16 अक्टूबर के जवाब में मतदाता जांच प्रक्रिया का खुलासा नहीं
भारतीय निर्वाचन आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापार रहस्य और बौद्धिक संपदा के संरक्षण का हवाला देते हुए उस सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण बताने से इनकार कर दिया, जिसका इस्तेमाल विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूचियों में त्रुटियां पहचानने के लिए किया गया।
विषय-सूची
- 16 अक्टूबर के जवाब में मतदाता जांच प्रक्रिया का खुलासा नहीं
- कार्यकर्ता क्या जानना चाहते थे
- जवाब रोकने के लिए तीन कानूनी आधार
- मतदाता रिकॉर्ड बदलने का कानूनी अधिकार किसके पास है?
- पश्चिम बंगाल के आरोपों से प्रक्रिया की जांच-पड़ताल
- दो आयुक्तों ने बार-बार दर्ज कीं आपत्तियां
- कांग्रेस ने ECINET पर सवाल उठाए, निलंबन की मांग की
- विवाद कैसे आगे बढ़ा
- पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपील की सलाह दी
- मुख्य बिंदु
तेलंगाना के करीमनगर के सामाजिक कार्यकर्ता एमए मुजीब अय्यूब को 16 अक्टूबर को दिए गए जवाब में आयोग ने उन लोगों का विवरण भी नहीं दिया, जो संभावित गड़बड़ियों के लिए चिह्नित रिकॉर्ड की समीक्षा करते हैं। स्वचालित जांच, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक मतदाताओं को गलत तरीके से चिह्नित होने से बचाने के उपायों से जुड़े सवालों को कानून के दायरे में आने वाली सूचना के बजाय स्पष्टीकरण मांगने वाले अनुरोध माना गया।
आयोग ने कहा कि पुनरीक्षण के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर विकसित या खरीदा नहीं गया। उसका कहना है कि मतदाताओं को शामिल करने या बाहर करने का फैसला निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर करते हैं।
यह इनकार ऐसे समय आया है जब इस प्रक्रिया की जांच-पड़ताल हो रही है। खबरों के मुताबिक, मतदाता सूचियों से 130 मिलियन नाम हटाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में अनियमित तरीके से नाम हटाए जाने के आरोप लगे हैं और दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज की हैं। कांग्रेस ने एसआईआर पर रोक लगाने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की है। आयोग का कहना है कि उसके फैसले कानून और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं।
कार्यकर्ता क्या जानना चाहते थे
अय्यूब के आवेदन में पूछा गया था कि मतदाता रिकॉर्ड आयोग की डिजिटल प्रणालियों से होकर किस तरह गुजरते हैं। उन्होंने सॉफ्टवेयर के नाम के अलावा, विसंगतियों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किए गए संस्करण, एप्लिकेशन या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मंच की जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या ये रिकॉर्ड को सत्यापन, सुधार या हटाने के लिए स्वचालित रूप से चिह्नित करते हैं।
उन्होंने यह भी पूछा कि रिकॉर्ड चिह्नित होने के बाद क्या होता है, वास्तविक मतदाताओं को गलतियों से बचाने के लिए क्या उपाय हैं और कार्रवाई से पहले विसंगति की समीक्षा या मंजूरी कौन-सा प्राधिकरण देता है।
आवेदन में उठाई गई चिंताओं में से एक, गलत सकारात्मक नतीजा, तब होता है जब कोई प्रणाली किसी वैध रिकॉर्ड को संभावित रूप से गलत बताती है। मतदाता के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या इस चेतावनी के बाद सावधानीपूर्वक जांच होती है, दस्तावेज मांगे जाते हैं या नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है।
अय्यूब ने अलग से पूछा था कि क्या किसी भी चरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, पूर्वानुमान विश्लेषण या निर्णयों में मदद करने वाले स्वचालित उपकरणों का इस्तेमाल हुआ। ऐसे उपकरण पैटर्न खोज सकते हैं या रिकॉर्ड को आगे की जांच के लिए सौंप सकते हैं। उनकी भूमिका अधिकारियों को जानकारी छांटने में मदद देने से लेकर, किन मामलों की जांच होगी इसे प्रभावित करने तक हो सकती है।
जवाब रोकने के लिए तीन कानूनी आधार
अलग-अलग सवालों के लिए आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों का सहारा लिया। सॉफ्टवेयर के नाम और संस्करण के बारे में उसने धारा 8(1)(d) का हवाला दिया। यह धारा व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापार रहस्य और बौद्धिक संपदा से जुड़ी उस सूचना को शामिल करती है, जिसका खुलासा किसी तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धी स्थिति को नुकसान पहुंचा सकता है।
