धुंध और सड़कों पर उल्लंघनों पर अदालत की चेतावनी
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 24 अक्टूबर तक प्रदूषण के बारे में सार्वजनिक चेतावनियां जारी करने का आदेश दिया और 26 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा। अदालत ने मुंबई के नागरिक प्रशासन, प्रदूषण नियामक और पुलिस की आलोचना की कि वे पटाखों और त्योहारों के शोर पर पाबंदियां लागू करने में नाकाम रहे। पीठ ने 500 मीटर से कम दृश्यता और लोगों के बाहर निकलने में हो रही कठिनाई का हवाला देते हुए स्थिति को आपातकालीन बताया।
विषय-सूची
- धुंध और सड़कों पर उल्लंघनों पर अदालत की चेतावनी
- पुलिस और नागरिक अधिकारियों को क्या करना होगा
- आदेश कैसे आगे बढ़े
- पटाखे कहां प्रतिबंधित हैं
- शोर के आंकड़े बताते हैं कि नियम लागू करने की चुनौती कितनी बड़ी है
- शोर पर पाबंदियों के साथ जमा राशि भी जुड़ी
- कम प्रदूषण वाले इलाकों के आंकड़ों से न्यायाधीश क्यों चिंतित हुए
- उत्सवों से पहले चेतावनियां लोगों तक पहुंचनी चाहिए
- 26 अक्टूबर को होगी कार्रवाई की परीक्षा
- मुख्य बातें
न्यायमूर्ति गिरीश एस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला के गोखले ने बुधवार, 21 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। यह जनहित याचिका अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की थी। उनकी आलोचना से पहले 22 सितंबर और 15 अक्टूबर को उत्सवों के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण नियंत्रित करने के आदेश दिए गए थे।
अदालत को बताया गया कि उस समय मुंबई देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर था। न्यायमूर्ति कुलकर्णी ने इस बात पर चिंता जताई कि समुद्री हवा और खुले तटीय इलाकों के बावजूद मुंबई में प्रदूषण दिल्ली से भी अधिक हो रहा था। सुनवाई में, जैसा कि बताया गया, वायु गुणवत्ता सूचकांक के कोई संख्यात्मक आंकड़े या रैंकिंग के आधार का डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया।
आम गतिविधियों पर धुंध के असर को समझाते हुए न्यायमूर्ति कुलकर्णी ने कहा:
लोग परेशान हैं और बाहर नहीं निकल पा रहे, सुबह की सैर असंभव है... धुंध बहुत खराब है और हमें नहीं पता कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।
तत्काल विवाद इस बात को लेकर है कि क्या अधिकारी पहले से जारी निर्देशों को लागू कर रहे हैं। अदालत ने सार्वजनिक सूचनाओं की कमी, क्रॉफर्ड मार्केट के पास एक पुलिस थाने के बाहर कथित तौर पर पटाखे फोड़े जाने और आवश्यक अनुमतियों या शोर-सीमा का पालन करने के लिखित आश्वासन के बिना त्योहारों के जुलूस निकाले जाने का उल्लेख किया।
निवासियों के लिए अदालत की मांगों का मतलब व्यावहारिक बदलाव हैं: स्पष्ट चेतावनियां, उल्लंघनों पर पुलिस की कार्रवाई, जुलूसों के ध्वनि उपकरणों की जांच और निर्माण-जनित प्रदूषण के खिलाफ कदम। अधिकारियों के लिए अगली सुनवाई तक यह दर्ज करना जरूरी है कि उन्होंने क्या किया है।
पुलिस और नागरिक अधिकारियों को क्या करना होगा
मुंबई पुलिस आयुक्त को सभी थानों के प्रभारी अधिकारियों की बैठक बुलानी होगी और उल्लंघनों से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करनी होगी। इससे अधिकारियों को निर्देशों का एक साझा सेट मिलेगा, ताकि नियमों का प्रवर्तन हर थाने में अलग-अलग लिए गए फैसलों पर पूरी तरह निर्भर न रहे।
