पहाड़ी बाढ़ की चपेट में आ सकने वाले इलाकों में निर्माण बढ़ रहा है
एक अध्ययन के अनुसार, उत्तरी नेपाल, दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और भारत के उत्तराखंड के एक हिस्से में कम से कम 300,000 लोग संभावित आपदा क्षेत्रों में रहते हैं। अध्ययन में पाया गया कि हिमनदी झीलों से आने वाली बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में निर्माण सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है।
विषय-सूची
- पहाड़ी बाढ़ की चपेट में आ सकने वाले इलाकों में निर्माण बढ़ रहा है
- शोधकर्ताओं ने खतरे का नक्शा कैसे बनाया
- नदी घाटियों में लगातार होते नुकसान
- पुनर्बहाली की कीमत घरों, खेतों और कारोबार तक पहुंची
- पर्यटन कारोबार को नुकसान और बुकिंग में गिरावट का सामना
- जलविद्युत परियोजनाएं संवेदनशील घाटियों में मूल्यवान संपत्तियां केंद्रित करती हैं
- समुदायों को बिखेरे बिना सुरक्षित जमीन तलाशना
- नदी किनारे के नियमों के पालन की परीक्षा
- बार-बार आने वाली आपदाओं से बढ़ता आर्थिक बोझ
- मुख्य बातें
Scientific Reports में प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित शोध के अनुसार, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्मित भूमि 2016 से 2023 के बीच लगभग 45% बढ़ी। हिमनदी झीलों की बाढ़ की चपेट में आने वाले इलाकों में विकास लगभग 78% बढ़ा। यानी, झीलों की बाढ़ वाले इन क्षेत्रों में निर्माण, अध्ययन के व्यापक जोखिम क्षेत्र की तुलना में करीब 1.7 गुना तेज़ी से बढ़ा।
ब्रिटेन, नेपाल और भारत के नौ शोधकर्ताओं ने नदी गलियारों में नीचे की ओर 50 किलोमीटर तक के क्षेत्र और लगभग 1,360 हिमनदी झीलों के आसपास के इलाकों का अध्ययन किया। उनके निष्कर्ष हिमालयी घाटियों को बदल रहे दो दबावों को एक साथ सामने लाते हैं: पहाड़ों का लगातार अस्थिर होना और उनके नीचे घरों, होटलों, सड़कों तथा बिजलीघरों की बढ़ती सघनता।
शोध का दायरा सीमित क्षेत्र तक था। आसपास की घाटियों को भी ऐसे ही खतरे हैं, इसलिए पूरे हिमालय में जोखिम की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या इससे काफी अधिक हो सकती है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के हिमनद विज्ञानी सी. स्कॉट वॉटसन ने कहा कि निर्माण से जुड़े फैसलों के दूरगामी नतीजे होंगे:
जैसे-जैसे नदी घाटियां अधिक आबाद हो रही हैं, आज लिए जा रहे विकास संबंधी फैसले आने वाले दशकों के आपदा जोखिम को तय करेंगे।
इन फैसलों का असर नेपाल में पुनर्वास पर पहले से पड़ रहा है, जहां 26 अगस्त की भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा ने बस्तियों को तबाह कर दिया और जलविद्युत सुविधाओं को मलबे में दबा दिया। अब अधिकारियों के सामने ऐसी जमीन तलाशने की कठिन चुनौती है, जहां बचे हुए लोग काम, खेतों और अपने समुदायों तक पहुंच खोए बिना फिर से बस सकें।
शोधकर्ताओं ने खतरे का नक्शा कैसे बनाया
अध्ययन में नदी या हिमनदी झील की सतह से 50 मीटर की ऊर्ध्वाधर दूरी के भीतर मौजूद इमारतों की गणना की गई। यहां ऊर्ध्वाधर दूरी का मतलब पानी से ऊपर की ऊंचाई है, न कि किसी इमारत से नदी किनारे तक पैदल चलने की दूरी।
