जिंदा दर्जी, गायब वोट और बढ़ता लंबित काम
दिल्ली के 53 वर्षीय दर्जी कामता प्रसाद चार लोगों के परिवार का खर्च चलाने के लिए रोज़ 250 रुपये कमाते हैं। अब वे काम के घंटों में सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, ताकि साबित कर सकें कि वे जिंदा हैं। उनके चुनावी रिकॉर्ड में उन्हें मृत दर्ज किया गया है। उनका नाम भी गलत तरीके से कांता प्रसाद लिखा गया है।
विषय-सूची
- जिंदा दर्जी, गायब वोट और बढ़ता लंबित काम
- कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए?
- सार्वजनिक जांच में गायब नामों के पीछे मिले निवासी
- जब घर में वे दस्तावेज़ न हों जिनकी अधिकारी मांग करते हैं
- तोड़फोड़ और पुनर्वास से पते की जांच मुश्किल
- फॉर्म 6 कानूनी विवाद क्यों बना
- चुनाव अधिकारियों ने उपाय बदलने का प्रस्ताव दिया
- नाम वापस जोड़ने की मुहिम और आवेदनों की लंबी कतार
- पश्चिम बंगाल में अपीलों का बोझ
- सड़कों और अदालतों तक पहुंचे विरोध प्रदर्शन
- आगे की तारीखें, जिनका मतदाताओं और अभियानकर्ताओं को सामना है
- मुख्य बातें
प्रसाद उन लाखों लोगों में शामिल हैं जिन्हें भारत के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान सूची से बाहर कर दिया गया। इस प्रक्रिया का मकसद मृत लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और स्थानांतरित हो चुके या अन्य कारणों से अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाना है। उनका कहना है कि उन्होंने पिछले विधानसभा और आम चुनावों में वोट दिया था और वे 35 वर्षों से मतदान कर रहे हैं।
प्रसाद ने बताया कि उन्हें नाम हटाए जाने का पता कैसे चला और उसे बहाल कराने के लिए वे क्या कर रहे हैं:
यह सुनकर मैं घबरा गया। तब से यह साबित करने के लिए हर जगह जा रहा हूं कि मैं जिंदा हूं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में करीब 13.3 करोड़ नाम हटाए गए। दिल्ली में 20 अक्टूबर, 2026 को आवेदन निपटारे के एक ब्योरे से पता चला कि नाम शामिल कराने के लिए आए करीब 4.5 लाख फॉर्म 6 आवेदनों में से 42 दिनों में सिर्फ 1,238 पर फैसला हुआ था, यानी लगभग 0.27%। निपटारे का अर्थ है कि किसी आवेदन पर फैसला हो चुका है; आवेदक उस मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं, जो तय करती है कि कौन वोट दे सकता है।
चुनाव आयोग का कहना है कि गलती से बाहर हुए पात्र लोग दावे, सहायक दस्तावेज़ और अपीलें जमा कर सकते हैं। आयोग ने अधिकारियों को बाहर किए गए मतदाताओं के मामलों की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया है। हालांकि, प्रसाद और अन्य लोगों के लिए सुधार की इस प्रक्रिया का मतलब है मजदूरी का नुकसान, बार-बार सुनवाई और यह अनिश्चितता कि उनके नाम कब वापस जुड़ेंगे।
कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए?