आयुक्त को एक हलफनामा भी दाखिल करना होगा, जिसमें पुष्टि हो कि पुलिसकर्मियों को अदालत के निर्देशों की जानकारी दे दी गई है और वे उन्हें लागू करेंगे। हलफनामा ऐसा लिखित बयान होता है, जिसकी सत्यता की औपचारिक पुष्टि कर उसे अदालत में जमा किया जाता है।
बृहन्मुंबई महानगरपालिका, जिसे बीएमसी के नाम से जाना जाता है, और पुलिस आयुक्त को 26 अक्टूबर की सुनवाई से पहले अनुपालन संबंधी हलफनामे जमा करने होंगे। अदालत ने बीएमसी और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, यानी एमपीसीबी, के आयुक्तों को भी उस सुनवाई में उपस्थित होकर उठाए गए कदम पेश करने का निर्देश दिया।
न्यायाधीशों ने चेतावनी दी कि निष्क्रियता के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दंड और अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने नियम लागू करने में विफलता को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जोड़ा, जो कानून के समक्ष समानता तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करते हैं। उनकी चेतावनी ने निवासियों को प्रदूषण से बचाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय की।
आदेश कैसे आगे बढ़े
कार्यवाही की शुरुआत त्योहारों के जुलूसों से होने वाले शोर की चिंता से हुई और फिर इसका दायरा बढ़कर पटाखों, अत्यधिक ध्वनि और बिगड़ती वायु गुणवत्ता के खिलाफ व्यापक कार्रवाई की मांग तक पहुंचा। यह स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका है, यानी अदालत ने जनता को प्रभावित करने वाले मामले को अपनी पहल पर उठाया।
मुख्य तारीखों से पता चलता है कि पाबंदियां जारी करने से कार्रवाई का प्रमाण मांगने तक मामला कैसे आगे बढ़ा:
- 21 सितंबर: अदालत ने जुलूसों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण की चिंताओं पर स्वतः संज्ञान लिया।
- 22 सितंबर: पीठ ने त्योहारों के जुलूसों के दौरान पटाखों, लेजर लाइटों, संगीत, वाद्ययंत्रों और ध्वनि उपकरणों पर पाबंदियां लगाईं। साथ ही अनुमतियों, जमा राशि और निगरानी की शर्तें रखीं।
- 15 अक्टूबर: अदालत ने त्योहारों के प्रदूषण और सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों के इस्तेमाल को लेकर अतिरिक्त निर्देश दिए।
- 20 अक्टूबर: आवाज फाउंडेशन ने मुंबई के कई स्थानों पर दुर्गा विसर्जन जुलूसों के दौरान शोर दर्ज किया।
- 21 अक्टूबर: पीठ ने नियम लागू करने में विफलता की आलोचना की और प्रदूषण की स्थिति को आपातकालीन बताया।
- 24 अक्टूबर: अधिकारियों को जन-जागरूकता सूचनाएं प्रकाशित करनी होंगी और सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित करनी होंगी।
- 26 अक्टूबर: अदालत अनुपालन की समीक्षा करेगी और वरिष्ठ नागरिक तथा प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों की प्रस्तुतियां सुनेगी।
अदालत ने सड़कों पर पटाखे फोड़ने की पाबंदी को सभी त्योहारों तक बढ़ाया है। इससे नियम लागू करना किसी एक उत्सव तक सीमित न रहकर लगातार निभाई जाने वाली जिम्मेदारी बन जाता है।
पटाखे कहां प्रतिबंधित हैं
