, कज़ाख, किर्गिज़, कोरियाई और अन्य समुदायों की परंपराएं और कला प्रस्तुत की गईं। सहयोग और सामाजिक एकजुटता मजबूत करने के काम के लिए 50 नागरिकों को जन मैत्री का सम्मान मिला।
सार्वजनिक उत्सव इस दृष्टिकोण का सजीव प्रतीक बन गए हैं। फसल उत्सव, सांस्कृतिक मेले और संयुक्त समारोह देशभर से हज़ारों लोगों को आकर्षित करते हैं। संदेश सीधा है: हर कोई इस समाज का हिस्सा है और हर किसी के पास साझा करने के लिए कुछ है। नीतियों और संसाधनों के समर्थन से साथ रहने पर दिया गया यह ज़ोर विविधता को नारे के बजाय रोज़मर्रा की प्रथा बनाने में मदद करता है।
नीति से अमल तक: विविधता को कैसे मिलता है समर्थन
उज्बेकिस्तान का नेतृत्व अंतरजातीय सद्भाव को घरेलू नीति का मूल हिस्सा बताता है। अधिकारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में आपसी सम्मान, कानून के समक्ष समानता और समुदायों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचे मजबूत किए गए हैं। देश मैत्री समितियों को समर्थन देता है और विदेशों में प्रवासी समुदायों से संबंधों को प्रोत्साहित करता है। इससे राष्ट्रीय सीमाओं से परे सांस्कृतिक रिश्ते बढ़ते हैं और लोगों के बीच संपर्क मजबूत होता है।
इस पहल की रीढ़ देशव्यापी सांस्कृतिक केंद्रों का नेटवर्क है। ये केंद्र भाषा सीखने वालों, संगीतकारों, नर्तकों और समुदाय से जुड़ाव तलाश रहे युवाओं के लिए खुले रहते हैं। वे अक्सर स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसे कार्यक्रम तैयार करते हैं जिनमें सभी निवासी शामिल हो सकते हैं, न कि केवल किसी एक समूह के सदस्य। इससे साझा जगहें बनती हैं, जहां पड़ोसी मिलते हैं और एक-दूसरे की रीति-रिवाजों के बारे में सीखते हैं। कई परिवारों के बच्चों को किसी दूसरी परंपरा से पहला परिचय पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बल्कि इन्हीं केंद्रों से मिलता है।
जन मैत्री दिवस इस पहल का मुख्य आयोजन है। इस वर्ष उज्बेकिस्तान, हमारी साझा मातृभूमि नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में लोगों को देश की विविध पहचान की जीवंत झांकी से गुजरने का अवसर मिला। एक मंडप में बेलारूस का नगर भवन फिर से बनाया गया था। दूसरे में कज़ाख और किर्गिज़ युर्त दिखाए गए, जिनमें कपड़े और घरेलू सामान भी थे। लोगों ने कई भाषाओं में गीत सुने, क्षेत्रीय व्यंजनों का स्वाद लिया और कारीगरों को काम करते देखा। उत्सव के साथ आयोजित एकता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पड़ोसी देशों और दूर-दराज़ के क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने चर्चा की कि सांस्कृतिक सहयोग किस तरह स्थिरता और विकास में मदद कर सकता है। ये प्रयास देश में आपसी समझ बढ़ाते हैं और पूरे क्षेत्र में सद्भावना पैदा करते हैं।
पड़ोसियों को करीब लाने वाले उत्सव और रोज़मर्रा की रस्में
