वैश्विक गैस व्यापार के केंद्र में एक दूरस्थ तटरेखा
मेलविल द्वीप के पास एक छोटी नाव पर सवार तिवी नेता पॉलीना जेड्डा पुरुंटाटामेरी दूर तक फैले सफेद रेत के समुद्र तट की ओर इशारा करती हैं, जो टिमोर सागर में जाकर ओझल हो जाता है। तिवी लोग इन जलक्षेत्रों को एम्पिजी का क्षेत्र मानते हैं—वह समुद्री सर्प जो धरती और सागर की रक्षा करता है। यही तटीय जलक्षेत्र अब बैरोसा परियोजना से जुड़ी एक प्रमुख गैस पाइपलाइन के मार्ग के पास हैं। ऑस्ट्रेलियाई और जापानी कंपनियों की वित्तीय सहायता और आपूर्ति से चल रही यह परियोजना उत्तरी क्षेत्र में जीवन और आजीविका को बदल रही है।
विषय-सूची
- वैश्विक गैस व्यापार के केंद्र में एक दूरस्थ तटरेखा
- बैरोसा परियोजना क्या है और इस पर विवाद क्यों है
- पाइपलाइनें, परमिट और निर्माण की तेज समय-सीमा
- कार्बन डाइऑक्साइड से भरपूर गैस और टिमोर-लेस्ते तक सीसीएस का चक्कर
- जापान का पैसा और ऊर्जा सुरक्षा की दलील
- तिवी और लाराकिया समुदायों की भूमि पर प्रभाव
- सहमति, परामर्श और कानून
- बैरोसा से आगे: इच्थिस, बीटालू और अगली लहर
- समुदायों के अधिकारों और जलवायु लक्ष्यों को केंद्र में रखकर नई शुरुआत
- जानने योग्य बातें
कई वर्षों से तिवी परिवार और अन्य फर्स्ट नेशंस समूह बैरोसा गैस क्षेत्र में ड्रिलिंग और तिवी द्वीपसमूह के पास समुद्र के नीचे पाइपलाइन से गैस डार्विन एलएनजी संयंत्र तक भेजने की योजना का विरोध कर रहे हैं। उनके अभियान में जापान भी शामिल हुआ है, जो दुनिया के सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस खरीदारों में से एक है। जापान की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक और प्रमुख एलएनजी खरीदार जेईआरए की बैरोसा में 12.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसे जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन के लगभग 346 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण का समर्थन मिला है। कई जापानी बिजली कंपनियां और व्यापारिक घराने इस परियोजना से एलएनजी खरीदने के लिए तैयार हैं। नियामकीय मंजूरियों और कानूनी लड़ाइयों की एक श्रृंखला के बाद परियोजना अब गैस उत्पादन शुरू करने के करीब है।
2025 के मध्य में सैंटोस ने एक अहम पड़ाव की पुष्टि की: डार्विन से लगभग 285 किलोमीटर उत्तर में स्थित गैस क्षेत्र में बीडब्ल्यू ओपल फ्लोटिंग उत्पादन और भंडारण पोत पहुंचा और उसे वहां जोड़ा गया। छह में से पांच कुओं की ड्रिलिंग पूरी हो चुकी है, कुल 262 किलोमीटर लंबी निर्यात पाइपलाइनें बिछा दी गई हैं और डार्विन एलएनजी तक 123 किलोमीटर की दोहरी पाइपलाइन का काम पूरा हो चुका है। कंपनी का लक्ष्य 2025 की तीसरी तिमाही में गैस उत्पादन शुरू करना है। समर्थकों का कहना है कि परियोजना डार्विन एलएनजी का संचालनकाल बढ़ाएगी, रोजगार पैदा करेगी और एशिया की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में मदद करेगी। विरोधियों का कहना है कि इससे पवित्र सांस्कृतिक स्थल, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और नाजुक जलवायु खतरे में पड़ते हैं।
