इंडोनेशिया का साउंड होरेग: संस्कृति, विवाद और नियमन की मांग

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इंडोनेशिया का साउंड होरेग: संस्कृति, विवाद और नियमन की मांग

साउंड होरेग का उभार: इंडोनेशिया में सड़कों पर गूंजता शोर

हाल के वर्षों में सड़कों पर मनोरंजन का एक अनोखा और गगनभेदी रूप पूरे इंडोनेशिया, खासकर पूर्वी और मध्य जावा में फैल गया है। इसे साउंड होरेग कहा जाता है—जावानी शब्द “कंपन” से निकला यह नाम उस चलन के लिए है जिसमें ट्रकों या नावों पर लाउडस्पीकरों के ऊंचे ढेर लगाए जाते हैं। ये शादी-ब्याह, कार्निवल, धार्मिक समारोहों और यहां तक कि राजनीतिक रैलियों के दौरान मोहल्लों में भारी बास वाला संगीत बजाते हुए निकलते हैं। कई लोगों के लिए साउंड होरेग उत्सव और सामुदायिक भावना का प्रतीक है, जो सामान्य आयोजनों को जोशीले नजारे में बदल देता है। लेकिन दूसरों के लिए यह सार्वजनिक व्यवधान, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और सामाजिक टकराव का कारण बन गया है। इससे देशभर में तीखी बहस छिड़ी है, जिसमें अब धार्मिक प्राधिकरण, सरकारी अधिकारी और स्थानीय समुदाय शामिल हैं।

विषय-सूची
  1. साउंड होरेग का उभार: इंडोनेशिया में सड़कों पर गूंजता शोर
  2. साउंड होरेग क्या है?
  3. संस्कृति, पहचान और साउंड होरेग की अर्थव्यवस्था
  4. जनता की नाराजगी: स्वास्थ्य, व्यवधान और सामाजिक टकराव
  5. धार्मिक फतवे और एमयूआई की भूमिका
  6. सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया
  7. साउंड होरेग और सामाजिक न्याय का सवाल
  8. समाधान की तलाश: नियमन, संवाद और सांस्कृतिक संतुलन
  9. संक्षेप में

साउंड होरेग क्या है?

साउंड होरेग सिर्फ तेज संगीत नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जिसमें श्रोता पूरी तरह डूब जाते हैं। ट्रकों या बड़े वाहनों में विशेष रूप से तैयार किए गए साउंड सिस्टम लगाए जाते हैं, जिनमें शक्तिशाली एम्प्लीफायर, सबवूफर और चमकदार लाइटें होती हैं। ये चलते-फिरते ऑडियो सेटअप सड़कों से गुजरते हैं और इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूजिक, डंगडट कोप्लो और रीमिक्स की धड़कती धुनों का आनंद लेने वाले युवाओं और तमाशबीनों की भीड़ खींचते हैं। संगीत इतना तीव्र होता है कि खिड़कियां हिल सकती हैं, दीवारें थरथरा सकती हैं और कुछ मामलों में संपत्ति को नुकसान भी पहुंच सकता है।

साउंड होरेग की शुरुआत 1970 के दशक में पूर्वी जावा में मानी जाती है, जहां पश्चिमी रॉक और पॉप संगीत के प्रति आकर्षण से उच्च गुणवत्ता वाले साउंड सिस्टम की मांग बढ़ी। समय के साथ ये सेटअप पारिवारिक जमावड़ों से लेकर सरकार द्वारा आयोजित कार्निवलों तक, स्थानीय समारोहों का अहम हिस्सा बन गए। कोविड-19 महामारी के बाद इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी, जब समुदायों ने खुले में जश्न मनाने के नए तरीके तलाशे। आज साउंड होरेग स्वतंत्रता दिवस परेड, धार्मिक त्योहारों और यहां तक कि राजनीतिक आयोजनों का नियमित हिस्सा है। व्यस्त मौसम में कुछ संचालक अच्छी-खासी कमाई करते हैं।

संस्कृति, पहचान और साउंड होरेग की अर्थव्यवस्था

कई इंडोनेशियाई लोगों, खासकर युवाओं और श्रमिक वर्ग के समुदायों के लिए, साउंड होरेग मनोरंजन से बढ़कर पहचान और सामूहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। समाजशास्त्री इसे जमीनी स्तर का उत्सव बताते हैं—ऐसा तरीका जिससे समुदाय सार्वजनिक जगहों पर अपना हक जताते हैं और उन इलाकों में मनोरंजन के अपने तंत्र बनाते हैं जहां किफायती विकल्प सीमित हैं। साउंड होरेग समूह का हिस्सा होना गर्व की बात है। “बैटल साउंड” प्रतियोगिताओं में संचालक सबसे तेज और प्रभावशाली ऑडियो के लिए मुकाबला करते हैं। इन प्रतियोगिताओं में जीतने वालों को शोहरत मिलती है और उनका कारोबार बढ़ता है।