30 सितंबर को प्रकाशित चुनाव आयोग के आंकड़ों में देशभर के करीब 13.3 करोड़ हटाए गए नामों को तीन व्यापक श्रेणियों में बांटा गया: 9.5 करोड़ को अनुपस्थित, स्थानांतरित या अन्य श्रेणी में रखा गया; 2.7 करोड़ को मृत दर्ज किया गया; और 1.01 करोड़ को कई जगह पंजीकृत पाया गया। अनुपस्थित, स्थानांतरित या अन्य श्रेणी में 71% से अधिक हटाए गए नाम आते हैं।
दिल्ली की प्रारूप मतदाता सूची के सामने प्रशासनिक चुनौती खास तौर पर बड़ी है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक आवेदन के अनुसार, सूची से बाहर किए गए लोगों की संख्या 4,756,722 है, यानी पुनरीक्षण से पहले के कुल मतदाताओं का 32.78%। 31 अगस्त की प्रारूप सूची के एक अन्य ब्योरे में यह संख्या 42 लाख बताई गई है। ऊंचे आंकड़े का मतलब है कि दिल्ली के पहले से सूचीबद्ध मतदाताओं में करीब हर तीन में से एक का नाम हटा दिया गया।
दिल्ली के कुल आंकड़े में करीब 31.59 लाख लोगों को स्थायी रूप से स्थानांतरित बताया गया। इस श्रेणी के कारण पते में बदलाव को संभालना विवाद का केंद्रीय मुद्दा बन गया है: अधिकारियों को यह पता लगाना है कि लोग अब कहां रहते हैं, जबकि निवासियों को अपने मौजूदा घर के पते पर पंजीकरण कराने का व्यावहारिक रास्ता चाहिए।
नई दिल्ली जिला प्रशासन के एसआईआर 2026 पृष्ठ पर पुनरीक्षण कार्यक्रम के 15 जुलाई को जारी होने का उल्लेख है और दिल्ली के अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत तथा दोहरी प्रविष्टियों वाले लोगों की सूची की तारीख 31 अगस्त दी गई है। इस कार्यक्रम में 1 अक्टूबर, 2026 को अर्हता तिथि माना गया है। यह वह संदर्भ तिथि है जिसके आधार पर पात्रता तय की जाती है।
नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने नाम हटाए जाने का एक पहले का दौर भी बताया है: एसआईआर के दौरान नाम हटाने पर रोक लगने से पहले मासिक अपडेट के जरिये करीब 11 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें ज्यादातर जनवरी से जून 2026 के बीच थे। जनवरी 2025 की दिल्ली मतदाता सूची में 1.5 करोड़ से अधिक मतदाता थे। पहले हटाए गए नाम और बाद में प्रारूप सूची से बाहर किए गए नाम पुनरीक्षण प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हटाए गए।
सार्वजनिक जांच में गायब नामों के पीछे मिले निवासी
जन सरोकार के स्वयंसेवक राजेंद्र कुमार का कहना है कि प्रसाद के ब्लॉक के करीब 9,000 मतदाताओं में से लगभग 2,000 के नाम हटाए गए, यानी करीब 22%। उन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दूसरी जगह पंजीकृत बताया गया। कुमार के अनुसार, उस ब्लॉक में प्रसाद ही एकमात्र व्यक्ति थे जिन्हें गलती से मृत दर्ज किया गया था।
दिल्ली के ओखला निर्वाचन क्षेत्र के दो मतदान केंद्रों की सार्वजनिक जांच में कम से कम 100 मतदाताओं को गलती से अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाला बताया गया। स्वयंसेवकों ने सात दिनों में 258 घरों का दौरा किया। इसके बाद निवासी 18 अक्टूबर को बाटला हाउस में हुई सार्वजनिक सुनवाई में शामिल हुए, जिसका आयोजन जन सरोकार, मजदूर किसान शक्ति संगठन, वोटर अधिकार मंच और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन ने किया था।
एक अन्य सुनवाई में पूर्व न्यायाधीशों ए के पटनायक, रेखा शर्मा और अंजना प्रकाश की अध्यक्षता वाले स्वतंत्र आयोग ने दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और बिहार से आई शिकायतें सुनीं। लोकसभा के पूर्व सदस्य तरुण मंडल ने कहा कि परिवार द्वारा नामांकन प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद उनका नाम हटा दिया गया।
आयोग ने सार्वजनिक बैठकों में प्रारूप मतदाता सूचियां पढ़कर सुनाने का सुझाव दिया। इससे पड़ोसी मिलकर गायब निवासियों, गलत वर्गीकरण और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान कर सकेंगे और साथ ही व्यक्तिगत दावों की प्रक्रिया भी जारी रहेगी।
