डेविड बाल्टीमोर और चीन-अमेरिका जीवन विज्ञान सेतु का निर्माण

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डेविड बाल्टीमोर और चीन-अमेरिका जीवन विज्ञान सेतु का निर्माण

सीमाओं के पार सेतु बनाने वाले वैज्ञानिक

नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी जीवविज्ञानी डेविड बाल्टीमोर का इस महीने 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चीन और चीनी-अमेरिकी शोधकर्ताओं की ओर से दी गई श्रद्धांजलियों में उन्हें देश में आत्मविश्वास से भरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा जीवन विज्ञान समुदाय बनाने में मदद का श्रेय दिया गया। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने ऐसी खोजें कीं, जिन्होंने वायरस और प्रतिरक्षा को लेकर वैज्ञानिकों की समझ बदल दी। बाद में वे मार्गदर्शक और सलाहकार बने तथा ऐसे कार्यक्रम बनाने में जुटे, जिन्होंने बीजिंग और शंघाई की प्रयोगशालाओं को लॉस एंजिलिस और बोस्टन से जोड़ा। चीन में कई लोगों के लिए वे ऐसे विरले वैश्विक व्यक्तित्व थे, जो सेमिनारों, कार्यशालाओं और छात्रों के साथ खुली बातचीत के लिए बार-बार लौटते थे। ये दौरे महज औपचारिक नहीं थे। अक्सर उनसे ठोस सहयोग, शिक्षकों की भर्ती और नए केंद्रों की रूपरेखा तैयार करने जैसे काम आगे बढ़े।

विषय-सूची
  1. सीमाओं के पार सेतु बनाने वाले वैज्ञानिक
  2. बाल्टीमोर ने आधुनिक जीवविज्ञान को कैसे बदला
  3. रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज से सटीक चिकित्सा तक
  4. चीनी वैज्ञानिकों की एक पीढ़ी का मार्गदर्शन
  5. सूझोउ और उससे आगे संस्थानों का निर्माण
  6. सिस्टम्स मेडिसिन क्यों अहम है
  7. बदलते भू-राजनीतिक माहौल में सहयोग
  8. भरोसा, पारदर्शिता और शोध जगत
  9. जीन संपादन विवादों से सबक
  10. आखिरी शोधपत्र और चीन से स्थायी जुड़ाव
  11. एलिस हुआंग और साझेदारी को आकार देने वाले मूल्य
  12. चीन के युवा शोधकर्ताओं के लिए उनकी विरासत का अर्थ
  13. मुख्य बिंदु

तीस की उम्र में बाल्टीमोर ने जीन अनुसंधान में क्रांतिकारी बदलाव किया। इसी काम के लिए उन्हें 1975 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला। उसके बाद के पांच दशकों में उन्होंने चीन में नए संस्थानों को सलाह दी, देश भर के परिसरों का दौरा किया और दर्जनों चीनी शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने बाद में प्रशांत महासागर के दोनों ओर की प्रयोगशालाओं को आकार दिया। उन्होंने सलाहकार बोर्डों की सह-अध्यक्षता की, खचाखच भरे सभागारों में व्याख्यान दिए और छोटे समूहों की चर्चाओं में समय बिताया, जहां युवा वैज्ञानिक अपने विचार परख सकते थे। उनका आखिरी वैज्ञानिक शोधपत्र चीनी जर्नल Immunity & Inflammation के पहले अंक में, उनके निधन से कुछ ही दिन पहले प्रकाशित हुआ। कई प्रशंसकों के लिए NF kappa B पर यह लेख उस वैज्ञानिक की ओर से एक उपयुक्त अंतिम संदेश था, जिनकी रुचि प्रतिरक्षा की आणविक कार्यप्रणाली से लेकर खोजों को संभव बनाने वाली संस्कृति तक फैली थी।

