चार बैंकों में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी
भारत सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकारी हिस्सेदारी घटाकर 75% करने पर विचार कर रहा है। इससे सार्वजनिक शेयरधारिता सामान्य न्यूनतम स्तर यानी 25% तक पहुंच जाएगी। तत्काल योजना के तहत सरकार का नियंत्रण बना रहेगा, जबकि निवेशकों के लिए अधिक शेयर उपलब्ध होंगे।
विषय-सूची
- चार बैंकों में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी
- 25% सार्वजनिक शेयरधारिता के नियम का मतलब
- दो रास्ते, लेकिन रकम अलग-अलग जगह जाएगी
- बाजार में बिक्री कितनी बड़ी हो सकती है?
- निजीकरण के लिए अलग फैसला जरूरी
- आईडीबीआई संशोधित बोलियों से सहमत खरीदार तक पहुंचा
- आईडीबीआई की कीमत पर विवाद क्यों
- कर्मचारी और विपक्षी दल नियंत्रण हस्तांतरण का विरोध कर रहे हैं
- सरकार ने सुधार और नई पूंजी का हवाला दिया
- मुख्य बातें
प्रस्तावित बदलाव का दायरा काफी बड़ा है। मार्च तिमाही के बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में दाखिल आंकड़ों के अनुसार, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में सरकार की हिस्सेदारी 89.3%, इंडियन ओवरसीज बैंक में 94.6%, यूको बैंक में 91% और पंजाब एंड सिंध बैंक में 93.9% थी। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हर बैंक में सार्वजनिक हिस्सेदारी काफी बढ़ानी होगी।
सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक और एकीकरण पर भी विचार कर रही है। इसके साथ दो बैंकों की पहचान निजीकरण के लिए की जा सकती है। दीर्घकालिक लक्ष्य तीन या चार बड़े सरकारी बैंक बनाने का है। इन चर्चाओं में स्वामित्व और नियंत्रण से जुड़े ऐसे फैसले शामिल हैं, जो अल्पांश हिस्सेदारी बेचने से कहीं आगे जाते हैं।
नियंत्रक हिस्सेदारी बेचने की आईडीबीआई बैंक की प्रस्तावित योजना इस दिशा में तत्काल कसौटी है। प्रेम वत्सा के नेतृत्व वाली फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स ने 60.72% हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में खरीदने पर सहमति दी है। यह सौदा भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी पर निर्भर है। नवंबर में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, सरकार ने 14 अक्टूबर, 2026 को प्रस्तावित लेनदेन को मंजूरी दी थी।
इस सौदे के खिलाफ कर्मचारियों के विरोध और राजनीतिक आपत्ति से पता चलता है कि बैंक के कुछ शेयर बेचने और उसका नियंत्रण नए मालिक को सौंपने में सरकार को अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
25% सार्वजनिक शेयरधारिता के नियम का मतलब
सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों के लिए आम तौर पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कम से कम 25% शेयर आम निवेशकों के पास हों। सार्वजनिक शेयरधारिता का मतलब उन निवेशकों के पास मौजूद शेयर हैं, जो नियंत्रक प्रवर्तक समूह से बाहर हैं। इन बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी 75% करने से बाकी एक चौथाई शेयर सार्वजनिक हाथों में होंगे।