नदी से काफी दूर बना घर भी ऐसी नीची जमीन पर हो सकता है जहां बाढ़ का पानी पहुंच जाए। इसके उलट, खड़ी पहाड़ी पर नदी के पास बनी इमारत पानी से काफी ऊपर हो सकती है। हर घाटी का आकार तय करता है कि पानी, कीचड़ और बड़े पत्थर कहां तक पहुंच सकते हैं।
नेपाल के रसुवा जिले के निवासियों ने बताया कि अगस्त की आपदा के दौरान कुछ जगहों पर पानी का स्तर 70 मीटर तक बढ़ गया था। नदी किनारों से दूर की इमारतें भी बाढ़ में डूब गईं और मलबे में दब गईं। उनके अनुभव बताते हैं कि सुरक्षित जमीन की पहचान करते समय योजनाकारों को बाढ़ के चरम स्तर और तलछट के बहाव का भी अध्ययन करना चाहिए।
हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ तब आती है जब बर्फ पिघलने से बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलता है। चट्टान या बर्फ का ढहना भी घाटी में सामग्री धकेल सकता है और नीचे की ओर विनाशकारी लहर पैदा कर सकता है। नेपाल में 1940 से हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ की लगभग 30 घटनाएं दर्ज की गई हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र लगभग वैश्विक दर से दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। ग्लेशियरों, बर्फ और स्थायी रूप से जमी जमीन के पिघलने से ढलान कमजोर हो सकती हैं, जबकि गर्म परिस्थितियों में उन ऊंचाइयों पर बारिश होने लगी है जहां पहले बर्फ गिरती थी। भूकंप अस्थिरता का एक और कारण हैं।
नदी घाटियों में लगातार होते नुकसान
26 अगस्त की आपदा में एक ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टानें ढहकर घाटी में आ गिरीं। लगभग 30 फीट ऊंची बताई गई लहरें पानी, बर्फ और बड़े पत्थरों को नीचे की ओर ले गईं, पुल बहा ले गईं और त्रिशूली नदी के किनारे 12 जलविद्युत संयंत्रों को मलबे में दबा दिया।
करीब 1,400 शव बरामद होने की खबर थी, जबकि 5,000 से अधिक लोग लापता बताए गए। नेपाली सेना के ब्रिगेडियर जनरल सुभाष जंग थापा ने सितंबर की शुरुआत में कहा कि मृतकों या लापता लोगों में से 121 जलविद्युत सुविधाओं में फंस गए थे।
निर्माण और आपदाओं का सिलसिला कई वर्षों तक फैला है:
- 2016 से 2023: अध्ययन के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्मित भूमि लगभग 45% बढ़ी, जबकि हिमनदी झीलों की बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में यह बढ़ोतरी लगभग 78% रही।
- अगस्त 2025: उत्तराखंड के धराली में मलबे के बहाव ने 56 से अधिक होटल, रेस्तरां और होमस्टे दबा दिए।
- 26 अगस्त: भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा ने नेपाल में बस्तियों और जलविद्युत सुविधाओं को तबाह कर दिया।
- 11 अक्टूबर: बूढ़ी गंडकी के किनारे आई बाढ़ से 200 घर क्षतिग्रस्त हुए, पांच पुल बह गए और पांच लोग लापता हो गए।
- 12 अक्टूबर: उत्तराखंड ने बाढ़ मैदानों के लिए नए ज़ोनिंग नियमों को मंजूरी दी।
पहाड़ी इलाकों में यात्रा भी बाधित हुई है। नेपाल के आव्रजन विभाग ने बाद में पूर्वानुमानित बर्फीले तूफानों और हिमस्खलन के कारण 29 से 31 अक्टूबर 2026 के बीच अक्टूबर में ट्रेकिंग रोकने की सलाह दी और प्रतिबंधित ट्रेकिंग क्षेत्रों के लिए नए परमिट जारी करना भी रोक दिया।
पुनर्बहाली की कीमत घरों, खेतों और कारोबार तक पहुंची