जब घर में वे दस्तावेज़ न हों जिनकी अधिकारी मांग करते हैं
निजी स्कूल के 38 वर्षीय शिक्षक कमल लाल का कहना है कि अधिकारियों ने उन्हें स्थानांतरित बताया, जबकि वे अब भी दिल्ली के एक फ्लाईओवर के नीचे दर्जनों परिवारों के साथ रहते हैं। सितंबर में नाम कटने का पता चलने के बाद उन्होंने चुनाव अधिकारियों से संपर्क किया, सुनवाई में हिस्सा लिया और बार-बार आवेदन दिए।
लाल ने बताया कि संपत्ति या उपयोगिता बिलों के रिकॉर्ड की मांग अनौपचारिक बस्तियों के निवासियों को कैसे प्रभावित करती है:
यह बहुत निराशाजनक है कि हम इस देश में वोट देते आए हैं और अब हमारे नाम इसलिए काट दिए गए हैं क्योंकि हमारे पास जमीन के कागजात या पानी का बिल नहीं है।
नागरिक समाज की एक सुनवाई में लाल ने कहा कि बेला एस्टेट के 729 मतदाताओं में से 728 के नाम हटा दिए गए। उन्होंने कहा कि उनके दादा 1913 में वहां आए थे और निवासियों ने नामांकन के 500 से अधिक फॉर्म जमा किए थे।
मयूर विहार की 58 वर्षीय घरेलू कामगार माया देवी ने बताया कि सूचियों के कारण उनका परिवार बंट गया है: उनका और उनकी दो बेटियों का नाम गायब था, जबकि उनके पति और बेटे का नाम सूची में बना रहा। उनका घर ढहाए जाने के बाद परिवार के पांच सदस्य मेट्रो स्टेशन के पास एक छोटे कमरे में रह रहे थे। उन्होंने कहा कि मदद के लिए जिस स्थानीय चुनाव अधिकारी से उन्होंने संपर्क किया, वह कभी नहीं आया।
39 वर्षीय ममता को डर है कि मतदाता रिकॉर्ड खोने से सब्सिडी वाले राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच भी प्रभावित हो सकती है। उनकी चिंता से पता चलता है कि मतदाता रिकॉर्ड परिवार की पहचान और निवास के इतिहास का दस्तावेज़ीकरण करने में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, खासकर तब जब अन्य कागजात कम हों।
तोड़फोड़ और पुनर्वास से पते की जांच मुश्किल
दिल्ली की नाम हटाने वाली सूचियों के विश्लेषण में तोड़फोड़ से प्रभावित इलाकों के नौ मतदान केंद्रों की पहचान की गई, जहां 10,015 मतदाताओं में से 8,800 के नाम हटा दिए गए थे, यानी करीब 88%। पूरी राजधानी में ऐसे 639 मतदान केंद्र पाए गए जहां आधे से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए थे।
इसी विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली के 14,947 मतदान केंद्रों में से केवल 51 पर हटाए गए नामों की दर चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों में बताए गए 2% के मानदंड के भीतर रही। इससे अधिक नाम हटाए जाने पर मतदाता पंजीकरण अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से दोबारा जांच करनी होती है। यही अधिकारी स्थानीय मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने के लिए जिम्मेदार होता है।
वजीरपुर में, सरकारी आवास में पुनर्वास के बाद 991 निवासियों के नाम हटा दिए गए, जिनमें ज्यादातर को अनुपस्थित या पता न चलने वाला बताया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 जनवरी, 2025 को परिवारों को फ्लैटों की चाबियां दी थीं; उनके पुराने जेलरवाला बाग बस्ती को उसी साल जून में ढहा दिया गया।
पटपड़गंज में जुलाई 2024 की तोड़फोड़ के बाद पंजीकृत 1,199 मतदाताओं में से 1,057 के नाम हटा दिए गए, हालांकि कई परिवार लौटकर फिर से बस गए थे। मतदान केंद्र अधिकारी सोविंद्र कुमार गौतम ने कहा कि अधिकारी कई निवासियों को 2002 की मतदाता सूची से जोड़ नहीं सके। जून 2025 में ढहाए गए जंगपुरा के पुराने मद्रासी कैंप में 1,093 मतदाताओं में से 934 के नाम हटा दिए गए।
मद्रासी कैंप से विस्थापित कुछ परिवारों को दिल्ली स्लम एंड झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2015 के तहत नरेला में फ्लैट मिले; बाकी लोगों ने दूसरी जगह कमरे किराये पर लिए। उनके मामलों में दो व्यावहारिक काम जुड़े हैं: नया पता दर्ज करना और पुराने पते से जुड़े चुनावी इतिहास को सुरक्षित रखना।
फॉर्म 6 कानूनी विवाद क्यों बना
फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने में होता है, खासतौर पर नए मतदाताओं के लिए। इसमें घोषणा करनी होती है कि आवेदक पहली बार नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा है। पहले से पंजीकृत मतदाताओं को इसका इस्तेमाल करने के लिए कहे जाने पर उनका कहना है कि यह शब्दावली उनके मतदान के इतिहास से मेल नहीं खाती।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 में ऐसे लिखित बयान के लिए एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है, जिसके बारे में व्यक्ति जानता हो या मानता हो कि वह गलत है, अथवा जिसे वह सच न मानता हो। याचिकाकर्ताओं ने इस आवश्यकता को चुनौती देते हुए इस प्रावधान का हवाला दिया है। इसके विपरीत, फॉर्म 8 का इस्तेमाल मौजूदा मतदाता का पता बदलने या किसी प्रविष्टि में सुधार करने के लिए होता है।
14 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश दिनेश मेहता और अदिति चौधरी ने नीलोत्पल दत्ता और एक अन्य मतदाता की याचिका का निपटारा किया। वे स्थानांतरित हो गए थे और गणना प्रक्रिया से चूक गए थे। अदालत ने चुनाव आयोग के वकील की दलील स्वीकार की कि वे मतदाता पंजीकरण अधिकारी की मदद से फॉर्म 6 भरकर आवेदन कर सकते हैं और झूठी घोषणा के आरोप का उनका डर खारिज कर दिया।
गोवा में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी सांता क्रूज़ निर्वाचन क्षेत्र के भीतर स्थानांतरित हुए परिवार के पांच सदस्यों के मामले में फॉर्म 8 के बजाय फॉर्म 6 के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक आवेदन फॉर्म 6 की आवश्यकता और एसआईआर की उस अतिरिक्त घोषणा, जिसमें आवेदकों या उनके रिश्तेदारों के पहले के पंजीकरण का ब्योरा मांगा गया है, दोनों को चुनौती देता है।
चुनाव अधिकारियों ने उपाय बदलने का प्रस्ताव दिया
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फॉर्म 6 के शीर्षक से “नए मतदाता” शब्द हटाने और पहले से नामांकित आवेदकों के लिए एक वैकल्पिक घोषणा जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। इस प्रस्ताव के तहत लोग अपने पुराने मतदाता फोटो पहचान पत्र का नंबर भी दे सकेंगे, जिससे अधिकारी उनकी पुरानी प्रविष्टि खोज सकें।
वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए केंद्र सरकार को निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन करना होगा। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने हटाए गए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 के इस्तेमाल को चुनौती दी है, जबकि कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने लोगों के नाम हटाने और फिर उन्हें वापस जोड़ने की प्रक्रिया पर होने वाले खर्च की आलोचना की है।
गोवा में चुनावी सॉफ्टवेयर के भीतर एक और बाधा सामने आई। हटाए गए 97 मतदाताओं ने दस्तावेज़ पेश किए और स्थानीय पंजीकरण अधिकारियों ने उन्हें पात्र पाया, लेकिन ईसीआईनेट में उनके नाम फिर से जोड़ने का कोई विकल्प नहीं था। वे अंतिम सूची से बाहर रहे और उन्हें फॉर्म 6 के जरिये दोबारा आवेदन करने को कहा गया।
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने भी नियमों में संशोधन किए बिना ऑनलाइन फॉर्म में किए गए बदलावों पर आपत्ति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने 5, 12 और 14 अक्टूबर को संशोधित फॉर्म पर चर्चा की। दिल्ली एसआईआर की सुनवाई 30 अक्टूबर से पहले करके 28 अक्टूबर को तय की गई।
नाम वापस जोड़ने की मुहिम और आवेदनों की लंबी कतार
चुनाव आयोग ने 29 सितंबर को उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष नामांकन अभियान का आदेश दिया जहां पुनरीक्षण पूरा हो चुका था। इसके व्यापक निर्देशों में उन जगहों के अधिकारियों से, जहां एसआईआर पूरा हो चुका है या जारी है, पुरानी और मौजूदा सूचियों का मिलान करने, बाहर किए गए निवासियों की पहचान करने और उनके घर जाने को कहा गया है।
