भारत में कंटेनर बनाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन
भारत की केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 28 अक्टूबर, 2026 को 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी। इसका लक्ष्य घरेलू वार्षिक विनिर्माण क्षमता को बढ़ाकर 7,50,000 ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट (टीईयू) करना है। यह देश की मौजूदा 75,000 टीईयू क्षमता से लगभग दस गुना है।
विषय-सूची
- भारत में कंटेनर बनाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन
- क्षमता का लक्ष्य क्यों अहम है
- करीब 89% धन परिचालन सहायता के लिए
- निर्माताओं के लिए सस्ता ऋण और बंदरगाह की जमीन
- नई फैक्ट्रियों के लिए न्यूनतम आकार के नियम
- स्थानीय सामग्री की अनिवार्यता बढ़कर 90%
- निर्यात की महत्वाकांक्षा के लिए परीक्षण अहम
- रोजगार और शिपिंग आपूर्ति सबसे बड़े दांव
- कार्यान्वयन की समयसीमा
- मुख्य बातें
यह कार्यक्रम वित्त वर्ष 2039-40 तक चलेगा और नई फैक्ट्रियों के साथ मौजूदा संयंत्रों के विस्तार को भी समर्थन देगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता की और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस फैसले की घोषणा की।
सबसे बड़ा आवंटन, 8,891 करोड़ रुपये, पात्र निर्माताओं की परिचालन लागत में मदद के लिए है। फैक्ट्रियों में निवेश के लिए लिए गए ऋणों पर ब्याज सब्सिडी देने के वास्ते 859 करोड़ रुपये और परीक्षण एवं प्रमाणन के लिए 150 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। निर्माताओं को प्रमुख बंदरगाहों पर रियायती दरों पर जमीन पट्टे पर भी मिल सकती है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब संघर्ष समुद्री व्यापार को बाधित कर रहे हैं, जहाजों को लंबे मार्गों पर भेज रहे हैं और कंटेनरों की उपलब्धता पर दबाव डाल रहे हैं। भारत आयात पर निर्भरता घटाने और अपनी शिपिंग आपूर्ति शृंखला को अधिक मजबूत बनाने के लिए घरेलू विनिर्माण आधार का विस्तार करना चाहता है।
सरकार का अनुमान है कि इस कार्यक्रम से करीब 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे। इसका दायरा कंटेनर जोड़ने वाली फैक्ट्रियों से आगे बढ़कर विशेष इस्पात, कॉर्नर कास्टिंग, लकड़ी के फ्रेम और पेंट बनाने वाले आपूर्तिकर्ताओं तक फैला है।
क्षमता का लक्ष्य क्यों अहम है
भारत की मौजूदा विनिर्माण क्षमता करीब 75,000 टीईयू सालाना है, लेकिन वास्तविक उत्पादन इसका लगभग आधा, यानी करीब 37,500 टीईयू, रहने का अनुमान है। प्रस्तावित 7,50,000 टीईयू क्षमता मौजूदा क्षमता से दस गुना और वर्तमान उत्पादन से करीब 20 गुना होगी।
टीईयू कंटेनर क्षमता मापने की एक मानक इकाई है, जो 20 फुट लंबे कंटेनर पर आधारित है। 40 फुट लंबे मानक कंटेनर को दो टीईयू माना जाता है। इससे फैक्ट्रियों, शिपिंग कंपनियों और बंदरगाहों को अलग-अलग आकार के कंटेनर संभालने के बावजूद क्षमता की तुलना करने में मदद मिलती है।
भारत हर साल 20 लाख से अधिक खाली कंटेनर आयात करता है, जिनमें करीब 80% चीन से आते हैं। चीन सालाना करीब 30 लाख कंटेनर बनाता है, जो उस विनिर्माण उद्योग के पैमाने को दिखाता है जिससे भारत प्रतिस्पर्धा करना चाहता है।