उज्बेकिस्तान के उत्सव साझा अनुभव के ज़रिए एकता को रेखांकित करते हैं। स्थानीय अधिकारियों और राष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से आयोजित वार्षिक फसल उत्सव में हज़ारों लोग आते हैं। परिवार उन मंचों के बीच घूमते हैं जहां लोक कलाकार प्रस्तुतियां देते हैं, जबकि दुकानों पर देशभर के हस्तशिल्प मिलते हैं। कई लोग खाने के लिए आते हैं, लेकिन बातचीत, नृत्य कार्यशालाओं और बच्चों की गतिविधियों के दौरान होने वाले मेल-जोल के लिए रुक जाते हैं। माहौल अनौपचारिक होता है, लेकिन इससे एक-दूसरे को पहचानने और सम्मान देने की आदत बनती है।
वसंत के उत्सव विरासत और नई शुरुआत के इस मेल को दिखाते हैं। मार्च के अंत में मनाया जाने वाला प्राचीन नववर्ष नवरोज़, पुनर्जन्म और मेहमाननवाज़ी का उत्सव है। मध्य एशिया के कई देशों में 1 मई सोवियत दौर की परेड से बदलकर अलग-अलग ढंग से मनाया जाने लगा। उज्बेकिस्तान में 1 मई को फव्वारों का दिवस माना जाता है। यह मौसम के बदलाव का संकेत है, औपचारिक सार्वजनिक अवकाश नहीं। यह बदलाव दिखाता है कि पुरानी परंपराएं आज के जीवन में नए अर्थ ग्रहण कर सकती हैं और फिर भी लोगों को साझा सार्वजनिक जगहों पर एकत्र कर सकती हैं।
धार्मिक त्योहार भी देश को एकजुट करते हैं। 2025 में उज्बेकिस्तान में ईद-उल-फितर का पहला दिन रविवार, 30 मार्च को है। राष्ट्रपति के एक आदेश के तहत आधिकारिक छुट्टी सोमवार को रखी गई, ताकि देशभर के परिवार साथ मिलकर त्योहार मना सकें। आदेश में उन मूल्यों पर ज़ोर दिया गया जिन्हें सार्वजनिक संदेशों में अक्सर रेखांकित किया जाता है, जिनमें मानवता, आपसी सम्मान और करुणा शामिल हैं। त्योहार के दौरान कम आय वाले परिवारों की मदद करने को भी प्रोत्साहित किया गया। ये कदम बहुजातीय समाज में सामाजिक एकजुटता और सबको साथ लेकर चलने वाले उत्सवों के प्रति नागरिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं।
भाषा शिक्षा और विरासत का संरक्षण
उज्बेकिस्तान अंतरजातीय सद्भाव को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जोड़ता है। यह अवधारणा यूनेस्को द्वारा बढ़ावा दी जाती है। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए 2003 के कन्वेंशन पर हाल की आवधिक रिपोर्ट में देश ने 2020 से पारंपरिक प्रथाओं को शिक्षा में शामिल करने, समुदायों की अगुवाई में दस्तावेज़ीकरण को समर्थन देने और समावेशी सूचियां बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों का ब्योरा दिया। इस पहल में उन समुदायों, समूहों और व्यक्तियों की भागीदारी को प्राथमिकता दी गई है जो परंपराओं को संजोते और आगे बढ़ाते हैं। उन्हें सहयोग देने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और शोध भी किए जाते हैं। इन नीतियों का विवरण यूनेस्को की रिपोर्टिंग प्रणाली में इस लिंक पर उपलब्ध है: उज्बेकिस्तान पर यूनेस्को आईसीएच की आवधिक रिपोर्ट.