ऑस्ट्रेलिया ने घरेलू जलवायु नीतियां सख्त की हैं, लेकिन जीवाश्म ईंधन के निर्यात का समर्थन जारी रखा है। जापान एक अहम बाजार बना हुआ है। जापानी खरीदार बिजली और उद्योग के लिए ऑस्ट्रेलियाई एलएनजी पर निर्भर हैं, लेकिन कीमतें अनुकूल होने पर वे कार्गो दूसरे देशों को भी बेचते हैं। पिछले साल जापान की कंपनियों ने जिन एलएनजी कार्गो को तीसरे देशों में दोबारा बेचा, उनमें बड़ा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया से आया था। यह दिखाता है कि ऊर्जा का प्रवाह व्यावसायिक तर्क से किस तरह तय होता है। इस वास्तविकता से टोक्यो को प्रभाव हासिल होता है, जिसका इस्तेमाल उसने कैनबरा से नियामकीय स्पष्टता और लचीलेपन की मांग करने में किया है। उत्तरी तट के आदिवासी समुदायों का कहना है कि गैस विकास की गति और पैमाना उनकी बात सुनने की क्षमता से कहीं आगे निकल गया है, और इसकी भारी कीमत उनकी भूमि और संस्कृति चुका रही है।
बैरोसा परियोजना क्या है और इस पर विवाद क्यों है
बैरोसा टिमोर सागर में स्थित एक अपतटीय गैस क्षेत्र है। गैस को पाइपलाइन के जरिए तट तक लाकर डार्विन एलएनजी संयंत्र में संसाधित किया जाता है। यह संयंत्र पहले बायू-अंडान क्षेत्र की गैस पर चलता था। बैरोसा संयुक्त उद्यम इस संसाधन को विश्वस्तरीय परिसंपत्ति बताता है, जो वर्षों तक एशियाई ग्राहकों को स्थिर एलएनजी आपूर्ति कर सकती है।
पाइपलाइनें, परमिट और निर्माण की तेज समय-सीमा
नियामकों ने 2018 में अपतटीय परियोजना योजना स्वीकार की, जिससे ड्रिलिंग और समुद्र के नीचे काम का रास्ता खुला। बाद में तिवी द्वीपवासियों की कानूनी चुनौतियों के कारण मंजूरियों के कुछ हिस्सों पर फिर से विचार करना पड़ा। इससे पारंपरिक मालिकों से परामर्श में कमियां उजागर हुईं। इसके बाद निर्माण कार्य फिर तेज हो गया। अपतटीय उत्पादन इकाई स्थापित हो चुकी है और कमीशनिंग जारी है। डार्विन एलएनजी के संचालनकाल को बढ़ाने के काम के साथ 2025 के आखिर में गैस उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य है।
कार्बन डाइऑक्साइड से भरपूर गैस और टिमोर-लेस्ते तक सीसीएस का चक्कर
विश्लेषक बैरोसा गैस को व्यापक रूप से उत्सर्जन-प्रधान बताते हैं। कार्बन की चुनौती से निपटने के लिए संयुक्त उद्यम कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़कर टिमोर-लेस्ते के एक खाली हो चुके गैस क्षेत्र में भंडारण के लिए भेजने का प्रस्ताव रखता है। इस परियोजना को अक्सर बायू-अंडान सीसीएस कहा जाता है। सीमाओं के पार सीओ2 भेजने और उसे समुद्र तल के नीचे जमा करने से लागत और जटिलता बढ़ती है। बड़े पैमाने पर सफल होने पर भी, रिसाव और आपूर्ति-श्रृंखला के शुरुआती चरणों से होने वाला काफी उत्सर्जन बना रहेगा। कागजों पर यह योजना नियामकीय शर्तें पूरी करती है, लेकिन इससे परियोजना की समय-सीमा बढ़ती है और वादे के मुताबिक प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी जरूरी होती है।
जापान का पैसा और ऊर्जा सुरक्षा की दलील
जापान के पास घरेलू तेल और गैस के भंडार कम हैं, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा उसकी नीति को दिशा देती है। टोक्यो का एस+3ई ढांचा (सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक दक्षता और पर्यावरण) सावधानीपूर्वक संतुलन साधने की कोशिश करता है। ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी इस नीति के अनुरूप है: यह लचीले ईंधन की आपूर्ति करती है, जबकि जापान हरित तकनीकों का परीक्षण कर रहा है। यह कहानी सिर्फ टोक्यो की रोशनी जलती रहने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध व्यापार से भी है। जापानी बिजली कंपनियां और व्यापारी अब ऊर्जा कारोबारियों की तरह काम करते हैं और अनुकूल होने पर ऑस्ट्रेलियाई एलएनजी का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय बाजारों में फिर से बेचते हैं। हाल के एक विश्लेषण में पाया गया कि पिछले साल जापान द्वारा दोबारा बेचे गए एलएनजी कार्गो का बड़ा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया से आया था। यह आपूर्ति अनुबंधों के पीछे के व्यावसायिक तर्क को रेखांकित करता है।
इस व्यापार के बड़े हिस्से को सार्वजनिक वित्त का सहारा मिलता है। नागरिक समाज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 के पेरिस समझौते के बाद से जेबीआईसी ने जीवाश्म गैस विस्तार के लिए 18.6 अरब अमेरिकी डॉलर दिए हैं। 2022 के बाद भी उसने 3.9 अरब अमेरिकी डॉलर दिए, जबकि जी7 ने बिना उत्सर्जन कटौती वाले जीवाश्म ईंधन के लिए विदेशों में सार्वजनिक वित्तपोषण खत्म करने का वादा किया था। अभियानकर्ता कहते हैं कि यह वित्तपोषण उत्सर्जन को लंबे समय तक बनाए रखता है और पाइपलाइनों, संयंत्रों तथा जहाजरानी से आदिवासी और तटीय समुदायों को नुकसान के जोखिम में डालता है। जेबीआईसी और जापानी अधिकारी इसके जवाब में कहते हैं कि हरित विकल्पों के विस्तार के दौरान गैस की सुनियोजित आपूर्ति स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है।
जापानी निवेशकों ने ऑस्ट्रेलिया को यह चेतावनी भी दी है कि नीतिगत बदलाव निवेश को हतोत्साहित कर सकते हैं। 2023 में कैनबरा में आयोजित एक संसदीय कार्यक्रम में, डार्विन के पास विशाल इच्थिस एलएनजी परियोजना चलाने वाली कंपनी इनपेक्स के मुख्य कार्यकारी ताकायुकी उएदा ने कहा कि कीमतों पर सीमा और नियामकीय अनिश्चितता से क्षेत्र पर अनचाहे असर पड़ने का जोखिम है।
श्री उएदा ने सांसदों से कहा कि पाबंदियां उलटा असर डाल सकती हैं: एशिया अधिक उत्सर्जन करने वाले ईंधनों की ओर जा सकता है और अमेरिकी गठबंधन वाले बाजारों से बाहर के आपूर्तिकर्ताओं के लिए रास्ता खुल सकता है।
नतीजतन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बहुत बढ़ जाएगा और 2050 तक नेट ज़ीरो हासिल करना असंभव हो जाएगा," उन्होंने कहा। "भू-राजनीतिक मोर्चे पर, एलएनजी कारोबार से ऑस्ट्रेलिया का चुपचाप पीछे हटना बेहद गंभीर नतीजे ला सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में जापान के राजदूत शिंगो यामागामी ने दांव पर लगी बात को और भी स्पष्ट शब्दों में रखा। इसी नीतिगत बहस को संबोधित करते हुए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई संसाधनों पर जापान की निर्भरता के पैमाने को लेकर चेताया।
"यह कल्पना करना मुश्किल है कि टोक्यो की नियॉन रोशनियां कभी बुझ जाएंगी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ऊर्जा संसाधनों का उत्पादन बंद कर दे तो ठीक यही होगा," उन्होंने कहा।
अल्बनीज़ सरकार ने जवाब दिया कि सुधारों का उद्देश्य घरों की सुरक्षा और घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना है, साथ ही ऑस्ट्रेलिया को भरोसेमंद निर्यातक बनाए रखना है। संसाधन मंत्री मैडलीन किंग ने जापानी निवेशकों को कैनबरा के इरादों का भरोसा दिलाया।
"ऑस्ट्रेलिया जापान को ऊर्जा का भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता और विदेशी निवेश के लिए सुरक्षित गंतव्य बना रहेगा," उन्होंने कहा।