सरकार ने वित्तीय संस्थानों समेत सरकारी कंपनियों को अगस्त 2026 तक छूट दी थी। इस छूट को लागू करने की जिम्मेदारी भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की थी। छूट को आगे बढ़ाए जाने की उम्मीद है, हालांकि इसकी अवधि और अधिसूचना की तारीख तय नहीं की गई है।
मार्च तिमाही के हिस्सेदारी आंकड़े बताते हैं कि यदि सरकार कुल शेयरों की संख्या बदले बिना मौजूदा शेयर बेचती है, तो लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कितनी कमी करनी होगी:
- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में सरकारी हिस्सेदारी 89.3% से घटाकर 75% करने के लिए 14.3 प्रतिशत अंक की कमी जरूरी होगी।
- इंडियन ओवरसीज बैंक में हिस्सेदारी 94.6% से घटाकर 75% करने के लिए 19.6 प्रतिशत अंक की कमी जरूरी होगी।
- यूको बैंक में हिस्सेदारी 91% से घटाकर 75% करने के लिए 16 प्रतिशत अंक की कमी जरूरी होगी।
- पंजाब एंड सिंध बैंक में हिस्सेदारी 93.9% से घटाकर 75% करने के लिए 18.9 प्रतिशत अंक की कमी जरूरी होगी।
इंडियन ओवरसीज बैंक से बदलाव का पैमाना समझा जा सकता है। उसकी सार्वजनिक हिस्सेदारी 5.4% से बढ़कर 25% हो जाएगी, यानी शुरुआती स्तर से चार गुने से भी अधिक। इतनी बड़ी मात्रा में शेयर बेचने के लिए पर्याप्त निवेशकों की मांग जरूरी है। यही वजह है कि अधिकारी समय और तरीके पर फैसला लेते समय बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रख रहे हैं।
दो रास्ते, लेकिन रकम अलग-अलग जगह जाएगी
बैंक और सरकार अलग-अलग लेनदेन के जरिये सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं। बिक्री प्रस्ताव (ओएफएस) के तहत मौजूदा शेयरधारक शेयर बाजार के जरिए अपने शेयर बेच सकता है। सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचती है, तो बिक्री से मिली रकम सरकारी खजाने में जाती है।
योग्य संस्थागत निवेशकों को शेयर जारी करके सूचीबद्ध बैंक योग्य संस्थागत नियोजन (क्यूआईपी) के जरिए पूंजी जुटा सकता है। इस रास्ते में रकम बैंक को मिलती है, जबकि जारी शेयरों की संख्या बढ़ने से सरकार की प्रतिशत हिस्सेदारी घट जाती है।
पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने हाल ही में क्यूआईपी के जरिए पूंजी जुटाई है। यह उन बैंकों के लिए एक रास्ता है जो कर्ज देने में मदद और पूंजी संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए धन जुटाते हुए सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। पूंजी संबंधी जरूरतें उन वित्तीय बफरों से जुड़ी हैं जिन्हें बैंकों को संभावित नुकसान के मुकाबले बनाए रखना होता है।
इस विकल्प का असर ग्राहकों, करदाताओं और निवेशकों पर पड़ता है। सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री से सार्वजनिक राजस्व बढ़ता है। नए शेयर जारी करने से बैंक की पूंजी मजबूत होती है। वित्तपोषण की रणनीति और बाजार की मांग के आधार पर अधिकारी दोनों में से कोई एक रास्ता या दोनों का मेल अपना सकते हैं।
बाजार में बिक्री कितनी बड़ी हो सकती है?