जीवंत परंपराएं सामुदायिक जीवन का रोज़ाना हिस्सा हैं। उज्बेकिस्तान में यूनेस्को की सूचियों में शामिल परंपराएं प्रचलित हैं, जैसे नवरोज़, पलाव बनाने की संस्कृति और अस्किया की मौखिक कला। शास्त्रीय संगीत और नृत्य की परंपराएं जारी हैं और शिल्प विद्यालय युवा पीढ़ियों तक हुनर पहुंचाने में मदद करते हैं। सांस्कृतिक केंद्र और स्कूल कार्यशालाएं आयोजित करते हैं, जहां बुज़ुर्ग रस्मों, गीतों और भोजन के पीछे की कहानियां बताते हैं। इस तरह की व्यावहारिक गतिविधियां बच्चों को अपनी विरासत की कद्र करने के साथ-साथ पड़ोसियों की परंपराओं को समझने और उनका सम्मान करने का रास्ता देती हैं।
भाषा सीखना व्यावहारिक रूप से मददगार है। कई सांस्कृतिक केंद्रों में मुफ्त या कम खर्च वाली कक्षाएं चलती हैं, जहां छात्र उज्बेक और किसी दूसरे समुदाय की भाषा साथ-साथ सीखते हैं। शिक्षक अक्सर अनौपचारिक मेल-जोल के सत्र रखते हैं, जिनमें प्रतिभागी बुनियादी अभिवादन, गीत और छोटी बातचीत का अभ्यास करते हैं। सीखने के ऐसे छोटे अवसर दूरियां घटाते हैं और गलती करने के डर के बिना रोज़मर्रा के जीवन में शामिल होने का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। यह आत्मविश्वास सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने वाली उन खामोश ताकतों में से एक है।
क्षेत्रीय संदर्भ: सहयोग और तुलना
मध्य एशिया की कहानी आवाजाही और आदान-प्रदान से अलग नहीं की जा सकती। सदियों तक व्यापार मार्गों ने कैस्पियन सागर से तियान शान तक के शहरों को जोड़ा। 1991 के बाद बने आधुनिक गणराज्यों के बीच सीमाओं के आर-पार भाषाएं, खान-पान और पारिवारिक रिश्ते साझा हैं। हाल के वर्षों में क्षेत्र के नेताओं ने आपसी विचार-विमर्श बढ़ाया है और बड़े साझेदारों को शामिल करने वाले मंच शुरू किए हैं, जैसे अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ सी5+1 बैठकें और चीन के साथ सी5 बैठकें। लक्ष्य है कि भौगोलिक स्थिति और विरासत को व्यापार तथा स्थिरता के लिए लाभ में बदला जाए।
उज्बेकिस्तान की एकता की पहल इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है। सहयोग सुरक्षा और संस्कृति, दोनों क्षेत्रों में दिखता है। अक्टूबर 2025 में समरकंद में एकता 2025 क्षेत्रीय सैन्य अभ्यास शुरू हुआ, जिसमें अज़रबैजान, कज़ाखस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के सैन्यकर्मी शामिल हुए। समारोह में औपचारिकता के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं। राष्ट्रीय गान बजाए गए, कमांडरों ने साझा प्रशिक्षण के महत्व पर ज़ोर दिया और सांस्कृतिक कार्यक्रम में सभी भागीदार देशों के गीत पेश किए गए। ऐसे आयोजन पेशेवर परिचय बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय मैत्री की भावना मजबूत करते हैं।
पड़ोसी देश विविधता के प्रबंधन के अपने-अपने तरीकों को भी आजमा रहे हैं। कज़ाखस्तान 1 मई को जन एकता दिवस मनाता है और जनसभा नाम की संस्था चलाता है, जो जातीय नीति के समन्वय का काम करती है। विश्लेषकों ने कहा है कि आधिकारिक उत्सव और संस्थाएं उपयोगी तो हैं, लेकिन अकेले स्थानीय तनावों को नहीं रोक सकतीं। क्षेत्र के कुछ हिस्सों के अनुभव बताते हैं कि लगातार अमल, पारदर्शी प्रतिक्रिया और समुदाय-स्तर पर समस्या का समाधान राष्ट्रीय बयानों जितना ही महत्वपूर्ण है। सबक सीधा है: प्रतीक माहौल बनाते हैं, लेकिन नतीजे अमल से तय होते हैं।
