कश्मीर में पुस्तकों पर प्रतिबंध: सेंसरशिप, स्मृति और विमर्श की लड़ाई

पढ़ने में 11 मिनट
कश्मीर में पुस्तकों पर प्रतिबंध: सेंसरशिप, स्मृति और विमर्श की लड़ाई

कश्मीर में पुस्तकों पर प्रतिबंध: सेंसरशिप, स्मृति और विमर्श की लड़ाई

अगस्त 2025 में, भारत-प्रशासित कश्मीर के अधिकारियों ने प्रख्यात विद्वानों, पत्रकारों और लेखकों की 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे सेंसरशिप, ऐतिहासिक स्मृति और क्षेत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। किताबों की दुकानों पर पुलिस छापों और किताबें रखने या बेचने पर आपराधिक कार्रवाई की धमकी के जरिए लागू किए गए इस प्रतिबंध की भारत और विदेशों में लेखकों, अधिकार समूहों और राजनीतिक दलों ने निंदा की है। इस विवाद के केंद्र में यह संघर्ष है कि कश्मीर की कहानी सुनाने का अधिकार किसे है और कौन-सी कहानियां सुनाई जा सकती हैं।

विषय-सूची
  1. कश्मीर में पुस्तकों पर प्रतिबंध: सेंसरशिप, स्मृति और विमर्श की लड़ाई
  2. प्रतिबंध की वजह क्या थी?
  3. कार्रवाई: छापे और जब्ती
  4. इन पुस्तकों पर ही क्यों? सरकार का तर्क
  5. कानूनी और संवैधानिक सवाल
  6. लेखक कौन हैं और उनकी किताबें क्या कहती हैं?
  7. लेखकों और विद्वानों की प्रतिक्रिया
  8. व्यापक संदर्भ: सेंसरशिप और कश्मीर का इतिहास
  9. धार्मिक और राजनीतिक आयाम
  10. निहितार्थ: विचारों की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक स्मृति और लोकतंत्र
  11. अंतरराष्ट्रीय और अकादमिक प्रभाव
  12. क्या किताबों पर प्रतिबंध लगाकर स्मृति मिटाई जा सकती है?
  13. संक्षेप में

प्रतिबंध की वजह क्या थी?

जम्मू और कश्मीर गृह विभाग ने 5 अगस्त 2025 को यह प्रतिबंध जारी किया। यह तारीख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत क्षेत्र का अर्ध-स्वायत्त दर्जा खत्म किए जाने की छठी वर्षगांठ भी थी। आधिकारिक अधिसूचना, एस.ओ. 203, 2025 में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 98 के तहत 25 पुस्तकों को “जब्तशुदा” घोषित किया गया। यह नई आपराधिक संहिता अधिकारियों को उन प्रकाशनों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देती है जिनमें ऐसी सामग्री हो, जिसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की कुछ धाराओं के तहत दंडनीय माना जाता है।

सरकार का दावा है कि ये पुस्तकें शिकायत, पीड़ित होने की भावना और यहां तक कि “आतंकवादी नायकों” की छवि को बढ़ावा देकर “झूठे विमर्श और अलगाववाद को फैलाती हैं”, “युवाओं को गुमराह करती हैं” और “हिंसा को बढ़ावा देती हैं”। प्रतिबंधित पुस्तकों में इतिहास संबंधी विश्लेषण, संस्मरण, खोजी पत्रकारिता और राजनीतिक टिप्पणियां शामिल हैं। इनके लेखक अरुंधति रॉय, हफ्सा कंजवाल, ए.जी. नूरानी, सुमंत्र बोस, अनुराधा भसीन, विक्टोरिया स्कोफील्ड, क्रिस्टोफर स्नेडन और अन्य हैं। इनमें कश्मीर विवाद की शुरुआत और भारत के विभाजन से लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों तथा भारतीय शासन के तहत कश्मीरियों के जीवन के अनुभवों तक के विषय शामिल हैं।

कार्रवाई: छापे और जब्ती

प्रतिबंध के बाद पुलिस ने कश्मीर घाटी के श्रीनगर, अनंतनाग, गांदरबल और हंदवाड़ा समेत कई इलाकों में किताबों की दुकानों पर छापे मारे। अधिकारियों ने प्रतिबंधित पुस्तकों की तलाश की, पुस्तक विक्रेताओं से पूछताछ की और किताबें जब्त कीं। कार्रवाई श्रीनगर में आयोजित चिनार पुस्तक महोत्सव तक भी पहुंची, जहां पुलिस ने प्रतिबंधित पुस्तकों की तलाश में स्टॉलों का निरीक्षण किया। आदेश में प्रतिबंधित पुस्तकें बेचते या अपने पास रखते पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की धमकी भी दी गई है। इससे निजी तौर पर किताब रखना भी संभावित अपराध बन गया है।

