भारत के नाविक: वैश्विक संकट के बीच समुद्र में फंसे
2024 में दुनिया के नौवहन उद्योग को अभूतपूर्व स्तर के मानवीय संकट का सामना करना पड़ा: जहाज मालिकों द्वारा नाविकों को छोड़ देने की घटनाएं रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। इस त्रासदी के केंद्र में भारतीय नाविक हैं, जो लगातार दूसरे वर्ष छोड़े गए चालक दल के सदस्यों की वैश्विक सूची में शीर्ष पर रहे। आंकड़ों के पीछे कठिनाइयों, टूटती उम्मीदों और ऐसी व्यवस्था की कहानियां हैं, जो अक्सर श्रमिकों को दुनिया के महासागरों में अकेला, वेतन से वंचित और भुला हुआ छोड़ देती है।
विषय-सूची
- भारत के नाविक: वैश्विक संकट के बीच समुद्र में फंसे
- नाविकों के लिए "परित्याग" का क्या अर्थ है?
- व्यक्तिगत कहानियां: छोड़े गए जहाजों पर जीवन
- भारतीय नाविक इतने असुरक्षित क्यों हैं?
- संकट का पैमाना: रिकॉर्ड संख्या और वित्तीय असर
- सुविधाजनक झंडे: समस्या के केंद्र में कानूनी खामी
- मानवीय कीमत: मनोवैज्ञानिक और आर्थिक असर
- यह अभी क्यों हो रहा है? व्यवस्थागत विफलताएं और वैश्विक रुझान
- संकट से निपटने के प्रयास: क्या किया जा रहा है?
- व्यापक असर: वैश्विक व्यापार की छिपी कीमत
- संक्षेप में
नाविकों के लिए "परित्याग" का क्या अर्थ है?
समुद्री श्रम अभिसमय (MLC) 2006 की परिभाषा के अनुसार, परित्याग तब होता है जब जहाज मालिक स्वदेश वापसी का खर्च नहीं उठाता, जरूरी देखभाल और सहायता मुहैया नहीं कराता, या कम से कम दो महीने तक अनुबंधित वेतन रोकता है। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है कि नाविकों को जहाजों पर, अक्सर विदेशी बंदरगाहों में, वेतन, भोजन, पानी या घर लौटने के साधन के बिना फंसा छोड़ दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) इन मामलों पर नजर रखने के लिए एक संयुक्त डेटाबेस चलाते हैं, लेकिन आंकड़े केवल इस पीड़ा के वास्तविक पैमाने की झलक देते हैं।
2024 में अंतरराष्ट्रीय परिवहन श्रमिक महासंघ (ITF) ने दुनिया भर में 3,133 नाविकों के परित्यक्त होने की सूचना दी, जो पिछले वर्ष की तुलना में चौंका देने वाली 87% वृद्धि थी। इनमें से 899 भारतीय नागरिक थे, यानी कुल मामलों के लगभग 29%। यह संकट केवल आंकड़ों का मामला नहीं है; यह उन जिंदगियों का मामला है जो ठहर गई हैं, आर्थिक संकट में घिरे परिवारों का मामला है और कानूनी तथा भौतिक अनिश्चितता में फंसे श्रमिकों का मामला है।
व्यक्तिगत कहानियां: छोड़े गए जहाजों पर जीवन
हर आंकड़े के पीछे एक मानवीय कहानी है। भारतीय मुख्य अधिकारी मानस कुमार अप्रैल से यूक्रेन के जलक्षेत्र में मालवाहक जहाज अंका पर फंसे हैं। रूस के गुप्त बेड़े का हिस्सा होने के संदेह में यूक्रेनी अधिकारियों ने इस जहाज पर छापा मारा था, जिसके बाद कुमार और उनका बहुराष्ट्रीय चालक दल नौकरशाही की अनिश्चितता में फंस गए। उन्हें बताया गया कि वे जा सकते हैं, लेकिन चालक दल हिचकिचाया—जहाज छोड़ने का मतलब था कि सामूहिक रूप से उन्हें बकाया 100,000 डॉलर से अधिक का वेतन गंवाना। कुमार ने BBC से कहा, "यह युद्ध क्षेत्र है। हम बस जल्दी घर लौटना चाहते हैं।"
एक अन्य मामला कैप्टन अमिताभ चौधरी का है, जो नौ भारतीय और एक इराकी चालक दल सदस्य के साथ सऊदी अरब के जुबैल बंदरगाह के पास चट्टानों से टकराने के बाद तंजानिया के झंडे वाले स्ट्रेटोस पर लगभग छह महीने तक फंसे रहे। जहाज मालिक ने वित्तीय नुकसान का हवाला देते हुए उनका वेतन देने से इनकार कर दिया। चालक दल की मुश्किलों में भूख, जहाज के डूबने का डर और अनिश्चितता का मनोवैज्ञानिक दबाव शामिल था। चौधरी ने गुहार लगाई, "दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है, समझ नहीं आता कि अब और क्या करें। क्या हमें कोई मदद मिल सकती है? हम बस घर जाकर अपने प्रियजनों से मिलना चाहते हैं।"
ये अकेली घटनाएं नहीं हैं। खाड़ी क्षेत्र में भारतीय स्वामित्व वाले, कुराकाओ के झंडे वाले तेल टैंकर निर्वाना के चालक दल को भी ऐसी ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा—भोजन नहीं, ईंधन नहीं और वेतन नहीं। वे अदालत के आदेश से हुए समझौते का इंतजार करते रहे, लेकिन महीनों बाद भी उन्हें उनका वेतन नहीं मिला था।
भारतीय नाविक इतने असुरक्षित क्यों हैं?