सहकर्मी ऐसे वैज्ञानिक का वर्णन करते हैं, जिन्होंने लोगों, विचारों और संस्थानों को जोड़ा। इस पूरे काम के पीछे एक सीधा विश्वास था: खुलापन और सीमाओं के पार आदान-प्रदान अच्छे अनुसंधान को तेजी से आगे बढ़ाते हैं। यह दृष्टिकोण चीन में बायोमेडिसिन के तेजी से बढ़ते निवेश के अनुकूल था और इसने अनौपचारिक दौरों को ऐसे स्थायी कार्यक्रमों में बदलने में मदद की, जिनसे प्रशिक्षण, बुनियादी खोज और अनुसंधान के व्यावहारिक उपयोग को मजबूती मिली। सूझोउ इंस्टीट्यूट ऑफ सिस्टम्स मेडिसिन उन्हें अपना संस्थापक सलाहकार मानता है। वेस्टलेक यूनिवर्सिटी ने नए स्नातकोत्तर कार्यक्रम शुरू करते समय उनके मार्गदर्शन का लाभ लिया। बीजिंग के सम्मेलन सभागारों में दो बार उन्होंने वर्ल्ड लाइफ साइंस कॉन्फ्रेंस के सत्रों की अध्यक्षता की, जिनमें युवा शोधकर्ता और वरिष्ठ नेता एक साथ आए। उनके बनाए व्यक्तिगत संबंध अब चीन और विदेशों की प्रयोगशालाओं में फैले हुए हैं।

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बाल्टीमोर ने आधुनिक जीवविज्ञान को कैसे बदला

चीनी वैज्ञानिक बाल्टीमोर को इतना सम्मान क्यों देते थे, यह समझने के लिए देखना होगा कि उन्होंने आधुनिक जीवविज्ञान को किस तरह बदला। 1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज की पहचान की। यह एक ऐसा एंजाइम है, जिसका उपयोग कुछ RNA वायरस DNA बनाने के लिए करते हैं। इस खोज ने पाठ्यपुस्तकों में आनुवंशिक जानकारी के एकतरफा प्रवाह की धारणा को उलट दिया और बताया कि रेट्रोवायरस अपनी प्रतिकृति कैसे बनाते हैं। रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज आणविक जीवविज्ञान का एक बुनियादी औजार बना और HIV के प्रमुख उपचारों का लक्ष्य भी। इस खोज ने चिकित्सा जगत को उन वायरस को समझने और उनका मुकाबला करने का तरीका दिया, जो हमारे जीनोम में अपनी जानकारी दर्ज करते हैं।

रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज से सटीक चिकित्सा तक

इसके बाद बाल्टीमोर की प्रयोगशाला ने प्रतिरक्षा तंत्र के नियंत्रण स्विचों को समझने में मदद की। उनकी टीम ने NF kappa B की पहचान की। यह एक ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर है, जो सूजन और कोशिका के अस्तित्व से जुड़े जीन सक्रिय करता है। जब NF kappa B का नियमन बिगड़ता है, तो कोशिकाएं गलत समय पर संकट संकेत भेजती हैं और ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। इस मार्ग को प्रभावित करने वाली दवाओं का लक्ष्य सामान्य बचाव व्यवस्था को बंद किए बिना बेकाबू सूजन को शांत करना है।

उनके समूह ने RAG1 और RAG2 जीन की भी खोज की। ये जीन VDJ रिकॉम्बिनेशन को संचालित करते हैं। यह आनुवंशिक फेरबदल अरबों तरह के एंटीबॉडी और T-सेल रिसेप्टर बनाता है। इसी प्रक्रिया के कारण मानव प्रतिरक्षा तंत्र रोगाणुओं की विशाल विविधता को पहचान पाता है। RAG जीन की समझ से यह स्पष्ट हुआ कि अर्जित प्रतिरक्षा कैसे सीखती है और कभी-कभी यह प्रक्रिया क्यों गड़बड़ा जाती है।

उनके काम की एक अन्य धारा ने आधुनिक कैंसर उपचार की नींव तैयार करने में मदद की। ABL1 टायरोसिन किनेज कैसे काम करता है और कुछ प्रकार के ल्यूकेमिया में BCR के साथ जुड़ने पर यह जरूरत से ज्यादा सक्रिय कैसे हो जाता है, इसका विश्लेषण करके बाल्टीमोर के शोध समूह के काम ने इमैटिनिब के औचित्य को मजबूत किया। यह लक्षित दवा क्रॉनिक मायलॉइड ल्यूकेमिया के उपचार में बड़ा बदलाव लाई। आज आम हो चुका कैंसर उपचार का सटीक दृष्टिकोण इसी तरह की स्पष्ट आणविक पड़ताल से विकसित हुआ।

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चीनी वैज्ञानिकों की एक पीढ़ी का मार्गदर्शन