तिवी और लाराकिया समुदायों की भूमि पर प्रभाव
तिवी लोगों के लिए सांस्कृतिक दायित्व तटरेखा से शुरू होकर समुद्र की गहराइयों तक जाते हैं। एम्पिजी की कहानी कोई रूपक नहीं है। यह एक ऐसा कानून है जो मछली पकड़ने, समारोहों और संरक्षण के नियम तय करता है। कई तिवी लोगों का कहना है कि समुद्र के नीचे पाइपलाइन के मार्ग पर उनसे उचित परामर्श नहीं किया गया और इस पैमाने की परियोजना पवित्र स्थलों और प्रजातियों के लिए खतरा है। हाल के वर्षों में अदालतों ने मंजूरी प्रक्रिया के कुछ हिस्सों में परामर्श की कमियां पाई थीं, जिसके चलते परियोजना समर्थक को संवाद प्रक्रिया पर फिर से काम करना पड़ा। इन कानूनी जीतों से परियोजना रुकी नहीं, लेकिन उन्होंने पारंपरिक मालिकों से कंपनियों को किस तरह बात करनी चाहिए, इस बारे में अपेक्षाएं अधिक स्पष्ट कर दीं।
डार्विन में लाराकिया लोगों के सामने एक अलग तरह की उलझन है। तटवर्ती ऊर्जा केंद्र रोजगार और ठेके देने का वादा करते हैं, लेकिन पुराने और प्रस्तावित संयंत्र सांस्कृतिक महत्व वाली भूमि को अपने दायरे में लेते रहे हैं, तटरेखाओं तक पहुंच बदलते रहे हैं और घरों के पास भारी उद्योग लाते रहे हैं। शोधकर्ताओं ने पेट्रोकेमिकल संयंत्रों के पास रहने और कुछ कैंसरों तथा अन्य बीमारियों की ऊंची दरों के बीच संबंध बताया है। इस क्षेत्र में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा आदिवासी है, समुदायों का कहना है कि जोखिम का बोझ उन पर असमान रूप से पड़ता है।
उद्योग क्षेत्र इसके लाभ गिनाता है। सैंटोस का कहना है कि डार्विन एलएनजी का संचालनकाल बढ़ाने के काम से डार्विन में निर्माण और रखरखाव के करीब 300 रोजगार पैदा हो रहे हैं, जिन्हें लगभग 1 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के निवेश का सहारा है। संचालन से क्षेत्र के कारोबारों के लिए हर साल आपूर्ति और सेवा के करीब 100 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। कंपनी का कहना है कि 2023 से उसने 54 आदिवासी प्रशिक्षुओं, कर्मचारियों और अप्रेंटिस को काम दिया है। बैरोसा एबोरिजिनल फ्यूचर फंड परियोजना की अवधि तक तटीय आदिवासी समुदायों के लिए हर साल 10 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक देने की योजना रखता है। शुरुआती अनुदानों में द्वीपों पर रोजगार के लिए तिवी रेंजर्स के साथ साझेदारी, डार्विन में नए लाराकिया नेशन आर्ट एंड कल्चर हब को समर्थन और वुरुमियंगा में कचरा प्रबंधन पर शिक्षा कार्यक्रम शामिल हैं।
आलोचकों का जवाब है कि सामुदायिक अनुदान और प्रशिक्षण गहरे ढांचागत मुद्दों का समाधान नहीं हैं। सांस्कृतिक अधिकार, अपनी भूमि पर नियंत्रण और स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का अधिकार इन विवादों के केंद्र में हैं। कई नेताओं का कहना है कि इनके बिना भाषा, परंपराओं और हजारों वर्षों से फलती-फूलती जीवनशैली के खोने का जोखिम है।
सहमति, परामर्श और कानून