भारत वाणिज्यिक जहाजों के चालक दल उपलब्ध कराने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसके हजारों नागरिक दुनिया भर के जहाजों पर काम करते हैं। फिर भी, भारतीय नाविकों को लगातार सबसे अधिक छोड़ा जाता है। उनकी असुरक्षा के पीछे कई कारण हैं:
- नौकरी पाने की मजबूरी: कई भारतीय नाविक भर्ती एजेंटों को भारी शुल्क देते हैं या प्रशिक्षण प्रमाणपत्रों पर खर्च करते हैं। इससे वे आर्थिक रूप से असुरक्षित हो जाते हैं और अपने निवेश की भरपाई के लिए वेतन पाने को मजबूर रहते हैं।
- जानकारी की कमी: कुछ चालक दल सदस्यों को जोखिमों या जहाज पर वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं होती, और संभव है कि आखिरी समय तक उन्हें यह भी न पता हो कि वे किस जहाज पर जा रहे हैं।
- सुविधाजनक झंडे: छोड़े गए जहाजों में से अधिकांश तथाकथित "सुविधाजनक झंडों" के तहत चलते हैं—ऐसे देशों की रजिस्ट्री के तहत जहां नियम-कायदे कमजोर हैं, जैसे पनामा, पलाऊ, तंजानिया और कोमोरोस। ये झंडे जहाज मालिकों को अपनी पहचान छिपाने, श्रम कानूनों से बचने और जवाबदेही से दूर रहने का मौका देते हैं।
- जटिल स्वामित्व संरचनाएं: जहाजों का स्वामित्व, प्रबंधन और चालक दल अक्सर अलग-अलग देशों की संस्थाओं के पास होता है। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कुछ गलत होने पर जिम्मेदार कौन है।
ITF के अनुसार, 2024 में छोड़े गए 90% जहाज सुविधाजनक झंडे के तहत चल रहे थे। वैश्विक व्यापार को आसान बनाने के लिए बनाई गई यह व्यवस्था अब उन बेईमान मालिकों के लिए ढाल बन गई है, जो चालक दल की भलाई की कीमत पर खर्च घटाना चाहते हैं।
संकट का पैमाना: रिकॉर्ड संख्या और वित्तीय असर
2024 के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं:
- दुनिया भर में 3,133 नाविक छोड़े गए (2023 के 1,676 से अधिक)
- 899 भारतीय नाविक छोड़े गए (किसी भी राष्ट्रीयता में सबसे अधिक)
- 312 जहाज छोड़े गए (2023 की तुलना में 136% वृद्धि)
- नाविकों का 20 मिलियन डॉलर से अधिक वेतन बकाया है, जिसमें से अब तक केवल लगभग आधा ही वसूल हुआ है
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में परित्याग के सबसे अधिक 42 मामले सामने आए, इसके बाद तुर्किये का स्थान रहा
ITF के वैश्विक निरीक्षण विभाग के समन्वयक स्टीव ट्राउज़डेल ने इस स्थिति को "पूरी तरह शर्मनाक" बताया और इसके लिए बेईमान जहाज मालिकों तथा सरकारों और अंतरराष्ट्रीय नियामकों की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराया। IMO को दी गई ITF की रिपोर्ट उन व्यवस्थागत विफलताओं को उजागर करती है जिनकी वजह से परित्याग जारी है। इनमें नियम लागू कराने की कमी, अपर्याप्त बीमा और जहाज मालिकों का जिम्मेदारी लेने से इनकार करना शामिल है।
सुविधाजनक झंडे: समस्या के केंद्र में कानूनी खामी
विदेशी झंडों के तहत जहाजों का पंजीकरण कराने की प्रथा—अक्सर ऐसे देशों में जहां निगरानी बहुत कम है—पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। "सुविधाजनक झंडे" (FOC) के नाम से जानी जाने वाली यह व्यवस्था जहाज मालिकों को ये अवसर देती है:
- श्रम और सुरक्षा नियमों से बचना
- परिचालन लागत घटाना
- वास्तविक स्वामित्व और जिम्मेदारी छिपाना