व्यापक पड़ोस में नेता अक्सर सार्वजनिक जीवन में संस्कृति की भूमिका को रेखांकित करते हैं। हाल ही में हुए एक एशियाई मंच का विषय राष्ट्रीय विविधता से वैश्विक एकजुटता की ओर बढ़ने पर केंद्रित था। यह भाषा ऐसे दौर को दर्शाती है जब देश जलवायु, सुरक्षा और आर्थिक जोखिमों से निपटते हुए साझा आधार तलाश रहे हैं। अंतरजातीय सद्भाव को समर्थन देने का उज्बेकिस्तान का रिकॉर्ड इस चर्चा से मेल खाता है और मध्य एशिया को संवाद में योगदान देने वाले क्षेत्र के रूप में सामने लाने में मदद करता है, न कि केवल उससे लाभ लेने वाले क्षेत्र के रूप में।
जमीनी स्तर पर क्या काम करता है और क्या मुश्किल बना हुआ है
उज्बेकिस्तान की व्यवस्था की कई खूबियां हैं। यह मानती है कि पहचान व्यक्तिगत और बहुस्तरीय होती है, और लोगों को अपनी विरासत छोड़े बिना सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के स्पष्ट अवसर देती है। 157 सांस्कृतिक केंद्रों से लेकर दर्जनों मैत्री समितियों तक, समर्थन का व्यापक दायरा कार्यक्रमों को शहरों और छोटे कस्बों तक पहुंचाता है। उत्सव और सम्मेलन अपनेपन की साझा भावना बनाते हैं। राज्य सेवा और विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व से संदेश जाता है कि सार्वजनिक संस्थाएं सभी नागरिकों के लिए खुली हैं। ये फैसले लोगों की अपेक्षाएं गढ़ते हैं, जो आगे चलकर उनके व्यवहार को आकार देती हैं।
कुछ चुनौतियां भी हैं जिन पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है। पहली है राजधानी और बड़े शहरों से बाहर समावेशन सुनिश्चित करना, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों या भाषा कक्षाओं तक पहुंच असमान हो सकती है। दूसरी चुनौती असर का आकलन है। आयोजनों और केंद्रों की गिनती करना इस बात पर नज़र रखने से आसान है कि रोज़मर्रा के मेल-जोल में सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार होता है या नहीं, या सेवाएं वास्तव में सबकी पहुंच में हैं या नहीं। तीसरी चुनौती शिक्षा है। स्कूलों को साझा पाठ्यक्रम और सांस्कृतिक तथा भाषाई विविधता के प्रति संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना होगा। यह संतुलन अच्छी तरह संभालने के लिए प्रशासकों को अक्सर प्रशिक्षण और संसाधनों की जरूरत पड़ती है। अंत में, सोशल मीडिया गलतफहमियों को तेज़ी से बढ़ा सकता है। अफवाहें तथ्यों से तेज़ फैलें तो त्वरित प्रतिक्रिया और शांत संवाद अहम होते हैं।
क्षेत्रीय शोधकर्ताओं और व्यवहारकर्ताओं द्वारा अक्सर सुझाए जाने वाले कदमों में जातीय नीति की नियमित, स्वतंत्र समीक्षा; स्थानीय जरूरतों से जुड़े बेहतर आंकड़े; पड़ोस के स्तर पर मजबूत मध्यस्थता क्षमता; और स्कूलों तथा युवा क्लबों में सम्मानजनक संवाद के कौशल सिखाना शामिल हैं। सांस्कृतिक केंद्र और स्थानीय नेता माता-पिता की भी मदद कर सकते हैं, क्योंकि बच्चे सबसे पहले परिवार में ही अंतर को समझना सीखते हैं। पारंपरिक पड़ोस संस्था महल्ला, छोटी समस्याओं को बढ़ने से पहले सुलझाने का उपयोगी मंच बनी हुई है। इन क्षेत्रों में रोज़मर्रा की दक्षता किसी औपचारिक नीति की परीक्षा आने से बहुत पहले समाज का लचीलापन बढ़ाती है।