विडंबना यह है कि प्रतिबंध की घोषणा ऐसे समय हुई जब भारतीय अधिकारी क्षेत्र में एक पुस्तक महोत्सव का उद्घाटन कर रहे थे। इससे राज्य-प्रायोजित साहित्यिक आयोजनों और असहमति की आवाजों को दबाने के बीच का तनाव उजागर हुआ।

विज्ञापन

इन पुस्तकों पर ही क्यों? सरकार का तर्क

सरकार अपने फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जोड़ती है। आधिकारिक आदेश में आरोप लगाया गया है कि पुस्तकें “ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करती हैं”, “आतंकवादियों का महिमामंडन करती हैं” और “अलगाववाद को उकसाती हैं”, जिससे भारत की संप्रभुता और एकता को खतरा है। अधिकारियों का तर्क है कि ऐसा साहित्य युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेल सकता है, समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ा सकता है और राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर सकता है।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि आदेश में केवल व्यापक निष्कर्ष दिए गए हैं; उसमें न तो किसी खास अंश का उल्लेख है, न ही आसन्न हिंसा के सबूत दिए गए हैं। प्रतिबंधित पुस्तकों में से कई प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने प्रकाशित की हैं और उन्हें गंभीर शोध या गहन पड़ताल पर आधारित पत्रकारिता के रूप में मान्यता मिली है। अधिसूचना खुद स्वीकार करती है कि ये पुस्तकें “ऐतिहासिक या राजनीतिक टिप्पणी के रूप में छद्मवेश में हैं।” इससे मूल रूप से माना जाता है कि वे विश्लेषण या राय के रूप में प्रस्तुत हैं, न कि हिंसा के खुले आह्वान के रूप में।

कानूनी और संवैधानिक सवाल

बीएनएसएस की धारा 98 के तहत प्रकाशनों को जब्त किया जा सकता है, यदि उनमें बीएनएस की कुछ धाराओं के तहत दंडनीय सामग्री होने की आशंका हो। इनमें संप्रभुता को खतरे में डालने, वैमनस्य बढ़ाने या राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल दावे करने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं। हालांकि, भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस पर पाबंदियां केवल सार्वजनिक व्यवस्था या हिंसा के लिए उकसावे जैसे सीमित आधारों पर ही लगाई जा सकती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों और इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) समेत अधिकार समूहों का तर्क है कि यह व्यापक प्रतिबंध कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि किसी विचार पर महज चर्चा या उसका समर्थन, चाहे वह कितना भी अलोकप्रिय क्यों न हो, संरक्षित अभिव्यक्ति है—जब तक कि वह सीधे तौर पर हिंसा के लिए न उकसाए। ऐतिहासिक श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में अदालत ने अभिव्यक्ति को व्यापक रूप से या पहले से ही दबाने के खिलाफ चेतावनी दी थी, खासकर राजनीतिक या अकादमिक विमर्श में।

विज्ञापन

लेखक कौन हैं और उनकी किताबें क्या कहती हैं?

प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची कश्मीर पर शोध और आलोचनात्मक टिप्पणी करने वाले प्रमुख नामों की फेहरिस्त जैसी है:

  • अरुंधति रॉय – बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका। उनकी पुस्तक आज़ादी में कश्मीर में राज्य हिंसा और लोगों के लापता होने पर निबंध शामिल हैं।
  • हफ्सा कंजवाल – अमेरिका में रहने वाली अकादमिक और कश्मीर का उपनिवेशीकरण: भारतीय कब्जे में राज्य-निर्माण की लेखिका। यह पुस्तक बताती है कि भारत ने क्षेत्र पर अपना नियंत्रण कैसे मजबूत किया।
  • ए.जी. नूरानी – संविधान विशेषज्ञ। उनकी पुस्तक कश्मीर विवाद 1947–2012 संघर्ष के कानूनी और राजनीतिक इतिहास का विस्तृत विवरण है।
  • सुमंत्र बोस – लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर तथा विवादित भूभाग और चौराहे पर कश्मीर के लेखक। उनकी किताबें क्षेत्र की जटिल भू-राजनीति की पड़ताल करती हैं।
  • अनुराधा भसीन – पत्रकार। उनकी पुस्तक विघटित राज्य में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद के हालात का दस्तावेजीकरण है।
  • विक्टोरिया स्कोफील्ड – इतिहासकार और संघर्ष में कश्मीर की लेखिका।
  • क्रिस्टोफर स्नेडन – ऑस्ट्रेलियाई राजनीति विज्ञानी और स्वतंत्र कश्मीर के लेखक।

अन्य प्रतिबंधित पुस्तकों में नारीवादी गवाहियां, मानवाधिकारों से जुड़े दस्तावेज और क्षेत्र के राजनीतिक बदलाव का विश्लेषण शामिल है। भारतीय, कश्मीरी और अंतरराष्ट्रीय नजरियों की यह विविधता कश्मीर के मुद्दे की जटिलता को दर्शाती है।