चीन में बाल्टीमोर का प्रभाव संस्थानों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी था। वर्षों के दौरान उन्होंने कई चीनी छात्रों और पोस्टडॉक्टरल शोधार्थियों को प्रशिक्षित किया। कुछ अमेरिका में ही रहे और वरिष्ठ प्राध्यापक बने। अन्य चीन लौटे और नए कार्यक्रम शुरू किए। महाद्वीपों के पार पूर्व छात्रों के नेटवर्क बने, जिन्होंने ग्वांगझू, शंघाई, बीजिंग और सूझोउ की प्रयोगशालाओं को अमेरिका के शोध केंद्रों से जोड़ा। इन संबंधों से शोध विधियां साझा करना, संयुक्त शोधपत्र लिखना और प्रतिभाओं को वहां पहुंचाना आसान हुआ, जहां वे आगे बढ़ सकती थीं।

बाल्टीमोर के साथ प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले प्रतिरक्षाविज्ञानी और अब सूझोउ इंस्टीट्यूट ऑफ सिस्टम्स मेडिसिन के प्रमुख चेंग गेन्होंग ने कहा कि उनके दौरे और सलाह सामान्य मार्गदर्शन से कहीं आगे थे। चेंग के अनुसार, बाल्टीमोर ने संस्थान की रणनीति बनाने में मदद की और युवा वैज्ञानिकों को कठोर शोध-पद्धतियों पर ध्यान बनाए रखते हुए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने के लिए प्रोत्साहित किया।

अपनी श्रद्धांजलि की शुरुआत करते हुए चेंग ने बताया कि चीनी प्रयोगशालाओं में यह प्रतिबद्धता कितनी स्पष्ट दिखती थी।

डॉ. बाल्टीमोर ने कई बार चीन का दौरा किया। उनके पदचिह्न अनेक विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में हैं।

चेंग और अन्य सहकर्मियों के मुताबिक, उनके संदेश का सार सरल था: विचार सीमाओं के पार जाएं तो विज्ञान तेजी से आगे बढ़ता है। मार्गदर्शन ऐसे दरवाजे खोल सकता है, जो अन्यथा बंद रहते। इस काम का बड़ा हिस्सा शांत और मानवीय होता है: किसी शोधार्थी की योजना ध्यान से सुनना, व्हाइटबोर्ड पर प्रयोग की रूपरेखा बनाना या किसी होनहार युवा शोधकर्ता के दौरे का सुझाव देने के लिए सहकर्मी को फोन करना।

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सूझोउ और उससे आगे संस्थानों का निर्माण

चीन में बाल्टीमोर की भूमिका टिकाऊ संस्थान बनाने से भी जुड़ी थी। सूझोउ में उन्होंने वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड की सह-अध्यक्षता झू चेन के साथ की। झू चेन चिकित्सक-वैज्ञानिक हैं और बाद में चीन के स्वास्थ्य मंत्री बने। संस्थान का मिशन प्रतिरक्षाविज्ञान, सिस्टम्स बायोलॉजी और सटीक चिकित्सा को जोड़ता है। यह मेल बाल्टीमोर के उस विचार को दर्शाता है कि विभिन्न विषय जब औजार और डेटा साझा करते हैं, तब अक्सर वास्तविक प्रगति होती है।

उन्होंने चीनी शोध विश्वविद्यालयों के नए मॉडलों से भी जुड़ाव रखा। वेस्टलेक यूनिवर्सिटी ने उन्हें अपने संचालन बोर्ड में शामिल होने का आमंत्रण दिया। विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप, स्नातकोत्तर शिक्षा पर केंद्रित और शोध-प्रधान परिसर बना रहा था। उन्होंने राष्ट्रीय सम्मेलनों का भी समर्थन किया और बीजिंग में वर्ल्ड लाइफ साइंस कॉन्फ्रेंस के दो बार अध्यक्ष रहे। इन सभी भूमिकाओं में दीर्घकालीन योजना के साथ युवा विद्वानों के मार्गदर्शन का व्यावहारिक तरीका शामिल था।

सिस्टम्स मेडिसिन क्यों अहम है

सिस्टम्स मेडिसिन में अलग-अलग अणुओं का पृथक अध्ययन करने के बजाय यह समझने की कोशिश होती है कि जीन, प्रोटीन, कोशिकाएं और ऊतक एक-दूसरे के साथ कैसे काम करते हैं। प्रतिरक्षा विकारों या कैंसर में संकेतों के परिपथ बीमारी को बढ़ाते हैं। इन परिपथों को मापना और उनमें बदलाव करना सीखना अगली पीढ़ी की चिकित्सा के लिए केंद्रीय है। बाल्टीमोर ने ऐसे प्रशिक्षण पर जोर दिया, जिसमें संगणना, सीक्वेंसिंग और पारंपरिक जीवविज्ञान का मेल हो। उनकी सलाह पर काम करने वाले संस्थान अब छात्रों को कोड लिखना, CRISPR स्क्रीन तैयार करना और प्रयोगशाला के प्रयोगों के साथ-साथ क्लिनिकल डेटा का विश्लेषण करना सिखाते हैं।