नेपाल के राष्ट्रीय योजना आयोग ने भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ से निजी क्षेत्र को 79.17 अरब नेपाली रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया। उसके शुरुआती आकलन में परिवारों को लगभग 69 अरब रुपये और कारोबारों को 9.69 अरब रुपये का नुकसान बताया गया।
नुकसान में जमीन का बड़ा हिस्सा था। आकलन में 3,610 परिवारों की 507.97 हेक्टेयर जमीन को हुए नुकसान का मूल्य 35.44 अरब रुपये दर्ज किया गया। आवासीय जमीन के नुकसान का मूल्यांकन 13.26 अरब रुपये और नष्ट या क्षतिग्रस्त घरों का 11.95 अरब रुपये किया गया।
15 स्थानीय निकायों में 58 मैदानी टीमों द्वारा किए गए आयोग के डिजिटल सर्वेक्षण में धादिंग, गोरखा, नुवाकोट और रसुवा में 6,817 प्रभावित परिवार, 32,872 लोग और 499 कारोबार दर्ज किए गए। सर्वेक्षण में पूरी तरह क्षतिग्रस्त 2,989 घर गिने गए। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण की शुरुआती गणना में 8,317 नष्ट घर और 15 स्थानीय इकाइयों में लगभग 1.6 मिलियन सीधे प्रभावित लोग दर्ज किए गए, जो आयोग के सर्वेक्षण के आंकड़ों से काफी व्यापक हैं।
2,951 परिवारों की फसलें क्षतिग्रस्त हुईं, जिससे 232 मिलियन रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। 1.24 अरब रुपये मूल्य के वाहन भी नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए, जिससे 1,100 से अधिक परिवार प्रभावित हुए।
इसलिए किसी किसान परिवार के लिए पुनर्बहाली का मतलब केवल छत बदलना नहीं है। जमीन का कटाव आजीविका का साधन छीन सकता है, जबकि वाहन खोने या सड़क टूटने से खरीदारों, स्कूलों और चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच बाधित हो सकती है।
पर्यटन कारोबार को नुकसान और बुकिंग में गिरावट का सामना
अन्नपूर्णा ट्रेकिंग क्षेत्र का प्रमुख प्रवेश द्वार पोखरा पिछले तीन दशकों में काफी फैला है। सेती गंडकी शहर से होकर बहती है। मेयर धनराज आचार्य ने कहा कि नियमों के तहत नदी से अधिक दूरी जरूरी होने के बावजूद कुछ पुरानी इमारतें नदी किनारे से केवल पांच मीटर दूर हैं।
आचार्य ने पुरानी इमारतों और उनमें रहने वालों को दूसरी जगह ले जाने की कठिनाई बताई:
उन्हें कहां ले जाएं और यह कैसे करें, असली चुनौती यही है।
और उत्तर में, ट्रेकिंग करने वालों को सेवाएं देने वाली बस्तियां भी नदियों के किनारे फैल गई हैं। होमस्टे संचालक फुर्पा छिरिंग लामा ने कहा कि एक ऐसे समय में जब आमतौर पर उनके सभी 20 कमरे भरे रहते हैं, सिर्फ पांच कमरे ही भरे थे। यानी उस समय कमरे भरने की दर 25% थी, जबकि ट्रेकिंग सीजन के चरम पर आमतौर पर उनकी सभी बुकिंग पूरी रहती हैं।
होटल एसोसिएशन पोखरा के अध्यक्ष लक्ष्मण सुबेदी ने माना कि पर्यटन कारोबार उचित योजना के बिना फैले हैं। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन निवेशकों और संचालकों में जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है:
जब तक आपदाएं आती हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
धराली दिखाता है कि बार-बार आने वाली आपदाएं पर्यटन अर्थव्यवस्था को कैसे कमजोर कर सकती हैं। 2018 और 2019 की बाढ़ में वहां 22 घर और 24 होटल नष्ट हो गए थे। इसके बाद अगस्त 2025 में मलबे के बहाव ने 56 से अधिक पर्यटन कारोबारों को दबा दिया। सड़कों, पुलों और सेब के बागों को भी नुकसान पहुंचा। निवासियों ने इमारतों के साथ-साथ कृषि और पर्यटकों से होने वाली वह आमदनी भी खो दी, जिसकी मदद से वे उबर सकते थे।