ईसीआई ने जानकारी को इन संरक्षित श्रेणियों से जुड़ा बताया। उसके जवाब में यह भी कहा गया कि एसआईआर के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर विकसित या खरीदा नहीं गया, जिससे ध्यान पहले से इस्तेमाल हो रहे उपकरणों पर गया।
स्वचालित रूप से रिकॉर्ड चिह्नित करने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षा उपायों से जुड़े सवालों पर अलग जवाब दिया गया। आयोग ने कहा कि ये सवाल धारा 2(f) के तहत सूचना की परिभाषा से बाहर स्पष्टीकरण मांगते हैं। व्यावहारिक तौर पर उसने इन अनुरोधों को अय्यूब द्वारा मांगे गए कामकाज के विवरण के खुलासे के बजाय स्पष्टीकरण मांगने वाला माना।
चिह्नित विसंगतियों की समीक्षा करने वाले प्राधिकरण के बारे में आयोग ने धारा 8(1)(g) का हवाला दिया। यह छूट ऐसी सूचना पर लागू होती है, जिसका खुलासा किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है, या कानून प्रवर्तन अथवा सुरक्षा कार्य में मदद करने वाले गोपनीय स्रोत की पहचान उजागर कर सकता है।
इस तरह जवाब में कामकाज के कई विवरण नहीं दिए गए: सॉफ्टवेयर की पहचान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल हुआ या नहीं, चेतावनियों पर लागू सुरक्षा उपाय और रिकॉर्ड पर कार्रवाई से पहले की समीक्षा प्रक्रिया।
मतदाता रिकॉर्ड बदलने का कानूनी अधिकार किसके पास है?
किसी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की ईआरओ की जिम्मेदारी समझाते हुए ईसीआई ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B(1) और 13B(2) का उल्लेख किया।
आयोग ने बताया कि ये अधिकारी नाम शामिल करने या हटाने के फैसले किस आधार पर करते हैं:
तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर।
मतदाता सूची किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान के लिए पंजीकृत लोगों की आधिकारिक सूची होती है। इसमें संशोधन करने का मतलब है पात्र लोगों के नाम जोड़ना, प्रविष्टियों में सुधार करना और जहां नाम हटाने की कानूनी शर्तें पूरी हों वहां नाम हटाना। इस सूची में किसी व्यक्ति का नाम होना सीधे तौर पर उसके मतदान कर पाने की क्षमता से जुड़ा है।
आयोग के जवाब में उस अधिकारी की पहचान की गई है, जिसके पास कानूनन जिम्मेदारी है। अय्यूब के सवाल इससे पहले के चरणों से भी जुड़े हैं: किसी रिकॉर्ड पर ध्यान कैसे जाता है, अधिकारी तक कौन-से सबूत पहुंचते हैं और किसी फैसले से पहले कंप्यूटर की चेतावनी की जांच कौन करता है।
पश्चिम बंगाल के आरोपों से प्रक्रिया की जांच-पड़ताल
पश्चिम बंगाल में कथित तौर पर फॉर्म 7 के जरिए 538,000 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। ये आपत्तियां किसी व्यक्ति ने दर्ज नहीं की थीं और स्वचालित रूप से जारी अस्वीकृतियों में कोई कारण नहीं बताया गया था। मतदाता सूची की किसी प्रविष्टि पर आपत्ति दर्ज करने या नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए फॉर्म 7 का इस्तेमाल किया जाता है।
एक अन्य खबर के मुताबिक, निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियों में शामिल किए गए मतदाताओं के खिलाफ 1.6 मिलियन अपीलें दायर कीं। पश्चिम बंगाल की सूचियां अप्रैल में विधानसभा चुनावों के लिए स्थिर किए जाने के दौरान ये अपीलें तीन दिनों में दायर की गईं।
ये आंकड़े अलग-अलग कार्रवाइयों से संबंधित हैं: कथित तौर पर हटाए गए 538,000 नाम और नाम शामिल किए जाने के खिलाफ 1.6 मिलियन अपीलें। इन्हें जोड़कर हटाए गए मतदाताओं की कुल संख्या नहीं माना जा सकता।
आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी पश्चिम बंगाल में एसआईआर की कुछ समस्याओं को इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर नेटवर्क यानी ईआरओनेट पोर्टल से जोड़ा। इससे नामित प्रशासनिक प्रणाली का संचालन डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर व्यापक विवाद के साथ जुड़ जाता है।
प्रभावित मतदाताओं के लिए ठोस सवाल यह हैं कि क्या उन्हें प्रतिकूल फैसले का कारण बताया जाता है, क्या मूल आपत्ति का पता लगाया जा सकता है और क्या कोई अधिकारी उस रिकॉर्ड की जांच कर सकता है, जिसके आधार पर उनकी स्थिति बदली गई।
दो आयुक्तों ने बार-बार दर्ज कीं आपत्तियां