लेखकों और विद्वानों की प्रतिक्रिया

लेखकों और बुद्धिजीवियों ने प्रतिबंध पर हैरानी और निराशा जताई है। प्रतिबंधित हो चुकी कश्मीर: आज़ादी के पक्ष में तर्क की सह-लेखिका अंगना चटर्जी ने कहा:

यह आदेश दिखाता है कि राज्य का इरादा शोध को अपराध बनाना और उसे राजद्रोही करार देना है। इस प्रतिबंध का प्रतीकात्मक और वास्तविक असर व्यापक हो सकता है। यह कश्मीरियों को डराने और अलग-थलग करने तथा उनके दर्द और प्रतिरोध को खामोश करने के लिए मनोवैज्ञानिक अभियान को फिर से सक्रिय करता है।

इतिहासकार सुमंत्र बोस, जिनके परिवार को औपनिवेशिक काल से सेंसरशिप का सामना करना पड़ा है, ने सरकार के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके काम का उद्देश्य शांति के रास्ते तलाशना है। अनुराधा भसीन ने अपनी पुस्तक का बचाव करते हुए उसे गहन शोध पर आधारित बताया और अधिकारियों को यह साबित करने की चुनौती दी कि उसमें आतंकवाद का महिमामंडन किया गया है।

मुख्य धर्मगुरु और अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक ने कहा:

विद्वानों और इतिहासकारों की किताबों पर प्रतिबंध लगाने से ऐतिहासिक तथ्य या लोगों के जीवन के अनुभव मिटेंगे नहीं। यह ऐसे कदम उठाने वालों की असुरक्षा को उजागर करता है।
विज्ञापन

व्यापक संदर्भ: सेंसरशिप और कश्मीर का इतिहास

कश्मीर के लिए सेंसरशिप नई बात नहीं है। यह क्षेत्र लंबे समय से संचार बंदी, अखबारों पर प्रतिबंध और पत्रकारों की हिरासत का सामना करता आया है। 1989 के सशस्त्र विद्रोह के बाद, और खासकर 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से, अधिकारियों ने मीडिया ही नहीं, बल्कि अकादमिक जगत और नागरिक समाज को भी तेजी से निशाना बनाया है। मौजूदा पुस्तक प्रतिबंध को कश्मीर के बारे में विमर्श पर नियंत्रण पाने और असहमति की आवाजों को दबाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

धार्मिक और राजनीतिक आयाम

कार्रवाई धार्मिक साहित्य तक भी पहुंची है। 2025 की शुरुआत में पुलिस ने प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी संगठन से जुड़े इस्लामी विद्वान सैयद अबुल आला मौदूदी की किताबें जब्त करने के लिए श्रीनगर की किताबों की दुकानों पर छापे मारे थे। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की कार्रवाइयां धार्मिक स्वतंत्रता और चयनात्मक कार्रवाई को लेकर चिंता पैदा करती हैं, क्योंकि भारत के अन्य हिस्सों में ऐसी ही किताबें उपलब्ध हैं।

सरकार के इस रवैये की तुलना उन औपनिवेशिक और सत्तावादी शासनों से की गई है, जिन्होंने किताबों पर प्रतिबंध लगाकर विचारों पर नियंत्रण करने की कोशिश की थी। सुरक्षा और समाज पर टिप्पणी करने वाली गजाला वहाब ने कहा कि अधिकारी भले ही युवा कश्मीरियों को अपने इतिहास तक पहुंच से वंचित करने की कोशिश करें, लेकिन सामूहिक स्मृति किताबों से परे भी कायम रहती है।

विज्ञापन

निहितार्थ: विचारों की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक स्मृति और लोकतंत्र

इस प्रतिबंध के निहितार्थ किताबों को अलमारियों से हटाए जाने तक सीमित नहीं हैं। आलोचकों ने चेतावनी दी है कि इससे भारत भर में असहमति और अकादमिक स्वतंत्रता को दबाने की खतरनाक मिसाल कायम होती है। इस्तेमाल किया गया कानूनी प्रावधान—बीएनएसएस की धारा 98—प्रतिबंधित किताबों को केवल कश्मीर में ही नहीं, बल्कि संभावित रूप से देशभर में जब्त करने की अनुमति देता है। कानूनी जोखिम से बचने के लिए प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता और ऑनलाइन मंच ये किताबें पूरी तरह हट सकते हैं, जिससे व्यवहार में देशव्यापी प्रतिबंध लग सकता है।