हाई कोर्ट के निर्देश पूरे साल सार्वजनिक सड़कों, गलियों और फुटपाथों पर पटाखे फोड़ने पर रोक लगाते हैं। यह पाबंदी नवरात्रि, दिवाली और क्रिसमस समेत सभी त्योहारों पर लागू होती है। शांत क्षेत्र घोषित इलाकों में पटाखे पूरी तरह प्रतिबंधित हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने पटाखों के निर्माण या बिक्री पर रोक नहीं लगाई है। उसके निर्देश इस बात से संबंधित हैं कि पटाखों का इस्तेमाल कहां किया जाए और अधिकारी उनसे होने वाले शोर तथा प्रदूषण को कैसे नियंत्रित करें। पहले के निर्देशों में ग्रीन पटाखों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई थी, जिन्हें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम उत्सर्जन के लिए बनाया जाता है।
अदालत ने दक्षिण मुंबई में क्रॉफर्ड मार्केट के पास हुई एक घटना का विशेष उल्लेख किया, जहां मंगलवार को एक पुलिस थाने के बाहर व्यस्त सड़कों पर कथित तौर पर पटाखे फोड़े गए। न्यायाधीशों ने इसे उनके आदेशों का "खुलेआम उल्लंघन" बताया।
जुलूसों में ध्वनि उपकरणों को लेकर भी पुलिस की कार्रवाई की जांच हुई। पीठ ने कहा कि लाइसेंस प्रदर्शित किए जाने चाहिए और सवाल उठाया कि निर्धारित डेसीबल सीमा का पालन करने की आवश्यक अनुमति या लिखित आश्वासन के बिना जुलूस कैसे निकाले जा रहे हैं। आयोजन स्थल पर जांच न हो तो अनुमति की शर्त का व्यावहारिक असर बहुत कम होता है।
शोर के आंकड़े बताते हैं कि नियम लागू करने की चुनौती कितनी बड़ी है
प्रदूषण के खिलाफ अभियान चलाने वाले संगठन आवाज फाउंडेशन ने 20 अक्टूबर को रात 8:51 बजे दुर्गा विसर्जन के दौरान माहिम में लाउडस्पीकर का शोर 110.8 डेसीबल दर्ज किया। रात 9:21 बजे प्रभादेवी में पटाखों का शोर 103.1 डेसीबल दर्ज किया गया।
दादर पश्चिम में फाउंडेशन ने रात 9:15 बजे पटाखों का शोर 82 से 102.6 डेसीबल के बीच दर्ज किया और देखा कि धुआं हवा में बना हुआ था। कफ परेड में रात 9:53 से 9:55 बजे के बीच ध्वनि-वर्धक उपकरणों का स्तर 87.2 से 100.4 डेसीबल के बीच था।
निर्धारित शोर सीमा व्यावसायिक इलाकों में दिन के समय 65 डेसीबल और रात में 55 डेसीबल है। आवासीय इलाकों में यह दिन में 55 और रात में 45 डेसीबल है। इन नियमों के तहत सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक दिन का समय माना जाता है, इसलिए सूर्यास्त के बाद दर्ज होने के बावजूद चारों जगहों के आंकड़े दिन की अवधि में लिए गए थे।
माहिम में दर्ज 110.8 डेसीबल का स्तर व्यावसायिक इलाकों के लिए निर्धारित दिन की 65 डेसीबल सीमा से 45.8 डेसीबल अधिक था। डेसीबल का पैमाना लघुगणकीय होता है, यानी इसमें बढ़ोतरी ध्वनि ऊर्जा में सामान्य गिनती के पैमाने की तुलना में कहीं बड़ी वृद्धि दर्शाती है। कौन-सी सीमा लागू होगी, यह उस स्थान के कानूनी वर्गीकरण पर निर्भर करता है।
आवाज फाउंडेशन की सुमायरा अब्दुलअली ने पुलिस की जिम्मेदारी बताते हुए कहा:
अदालत ने पुलिस को डेसीबल स्तर मापने और उचित कार्रवाई करने का आदेश दिया है।
फाउंडेशन ने कहा कि कई गतिविधियां पुलिस की मौजूदगी में हुईं, जबकि जिन जगहों पर उसने निरीक्षण किया वहां डेसीबल मीटर दिखाई नहीं दिए।
शोर पर पाबंदियों के साथ जमा राशि भी जुड़ी
22 सितंबर के निर्देशों के तहत त्योहारों के आयोजकों और मंडलों, यानी आयोजन समितियों, को ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत अनुमति लेने की शर्त के रूप में 100,000 रुपये जमा करने थे। व्यक्तियों के लिए यह राशि 50,000 रुपये थी।
