धनशोधन के एक बड़े मामले पर निजी बातचीत
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने कहा है कि तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने उनसे उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान "बीच का रास्ता" अपनाने का आग्रह किया था, जिनमें धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत व्यापक शक्तियों को बरकरार रखने वाले फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी। कौल ने यह भी कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में देरी से जुड़ा एक मामला उनकी पीठ से तब हटा दिया गया, जब वे केंद्र सरकार पर लंबित सिफारिशों पर कार्रवाई करने का दबाव बना रहे थे।
विषय-सूची
- धनशोधन के एक बड़े मामले पर निजी बातचीत
- कौल के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के कक्ष में क्या हुआ
- 2022 का फैसला क्यों अहम है
- फैसले पर पुनर्विचार के दो रास्ते
- कार्यवाही अलग-अलग पीठों तक कैसे पहुंची
- नियुक्तियों का मामला कौल की पीठ से हटाया गया
- पांच नामों पर सहमति, छठे पर विवाद
- उम्मीदवार की जाति और दृढ़ता पर मतभेद
- नियुक्ति व्यवस्था तक पहुंची कौल की आलोचना
- प्रमुख बातें
कौल ने पत्रकार करण थापर को दिए एक साक्षात्कार में इन घटनाओं का ज़िक्र किया। साक्षात्कार में उनकी संस्मरण-पुस्तक, Without Fear or Favour, पर चर्चा हुई। उनका विवरण सुप्रीम कोर्ट के कामकाज के दो संवेदनशील क्षेत्रों को जोड़ता है: सरकारी जांच शक्तियों को चुनौती देने वाले मामलों पर फैसला करना और न्यायाधीशों की नियुक्तियों का प्रबंधन।
PMLA विवाद 27 जुलाई, 2022 को विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ मामले में दिए गए अदालत के फैसले से जुड़ा है। उस फैसले में गिरफ्तारी, तलाशी, ज़ब्ती, संपत्ति कुर्की, सबूत के भार और ज़मानत की कड़ी शर्तों से जुड़े प्रावधानों को बरकरार रखा गया था। इन प्रावधानों पर पुनर्विचार से धनशोधन की जांच का सामना कर रहे लोगों के लिए अपने मामलों की जानकारी हासिल करने और हिरासत से रिहाई मांगने के तरीके प्रभावित हो सकते हैं।
न्यायिक नियुक्तियों पर संस्मरण की आलोचना से जुड़े ब्योरे पर प्रतिक्रिया देते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी है और विस्तार से जवाब देने से पहले उन्हें संबंधित अंशों को संदर्भ सहित समझना होगा। उन्होंने कौल के साथ अपने कॉलेजियम संबंधों को सम्मानजनक बताया और कहा कि उन्हें याद नहीं कि कौल किसी बैठक से बाहर चले गए हों।
नियुक्तियों के मामले को लेकर दबाव के बारे में कौल के बयान की एक स्पष्ट सीमा है: उन्होंने कहा कि वे यह नहीं बता सकते कि सरकार ने मामला उनकी पीठ से हटवाया था या नहीं।
कौल के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के कक्ष में क्या हुआ
कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया था। उस समय कौल की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ को PMLA पर पुनर्विचार की याचिकाओं पर सुनवाई करनी थी। कौल के मुताबिक, उस पीठ के एक अन्य सदस्य न्यायमूर्ति संजीव खन्ना भी मौजूद थे।
कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ ने उन्हें सुनवाई आगे न बढ़ाने के लिए मनाने की कोशिश की और सुझाव दिया कि अगर वे आगे बढ़ें तो सावधानी बरतें और बीच का रास्ता अपनाएं। कौल को याद है कि उन्होंने जवाब दिया था कि उन्होंने अपने न्यायिक करियर में कभी ऐसा रुख नहीं अपनाया और जब भी उन्हें लगा कि किसी मामले की सुनवाई उचित है, उन्होंने ऐसा किया।
कौल ने कहा कि उस चरण में पीछे हटने से उनकी ईमानदारी पर सवाल उठते। इसके बाद वे और खन्ना अदालत कक्ष गए और मामले की सुनवाई की। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि केंद्र सरकार ने बार-बार स्थगन मांगा, क्योंकि वह चाहती थी कि दिसंबर 2023 में उनकी सेवानिवृत्ति तक कार्यवाही टल जाए।
यह मतभेद उस बातचीत से पहले ही शुरू हो गया था। कौल ने कहा कि एक सहकर्मी ने उन्हें बताया कि याचिकाएं किसी दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुई थीं। जब उन्होंने इस बारे में चंद्रचूड़ से बात की, तो मुख्य न्यायाधीश ने समझाया कि एक न्यायाधीश ने संबंधित मामलों को अपनी पीठ के समक्ष एक साथ सूचीबद्ध करने का आदेश दिया था।
कौल ने आपत्ति जताई कि मुख्य न्यायाधीश की सहमति के बिना ऐसा स्थानांतरण नहीं हो सकता था। उन्होंने कहा कि उन्होंने चंद्रचूड़ से कहा कि अगर उन्हें मामले नहीं सुनने देने का इरादा था, तो यह बात सीधे बता दी जाए। इसके बाद चंद्रचूड़ ने कौल, खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की पीठ गठित की। कौल के सेवानिवृत्त होने से पहले सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