मतदान केंद्र अधिकारियों को हर हफ्ते कम से कम 20 से 25 मतदाताओं से संपर्क करने और करीब एक महीने में यह काम पूरा करने की सलाह दी गई। उन्हें निवासियों की मौजूदा स्थिति दर्ज करनी है, पात्र लोगों को फॉर्म 6 जमा करने में मदद करनी है और अपने निष्कर्ष पंजीकरण अधिकारियों तथा मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ साझा करने हैं। रैन बसेरों, मजदूर बस्तियों, बेघर लोगों और अन्य हाशिये पर रह रहे निवासियों के लिए शिविर लगाने का प्रस्ताव है।
दिल्ली में आवेदनों के आंकड़े कतार का पैमाना दिखाते हैं। प्रारूप सूची जारी होने के बाद करीब 2.39 लाख आवेदन उन लोगों से आए जो दोबारा नाम जुड़वाना चाहते थे या पहली बार पंजीकरण करा रहे थे। ये आवेदन करीब 4.5 लाख फॉर्म 6 अनुरोधों का हिस्सा थे, जिनमें से 42 दिनों में 1,238 पर फैसला हुआ था।
बाद के एक अपडेट में कहा गया कि प्रक्रिया आसान किए जाने के बाद नोटिस पाने वाले दिल्ली के करीब 33 लाख मतदाताओं में से 60% से अधिक का सत्यापन हो चुका था। मतदान केंद्र अधिकारी घरों से दस्तावेज़ ले सकते थे और वर्तनी की छोटी-मोटी गलतियां सुधार सकते थे। 19 लाख से अधिक नोटिस तार्किक विसंगतियों से जुड़े थे, जैसे नाम या उम्र का मेल न खाना, जबकि करीब 14 लाख ऐसे रिकॉर्डों से संबंधित थे जिन्हें 2002 के पुनरीक्षण से जोड़ा नहीं जा सका।
पश्चिम बंगाल में अपीलों का बोझ
पश्चिम बंगाल की अपीलीय व्यवस्था नाम हटाए जाने के बाद होने वाले काम का एक और पैमाना दिखाती है। तार्किक विसंगतियों को लेकर करीब 60 लाख मतदाताओं की न्यायिक जांच हुई और न्यायिक अधिकारियों ने 27.16 लाख नाम हटा दिए। रिट याचिका (सिविल) 1089/2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गठित 19 अपीलीय अधिकरणों की सभी सुनवाइयां कोलकाता में हो रही थीं, जिससे कुछ निवासियों को सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ी।
अपीलों के विस्तृत आंकड़ों में 38.1 लाख आवेदन दर्ज हुए और 82,782 पर फैसला हुआ, यानी कुल का करीब 2.2%। जिन मामलों पर फैसला हुआ, उनमें 75,443 लोगों के नाम बहाल किए गए और 7,339 अपीलें खारिज की गईं। मालदा में 6.85 लाख अपीलों में से 1,027 पर फैसला हुआ था, करीब 0.15%। एक अन्य समेकित ब्योरे में फैसलों की संख्या एक लाख से अधिक बताई गई।
13 अप्रैल से 10 सितंबर के बीच दर्ज नाम शामिल कराने की 6,444 खारिज अपीलों की जांच में अनुमान लगाया गया कि 80.2% अपीलें मुस्लिम नाम वाले मतदाताओं की थीं। रिकॉर्ड में नाम थे, आधिकारिक धार्मिक पहचान नहीं; और सभी अपीलकर्ताओं की धार्मिक संरचना के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। खारिज की गई अपीलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 52.7% थी।
अधिकरण उन मतदाताओं के खिलाफ चुनाव आयोग की अपीलें भी सुनते हैं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने पात्र माना था। न्यायमूर्ति इंद्रजीत चटर्जी ने कहा कि मुर्शिदाबाद की 10 सीटों से उनके अधिकरण के समक्ष नाम शामिल किए जाने के खिलाफ आई सभी 2.54 लाख अपीलें अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से थीं। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि अपील में सफल रहने वालों को भविष्य के चुनावों के लिए सूची में शामिल किया जाएगा।
सड़कों और अदालतों तक पहुंचे विरोध प्रदर्शन
विपक्षी दलों और युवा संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने पुनरीक्षण प्रक्रिया को भारतीय जनता पार्टी के लाभ के लिए ढाला है। आयोग और भाजपा ने इस आरोप से इनकार किया है। प्रदर्शनकारियों ने कुमार के इस्तीफे की मांग की है, जबकि दिल्ली और अन्य जगहों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।
परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन से उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने अब मतदाता अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया है। संस्थापक अभिजीत दिपके ने दिवाली तक नए प्रदर्शनों पर रोक लगाने की घोषणा की और समर्थकों से परिवार के साथ समय बिताने को कहा। संगठन तिहाड़ जेल में बंद सौरभ दास और आशुतोष रांका की रिहाई की मांग करता रहा।