एक व्यापक प्रस्ताव में चार बैंकों के साथ बैंक ऑफ महाराष्ट्र को भी शामिल किया गया है। इसमें पांचों बैंकों में 20% तक हिस्सेदारी घटाने पर विचार किया गया है। खबरों के मुताबिक, तैयारी के तहत मर्चेंट बैंकर नियुक्त किए जा रहे हैं। ये वित्तीय सलाहकार लेनदेन की रूपरेखा बनाने, निवेशकों से संपर्क करने और प्रक्रिया संभालने में मदद करते हैं।
यूको बैंक के लिए एक प्रस्तावित लेनदेन में करीब 10% हिस्सेदारी बेचकर 2,500 करोड़ रुपये तक जुटाने का लक्ष्य है। यदि यह बिक्री बताई गई 91% हिस्सेदारी से 10 प्रतिशत अंक घटाने के रूप में की जाती है, तो सरकारी हिस्सेदारी 75% करने की दिशा में यह एक मध्यवर्ती कदम होगा।
योजना के अलग-अलग चरणों में समयसीमा को अलग तरह से बताया गया है। पहले प्रस्ताव में छह महीने के भीतर बिक्री की बात थी; ताजा जानकारी के अनुसार, अगले एक साल में चार बैंकों में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाना तत्काल प्राथमिकता है। वित्त मंत्रालय आने वाले महीनों में मंत्रिमंडल की मंजूरी लेने की तैयारी भी कर रहा था। लेनदेन का पक्का कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है।
खबरों के मुताबिक, अल्पांश हिस्सेदारी बेचने की योजनाओं की जानकारी के बाद प्रभावित बैंकों के शेयरों में करीब 3% से 4% की बढ़त हुई। सार्वजनिक निवेशकों के लिए कारोबार योग्य शेयरों की संख्या बढ़ने से निवेशकों का दायरा व्यापक हो सकता है और शेयरों का कारोबार अधिक सक्रिय हो सकता है। लेनदेन के समय मांग के आधार पर अंतिम कीमतें तय होंगी।
निजीकरण के लिए अलग फैसला जरूरी
केंद्रीय बजट 2021-22 में आईडीबीआई बैंक के अलावा दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की योजना घोषित की गई थी। स्वामित्व पर नए सिरे से हो रही चर्चा ने बैंक निजीकरण के अधूरे कार्यक्रम को फिर से केंद्र में ला दिया है।
खबरों के मुताबिक, नीति आयोग ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक को निजीकरण के संभावित उम्मीदवारों के रूप में चुना था। हालांकि, रणनीतिक बिक्री के लिए किसी भी बैंक का चयन करने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। जुलाई 2026 की एक खबर के अनुसार, अंतिम बोली के चरण तक पहुंचने वाला एकमात्र रणनीतिक बैंक विनिवेश आईडीबीआई का ही था।
सरकारी हिस्सेदारी 75% करने से सरकार के पास नियंत्रक बहुमत बना रहेगा। निजीकरण में नियंत्रण नए मालिक को सौंपा जाएगा और इसके लिए बैंकिंग कंपनी (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) अधिनियम में बदलाव समेत विधायी संशोधन जरूरी होंगे।
बैंकों के संभावित एकीकरण का कार्यक्रम एक और विकल्प पेश करता है: उन्हें निजी मालिकों को सौंपने के बजाय उनका विलय करना। अधिकारियों के तकनीकी प्रणालियों की अनुकूलता, भौगोलिक पहुंच और कारोबार के स्वरूप पर विचार करने की उम्मीद है। बैंकों से सुझाव देने को कहा गया है। इन बातों से तय होगा कि कंप्यूटर प्रणालियों, शाखा नेटवर्क और कर्ज देने के कामकाज को कितनी आसानी से एक साथ जोड़ा जा सकता है।
आईडीबीआई संशोधित बोलियों से सहमत खरीदार तक पहुंचा
अल्पांश हिस्सेदारी घटाने के लक्ष्य वाले चार बैंकों से आईडीबीआई बैंक की स्थिति अलग है। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के पास मिलाकर 94% से अधिक हिस्सेदारी है, लेकिन बैंक का संचालन निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में होता है।
शुरुआती बोलियां सरकार की मूल्यांकन अपेक्षाओं से कम रहने के बाद बिक्री प्रक्रिया ठहर गई थी। 16 जुलाई, 2026 तक फेयरफैक्स और दुबई के अमीरात एनबीडी से संशोधित वित्तीय बोलियां मिल चुकी थीं। बाद में संयुक्त 60.72% हिस्सेदारी के प्रस्तावित खरीदार के रूप में फेयरफैक्स उभरा।