जलविद्युत परियोजनाएं संवेदनशील घाटियों में मूल्यवान संपत्तियां केंद्रित करती हैं
त्रिशूली बेसिन में 36 जलविद्युत परियोजनाएं हैं, जिनमें अगस्त की आपदा में दबे 12 संयंत्र भी शामिल हैं। बिजली विकास के कारण घाटियों में कर्मचारी, सुरंगें, सड़कें और महंगी मशीनें लाई जाती हैं। इन घाटियों का पानी बिजली पैदा कर सकता है, लेकिन विनाशकारी बाढ़ भी ला सकता है।
निर्माणाधीन अपर त्रिशूली-1 की लागत आधा अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक थी। विश्व बैंक समूह की दो शाखाओं ने करीब 300 मिलियन डॉलर के ऋण और इक्विटी के जरिए इसका समर्थन किया, जबकि एशियाई विकास बैंक ने 60 मिलियन डॉलर का ऋण दिया।
विश्व बैंक ने कहा कि परियोजना का डिज़ाइन 2018 में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बाढ़ और भूस्खलन के आकलन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। उसने कहा कि अगस्त की आपदा से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी का उपयोग जोखिम आकलन, निगरानी, चेतावनियों और आपात प्रतिक्रिया पर विचार करने में किया जाएगा।
2024 में परियोजना का दौरा करने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञों ने जलवायु अनुकूलन आकलन न होने को एक बड़ी कमी बताया। नदी संरक्षण की पैरोकार परिणीता डांडेरकर ने भी सवाल उठाया कि क्या आकलनों में एक ही नदी के किनारे कई परियोजनाओं से जुड़े संयुक्त आपदा जोखिमों की पर्याप्त जांच की गई थी।
नेपाल विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी अकादमी के जलविद्युत इंजीनियर दीपक ज्ञवाली ने कहा कि ढहने के पीछे की ताकत निर्माण में की गई विस्फोटक कार्रवाई से कहीं अधिक थी। फिर भी उन्होंने परियोजनाओं के समूहों में जोखिमों की बारीकी से जांच की मांग की:
इन जोखिमों का ठीक से अध्ययन और आकलन किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं हुआ है।
यह समस्या नेपाल तक सीमित नहीं है। चीन और भारत ने हिमालय में 68 बड़े बांध बनाए हैं और 101 अन्य प्रस्तावित हैं। तिब्बत में चीन की बड़ी जलविद्युत परियोजना की अनुमानित लागत 170 अरब डॉलर है और इससे 300 मिलियन लोगों को बिजली मिलने की उम्मीद है। इसलिए पूरी नदी प्रणालियों की सुरक्षा का असर बहुत नीचे तक रहने वाली आबादी पर पड़ता है।
समुदायों को बिखेरे बिना सुरक्षित जमीन तलाशना
नेपाल के अधिकारी असुरक्षित मानी जाने वाली बस्तियों का नक्शा बना रहे हैं और पुनर्निर्माण की मास्टर योजना तथा आपदा-पश्चात जरूरतों का आकलन तैयार कर रहे हैं। इस आकलन का उद्देश्य आवास, सेवाओं, बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में नुकसान, आय के नुकसान और पुनर्बहाली के लिए जरूरी संसाधनों का हिसाब लगाना है।
अगस्त की बाढ़ में रसुवा, नुवाकोट और धादिंग की लगभग 15 बस्तियां नष्ट हो गईं। पुनर्वास आकलन के समय बचाए गए 3,948 लोग चार जिलों और काठमांडू के अस्थायी राहत केंद्रों में रह रहे थे।