13 अक्टूबर को जंतर मंतर पर अवरोधक पार करने के बाद हिरासत में लिए गए 14 लोगों में दास और रांका भी शामिल थे। एक विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने सार्वजनिक शांति के लिए लगातार बने खतरे का हवाला देते हुए उनकी हिरासत बढ़ा दी। उनके संगठन ने 19 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत इस अवधि-विस्तार को चुनौती दी। यह अनुच्छेद व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। संगठन ने तत्काल रिहाई की मांग भी की।
16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में हुए प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। दिपके और छात्र नेता नेहा बोरा को पहले ही हिरासत में ले लिया गया था और अगले दिन छोड़ दिया गया। पुलिस ने पाबंदियों, अनुमति न होने और सार्वजनिक सुरक्षा का हवाला दिया; प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे राष्ट्रीय झंडों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की याचिकाओं पर चुनाव अधिकारियों से जवाब मांगा है, जंतर मंतर को अनुमत विरोध-स्थलों की सूची से हटाए जाने की जांच करने पर सहमति दी है और पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों के बाद सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। अमेरिकी प्रतिनिधि प्रमिला जयपाल ने भी 14 अक्टूबर को चिंता जताई और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया।
आगे की तारीखें, जिनका मतदाताओं और अभियानकर्ताओं को सामना है
अधिकारियों ने प्रसाद को आश्वासन दिया है कि उनका नाम बहाल कर दिया जाएगा, लेकिन कोई समयसीमा नहीं दी गई है। नजदीक आती सुनवाइयों और नामांकन की समयसीमाओं के कारण सुधार की प्रक्रिया की गति उन निवासियों के लिए अहम हो गई है जो अब भी इंतजार कर रहे हैं।
- 21 अक्टूबर: दास और रांका को मजिस्ट्रेट के सामने फिर पेश होना था।
- 26 अक्टूबर: महाराष्ट्र में दावों और आपत्तियों की अवधि समाप्त होगी।
- 28 अक्टूबर: सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली एसआईआर मामले की सुनवाई तय है।
- 29 अक्टूबर: नोटिस पाने वाले दिल्ली के मतदाताओं के लिए पात्रता साबित करने की समयसीमा तय की गई।
- 16 नवंबर: महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होनी है।
- 4 दिसंबर: दिल्ली की अंतिम एसआईआर सूची प्रकाशित होनी है।
प्रसाद का तत्काल लक्ष्य अपने परिवार का खर्च चलाते हुए रिकॉर्ड में सही प्रविष्टि बहाल कराना है। चुनाव कार्यालयों के सामने बाहर किए गए निवासियों के मामलों की दोबारा जांच, आवेदनों का निपटारा और अंतिम सूचियां प्रकाशित होने से पहले पते तथा पहचान से जुड़े सवालों को हल करने का काम है।
मुख्य बातें
- एसआईआर के दौरान देशभर में करीब 13.3 करोड़ नाम हटाए गए हैं; इनमें 71% से अधिक को अनुपस्थित, स्थानांतरित या अन्य श्रेणी में रखा गया है।
- सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक आवेदन के अनुसार, दिल्ली की प्रारूप सूची से 4,756,722 मतदाताओं के नाम हटाए गए, यानी पहले के कुल मतदाताओं का करीब एक तिहाई।
- सार्वजनिक जांच और निवासियों की गवाही से पता चलता है कि जीवित और पात्र लोगों को मृत या स्थानांतरित दर्ज किया गया।
- दिल्ली में करीब 4.5 लाख फॉर्म 6 आवेदनों में से सिर्फ 1,238 पर 42 दिनों में फैसला हुआ था।
- दिल्ली हाई कोर्ट ने दो याचिकाकर्ताओं के लिए फॉर्म 6 को नाम वापस जुड़वाने का रास्ता माना; व्यापक चुनौतियां सुप्रीम कोर्ट में जारी हैं।
- महाराष्ट्र के चुनाव अधिकारियों ने पहले से पंजीकृत मतदाताओं को मान्यता देने के लिए फॉर्म में बदलाव का प्रस्ताव दिया है।
- नई सत्यापन प्रक्रिया, नामांकन शिविर और नजदीक आती अदालती सुनवाइयां सुधार प्रक्रिया की दिशा तय करेंगी।