इस लेनदेन में सरकार की 30.48% और एलआईसी की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है। फेयरफैक्स ने प्रति शेयर 81 रुपये देने पर सहमति जताई है। अक्टूबर में सरकार की मंजूरी एक बड़ा कदम थी, जबकि स्वामित्व परिवर्तन के लिए आरबीआई की मंजूरी मिलने के बाद ही सौदा पूरा हो सकेगा।
नीति और बिक्री प्रक्रिया के प्रमुख पड़ाव ये हैं:
- बजट 2021-22: सरकार ने आईडीबीआई बैंक के अलावा दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण की योजना घोषित की।
- 16 जुलाई, 2026: मूल्यांकन संबंधी अपेक्षाओं से कम शुरुआती प्रस्तावों के बाद फेयरफैक्स और अमीरात एनबीडी की संशोधित बोलियों का मूल्यांकन किया जा रहा था।
- अगस्त 2026: सरकारी कंपनियों के लिए सार्वजनिक शेयरधारिता की पहले दी गई छूट की निर्धारित अवधि समाप्त हुई।
- 14 अक्टूबर, 2026: सरकार ने फेयरफैक्स के साथ आईडीबीआई के प्रस्तावित लेनदेन को मंजूरी दी।
- नवंबर 2026: आईडीबीआई के कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन किया और उनकी यूनियन ने आगे की कार्रवाई पर विचार करने के लिए 10 नवंबर को बैठक तय की।
आईडीबीआई की कीमत पर विवाद क्यों
फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की सहमत कीमत, दो स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों द्वारा तय 75.99 रुपये के बेंचमार्क उचित मूल्य से 5.01 रुपये अधिक है। यह करीब 6.6% प्रीमियम है। कर्मचारी प्रतिनिधि इस बेंचमार्क तक पहुंचने के लिए अपनाए गए तरीकों को चुनौती दे रहे हैं।
यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज के संयोजक देविदास तुलजापुरकर ने कहा कि मूल्य तय करते समय बैंक की तुलना सार्वजनिक क्षेत्र के ऋणदाताओं से की गई, जबकि इसका वर्गीकरण निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में है।
"नियमों और अदालतों के फैसलों के मामले में आईडीबीआई बैंक को निजी क्षेत्र का बैंक माना जाता है। लेकिन मूल्यांकन के लिए इसकी तुलना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से की जा रही है," तुलजापुरकर ने कहा।
यूनियन मूल्यांकन की पद्धति, मान्यताओं और संपत्ति, अन्य परिसंपत्तियों, ग्राहक संबंधों तथा भविष्य की कमाई के आकलन का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग कर रही है। तुलना के लिए चुने गए बैंकों का महत्व है, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के ऋणदाताओं का मूल्यांकन आम तौर पर निजी क्षेत्र के ऋणदाताओं से कम होता है।
सरकार ने बिक्री प्रक्रिया के दौरान पहले तर्क दिया था कि सीमित कारोबार के बीच आईडीबीआई के शेयर मूल्य में उतार-चढ़ाव उसके वास्तविक उद्यम मूल्य को नहीं दर्शाता। सरल शब्दों में, सरकार का कहना था कि बैंकिंग कारोबार का मूल्यांकन थोड़ी मात्रा में खरीदे-बेचे गए शेयरों की कीमत से आगे जाकर करना जरूरी है।
कर्मचारी और विपक्षी दल नियंत्रण हस्तांतरण का विरोध कर रहे हैं
यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज ने दो दिन की देशव्यापी हड़ताल आयोजित की और निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने की मांग की। यूनियन चाहती है कि सरकार अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 51% से अधिक करे और नियंत्रण अपने पास रखे।
इस विवाद में बताए गए कर्मचारियों के आंकड़ों में कुल 19,108 कर्मचारी शामिल हैं। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के करीब 9,500 कर्मचारी, 6,911 महिलाएं और दिव्यांगता वाले 884 कर्मचारी हैं। इन श्रेणियों में एक-दूसरे से मेल हो सकता है। स्वामित्व बदलने के साथ कर्मचारी प्रतिनिधि कर्मचारियों के लिए सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं।