उज्बेकिस्तान से परे भी क्यों अहम है यह
विक्टर पाक जैसी कहानियां एक बड़े सीमा-पार परिदृश्य का हिस्सा हैं। मध्य एशिया का कोरियाई समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र को कोरियाई प्रायद्वीप से जोड़ता आया है। व्यापार, छात्र आदान-प्रदान और काम के लिए आवाजाही अब दोनों दिशाओं में होती है। मध्य एशिया के अधिकाधिक नागरिक कोरिया में काम करते हैं और ऐसे नए रिश्ते बनाते हैं जो परिवारों और कारोबारों को प्रभावित करते हैं। हर सफल आदान-प्रदान भरोसा बढ़ाता है, जो शिक्षा से लेकर प्रौद्योगिकी तक के क्षेत्रों में देशों के सहयोग में मदद करता है।
स्थिर और समावेशी उज्बेकिस्तान, मध्य एशिया की उस साख को भी मजबूत करता है जहां अलग-अलग समुदाय साथ रहते हैं। यह प्रतिष्ठा पर्यटकों, छात्रों और निवेशकों को आकर्षित करती है। इससे एशिया और यूरोप के बीच सेतु के रूप में क्षेत्र की भूमिका को भी समर्थन मिलता है। मध्य एशिया से गुजरने वाले पारगमन मार्ग, जिन्हें अक्सर मिडिल कॉरिडोर कहा जाता है, बुनियादी ढांचे के साथ-साथ भरोसे पर भी चलते हैं। सांस्कृतिक आत्मविश्वास, निष्पक्ष व्यवहार और लोगों के बीच संपर्क से यह भरोसा कायम करना आसान होता है।
निष्कर्ष
- उज्बेकिस्तान साझा भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों, संस्थानों और सार्वजनिक उत्सवों के ज़रिए बहुजातीय समाज को समर्थन देता है।
- देशभर में 157 राष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र सक्रिय हैं। इनके साथ मैत्री समितियां और प्रवासी समुदायों से रिश्ते भी हैं, जो विदेशों में सांस्कृतिक संबंध बढ़ाते हैं।
- 35 जातीय पृष्ठभूमियों के लगभग 5,000 सरकारी कर्मचारी राज्य सेवा में काम करते हैं और राष्ट्रीय तथा स्थानीय विधायिकाओं में अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व है।
- 2021 में शुरू हुआ और 30 जुलाई को मनाया जाने वाला जन मैत्री दिवस 22 मंडपों और बड़ी भीड़ के साथ लोगों को एक-दूसरे की परंपराओं से परिचित कराता है।
- सहयोग और सामाजिक एकजुटता बढ़ाने के काम के लिए इस वर्ष 50 नागरिकों को जन मैत्री का सम्मान मिला।
- ईद-उल-फितर और नवरोज़ सहित धार्मिक और मौसमी उत्सवों को एकता और आपसी सहयोग के अवसरों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- यूनेस्को को उज्बेकिस्तान की रिपोर्ट अमूर्त विरासत को शिक्षा में शामिल करने और परंपराओं के संरक्षण में समुदायों को भागीदार बनाने के कदमों को रेखांकित करती है।
- क्षेत्रीय सहयोग में सांस्कृतिक संवाद और समरकंद में एकता 2025 जैसे सुरक्षा अभ्यास शामिल हैं, जिनमें प्रशिक्षण के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है।
- मुख्य चुनौतियों में बड़े शहरों से बाहर समान पहुंच, रोज़मर्रा के समावेशन का बेहतर आकलन और एकता तथा विविधता, दोनों को साधने वाली शिक्षा शामिल हैं।
- देश के भीतर प्रगति मध्य एशिया की स्थिर और स्वागतशील क्षेत्र की छवि मजबूत करती है और व्यापक आर्थिक तथा सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देती है।