खल्ते से पता चलता है कि वास्तव में सुरक्षित जमीन ढूंढना कितना मुश्किल है। उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष माधव प्रसाद अर्याल ने कहा कि वहां करीब 300 परिवार रहते थे, जिनमें 2015 के भूकंप के बाद पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे लोग भी शामिल थे। पुनर्वास के लिए तय की गई जगह टाल्लोपाहिरे का कुछ हिस्सा भी बह गया।
पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने कहा कि पुनर्वास में आजीविका और सामुदायिक रिश्तों तक पहुंच बरकरार रहनी चाहिए। उन्होंने पहाड़ी निवासियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाने के बजाय आसपास के सुरक्षित स्थानों को प्राथमिकता दी:
आसपास के सुरक्षित इलाकों की पहचान की जानी चाहिए, जैसे पहाड़ों की छोटी घाटियां और पहाड़ियों की ऊंची जमीन, जहां जोखिम वाली बस्तियों को बसाया जा सके।
नेपाल के पास इस दिशा में अनुभव है। 2015 के भूकंप के बाद लाप्राक गांव के पुनर्वास के लिए गुप्सीपाखा में 602 घर बनाए गए थे। पुनर्निर्माण प्राधिकरण के पूर्व प्रमुख सुशील ग्यावली ने कहा कि आकलनों में लगभग 300 बस्तियों की जांच की गई और 64 को जोखिमग्रस्त पाया गया; 46 को एकीकृत बस्तियों के रूप में विकसित किया गया और 19 में सुरक्षात्मक उपाय किए गए।
सरकार प्रभावित जिलों के भीतर सुरक्षित जमीन और अन्य जिलों में संभावित पुनर्वास पर विचार कर रही है। पुनर्वास के अंतिम स्थल, वित्तपोषण की व्यवस्था और परिवारों को निर्माण अनुदान मिलेगा या सरकार द्वारा बनाए गए घर, इन पर अभी फैसला नहीं हुआ है।
नदी किनारे के नियमों के पालन की परीक्षा
नेपाल का आपदा प्राधिकरण कहता है कि रसुवा-भोटेकोशी गलियारे में नदी किनारे से 15 मीटर के भीतर बस्तियों पर रोक होगी। अन्य गलियारों के लिए भी ऐसी ही पाबंदियां प्रस्तावित हैं।
नदी किनारे से पीछे हटने के नियम निर्माण और नदी के बीच की क्षैतिज दूरी तय करते हैं। बाढ़ नियोजन में पानी से ऊंचाई, अस्थिर ढलानों और मलबे के संभावित पहुंच क्षेत्र को भी ध्यान में रखना जरूरी है। पानी 70 मीटर ऊपर चढ़ने की निवासियों की बातें बताती हैं कि अधिकारियों को खतरे के किस पैमाने पर विचार करना होगा।
शहरी नियोजन विशेषज्ञ और यूनिवर्सिटी ऑफ नेपाल के रजिस्ट्रार सूर्य राज आचार्य ने कहा कि नदियों के पास की सुलभ, अपेक्षाकृत समतल जमीन ने सड़कों, होटलों, बाजारों वाले कस्बों और जलविद्युत परियोजनाओं को आकर्षित किया है। उनका कहना था कि नाजुक पहाड़ी पर्यावरण के लिए सख्त नियोजन जरूरी है, जबकि मौजूदा नियम कमजोर हैं और उनका पालन ठीक से नहीं होता।
उत्तराखंड मंत्रिमंडल के 12 अक्टूबर के फैसले में बाढ़ मैदानों में विकास को नियंत्रित करने, लोगों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा करने तथा बाढ़ के पानी के प्राकृतिक बहाव को बनाए रखने के नियम मंजूर किए गए। कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने कहा कि पाबंदियां पहले से कागजों पर थीं, लेकिन व्यवहार में उन्हें दरकिनार किया जा रहा था।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के आपदा अध्ययन केंद्र के निदेशक बसंत राज अधिकारी ने बीमा के लिए जोखिम के आधार पर स्थानों का वर्गीकरण करने का सुझाव दिया। सुरक्षित क्षेत्रों में घरों को बेहतर बीमा सुरक्षा देने से परिवारों और निर्माणकर्ताओं को अधिक खतरनाक जगहों से बचने का आर्थिक कारण मिल सकता है।