2024 में छोड़े गए 81% से 90% जहाज FOC के तहत चल रहे थे। 43 मामलों के साथ पनामा सबसे आगे रहा, उसके बाद पलाऊ, तंजानिया, कोमोरोस, कैमरून और बहरीन का स्थान था। कुछ जहाजों का कोई पहचान योग्य झंडा ही नहीं था, जिससे फंसे हुए चालक दल के लिए कानूनी उपाय तलाशना और मुश्किल हो गया।
ITF के अध्यक्ष पैडी क्रमलिन ने इस कारोबारी मॉडल की आलोचना की:
इस कारोबारी मॉडल की बुनियाद ऐसे देशों में पंजीकरण कराने पर है जहां न जवाबदेही है, न नियमन। परित्याग, मौत, शोषण और वेतन न देने के मामले सामने आते हैं। FOC देशों में नियमन की क्षमता नहीं है और वे केवल राजस्व आकर्षित करना चाहते हैं।
मानवीय कीमत: मनोवैज्ञानिक और आर्थिक असर
छोड़े गए नाविकों के लिए इसके नतीजे विनाशकारी होते हैं। उनमें से कई अपने परिवारों के मुख्य कमाने वाले हैं। वेतन न मिलने पर घर में परिवार कर्ज में डूब जाते हैं, बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता है और बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। मनोवैज्ञानिक असर गंभीर होता है: चिंता, अवसाद और आघात के बाद का तनाव आम हैं, खासकर उन लोगों में जो महीनों या वर्षों तक फंसे रहते हैं।
संजय (बदला हुआ नाम) जैसे कुछ नाविक दो साल से अधिक समय से जहाजों पर फंसे हैं। वे बिना वेतन काम कर रहे हैं और गुजारा करने के लिए परिवार की विरासत में मिली चीजें बेच रहे हैं। UAE में सनशाइन 7 के चालक दल जैसे अन्य लोगों ने 20 महीने से अधिक समय तक भीषण गर्मी, भोजन की कमी और एयर कंडीशनिंग न होने की स्थिति झेली। सबसे बुरे मामलों में निराशा आत्महत्या की कोशिशों तक ले जाती है।
कानूनी अनिश्चितता, वीजा प्रतिबंध और दस्तावेजों से जुड़ी समस्याएं अक्सर अनुबंध खत्म होने के काफी बाद तक नाविकों को जहाजों पर फंसा देती हैं। अदालतों के समझौते या स्वदेश वापसी के आदेश देने पर भी भुगतान में देरी हो सकती है या वह कभी होता ही नहीं।
यह अभी क्यों हो रहा है? व्यवस्थागत विफलताएं और वैश्विक रुझान
परित्याग के मामलों में उछाल कई कारणों के एक साथ प्रभाव का नतीजा है:
- आर्थिक दबाव: वैश्विक नौवहन में कड़ी प्रतिस्पर्धा है और जहाज मालिक जहां भी संभव हो, खर्च घटाने की कोशिश करते हैं। वित्तीय संकट आने पर अनुबंध की शर्तें पूरी करने के बजाय जहाज छोड़ देना सस्ता पड़ सकता है।
- कमजोर अमल: MLC 2006 जैसे अंतरराष्ट्रीय अभिसमय नाविकों के कल्याण का ढांचा देते हैं, लेकिन उनका अमल एकसमान नहीं है। बंदरगाह देशों के पास हस्तक्षेप करने के संसाधन या इच्छाशक्ति नहीं हो सकती, जबकि ध्वज वाले देश अक्सर नियमों से अधिक राजस्व को प्राथमिकता देते हैं।
- अपारदर्शी स्वामित्व: जटिल कॉर्पोरेट संरचनाएं और मुखौटा कंपनियां किसी को जवाबदेह ठहराना मुश्किल बना देती हैं।
- COVID-19 महामारी: महामारी ने चालक दल बदलने की मुश्किलें बढ़ा दीं। इसके चलते परित्याग के और मामले सामने आए, क्योंकि जहाज बंदरगाहों में फंसे रहे या चालक दल को बदलना संभव नहीं था।
रियर एडमिरल संजय रॉय (सेवानिवृत्त) ने EurAsian Times के लिए लिखते हुए कहा, "व्यवस्थागत विफलताएं और अंतरराष्ट्रीय नियमों को कमजोर ढंग से लागू करना इस संकट को और गंभीर बनाते हैं। नौवहन उद्योग सुविधाजनक झंडों, घटिया श्रम प्रथाओं और कमजोर नियामक अमल के सहारे चलता है।"
संकट से निपटने के प्रयास: क्या किया जा रहा है?