इसका आर्थिक असर भी काफी है। ग्रेटर मलंग में ही करीब 1,200 साउंड होरेग संचालक बताए जाते हैं, जिनमें से 500 हजारों लोगों को रोजगार देते हैं। साउंड होरेग सेटअप किराये पर लेने का खर्च 20 लाख से 10 करोड़ रुपिया (लगभग 121 से 9,400 अमेरिकी डॉलर) तक हो सकता है। यह उस क्षेत्र में बड़ी रकम है जहां न्यूनतम मासिक वेतन 20 लाख रुपिया से कुछ ही अधिक है। अगस्त में, जब इंडोनेशिया स्वतंत्रता दिवस मनाता है, कुछ संचालक एक ही महीने में 50 करोड़ रुपिया (30,000 अमेरिकी डॉलर से अधिक) तक कमा सकते हैं।

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पूर्वी जावा में कानून और मानवाधिकार मंत्रालय का भी साउंड होरेग की ओर ध्यान गया है। मंत्रालय ने स्थानीय रचनात्मकता और नवाचार को मान्यता देने के लिए साउंड सिस्टम को बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) देने का प्रस्ताव रखा है। समर्थकों का कहना है कि इससे बेहतर नियमन और मान्यता मिल सकती है, जबकि आलोचकों को चिंता है कि इससे ऐसी प्रथा को वैधता मिल सकती है जो पहले से ही सामाजिक तनाव और ध्वनि प्रदूषण का कारण बन रही है।

जनता की नाराजगी: स्वास्थ्य, व्यवधान और सामाजिक टकराव

लोकप्रिय होने के बावजूद साउंड होरेग को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। जावा भर के निवासियों ने ध्वनि प्रदूषण, संपत्ति को नुकसान और रोजमर्रा की जिंदगी में खलल की शिकायतें की हैं। इन साउंड सिस्टम का शोर अक्सर 100 डेसीबल से अधिक होता है—यानी उड़ान भरते विमान के शोर के बराबर—जो स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा सुरक्षित मानी जाने वाली 85 डेसीबल की सीमा से कहीं अधिक है। लंबे समय तक ऐसे शोर के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता को स्थायी नुकसान, नींद संबंधी विकार, तनाव बढ़ना और यहां तक कि हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील समूहों को इसका खास जोखिम है।

साउंड होरेग से जुड़ी कुछ घटनाएं चिंताजनक रही हैं। अगस्त की शुरुआत में, लुमाजांग जिले में एक महिला साउंड होरेग कार्यक्रम देखते समय चक्कर आने की शिकायत के बाद गिर पड़ीं और उनकी मौत हो गई। एक अन्य घटना में, परेड के दौरान साउंड सिस्टम गिरने से एक किशोर और नौ साल का बच्चा घायल हो गए। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में ट्रक भारी उपकरणों को रास्ता देने के लिए फाटक, पुल की रेलिंग और सड़क के संकेत तोड़ते दिखते हैं, जिससे जनता का गुस्सा और बढ़ा है।

कई लोगों के लिए मुद्दा सिर्फ शोर का नहीं, बल्कि सत्ता और सामाजिक असमानता का भी है। आलोचकों का कहना है कि स्थानीय रसूखदार लोग—मकान मालिक, कारोबारी या गांव के अधिकारी—कभी-कभी अपना दबदबा जताने के लिए साउंड होरेग का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह शोर एक ऐसे हथियार में बदल जाता है जो उन लोगों को चुप करा देता है जिनके पास विरोध करने के साधन या प्रभाव नहीं हैं। शिकायत करने पर सामाजिक विरोध या यहां तक कि धमकी का सामना करना पड़ सकता है, खासकर तब जब संचालकों को ताकतवर लोगों का समर्थन हासिल हो।

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धार्मिक फतवे और एमयूआई की भूमिका