स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का अधिकार, जिसे अक्सर एफपीआईसी कहा जाता है, संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा में शामिल एक सिद्धांत है। इसका मतलब है कि समुदायों को किसी परियोजना की पूरी जानकारी ऐसे रूप में दी जानी चाहिए जिसे वे समझ और इस्तेमाल कर सकें, और परियोजना शुरू होने से पहले उन्हें हां या ना कहने का अवसर मिलना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया ने इस घोषणा का समर्थन किया है, लेकिन घरेलू कानून हर बार एफपीआईसी को बाध्यकारी नहीं बनाता। अपतटीय पेट्रोलियम परियोजनाओं की मंजूरी नियामकीय दिशा-निर्देशों और परामर्श मानकों के मेल पर निर्भर करती है, जिन्हें अदालतें कभी-कभी अपर्याप्त पा चुकी हैं।
जब आदिवासी संगठन कहते हैं कि बातचीत जल्दबाजी में हुई या अधूरी रही, तो कंपनियां अक्सर जवाब देती हैं कि उन्होंने कानून के अक्षर का पालन किया। बैरोसा की मंजूरियों से जुड़े हाल के मुकदमों में यही टकराव सामने आया और परामर्श के नए दौर शुरू करने पड़े। इस प्रकरण ने एक बड़ी समस्या उजागर की। बड़ी परियोजनाएं अलग-थलग नहीं होतीं, फिर भी मंजूरी प्रक्रिया अक्सर एक समय में सिर्फ एक परमिट पर ध्यान देती है। पाइपलाइनों, निर्यात टर्मिनलों और भारी उद्योग के संयुक्त बोझ को झेल रहे तटीय समुदायों को ऐसा लगता है मानो ऊर्जा गलियारे के पास रहने की उन्हें सजा मिल रही हो।
यह तनाव सिर्फ ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं है। एक वैश्विक समीक्षा में पाया गया कि ऊर्जा संक्रमण के लिए जरूरी आधे से अधिक खनिज आदिवासी भूमि पर या उसके पास मौजूद हैं। अधिकारों के उल्लंघन, कमजोर परामर्श और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के आरोप व्यापक रहे हैं। उद्योग संगठनों का कहना है कि वे मानकों को ऊंचा उठा रहे हैं। रिस्पॉन्सिबल माइनिंग एश्योरेंस पहल जैसे स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए जाने वाले ढांचे अधिक ठोस निगरानी के लिए सामने आए हैं। अब कुछ साझेदारियों में फर्स्ट नेशंस संगठनों को इक्विटी हिस्सेदारी दी जाती है, जिससे समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में जगह और मुनाफे में हिस्सा मिलता है। ये मॉडल हर जगह एक जैसे नहीं हैं, लेकिन अधिक टिकाऊ समझौतों का रास्ता दिखाते हैं।
बैरोसा से आगे: इच्थिस, बीटालू और अगली लहर
डार्विन पहले से दुनिया की प्रमुख एलएनजी आपूर्ति श्रृंखलाओं में से एक का केंद्र है। इनपेक्स द्वारा संचालित इच्थिस परियोजना की खोज 2000 में हुई और 2012 में इसे मंजूरी मिली। इसमें 2018 में उत्पादन शुरू हुआ। इसमें समुद्र के नीचे के कुएं, अपतटीय प्रसंस्करण, डार्विन के पास तटवर्ती सुविधाओं तक 890 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन और बड़े भंडारण तथा निर्यात संयंत्र शामिल हैं। अधिकतम उत्पादन के समय इच्थिस ने सालाना करीब 9.3 मिलियन टन एलएनजी और 1.65 मिलियन टन एलपीजी का उत्पादन किया है। कंडेनसेट की काफी मात्रा सीधे समुद्र से भेजी जाती है। इच्थिस में जापानी बिजली कंपनियां अल्पांश निवेशक हैं, जिससे टोक्यो और इस क्षेत्र के बीच लंबे संबंध और मजबूत हुए हैं।
नई परियोजनाएं कतार में हैं। डार्विन के दक्षिण में बीटालू उप-बेसिन में कंपनियां हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग के जरिए शेल गैस की खोज कर रही हैं। पारंपरिक मालिकों और पशुपालकों को भूजल प्रदूषण, रसायनों और समझौतों में पारदर्शिता की कमी की चिंता है। सामुदायिक समूहों का कहना है कि कई आदिवासी परिवारों को यह पूरी जानकारी नहीं दी गई है कि फ्रैकिंग कैसे होती है और इसका पानी, भोजन तथा पवित्र स्थलों पर क्या असर पड़ सकता है। इसी दौरान, उत्तरी क्षेत्र की सरकार ने ऊर्जा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जापानी एजेंसियों के साथ सहयोग समझौते किए हैं। गैस क्षेत्र में अनुभव रखने वाले एक क्षेत्रीय समन्वयक को परियोजनाएं आगे बढ़ाने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस कदम से फैसलों का झुकाव विकास की ओर हो जाता है।