आयात के आंकड़ों में अलग-अलग कंटेनरों की गिनती होती है, जबकि भारत का क्षमता लक्ष्य टीईयू में है। इसलिए दोनों की तुलना करते समय कंटेनरों की लंबाई अहम है। 40 फुट लंबे कंटेनरों की खेप में, 20 फुट लंबे कंटेनरों की उतनी ही संख्या के मुकाबले टीईयू दोगुने होंगे।
भारत की मौजूदा फैक्टरी क्षमता और वास्तविक उत्पादन के बीच का अंतर भी महत्वपूर्ण है। अधिक उत्पादन लाइनें बनाना इस काम का एक हिस्सा है; इस क्षमता का कितना इस्तेमाल होगा, यह ऑर्डर मिलने और प्रतिस्पर्धी लागत पर कंटेनर बनाने पर निर्भर करेगा।
करीब 89% धन परिचालन सहायता के लिए
परिचालन खर्च के लिए 8,891 करोड़ रुपये का आवंटन कार्यक्रम के कुल बजट का 88.91% है। ब्याज सहायता का हिस्सा 8.59% और परीक्षण एवं प्रमाणन का हिस्सा शेष 1.5% है। इन तीनों मदों का कुल योग 10,000 करोड़ रुपये है।
परिचालन खर्च से आशय किसी व्यवसाय को चलाने और उसके उत्पाद बनाने की आवर्ती लागतों से है, न कि फैक्टरी बनाने के शुरुआती खर्च से। योजना के तहत भारत में निर्मित, वैश्विक शिपिंग मानकों के अनुरूप और इसमें भाग लेने वाले निर्माताओं द्वारा बेचे गए पात्र कंटेनरों को सहायता मिलेगी।
20 फुट लंबे मानक कंटेनर के लिए घोषित सहायता 49,500 रुपये और 40 फुट लंबे कंटेनर के लिए 86,625 रुपये है। 20 फुट लंबे विशेष कंटेनरों के लिए सहायता 37,125 से 74,250 रुपये तक होगी।
इस तरह 40 फुट लंबे मानक कंटेनर को 20 फुट लंबे कंटेनर की तुलना में 1.75 गुना सहायता मिलेगी, जबकि उसकी टीईयू क्षमता दोगुनी है। भुगतान की व्यवस्था हर टीईयू के लिए एक समान राशि देने के बजाय कंटेनर के प्रकार के अनुसार अलग-अलग है।
निर्माताओं के लिए सस्ता ऋण और बंदरगाह की जमीन
ब्याज सहायता के लिए रखे गए 859 करोड़ रुपये से पूंजीगत खर्च के लिए पात्र अवधि-ऋणों पर सालाना 3% ब्याज सब्सिडी दी जाएगी। पूंजीगत खर्च में फैक्टरी, मशीनरी और उत्पादन उपकरण जैसी परिसंपत्तियों में निवेश शामिल है।
यह सहायता नई कंटेनर विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने और मौजूदा क्षमता का विस्तार करने के लिए लिए गए ऋणों पर लागू होगी। ब्याज सब्सिडी से उत्पादन में निवेश करते समय निर्माताओं की उधारी लागत का एक हिस्सा कम होगा।
प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण कंटेनर निर्माताओं को लागू दर के 25% पर जमीन पट्टे पर भी दे सकते हैं। पात्र पट्टे के मामले में जमीन का शुल्क पूरी लागू दर के मुकाबले तीन-चौथाई कम होगा।
इस रियायत की अनुमति देने के लिए सरकार भूमि प्रबंधन संबंधी नीति दिशानिर्देशों में ढील दे रही है। बंदरगाह की जमीन का समर्थन तीन वित्तपोषित सहायता श्रेणियों के साथ जुड़ता है। वैष्णव ने कार्यक्रम के तहत सहायता के चार रूप बताए: ब्याज सहायता, परिचालन सहायता, परीक्षण एवं प्रमाणन और भूमि पट्टे पर देना।
नई फैक्ट्रियों के लिए न्यूनतम आकार के नियम
नई विनिर्माण परियोजनाओं की वार्षिक क्षमता कम से कम 1,00,000 टीईयू होनी चाहिए। मौजूदा फैक्ट्रियों के विस्तार से सालाना कम से कम 25,000 टीईयू क्षमता जुड़नी चाहिए। इन सीमाओं का उद्देश्य ऐसी परियोजनाओं को सहायता देना है जो राष्ट्रीय क्षमता में पर्याप्त योगदान कर सकें।