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बदलते भू-राजनीतिक माहौल में सहयोग

चीन में बाल्टीमोर का करियर ऐसे दौर में आगे बढ़ा, जब देश की वैज्ञानिक क्षमता बढ़ रही थी और अमेरिका में राजनीतिक निगरानी का स्वरूप बदल रहा था। अमेरिका-चीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी समझौते पर पहली बार 1979 में हस्ताक्षर हुए थे। हाल के वर्षों में इस लंबे समय से चले आ रहे समझौते पर कई दौर की बातचीत और देरी हुई है। वॉशिंगटन ने अधिक मजबूत सुरक्षा और स्पष्ट शर्तों की मांग की है। अमेरिका के विश्वविद्यालयों ने विदेशी संबंधों का खुलासा न किए जाने को लेकर एजेंसियों की चिंताओं के जवाब में जानकारी देने के नियम कड़े किए और हितों के टकराव की समीक्षा शुरू की। एमोरी यूनिवर्सिटी और एमडी एंडरसन जैसे संस्थानों के चर्चित मामलों ने दिखाया कि वित्तपोषण, नियुक्तियों या डेटा तक पहुंच की पूरी जानकारी न देने पर क्या जोखिम हो सकते हैं।

भरोसा, पारदर्शिता और शोध जगत

इन बहसों ने सहयोग का संदर्भ बदल दिया। साथ ही स्पष्ट मानदंडों की जरूरत भी रेखांकित की। बाल्टीमोर खुले आदान-प्रदान के पक्षधर थे और कई देशों के युवा वैज्ञानिकों की भागीदारी को महत्व देते थे। यह दृष्टिकोण पारदर्शिता या सुरक्षा के खिलाफ नहीं है। इसमें स्पष्ट नीतियों, समय पर जानकारी देने और संवेदनशील काम की मजबूत समीक्षा की मांग है। उनके साथ प्रशिक्षित चीनी शोधकर्ता अक्सर कठोरता और खुलेपन की ऐसी अपेक्षा का जिक्र करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। व्यवहार में भरोसा तब बढ़ता है, जब संस्थान सटीक जानकारी देने को प्रोत्साहित करने वाली प्रक्रियाएं बनाते हैं और सहयोग में साझा संचालन, नियमित ऑडिट तथा पारस्परिक डेटा साझाकरण शामिल होता है।

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जीन संपादन विवादों से सबक

2018 में शोधकर्ता हे जियानकुई द्वारा शेनझेन में भ्रूणों में बदलाव के बाद जीन-संपादित जीनोम वाले पहले शिशुओं के जन्म का खुलासा हुआ। इस घटना ने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को झकझोर दिया। इस परियोजना में HIV से प्रतिरोध पैदा करने के उद्देश्य से CCR5 जीन को निशाना बनाने के लिए CRISPR का इस्तेमाल किया गया था। इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, क्योंकि जनन-कोशिकाओं में जीन संपादन से ऐसी आनुवंशिक जानकारी बदलती है, जो आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकती है। अधिकांश सरकारों और वैज्ञानिक संगठनों का कहना है कि व्यापक जन-सहमति और सुरक्षा के स्पष्ट आंकड़ों के बिना यह सीमा पार नहीं की जानी चाहिए।

बाद की रिपोर्टों से पता चला कि कुछ लोगों को संदेह था या जानकारी थी कि हे मानव भ्रूणों पर प्रयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं। कुछ ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी। अन्य चुप रहे या उन्हें बच्चों के जन्म की जानकारी घोषणा के बाद ही मिली। इस घटना ने संस्थागत निगरानी और समुदाय के आत्म-नियमन की कमजोरियां उजागर कीं। बाद में चीन ने नियम सख्त किए और अंतरराष्ट्रीय समूहों ने भ्रूण अनुसंधान तथा जीन संपादन के औजारों से जुड़े क्लिनिकल शोध के लिए साझा मानकों की मांग दोहराई।