जलवायु का हिसाब भी है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि एलएनजी संयंत्रों का कार्बन पदचिह्न कई लोगों की धारणा से बड़ा होता है, क्योंकि इसमें शुरुआती चरणों का मीथेन उत्सर्जन, प्रसंस्करण और जहाजरानी शामिल हैं। मौजूदा सुविधाओं से होने वाला उत्सर्जन कभी-कभी शुरुआती अनुमानों से अधिक रहा है। अगर बैरोसा बड़े पैमाने पर आगे बढ़ती है और उसके बाद बीटालू परियोजना आती है, तो डार्विन क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया के जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन का बढ़ता हिस्सा वहन करेगा। इससे सेफगार्ड मैकेनिज्म और राज्य के लक्ष्यों की परीक्षा होगी। बैरोसा की सीसीएस योजना, अगर तय डिजाइन के अनुसार काम करे, तो कुछ उत्सर्जन घटा सकती है, लेकिन उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं करेगी।
समुदायों के अधिकारों और जलवायु लक्ष्यों को केंद्र में रखकर नई शुरुआत
ऑस्ट्रेलिया-जापान ऊर्जा साझेदारी पर नजर रखने वाले विश्लेषक बढ़ती असंगति की चेतावनी देते हैं। टोक्यो एलएनजी में लचीलापन और हरित ईंधनों की ओर चरणबद्ध रास्ता चाहता है। कैनबरा बड़े, अब तक परखे न गए हरित वस्तु-परियोजनाओं के लिए शुरुआती प्रतिबद्धताएं और एलएनजी में स्थिर निवेश चाहता है। दोनों पक्षों को चिंता है कि दूसरा बीच रास्ते में नियम बदल देगा। एक मंच ने दोनों सरकारों से साझा दृष्टिकोण तैयार करने का आग्रह किया, जिसमें एलएनजी और हरित आपूर्ति को एक ही जोखिम और मानक ढांचे के तहत रखा जाए। 2026 में 50वीं वर्षगांठ के करीब पहुंच रही नारा संधि इस प्रयास को मजबूती दे सकती है। विचार सीधा है। निवेशकों को भरोसा विश्वसनीय नियमों, मंजूरी की निरंतरता और तालमेल वाले प्रमाणन मानकों से मिलता है, त्वरित सौदों से नहीं।
उत्तरी क्षेत्र के समुदायों के लिए भरोसेमंद होने का आकलन रोजमर्रा के व्यवहार से होगा, घोषणापत्रों से नहीं। विश्वास बनाने और टकराव घटाने के उपायों में शामिल हैं:
- स्वतंत्र निगरानी के साथ अपतटीय और तटवर्ती परियोजनाओं के लिए कानून में स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति की गारंटी देना।
- ऐसे संचयी प्रभाव आकलन अनिवार्य करना जिनमें सिर्फ अलग-अलग परमिट नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर चढ़ती पाइपलाइनों, संयंत्रों और जहाजरानी गलियारों को साथ में देखा जाए।
- सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा को बाध्यकारी शर्तों में शामिल करना और आदिवासी रेंजर कार्यक्रमों के लिए दीर्घकालीन वित्तपोषण देना।
- राजस्व पारदर्शी रूप से साझा करना, जिसमें पारंपरिक मालिकों की पसंद पर समुदायों को इक्विटी हिस्सेदारी देना भी शामिल हो।
- परियोजनाओं के लिए उत्सर्जन की सख्त सीमाएं तय करना, मीथेन का सत्यापित मापन करना और सीमा पार होने पर स्पष्ट नतीजे लागू करना।
- उत्पादन बढ़ाने की अनुमति देने से पहले स्वतंत्र प्रदर्शन पड़ावों के आधार पर कार्बन पकड़ने की योजनाओं की जांच करना।