जुलाई 2025 में विवाद एक नए स्तर पर पहुंच गया, जब इंडोनेशियाई उलेमा परिषद (एमयूआई) की पूर्वी जावा शाखा—देश की शीर्ष इस्लामी धर्मगुरु संस्था—ने एक फतवा जारी कर कुछ शर्तों के तहत मुसलमानों के लिए साउंड होरेग को हराम (निषिद्ध) घोषित किया। यह फतवा निवासियों और इस्लामी मदरसों की बढ़ती शिकायतों के बाद आया। शिकायतों में शोर और सार्वजनिक व्यवधान के साथ-साथ अनुचित नृत्य, शराब के सेवन और साउंड होरेग आयोजनों में बच्चों के सामने अशिक्षाप्रद कार्यक्रमों को लेकर चिंता जताई गई थी।

एमयूआई के फतवा आयोग के सचिव, केएच मिफ्ताहुल हुडा ने कहा, “जब ऐसी गतिविधियों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और सार्वजनिक व्यवस्था बाधित होती है, तो इसकी जिम्मेदारी पुलिस या सैटपोल पीपी जैसे सुरक्षा बलों की होती है। केवल फतवे से इसका समाधान नहीं हो सकता, क्योंकि फतवे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।”

फतवा खास तौर पर उन चलते-फिरते साउंड होरेग आयोजनों को निशाना बनाता है जिनमें शरीयत का उल्लंघन होता है या सामुदायिक शांति भंग होती है। हालांकि, उचित आवाज के स्तर पर आधिकारिक या धार्मिक आयोजनों में साउंड सिस्टम के इस्तेमाल की अनुमति है। केंद्रीय एमयूआई ने स्पष्ट किया कि उसने कोई राष्ट्रीय फतवा जारी नहीं किया है; यह फैसला पूर्वी जावा के पासुरुआन स्थित एक इस्लामी मदरसे में आयोजित मंच से आया था। फिर भी, इस आदेश ने सरकारी नियमन की मांग तेज कर दी है और धार्मिक मानदंडों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सामुदायिक कल्याण के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी है।

सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया

फतवे के बाद एमयूआई ने सरकार से साउंड होरेग सिस्टम के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम बनाने का आग्रह किया। स्थानीय प्रशासन ने टास्क फोर्स बनाकर साउंड होरेग संचालकों के साथ बैठकें कीं। इसके बाद आवाज की सीमा तय करने और प्रभावित निवासियों की सहमति लेने पर समझौते हुए। हालांकि, नियम लागू करना अब भी चुनौती बना हुआ है। पुलिस के संसाधन सीमित हैं और उल्लंघन पर सजा मामूली है—आमतौर पर छोटा जुर्माना या कुछ दिनों की जेल। मलंग और ब्लितार जैसे कुछ शहरों में सार्वजनिक सड़कों पर तेज लाउडस्पीकरों पर स्थानीय प्रतिबंध लगाए गए हैं, लेकिन इन्हें लगातार लागू नहीं किया जाता।

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कानून और मानवाधिकार मंत्रालय के साउंड होरेग को आईपीआर देने के प्रस्ताव ने भी बहस छेड़ी है। सुराबाया स्थित रेडियो स्टेशन सुवारा सुराबाया के एक सर्वेक्षण में 63 प्रतिशत लोगों ने इस कदम का विरोध किया। उन्होंने जारी शोर और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का हवाला दिया। कुछ कलाकारों और सांस्कृतिक आलोचकों का कहना है कि रियोग या जरणन जैसी पारंपरिक कला शैलियां मान्यता और संरक्षण की अधिक हकदार हैं, जबकि साउंड होरेग को व्यवधानकारी और “संस्कृति-विरोधी” माना जाता है।

साउंड होरेग और सामाजिक न्याय का सवाल

साउंड होरेग पर बहस सिर्फ शोर की नहीं, बल्कि समाज की उस गहरी संरचना की है जो तय करती है कि किसे बोलने का अधिकार है और किसे सुनना पड़ता है, कौन जश्न मनाता है और किसे तकलीफ सहनी पड़ती है। इसके समर्थक इसे “जनता की आवाज” और ऐसे समाज में जमीनी स्तर पर सशक्तीकरण का प्रतीक बताते हैं जहां सार्वजनिक जगहों पर अक्सर पाबंदियां रहती हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि पूरे साउंड होरेग सेटअप का किराया आम ग्रामीणों की पहुंच से बाहर होता है। असल फायदा कभी-कभी उन स्थानीय रसूखदारों को मिलता है जो अपनी दौलत और प्रभाव का प्रदर्शन करना चाहते हैं।