बार-बार आने वाली आपदाओं से बढ़ता आर्थिक बोझ
हिमाचल प्रदेश के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में चार वर्षों के दौरान आपदाओं से लगभग 460 अरब भारतीय रुपये का नुकसान दर्ज किया गया। 2025 की आपदा-पश्चात जरूरतों के आकलन में नुकसान से जुड़ी 62,000 से अधिक सत्यापित प्रविष्टियां थीं।
थुनाग में 2026 के एक अध्ययन ने जून और जुलाई 2025 की बाढ़ से हुए सीधे नुकसान का अनुमान 62 मिलियन से 78 मिलियन भारतीय रुपये के बीच लगाया। आपदा में 38 घर और 14 दुकानें नष्ट हुईं, 61 अन्य घर क्षतिग्रस्त हुए और 63 मवेशी मारे गए।
आईआईटी मद्रास के 109 हिमालयी जिलों के आकलन से यह समझने में मदद मिलती है कि सबसे खतरनाक जगह और सबसे कम लचीला समुदाय अलग-अलग हो सकते हैं। खतरे के मामले में शिमला सबसे ऊपर रहा, यानी वहां नुकसानदेह घटनाओं का खतरा अधिक है। संवेदनशीलता के मामले में धलाई सबसे ऊपर रहा, यानी वहां लोगों के नुकसान झेलने की आशंका अधिक है। खतरे, संवेदनशीलता और जोखिम की चपेट में होने, तीनों को मिलाकर दार्जिलिंग सबसे ऊपर रहा।
भारत के जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रमों में 15 राज्यों में भूस्खलन जोखिम घटाने के लिए 10 अरब भारतीय रुपये और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश में हिमनदी झील बाढ़ जोखिम घटाने के लिए 1.5 अरब रुपये शामिल हैं। 2026-27 से 2030-31 के लिए 16वें वित्त आयोग ने राज्य आपदा जोखिम न्यूनीकरण कोषों के लिए 408.8 अरब रुपये की सिफारिश की।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर की श्रेया वाधवान ने बताया कि क्षतिग्रस्त सड़क किसी बस्ती का स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और बाजारों से संपर्क काट सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के पर्वतीय भूगोलवेत्ता एल्टन बायर्स ने कहा कि निर्माण पर इस अध्ययन से अधिक प्रभावी चेतावनी प्रणालियों और एहतियाती उपायों को बढ़ावा मिलना चाहिए।
व्यावहारिक चुनौती इन उपायों को जोड़ने की है: बाढ़ से पहले लोगों को चेतावनी देना, नई इमारतों को उसके संभावित रास्ते से दूर रखना और ऐसी जगहों पर पुनर्निर्माण करना जहां परिवार सुरक्षित रहते हुए अपनी आजीविका चला सकें।
मुख्य बातें
- अध्ययन के तहत आए हिमालयी क्षेत्र में कम से कम 300,000 लोग संभावित आपदा क्षेत्रों में रहते हैं।
- 2016 से 2023 के बीच निर्मित भूमि लगभग 45% बढ़ी, जबकि हिमनदी झीलों की बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में बढ़ोतरी लगभग 78% रही।
- नेपाल के शुरुआती आकलन में भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा से निजी क्षेत्र को 79.17 अरब नेपाली रुपये का नुकसान बताया गया।
- पर्यटन कारोबार, खेतों, घरों और जलविद्युत सुविधाओं को बाढ़, मलबे और संपर्क बाधित होने से जुड़े जोखिमों का सामना है।
- नेपाल पुनर्वास योजनाएं और नदी किनारे निर्माण पर पाबंदियां तैयार कर रहा है; उत्तराखंड ने 12 अक्टूबर को बाढ़ मैदानों के लिए नए ज़ोनिंग नियम मंजूर किए।
- सुरक्षित पुनर्निर्माण में बाढ़ के चरम स्तर, आजीविका, सामुदायिक रिश्तों और निर्माण नियमों के पालन को ध्यान में रखना जरूरी है।