- पेट्रोकेमिकल और एलएनजी सुविधाओं के पास रहने वाले समुदायों के लिए स्वतंत्र स्वास्थ्य निगरानी का वित्तपोषण करना।
नतीजों को प्रभावित करने की वित्तीय ताकत जापान के पास है। अगर सार्वजनिक वित्त और खरीदारों के अनुबंध उच्चतम मानकों वाले परामर्श और जलवायु संबंधी शर्तों की मांग करें, तो इस क्षेत्र की परियोजनाएं बदलेंगी। ऑस्ट्रेलिया के पास नीतिगत उपाय हैं। अगर मंजूरियां आपूर्ति सुरक्षा को समुदायों के मजबूत अधिकारों और स्वच्छ रास्तों से जोड़ें, तो निवेश का जोखिम घटेगा और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ेगी। दोनों देशों के ये कदम एलएनजी को कम करने और हरित आपूर्ति को बढ़ाने का रास्ता बना सकते हैं, बिना फर्स्ट नेशंस समुदायों को हाशिये पर धकेले।
ऐसा करने का दबाव ऑस्ट्रेलिया से बाहर भी बढ़ रहा है। अलास्का से ब्रिटिश कोलंबिया तक आदिवासी नेता और जलवायु समर्थक उन बैंकों और सरकारों को चुनौती दे रहे हैं जो नई जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं को लगातार पैसा दे रहे हैं। जेबीआईसी जैसे सार्वजनिक ऋणदाताओं पर केंद्रित वैश्विक अभियान मजबूत हो रहे हैं। संदेश साफ है: समुदायों की सहमति, स्वास्थ्य और संस्कृति कोई गौण मुद्दे नहीं हैं। न्यायसंगत होने का दावा करने वाली किसी भी ऊर्जा व्यवस्था के केंद्र में इन्हें होना चाहिए।
जानने योग्य बातें
- जापानी निवेशक जेईआरए की 12.5 प्रतिशत हिस्सेदारी और जेबीआईसी के ऋण वाली बैरोसा एलएनजी परियोजना गैस उत्पादन शुरू करने के करीब है। अपतटीय सुविधाएं स्थापित और पाइपलाइनें पूरी हो चुकी हैं।
- परियोजना में गैस को डार्विन एलएनजी संयंत्र तक पहुंचाया जाएगा। इसमें सीओ2 पकड़कर भंडारण के लिए टिमोर-लेस्ते भेजने की योजना भी है, जिससे लागत और जटिलता बढ़ेगी।
- तिवी और लाराकिया नेताओं का कहना है कि परामर्श पर्याप्त नहीं रहा और सांस्कृतिक विरासत, समुद्री भूमि तथा सामुदायिक स्वास्थ्य को बढ़ते जोखिमों का सामना है।
- सैंटोस रोजगार, स्थानीय खरीद और तटीय समुदायों के लिए सालाना 10 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक के बैरोसा एबोरिजिनल फ्यूचर फंड को रेखांकित करता है।
- जापान अपनी एस+3ई नीति के तहत एलएनजी को ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा बताता है, जबकि नागरिक समाज की रिपोर्टें 2016 से गैस क्षेत्र में जेबीआईसी के 18.6 अरब अमेरिकी डॉलर के वित्तपोषण की आलोचना करती हैं।
- जापानी बिजली कंपनियां ऑस्ट्रेलियाई एलएनजी को तीसरे देशों में भी दोबारा बेचती हैं। इससे घरेलू आपूर्ति से आगे एलएनजी व्यापार की व्यावसायिक भूमिका जाहिर होती है।
- इनपेक्स द्वारा संचालित इच्थिस एलएनजी इस क्षेत्र में जापानी समर्थन वाली गैस परियोजनाओं का पैमाना दिखाती है, जबकि बीटालू की फ्रैकिंग योजनाओं से पानी और सहमति को लेकर नई चिंताएं उठती हैं।
- विश्लेषक ऑस्ट्रेलिया और जापान के साझा दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जिसमें स्थिर मंजूरियों और मानकों के सहारे एलएनजी तथा हरित ईंधनों के नियमों में तालमेल हो।
- प्रमुख सुधारों में बाध्यकारी एफपीआईसी, संचयी प्रभाव आकलन, विरासत की मजबूत सुरक्षा, समुदायों के लिए इक्विटी विकल्प और वास्तविक प्रवर्तन वाली सख्त उत्सर्जन सीमाएं शामिल हैं।