इसका असर झेलने वालों, खासकर बुजुर्गों, शिशुओं और आराम की जरूरत वाले मजदूरों के लिए साउंड होरेग पीड़ा का कारण बन सकता है। शिकायतों का अक्सर विरोध या हिंसा से जवाब दिया जाता है। हाल की एक घटना में, बीमार बच्चे के लिए शांति की गुहार लगा रहे एक पिता पर परेड में शामिल लोगों ने हमला किया। इस तरह साउंड होरेग एक “ध्वनिक पदानुक्रम” बना सकता है, जिसमें पैसे और सत्ता वाले लोग गांव के ध्वनि-परिवेश को नियंत्रित करते हैं और बाकी लोगों को चुपचाप इसे सहना पड़ता है।

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समाधान की तलाश: नियमन, संवाद और सांस्कृतिक संतुलन

विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। विशेषज्ञ और सामुदायिक नेता ऐसे संतुलित तरीके की मांग कर रहे हैं जो सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और जनकल्याण, दोनों का सम्मान करे। साउंड होरेग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना न तो व्यावहारिक माना जा रहा है, न ही न्यायसंगत, क्योंकि इसका आर्थिक और सामाजिक महत्व है। इसके बजाय, संबंधित पक्ष भागीदारी पर आधारित नियम, संचालकों के लिए तकनीकी प्रशिक्षण, उचित समय-सीमा और डेसीबल की सीमा तय करने, तथा नियमों का पालन करने वालों को प्रोत्साहन देने की वकालत कर रहे हैं।

एक अकादमिक विश्लेषण में कहा गया, “यह समुदायों को चुप कराने की बात नहीं है। बात उत्सव को नए सिरे से इस तरह गढ़ने की है कि उसमें हर कोई शामिल हो सके—सिर्फ वे नहीं जो अपनी आवाज सुनाने का खर्च उठा सकते हैं।”

कुछ समुदाय समझौते के रास्ते आजमा रहे हैं, जैसे परेड के समय पर पाबंदी लगाना, आयोजनों का मार्ग रिहायशी इलाकों से दूर करना और आपसी सम्मान के बारे में नागरिक शिक्षा को बढ़ावा देना। सरकार से धार्मिक नेताओं, कारोबारियों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और निवासियों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने तथा अत्यधिक शोर से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का आग्रह किया जा रहा है।

इंडोनेशिया के अपने दार्शनिक मूल्यों—जैसे राष्ट्रीय विचारधारा पंचशील में निहित न्यायपूर्ण और सभ्य मानवता, एकता और सामाजिक न्याय—से सीख लेने की भी मांग की जा रही है। इन सिद्धांतों के आधार पर नियम बनाकर इंडोनेशिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन साध सकता है तथा सांस्कृतिक जीवंतता और सामुदायिक सौहार्द, दोनों को बनाए रख सकता है।

संक्षेप में

  • साउंड होरेग इंडोनेशिया में सड़क पर मनोरंजन का लोकप्रिय लेकिन विवादास्पद रूप है, जिसमें सार्वजनिक आयोजनों में शक्तिशाली चलते-फिरते साउंड सिस्टम इस्तेमाल होते हैं।
  • इसकी गहरी सांस्कृतिक और आर्थिक जड़ें हैं। यह कई लोगों को आय और पहचान देता है, लेकिन स्वास्थ्य जोखिम, संपत्ति को नुकसान और सामाजिक टकराव भी पैदा करता है।
  • जनता की नाराजगी के चलते धार्मिक आदेश जारी हुए हैं। इंडोनेशियाई उलेमा परिषद की पूर्वी जावा शाखा ने कुछ शर्तों के तहत साउंड होरेग को हराम घोषित किया है।
  • सीमित संसाधनों और नियम लागू करने की कठिनाइयों के कारण साउंड होरेग को नियंत्रित करने के सरकारी और पुलिस प्रयासों में चुनौतियां हैं।
  • यह बहस सामाजिक न्याय, सत्ता और सार्वजनिक जगहों पर अधिकार जैसे व्यापक मुद्दों को उजागर करती है। इसके साथ भागीदारी पर आधारित नियमों और सामुदायिक संवाद की मांग भी उठी है।
  • इंडोनेशिया स्थानीय मूल्यों और नए समाधानों के सहारे सांस्कृतिक उत्सव और जनकल्याण के बीच संतुलन तलाश रहा है, ताकि साउंड होरेग पर नियंत्रण किया जा सके।
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