किसी संगठन से ली जाने वाली राशि किसी व्यक्ति से ली जाने वाली राशि की दोगुनी है। आयोजन स्थल पर या जुलूस के दौरान निर्धारित शोर सीमा का उल्लंघन होने पर जमा राशि जब्त की जा सकती है। इससे आयोजकों को ध्वनि स्तर नियंत्रित रखने का सीधा आर्थिक कारण मिलता है।
अदालत ने अनुमतियों, डेसीबल मीटर और लिखित आश्वासनों की भी शर्त रखी। इन उपायों से जिम्मेदारियों का एक क्रम बनता है: आयोजक कार्यक्रम से पहले नियमों का पालन करने का वचन देते हैं, आयोजन के दौरान शोर की जांच होती है और उल्लंघन पर जमा राशि जब्त होने के साथ कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।
आवाज फाउंडेशन ने माहिम और कफ परेड में यातायात की ओर, और हाजी अली के पास आवासीय इमारतों तथा यातायात की ओर निर्देशित लेजर लाइटों का भी उल्लेख किया। उसने वर्ली और बाबुलनाथ में पटाखों का इस्तेमाल भी देखा। इन टिप्पणियों ने उसकी चिंता को लाउडस्पीकर के शोर से आगे बढ़ाकर उन गतिविधियों तक पहुंचाया, जिनका असर जुलूस मार्गों से गुजरने या उनके पास रहने वाले लोगों पर पड़ता है।
कम प्रदूषण वाले इलाकों के आंकड़ों से न्यायाधीश क्यों चिंतित हुए
न्यायमूर्ति गोखले ने चेतावनी दी कि अधिकारी मुंबई के सबसे स्वच्छ इलाकों के वायु गुणवत्ता आंकड़ों का हवाला दे सकते हैं, जबकि यातायात सिग्नलों के पास और झुग्गी-बस्तियों की स्थितियों को नजरअंदाज कर सकते हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर थी कि क्या अधिकारियों के विवरण उन जगहों की वास्तविक स्थिति दिखाते हैं जहां निवासी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं।
वायु गुणवत्ता सूचकांक, यानी एक्यूआई, प्रदूषकों के माप को ऐसे पैमाने पर प्रस्तुत करता है जिससे हवा की स्थिति समझना आसान हो। शहर के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण अलग-अलग होता है, इसलिए किसी एक निगरानी केंद्र का आंकड़ा व्यस्त सड़क के किनारे की स्थिति से अलग हो सकता है।
न्यायाधीश की टिप्पणी का असर नियम लागू करने के तरीकों पर पड़ता है। अगर अधिकारी कम प्रदूषित जगहों पर ध्यान दें, तो भारी यातायात या घनी आबादी वाले इलाकों पर कम ध्यान दिया जा सकता है, भले ही वहां के निवासियों को अधिक खराब स्थितियों का सामना करना पड़े। अदालत चाहती थी कि अधिकारी मुंबई में प्रदूषण से निपटने के लिए कदम उठाएं।
न्यायमूर्ति कुलकर्णी ने निर्माण गतिविधियों पर बीएमसी के नियंत्रण पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि महानगरपालिका डेवलपरों और निर्माण स्थलों पर नियंत्रण के लिए बहुत कम करती दिख रही है और जुर्माने वसूलने की मांग की। इस आलोचना से सुनवाई का दायरा त्योहारों की गतिविधियों से आगे बढ़कर उत्सर्जन के एक अन्य स्रोत तक पहुंचा, जिस पर नागरिक प्रशासन को नियमित रूप से नियम लागू करने की जरूरत है।
उत्सवों से पहले चेतावनियां लोगों तक पहुंचनी चाहिए
अदालत ने पाया कि बीएमसी और एमपीसीबी ने सार्वजनिक सड़कों, गलियों और फुटपाथों पर पटाखों की पाबंदियों, या धुएं, जहरीले उत्सर्जन और शोर के खतरों के बारे में बताने वाली सार्वजनिक सूचनाएं जारी नहीं की थीं। उसने 24 अक्टूबर तक इन्हें प्रकाशित करने और सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित करने का आदेश दिया।