न्यूनतम आकार वाली नई इकाई की क्षमता 7,50,000 टीईयू के राष्ट्रीय लक्ष्य की करीब 13.3% होगी। 25,000 टीईयू का न्यूनतम विस्तार उस लक्ष्य का लगभग 3.3% होगा।
इन दो तरह के निवेश के लिए योजना में ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। ग्रीनफील्ड परियोजना का मतलब नई इकाई बनाना है, जबकि ब्राउनफील्ड विस्तार से मौजूदा परिचालन में क्षमता बढ़ाना अभिप्रेत है।
सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के तीन साल के भीतर इकाइयों को चालू करना होगा। इससे हर मंजूर परियोजना के परिचालन शुरू करने की समयसीमा तय होती है, जबकि निर्माण, उपकरण लगाने और उत्पादन की तैयारी के लिए समय भी मिलता है। घोषणा में आवेदन शुरू होने की कोई कैलेंडर तारीख नहीं दी गई।
स्थानीय सामग्री की अनिवार्यता बढ़कर 90%
पात्र निर्माताओं को वित्त वर्ष 2031-32 तक कम से कम 70% स्थानीय सामग्री की शर्त पूरी करनी होगी। वित्त वर्ष 2032-33 से यह सीमा बढ़कर 90% हो जाएगी।
स्थानीय सामग्री से आशय उत्पाद के उस मूल्य के हिस्से से है जो घरेलू इनपुट और गतिविधियों से आता है। इस शर्त का उद्देश्य उत्पादन प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा भारत में लाना है, जिसमें कंटेनर बनाने में इस्तेमाल होने वाले पुर्जों और सामग्रियों की आपूर्ति भी शामिल है।
यह वृद्धि 20 प्रतिशत अंक की है। पहली सीमा के तहत पात्र सामग्री का अधिकतम 30% भारत के बाहर से आ सकता है; बाद की सीमा लागू होने पर यह हिस्सा घटकर 10% रह जाएगा।
विशेष इस्पात, कॉर्नर कास्टिंग, लकड़ी के फ्रेम और पेंट के आपूर्तिकर्ताओं समेत कई उद्योगों को इससे लाभ मिलने की उम्मीद है। कॉर्नर कास्टिंग कंटेनर के कोनों पर लगे मजबूत जोड़ होते हैं, जिनकी मदद से परिवहन के दौरान कंटेनर उठाए और सुरक्षित किए जाते हैं।
चरणबद्ध शर्त निर्माताओं को ऊंचा घरेलू सामग्री मानक पूरा करने से पहले उत्पादन स्थापित करने का शुरुआती समय देती है। इससे भारतीय आपूर्तिकर्ताओं का विकास भी कार्यक्रम के विनिर्माण लक्ष्य का हिस्सा बनता है।
निर्यात की महत्वाकांक्षा के लिए परीक्षण अहम
सरकार ने परीक्षण और प्रमाणन सहायता के लिए 150 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसमें गतिशील अनुदैर्ध्य आघात परीक्षण की साझा सुविधाएं भी शामिल हैं। इस तरह के परीक्षण में देखा जाता है कि किसी आघात के दौरान कंटेनर अपनी लंबाई की दिशा में लगने वाले बलों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।
बंदरगाहों और जहाजों, ट्रेनों तथा ट्रकों के बीच आवाजाही के दौरान कंटेनरों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। परीक्षण और प्रमाणन से निर्माता यह दिखा सकते हैं कि उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए जरूरी मानकों पर खरे उतरते हैं।
साझा सुविधाओं से निर्माताओं को परीक्षण ढांचे तक पहुंच मिलेगी और हर कंपनी को खुद सभी सुविधाएं स्थापित नहीं करनी पड़ेंगी। वैश्विक शिपिंग मानकों का पालन करना भी योजना के तहत परिचालन सहायता की एक शर्त है।
सरकार का घोषित लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण आधार विकसित करना और भारत को संभावित कंटेनर निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इस लक्ष्य के लिए शिपिंग मानकों को पूरा करना और लागत के मामले में प्रतिस्पर्धी होना, दोनों अहम हैं।