यूनियन ने आगे की कार्रवाई पर विचार के लिए 10 नवंबर को मुख्य समिति की बैठक तय की और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस से समर्थन मांगने की योजना बनाई। उसने फेयरफैक्स के स्वामित्व ढांचे, वित्तीय स्थिति और नियामकीय रिकॉर्ड की जांच का अनुरोध भी किया।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने लेनदेन की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग की और इसके मूल्यांकन तथा वित्तपोषण पर सवाल उठाए। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी नियंत्रण हस्तांतरित करने का विरोध किया। उनके हस्तक्षेप से यह सौदा वित्तीय बातचीत के साथ-साथ राजनीतिक विवाद भी बन गया है।
सरकार ने सुधार और नई पूंजी का हवाला दिया
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आईडीबीआई की पिछली वित्तीय मुश्किलों और बाद में हुई सुधार प्रक्रिया का हवाला देकर प्रस्तावित बिक्री का बचाव किया। उन्होंने कहा कि बैंक को 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पुनर्पूंजीकरण सहायता मिली थी।
सीतारमण ने वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर समेत कंपनियों को दिए गए उन कर्जों का उल्लेख किया जो बाद में खराब कर्ज बन गए। खराब कर्ज वह होता है जिसे उधारकर्ता तय शर्तों के मुताबिक नहीं चुका पाता और इससे बैंक को नुकसान का सामना करना पड़ता है।
बिक्री की आलोचना के जवाब में सीतारमण ने इन कर्जों के असर को इस तरह बताया:
"ये खराब कर्ज बन गए और आईडीबीआई बैंक को भारी नुकसान हुआ, जिसे हमने स्वीकार किया," उन्होंने कहा।
सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक वित्तीय सहायता और प्रबंधन के तौर-तरीकों में बदलाव से बहाल हुए ऋणदाता को रणनीतिक निजी निवेश से मदद मिल सकती है। इसके उलट कर्मचारी प्रतिनिधि और विपक्षी दल कीमत तय करने की प्रक्रिया का अधिक खुलासा और सार्वजनिक निवेश की सुरक्षा चाहते हैं।
नीति-निर्माता सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 20% से बढ़ाकर 49% करने पर भी विचार कर रहे हैं। प्रस्तावित बदलाव से इन ऋणदाताओं के लिए उपलब्ध विदेशी पूंजी का दायरा बढ़ सकता है। इसके लिए अभी विचाराधीन शेयर बिक्री से अलग नीतिगत फैसला जरूरी होगा।
अधिक सार्वजनिक हिस्सेदारी के लक्ष्य वाले चार बैंकों के लिए तत्काल काम सीमित है: बिक्री या पूंजी जुटाने का रास्ता चुनना, पर्याप्त निवेशक आकर्षित करना और सरकारी हिस्सेदारी को घटाकर 75% के करीब लाना। आईडीबीआई का नियंत्रण हस्तांतरित करना, आगे के निजीकरण के लिए उम्मीदवार चुनना और संभावित विलय, इन सभी के लिए अलग मंजूरी और कार्यान्वयन जरूरी हैं।
मुख्य बातें
- भारत चार सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी घटाकर 75% करने पर विचार कर रहा है, जिससे सार्वजनिक निवेशकों की हिस्सेदारी 25% होगी।
- सरकार की बताई गई हिस्सेदारी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 89.3% से लेकर इंडियन ओवरसीज बैंक में 94.6% तक है।
- सरकारी शेयर बेचने से राज्य को धन मिलेगा; नए शेयर जारी करने से बैंकों की पूंजी बढ़ेगी।
- फेयरफैक्स ने आरबीआई की मंजूरी के अधीन आईडीबीआई बैंक की 60.72% हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में खरीदने पर सहमति दी है।
- आईडीबीआई के कर्मचारी प्रतिनिधि मूल्यांकन को चुनौती दे रहे हैं और सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार बैंक की सुधार प्रक्रिया और पुनर्पूंजीकरण का हवाला दे रही है।
- आगे के बैंक निजीकरण और एकीकरण पर नीतिगत विचार जारी हैं, लेकिन इनके लिए अलग फैसले जरूरी होंगे।