पहले के निर्देशों में महाराष्ट्र सरकार, बीएमसी और एमपीसीबी की ओर से संयुक्त सूचनाएं जारी करने, स्कूलों और सार्वजनिक परिवहन में जागरूकता अभियान चलाने, मशहूर हस्तियों की भागीदारी, और पुलिस से जुड़ी प्रभावी शिकायत व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी। नई समय-सीमा ने उन संचार उपायों को तत्काल जरूरी बना दिया, जिनकी कमी का पीठ ने उल्लेख किया था।
आवाज फाउंडेशन ने कहा कि उसने 26 सितंबर, 28 सितंबर और 13 अक्टूबर को गणेशोत्सव के दौरान लाउडस्पीकरों, पटाखों और लेजर लाइटों को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यालय को ईमेल भेजे थे। उसके पत्राचार में पटाखों के रसायनों और घरों तथा यातायात की ओर निर्देशित रोशनी को लेकर चिंता जताई गई थी।
फाउंडेशन ने 25 सितंबर को गणेश विसर्जन के दौरान नियम लागू करने की मिली-जुली तस्वीर भी पेश की। अधिकतर गणेश मंडलों ने ट्रकों पर लगे डीजे और शोर बढ़ाने वाले उपकरणों को हटाकर शोर संबंधी नियमों का पालन किया हुआ दिखाई दिया। हालांकि, विसर्जन स्थलों के पास राजनीतिक दलों के बूथों पर लगे लाउडस्पीकर कई जगह 100 डेसीबल से अधिक शोर कर रहे थे और देर रात तक चलते रहे।
26 अक्टूबर को होगी कार्रवाई की परीक्षा
अगली सुनवाई में बीएमसी और एमपीसीबी के आयुक्त पीठ के सामने अपने कदमों का ब्यौरा देंगे। नागरिक प्रशासन और पुलिस के अनुपालन हलफनामों से नियमों के प्रवर्तन, कर्मचारियों को दिए गए निर्देशों और जनता तक पहुंचाई गई सूचनाओं का लिखित ब्योरा अदालत को मिलेगा।
व्यावहारिक परीक्षा यह है कि क्या चेतावनियां और पाबंदियां सड़कों, निर्माण स्थलों और जुलूस मार्गों पर कार्रवाई में बदलेंगी। न्यायाधीशों ने ठोस जिम्मेदारियां तय की हैं: निवासियों को जानकारी देना, पुलिस को साधन और निर्देश देना, अनुमतियों की जांच करना, शोर मापना और उल्लंघनों पर कार्रवाई करना।
न्यायमूर्ति कुलकर्णी की चिंता थी कि लोगों को बाहर निकलने का फैसला लेने से पहले वायु गुणवत्ता जांचने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। अब तय समय-सीमाओं के साथ जवाब देने की जिम्मेदारी उन सार्वजनिक संस्थाओं पर है जिनके पास अदालत के आदेश लागू करने की शक्ति है।
मुख्य बातें
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई में प्रदूषण की स्थिति को आपातकालीन बताया और नागरिक प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण तथा पुलिस अधिकारियों द्वारा नियम लागू करने में देरी की आलोचना की।
- जन-जागरूकता सूचनाएं 24 अक्टूबर तक प्रकाशित की जानी चाहिए और सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित की जानी चाहिए।
- बीएमसी और एमपीसीबी के आयुक्तों को 26 अक्टूबर की सुनवाई में उपस्थित होकर अपनी कार्रवाई का ब्योरा देना होगा।
- मुंबई पुलिस आयुक्त को थानों के अधिकारियों की बैठक बुलानी होगी, नियम लागू करने की प्रक्रिया तैयार करनी होगी और हलफनामा दाखिल करना होगा।
- सार्वजनिक सड़कों, गलियों और फुटपाथों पर पूरे साल पटाखे प्रतिबंधित हैं और शांत क्षेत्रों में इन पर पूरी तरह रोक है।
- आवाज फाउंडेशन ने 20 अक्टूबर के जुलूसों के दौरान माहिम में लाउडस्पीकर का शोर 110.8 डेसीबल दर्ज किया।
- अदालत ने निर्माण-जनित प्रदूषण पर नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठाए और निष्क्रियता के लिए अधिकारियों को संभावित दंड और अभियोजन की चेतावनी दी।