रोजगार और शिपिंग आपूर्ति सबसे बड़े दांव
सरकार का अनुमान है कि इस योजना से करीब 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे। अप्रत्यक्ष रोजगार का अनुमान प्रत्यक्ष रोजगार से 16 गुने से भी अधिक है, जो कंटेनर असेंबली संयंत्रों से बाहर अपेक्षित गतिविधियों को दर्शाता है।
प्रत्यक्ष रोजगार विनिर्माण कार्यों से जुड़े होंगे, जबकि व्यापक रोजगार लाभ संबंधित उद्योगों और आपूर्ति शृंखलाओं में मिलने की उम्मीद है। ये कार्यक्रम के विकास से जुड़े सरकारी अनुमान हैं, पहले से पैदा हो चुकी नौकरियों की संख्या नहीं।
निर्यातकों और शिपिंग कारोबार के लिए मजबूत घरेलू कंटेनर उद्योग अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति तंग होने पर उपकरणों का बड़ा स्थानीय स्रोत उपलब्ध करा सकता है। शिपिंग मार्गों में लंबे बदलाव के कारण कंटेनर को अगली खेप के लिए लौटने में अधिक समय लगता है, जिससे माल ढोने के लिए उपलब्ध कंटेनरों पर दबाव पड़ता है।
घरेलू विनिर्माण नए कंटेनरों की आपूर्ति का समाधान करता है। जहाजों और बंदरगाहों को फिर भी इन कंटेनरों को वहां पहुंचाना होगा जहां निर्यातकों को उनकी जरूरत है। कार्यक्रम की व्यावहारिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि फैक्ट्रियां उपयुक्त उपकरण ऐसे दामों पर बनाती हैं या नहीं जो खरीदारों को आकर्षित करें, साथ ही समुद्री परिवहन नेटवर्क का संचालन भी अहम होगा।
कार्यान्वयन की समयसीमा
यह योजना खर्च के लिए लंबी अवधि के साथ अलग-अलग परियोजनाओं और घरेलू खरीद के लिए पहले की समयसीमाएं तय करती है। निवेश की योजना बना रहे निर्माताओं को दोनों बातों का ध्यान रखना होगा।
- केंद्रीय बजट 2026-27: कंटेनर विनिर्माण योजना की घोषणा की गई।
- 28 अक्टूबर, 2026: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10,000 करोड़ रुपये के कार्यक्रम को मंजूरी दी।
- सैद्धांतिक मंजूरी के तीन साल के भीतर: सहायता प्राप्त विनिर्माण इकाइयों को चालू करना होगा।
- वित्त वर्ष 2031-32 तक: स्थानीय सामग्री की न्यूनतम अनिवार्यता 70% है।
- वित्त वर्ष 2032-33 से: स्थानीय सामग्री की न्यूनतम अनिवार्यता बढ़कर 90% हो जाएगी।
- वित्त वर्ष 2039-40: कार्यक्रम की घोषित अंतिम अवधि।
तत्काल काम मंजूरी को फैक्टरी निवेश, उत्पादन और बिक्री में बदलना है। योजना में ज्यादातर वित्तीय सहायता पात्र कंटेनरों के विनिर्माण और बिक्री से जुड़ी है, जबकि सस्ता वित्त, जमीन की रियायतें और साझा परीक्षण ढांचा इन गतिविधियों को समर्थन देंगे।
मुख्य बातें
- भारत ने वित्त वर्ष 2039-40 तक कंटेनर विनिर्माण सहायता के लिए 10,000 करोड़ रुपये मंजूर किए।
- वार्षिक क्षमता का लक्ष्य 7,50,000 टीईयू है, जबकि मौजूदा क्षमता करीब 75,000 टीईयू है।
- परिचालन सहायता के लिए 8,891 करोड़ रुपये हैं, जो बजट का लगभग 89% है।
- पात्र निवेश ऋणों पर सालाना 3% ब्याज सब्सिडी मिलेगी।
- वित्त वर्ष 2032-33 में स्थानीय सामग्री की अनिवार्यता 70% से बढ़कर 90% होगी।
- सरकार का अनुमान है कि करीब 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।