चीन में या चीनी साझेदारों के साथ काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए यह मामला याद दिलाता है कि सेमिनार और समीक्षा समितियां पर्याप्त नहीं हैं। स्पष्ट कानून, अधिकार-संपन्न नैतिकता बोर्ड और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने वाले पेशेवर संगठन जरूरी हैं। मकसद अनुसंधान को धीमा करना नहीं है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णायक कदम, खासकर वे जो आने वाले बच्चों को प्रभावित करते हैं, सख्त सुरक्षा और सहमति संबंधी शर्तों पर खरे उतरें।

आखिरी शोधपत्र और चीन से स्थायी जुड़ाव

बाल्टीमोर का आखिरी वैज्ञानिक लेख उनके निधन से ठीक पहले Immunity & Inflammation के पहले अंक में प्रकाशित हुआ। इसमें उनका एक प्रिय विषय फिर सामने आया: NF kappa B के जरिए कोशिकाएं रक्षा कार्यक्रम कैसे सक्रिय और निष्क्रिय करती हैं। यह अणु एक स्विचबोर्ड की तरह काम करता है। तनाव के संकेत मिलने पर NF kappa B कोशिका के केंद्रक में जाता है और सूजन संबंधी प्रतिक्रिया शुरू करने वाले जीन सक्रिय करता है। संकेत खत्म होने पर यह प्रणाली बंद हो जाती है। लगातार सक्रिय रहने से ऑटोइम्यून बीमारी या कैंसर हो सकता है। इस लेख में मौजूदा समझ का सार दिया गया और ऐसी उपचार रणनीतियां बताई गईं, जो जरूरी प्रतिरक्षा कार्यों को मिटाए बिना इस स्विच को फिर से व्यवस्थित कर सकती हैं।

उनके साथ चीन में काम कर चुके शोधकर्ताओं के लिए इस काम का चीनी जर्नल में प्रकाशित होना प्रतीकात्मक महत्व रखता था। यह विज्ञान और व्यक्तिगत संबंधों का एक और सेतु था। यह चुनाव उस वैज्ञानिक के स्वभाव के अनुरूप था, जिन्होंने वर्षों तक चीनी विश्वविद्यालयों की यात्राएं कीं, भरी कक्षाओं में सवालों के जवाब दिए और पूर्व शोधार्थियों के करियर की खबर लेते रहे। मित्र चीन से उनके पारिवारिक संबंध का भी उल्लेख करते हैं। उनकी पत्नी, विषाणुविज्ञानी एलिस एस. हुआंग का जन्म नानचांग में हुआ था। बाद में वे अमेरिकी विज्ञान नीति और शिक्षा के क्षेत्र की प्रमुख हस्ती बनीं।

एलिस हुआंग और साझेदारी को आकार देने वाले मूल्य

एलिस हुआंग का करियर उन वैज्ञानिक मूल्यों की एक समानांतर कहानी पेश करता है, जिन्होंने चीन के साथ इस दंपती के जुड़ाव को दिशा दी। जानी-मानी विषाणुविज्ञानी और बाद में अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस की अध्यक्ष रहीं हुआंग लंबे समय से कहती आई हैं कि प्रगति के लिए जुनून, रचनात्मकता और स्वतंत्रता जरूरी हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विज्ञान में महिलाओं तथा अल्पसंख्यकों की भागीदारी को बढ़ावा दिया। साल्क इंस्टीट्यूट और बाद में हार्वर्ड तथा एमआईटी में RNA वायरस पर उनका शुरुआती काम उस दौर से जुड़ा था, जब रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज की भूमिका को समझा जा रहा था। खुले सवालों की पड़ताल को महत्व देने और जिज्ञासा को संरक्षण देने वाली वैज्ञानिक संस्कृति की पैरवी में वे और बाल्टीमोर अक्सर साथ खड़े रहे।

यह दृष्टिकोण चीन के बढ़ते शोध समुदाय से जुड़ गया। प्रयोगशालाओं का तेजी से विस्तार हुआ तो बहस का केंद्र उपकरण खरीदने से हटकर लोगों को आगे बढ़ाने पर आ गया। सवालों का स्वागत करने और साहसी विचारों को समर्थन देने वाली संस्कृति बनाने पर हुआंग के संदेश को उन युवा समूहों में समर्थन मिला, जो विश्वस्तरीय कार्यक्रम बनाना चाहते थे। उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि पारिवारिक संबंध सीमा पार सहयोग को सहज बना सकते हैं और निजी इतिहास को पेशेवर फैसलों से जोड़ सकते हैं।