खबरों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम-से-कम 14 बार लिखित असहमति और आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां फैसलों और आदेशों से जुड़ी थीं, जिनमें ज्यादातर एसआईआर से संबंधित थे। इनमें कुछ ऐसे फैसले भी शामिल थे, जो कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना लिए गए।
दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन के समक्ष भी चिंताएं उठाईं। आरोप है कि केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी टीम ने चुनाव अधिकारियों की ईसीआई सॉफ्टवेयर तक पहुंच सीमित की। इससे एक और सवाल उठा: चुनावी फैसलों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को अपने काम में मदद करने वाली प्रणालियों तक कितनी पहुंच थी।
आयोग ने जवाब दिया कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। उसने कहा कि उसके डिजिटल मंच कड़े डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं और उसके आदेशों को पूरा कानूनी समर्थन प्राप्त है तथा वे स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।
यह विवाद चुनावी प्रशासन के दो पहलुओं को एक साथ लाता है: निर्वाचन क्षेत्र के अधिकारियों को सौंपी गई कानूनी जिम्मेदारी और केंद्रीय डिजिटल प्रणालियों के जरिए नियंत्रित पहुंच अनुमतियां। दोनों ही इस बात को प्रभावित करते हैं कि कोई अधिकारी मामले की जांच कैसे कर सकता है और उस पर कार्रवाई कैसे कर सकता है।
कांग्रेस ने ECINET पर सवाल उठाए, निलंबन की मांग की
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने ईसीआई पर मतदाता पंजीकरण और संबंधित सेवाओं के ऑनलाइन मंच ECINET के बारे में जानकारी छिपाने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि इस मंच का इस्तेमाल मतदाता सूचियों में हेरफेर को केंद्रीकृत करने के लिए किया गया।
रमेश ने यह सवाल भी उठाया कि उनके मुताबिक, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के खुलासों से यह जानकारी सामने क्यों आई कि कंपनी ने ECINET विकसित किया, जबकि आयोग को यह जानकारी पारदर्शी तरीके से खुद देनी चाहिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी पुनरीक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल हो रहा है और इस मुद्दे पर आयोग के रुख को चुनौती दी।
जानकारी साझा न किए जाने पर कांग्रेस की आपत्ति समझाते हुए रमेश ने कहा:
ECINET सॉफ्टवेयर और एआई के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता की कमी ने नागरिकों के बीच पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है।
रमेश ने कहा कि ECINET और आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ी आपत्तियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग तक पहुंची थीं। आयोग के कामकाज और पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने कुमार को हटाने और एसआईआर पर तत्काल रोक लगाने की मांग फिर दोहराई।
हेरफेर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल के आरोप कांग्रेस के दावे हैं। ईसीआई का घोषित रुख है कि उसके फैसले कानून के मुताबिक हैं, उसकी प्रक्रियाएं स्थापित हैं और उसके मंच कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हैं।
विवाद कैसे आगे बढ़ा
यह विवाद पुनरीक्षण प्रक्रिया, अंदरूनी आपत्तियों और बाद में सॉफ्टवेयर की जानकारी मांगने के आवेदन के दौरान बढ़ा है। प्रमुख तारीखें इस प्रकार हैं:
- जून 2025: एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई।
- नवंबर 2025 से अगस्त 2026: संधू और जोशी ने कथित तौर पर कम-से-कम 14 लिखित असहमतियां और आपत्तियां दर्ज कीं।
- 23 सितंबर: आयुक्तों की आपत्तियों का विवरण सार्वजनिक हुआ।
- 16 अक्टूबर: ईसीआई ने अय्यूब के आवेदन का जवाब दिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ा विवरण तथा मांगी गई अन्य जानकारी रोक ली।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को Association For Democratic Reforms & Ors. v. Election Commission of India & Ors. मामले में बिहार के एसआईआर की वैधता बरकरार रखी। यह प्रक्रिया आयोग के 24 जून 2025 के आदेश से शुरू हुई थी। अदालत के फैसले, 2026 INSC 564, में कहा गया:
विवादित एसआईआर प्रक्रिया न तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और 1960 के नियमों से सीधे टकराती है, न ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता से हटती है। इसके बजाय, यह संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ पढ़ी गई जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) से जुड़ी प्रक्रिया है, जिसे उस उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है, जिसकी रक्षा के लिए संविधान का भाग XV बनाया गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि प्रक्रिया आनुपातिकता की कसौटी पर खरी उतरी, नोटिस और सुनवाई से जुड़े सुरक्षा उपाय मूल रूप में बरकरार रहे और नाम हटाना 1960 के नियमों के नियम 21A का उल्लंघन नहीं था। उसने दस्तावेजी ढांचे को न तो मनमाना माना, न ही वैधानिक व्यवस्था के विपरीत। पहले से पंजीकरण होने पर वैधता की खंडनीय धारणा बनती है, लेकिन इससे विशेष गहन पुनरीक्षण पर रोक नहीं लगती।
नागरिकता के मामले में अदालत ने चुनावी पंजीकरण की पात्रता की सीमित जांच की अनुमति दी, लेकिन इसे नागरिकता के अंतिम निर्धारण से अलग रखा, जो नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण का अधिकार है। मतदाता सूची से बाहर होना अपने आप किसी व्यक्ति को नागरिकता से वंचित नहीं करता। अगर आयोग इस बात से संतुष्ट नहीं है कि कोई व्यक्ति नाम शामिल करने की वैधानिक शर्तें पूरी करता है, तो उसे उस व्यक्ति का मामला केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकरण के पास भेजना होगा। नागरिकता के आधार पर नाम हटाने का कोई भी फैसला उस प्राधिकरण के निर्णय के अधीन रहेगा।
अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि 2003 की सूची से नागरिकता के आधार पर हटाए गए लोगों के मामले चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को भेजे जाएं। प्राधिकरण को नोटिस देना और सुनवाई का अवसर देना होगा और जहां तक संभव हो, अगला संसदीय, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव, इनमें से जो पहले हो, उससे पहले फैसला करना होगा। जिन्हें नागरिक पाया जाए, उनके नाम सूची में बहाल किए जाने चाहिए। बिहार में रहने वाले वे लोग, जिनके नाम गलती से अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित या दोहराव वाला बताकर हटाए गए, न्यायिक समीक्षा के जरिए फैसले को चुनौती दे सकते हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपील की सलाह दी
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने अय्यूब को उचित प्राधिकरणों के समक्ष जवाब को चुनौती देने की सलाह दी। उन्होंने इसे कानूनी विवाद बताया और आयोग पर सवालों से बचने का आरोप लगाया।
रावत ने कहा:
यह कानूनी मामला है और आवेदक को उन सवालों के जवाब पाने के लिए सक्षम प्राधिकरणों के समक्ष अपील दायर करनी चाहिए, जिनसे ईसीआई बच रहा है।
अपील में आयोग के सूचना का अधिकार संबंधी फैसले की समीक्षा करने वाले प्राधिकरण के समक्ष जानकारी रोकने के कारण रखे जाएंगे। तात्कालिक मुद्दा सॉफ्टवेयर, सुरक्षा उपायों और समीक्षा की जिम्मेदारियों से जुड़े रिकॉर्ड तक पहुंच का है। इसके साथ ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के तरीके को लेकर अलग विवाद भी है।
मुख्य बिंदु
- ईसीआई ने 16 अक्टूबर के जवाब में एसआईआर सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण नहीं बताया और व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापार रहस्य तथा बौद्धिक संपदा का हवाला दिया।
- स्वचालित रूप से रिकॉर्ड चिह्नित करने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षा उपायों से जुड़े सवालों को स्पष्टीकरण के अनुरोध माना गया।
- आयोग का कहना है कि एसआईआर के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर विकसित या खरीदा नहीं गया और ईआरओ तथ्यों तथा रिकॉर्ड के आधार पर मतदाताओं को शामिल करने या बाहर करने का फैसला करते हैं।
- पश्चिम बंगाल में कथित अनियमितताओं और दो चुनाव आयुक्तों की बार-बार दर्ज आपत्तियों से डिजिटल प्रणालियों और अधिकारियों की पहुंच की जांच-पड़ताल बढ़ी है।
- कांग्रेस एसआईआर पर रोक और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग कर रही है। ईसीआई का कहना है कि उसकी कार्रवाइयां कानून के मुताबिक हैं।
- सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले ने बिहार के एसआईआर को बरकरार रखा और चुनावी पात्रता के लिए नागरिकता की सीमित जांच की अनुमति दी। नागरिकता का अंतिम निर्धारण नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण के लिए सुरक्षित रखा गया।
- पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने आवेदक को आरटीआई के जवाब के खिलाफ अपील करने की सलाह दी है।