आईएफएफ जैसे डिजिटल अधिकार समूहों का कहना है कि विवादित विमर्शों का जवाब अधिक संवाद और पारदर्शिता है, न कि व्यापक प्रतिबंध। उनका कहना है कि शोध और टिप्पणी तक पहुंच सीमित करने से लोकतांत्रिक विमर्श और सूचना के अधिकार को नुकसान पहुंचता है।

विपक्षी नेताओं और दलों ने इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला बताते हुए इसकी निंदा की है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि सेंसरशिप विचारों को खामोश करने के बजाय उन्हें और फैलाती है तथा कश्मीर में अलगाव को गहरा करती है। माकपा नेता एम.वाई. तारिगामी ने प्रतिबंध को सेंसरशिप का खुला कदम बताया और इसे रद्द करने की मांग की।

अंतरराष्ट्रीय और अकादमिक प्रभाव

इस प्रतिबंध ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा है। मीडिया संस्थानों और अधिकार संगठनों ने भारत की विविध विचारों को स्वीकार करने वाले लोकतंत्र की छवि पर मंडराते खतरे को उजागर किया है। विद्वानों को आशंका है कि इस कदम से प्रकाशक कश्मीर पर आलोचनात्मक पुस्तकें छापने से बचेंगे, जिससे अकादमिक शोध और बहस पर दबाव पड़ेगा। कश्मीर के छात्र और शोधकर्ता इस प्रतिबंध को सामूहिक विस्मृति थोपने की कोशिश मानते हैं, जिससे क्षेत्र के इतिहास का अध्ययन करना और उसे याद रखना कठिन हो जाएगा।

प्रख्यात भारतीय लेखिका नीलांजना रॉय ने कहा:

यह प्रतिबंध कश्मीर पर चुनिंदा ढंग से तैयार की गई पठन-सूची है। इतिहास बताता है कि ऐसे प्रतिबंध शायद ही कभी सफल होते हैं; अक्सर प्रतिबंधित सामग्री की मांग और बढ़ जाती है।

क्या किताबों पर प्रतिबंध लगाकर स्मृति मिटाई जा सकती है?

सरकार की कोशिशों के बावजूद, कई लोगों का मानना है कि किताबों पर प्रतिबंध लगाकर उनमें वर्णित वास्तविकताओं या उनमें संजोई स्मृतियों को मिटाया नहीं जा सकता। मीरवाइज उमर फारूक और अन्य लोगों ने कहा है कि लिखित विवरण दबाए जाने के बावजूद लोगों के जीवन के अनुभव और मौखिक इतिहास बने रहते हैं। इतिहास के किन रूपों और विवरणों को प्रसारित होने देना है, इसे नियंत्रित करने की कोशिश को इस रूप में देखा जा रहा है कि इससे आने वाली पीढ़ियों को कश्मीर के बारे में क्या पता चलेगा, यह तय किया जा सके। लेकिन इससे अविश्वास और अलगाव और गहरा होने का खतरा भी है।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां प्रतिबंधित किताबें प्रतिरोध और जिज्ञासा का प्रतीक बन गईं। डिजिटल युग में जानकारी को दबाना कठिन है और सेंसरशिप की कोशिशें अक्सर उलटा असर करती हैं तथा प्रतिबंधित पुस्तकों की ओर अधिक ध्यान खींचती हैं।

विज्ञापन

संक्षेप में

  • अगस्त 2025 में भारत-प्रशासित कश्मीर के अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रमुख विद्वानों, पत्रकारों और लेखकों की 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया।
  • पुलिस छापों और आपराधिक कार्रवाई की धमकी के जरिए लागू प्रतिबंध कश्मीर के इतिहास, राजनीति और मानवाधिकारों पर लिखी पुस्तकों को निशाना बनाता है। इनमें अरुंधति रॉय, हफ्सा कंजवाल और ए.जी. नूरानी की पुस्तकें शामिल हैं।
  • आलोचकों का कहना है कि यह व्यापक सेंसरशिप है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अकादमिक शोध और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है तथा इसका असर देशभर में पड़ सकता है।
  • कानूनी विशेषज्ञों और अधिकार समूहों का कहना है कि प्रतिबंध संवैधानिक और कानूनी रूप से संदेहास्पद है, क्योंकि इसमें उकसावे या आसन्न हिंसा के विशिष्ट सबूत नहीं दिए गए हैं।
  • इस कदम को असहमति दबाने और कश्मीर के बारे में विमर्श को नियंत्रित करने के व्यापक चलन का हिस्सा माना जा रहा है। इसके ऐतिहासिक स्मृति और सूचना के अधिकार पर भी प्रभाव पड़ सकते हैं।
  • लेखकों, विद्वानों और राजनीतिक नेताओं ने चेतावनी दी है कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने से लोगों के जीवन के अनुभव या ऐतिहासिक तथ्य नहीं मिटेंगे; इसके बजाय, इससे उन विचारों को और बल मिल सकता है जिन्हें राज्य दबाना चाहता है।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है