चीन के युवा शोधकर्ताओं के लिए उनकी विरासत का अर्थ

चीन में बाल्टीमोर की विरासत की तीन परस्पर जुड़ी धाराएं हैं। पहली है विज्ञान। उन्होंने और उनके शोधार्थियों ने वायरस की प्रतिकृति, प्रतिरक्षा के नियंत्रण और कैंसर के संकेतों के तर्क को स्पष्ट किया। ये विचार अब चीनी अस्पतालों में नए निदान और उपचारों का आधार हैं। दूसरी है मानव पूंजी। उन्होंने जिन शोधकर्ताओं को प्रशिक्षित किया, वे खुद मार्गदर्शक बने। उन्होंने ऐसी प्रयोगशालाएं बनाईं, जहां बुनियादी और क्लिनिकल विज्ञान का मेल है, और विदेशों के सहयोगियों से संबंध बनाए रखे। तीसरी धारा है संस्थान निर्माण। सूझोउ से हांगझोउ और बीजिंग तक उन्होंने ऐसी व्यवस्थाओं को आकार देने में मदद की, जो किसी एक प्रयोगशाला से कहीं अधिक समय तक टिकेंगी। इनमें सलाहकार बोर्ड, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और सम्मेलन नेटवर्क शामिल हैं।

छात्रों और करियर की शुरुआत कर रहे वैज्ञानिकों के लिए दो व्यावहारिक सबक साफ हैं। प्रयोगशाला तब फलती-फूलती है, जब वह कठिन सवाल चुनती है और ऊंचे मानक बनाए रखती है। वह तब भी आगे बढ़ती है, जब दूसरे स्थानों से आए विचारों और लोगों के लिए खुली रहती है। बाल्टीमोर को नई जिज्ञासाएं सुनना पसंद था और उनका मानना था कि विज्ञान एक साझा परियोजना है, इसलिए वे यात्राएं करते रहे। चीन का शोध समुदाय आंशिक रूप से इसलिए तेजी से बढ़ा, क्योंकि उसने इस तरह के आदान-प्रदान के लिए जगह बनाई। इस विकास का भविष्य पारदर्शिता को और मजबूत करने, सहकर्मी समीक्षा बेहतर बनाने और राजनीति से मुश्किलें बढ़ने पर भी प्रशिक्षण को अंतरराष्ट्रीय बनाए रखने पर निर्भर करेगा।

मुख्य बिंदु

  • 87 वर्ष की आयु में निधन हुए डेविड बाल्टीमोर ने मार्गदर्शन, लगातार दौरों और संस्थान निर्माण के जरिए चीन के साथ लंबे समय तक संबंध बनाए।
  • उनके वैज्ञानिक योगदानों में रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज, NF kappa B तथा RAG जीन और BCR ABL से जुड़ी खोजें शामिल हैं। इनसे HIV उपचार, प्रतिरक्षाविज्ञान और सटीक कैंसर चिकित्सा को आकार मिला।
  • उन्होंने सूझोउ इंस्टीट्यूट ऑफ सिस्टम्स मेडिसिन को सलाह दी और वेस्टलेक यूनिवर्सिटी जैसे शोध विश्वविद्यालयों के नए मॉडलों का समर्थन किया।
  • चेंग गेन्होंग समेत चीनी वैज्ञानिकों की श्रद्धांजलियां खुले आदान-प्रदान और युवा प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करने में उनके विश्वास को रेखांकित करती हैं।
  • NF kappa B पर उनका आखिरी शोधपत्र निधन से कुछ दिन पहले एक चीनी जर्नल के पहले अंक में प्रकाशित हुआ।
  • सहयोग पर अब अधिक कड़ी निगरानी है। इसमें विदेशों से अघोषित संबंधों को लेकर अमेरिका की पड़ताल और अमेरिका-चीन विज्ञान समझौते पर जारी बातचीत शामिल है।
  • हे जियानकुई के जीन संपादन मामले के बाद नियम सख्त हुए और भ्रूण अनुसंधान के लिए वैश्विक मानकों की मांग फिर उठी।
  • एलिस एस. हुआंग के नेतृत्व और विज्ञान में जुनून तथा स्वतंत्रता की पैरवी ने इस दंपती के चीन से जुड़ाव को और गहराई दी।
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