अंतरराष्ट्रीय संगठन, यूनियन और गैर-सरकारी संगठन इस संकट से निपटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन प्रगति धीमी है। IMO और ILO ने दिशानिर्देश मजबूत किए हैं और जहाज मालिकों के लिए परित्याग तथा उससे जुड़े दावों को पूरा करने हेतु अनिवार्य बीमा जरूरी किया है। ITF दुनिया भर के 120 बंदरगाहों में निरीक्षकों का नेटवर्क चलाता है, जो संकट के संदेशों पर कार्रवाई करता है और बकाया वेतन वसूलने तथा चालक दल को स्वदेश भेजने की कोशिश करता है।
हालांकि, नियम लागू कराना अब भी चुनौती है। ITF के महासचिव स्टीफन कॉटन के शब्दों में:
परित्याग में वृद्धि शोषणकारी प्रथाओं और वैश्विक नियमन की कमी को उजागर करती है। समाधान स्पष्ट है: सरकारों की ओर से बेहतर नियमन, उसका अमल और जवाबदेही।
भारत जैसे कुछ देशों से भर्ती एजेंसियों की निगरानी और जहाजों की जांच बेहतर करने की मांग की जा रही है। भारत के समुद्री नियामक, जहाजरानी महानिदेशालय को ढीली जांच-पड़ताल के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है। हालांकि, उसका यह भी कहना है कि अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से पहले नाविकों को उसमें विसंगतियों के प्रति सतर्क रहना चाहिए।
व्यापक असर: वैश्विक व्यापार की छिपी कीमत
मात्रा के हिसाब से दुनिया का 80% से अधिक व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। दुकानों की अलमारियों में भरे सामान और अर्थव्यवस्थाओं को गति देने वाली चीजें नाविकों के श्रम पर निर्भर हैं। फिर भी, परित्याग का संकट वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के अंधेरे पहलू को उजागर करता है—जहां श्रमिकों को इस्तेमाल के बाद फेंक देने लायक समझा जाता है और कानूनी खामियां शोषण को फलने-फूलने देती हैं।
नौवहन उद्योग के बढ़ने के साथ सुधार की जरूरत भी और तात्कालिक होती जा रही है। निर्णायक कार्रवाई के बिना परित्याग समुद्री क्षेत्र पर धब्बा बना रहेगा और वैश्विक वाणिज्य की बुनियाद को कमजोर करेगा।
संक्षेप में
- 2024 में दुनिया भर में रिकॉर्ड 3,133 नाविक छोड़े गए। इनमें भारतीय नागरिकों का समूह सबसे बड़ा था (899 मामले)।
- परित्याग के कारण चालक दल के सदस्य वेतन, जरूरी सामान और घर लौटने के साधन के बिना फंस जाते हैं—कभी-कभी महीनों या वर्षों तक।
- "सुविधाजनक झंडों" का व्यापक इस्तेमाल जहाज मालिकों को जिम्मेदारी से बचने और कमजोर नियमों का फायदा उठाने देता है।
- आर्थिक मजबूरी, जानकारी की कमी और जटिल स्वामित्व संरचनाएं भारतीय नाविकों को खास तौर पर असुरक्षित बनाती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय संगठन और यूनियन इस संकट से निपटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन नियम लागू कराना और जवाबदेही सुनिश्चित करना अब भी बड़ी चुनौतियां हैं।
- यह संकट वैश्विक व्यापार की छिपी मानवीय कीमत और नौवहन उद्योग में तत्काल सुधार की जरूरत को उजागर करता है।