2022 का फैसला क्यों अहम है
PMLA के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) को धनशोधन की जांच का अधिकार है। मोटे तौर पर, धनशोधन अपराध से हासिल रकम को इस तरह इस्तेमाल करने की प्रक्रिया है कि वह वैध दिखाई दे। जांच के दौरान इसकी शक्तियां किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और संपत्ति पर उसके नियंत्रण, दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।
2022 का फैसला न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सी.टी. रविकुमार ने सुनाया था। इसमें धारा 5, 8(4), 15, 17 और 19 समेत चुनौती दिए गए प्रावधानों को बरकरार रखा गया। ये प्रावधान संपत्ति कुर्की, कब्ज़े, समन, तलाशी, ज़ब्ती और गिरफ्तारी से जुड़ी शक्तियों के दायरे में आते हैं।
धारा 24 सबूत के भार से संबंधित है। कुछ निर्धारित परिस्थितियों में कानून कार्यवाही का सामना कर रहे व्यक्ति पर अपराध से हासिल रकम के बारे में एक अनुमान का खंडन करने का भार डालता है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आपराधिक कार्यवाही आम तौर पर अभियोजन पक्ष के अपने मामले को साबित करने की ज़िम्मेदारी से शुरू होती है।
धारा 45 ज़मानत के लिए दो कड़ी शर्तें लगाती है। मोटे तौर पर, जब लोक अभियोजक रिहाई का विरोध करता है, तो अदालत को यह मानने के उचित आधार होने चाहिए कि आरोपी दोषी नहीं है और ज़मानत पर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है। इन शर्तों के कारण सामान्य ज़मानत नियमों की तुलना में रिहाई हासिल करना अधिक कठिन हो जाता है।
अदालत ने निकेश ताराचंद शाह मामले में इन दोहरी शर्तों के पुराने संस्करण को रद्द कर दिया था। संसद ने 2018 में प्रावधान में संशोधन किया और 2022 के फैसले में संशोधित व्यवस्था को बरकरार रखा गया। इसलिए पुनर्विचार से जुड़ी कार्यवाही उन नियमों से संबंधित है जिनका गिरफ्तारी, हिरासत और संपत्ति पर पाबंदियों का सामना कर रहे लोगों पर तत्काल असर पड़ता है।
फैसले पर पुनर्विचार के दो रास्ते
2022 के फैसले के खिलाफ आठ पुनर्विलोकन याचिकाएं दायर की गईं। इन कार्यवाहियों की पहचान कार्ति पी. चिदंबरम बनाम प्रवर्तन निदेशालय, RP(Crl) 219/2022 और इससे जुड़ी याचिकाओं के रूप में है।
पुनर्विलोकन में सुप्रीम कोर्ट से सीमित कानूनी दायरे में अपने ही फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया जाता है। व्यापक याचिकाओं में विजय मदनलाल चौधरी फैसले पर पुनर्विचार और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी की गई थी। कौल का विवरण व्यापक पुनर्विचार कार्यवाही से जुड़ा है, जबकि आठ पुनर्विलोकन याचिकाएं अलग प्रक्रिया से आगे बढ़ीं।
25 अगस्त, 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने पुनर्विलोकन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने आगे विचार के लिए दो मुद्दे चिन्हित किए: प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) तक पहुंच और निर्दोषिता की धारणा को उलटना।
ECIR ED का आंतरिक दस्तावेज़ है, जिसमें धनशोधन का मामला दर्ज होता है। आरोपी के लिए इसकी जानकारी अहम है, क्योंकि इससे उसे जांच का आधार समझने में मदद मिल सकती है। निर्दोषिता की धारणा का मतलब है कि आपराधिक कार्यवाही की शुरुआत किसी व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में मानकर होती है जिसका दोष साबित किया जाना है, न कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसे पहले से अपनी निर्दोषिता साबित करनी हो।
अदालत ने पुनर्विलोकन याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दी। बाद की एक सुनवाई में न्यायमूर्ति रविकुमार ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रक्रिया "छिपी हुई अपील" बन जाएगी। पुनर्विलोकन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उन्हें फैसले में बताई गई त्रुटियों को समझाने का अवसर मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि पुनर्विलोकन के कानूनी मुद्दों के दायरे में दोनों पक्षों को दलीलें रखने का समय दिया जाएगा।
कार्यवाही अलग-अलग पीठों तक कैसे पहुंची
स्थगन और पीठ के सदस्यों में बदलाव के बीच मुकदमा आगे बढ़ता रहा। 2024 की एक सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पुनर्विलोकन का मामला पिछली रात 9 बजे के बाद सूचीबद्ध किया गया था और ED को तैयारी के लिए समय चाहिए। पीठ ने सुनवाई 28 अगस्त, 2024 तक स्थगित कर दी।
उस विशेष पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, रविकुमार और उज्जल भुइयां थे। बाद में पुनर्विलोकन याचिकाएं न्यायमूर्ति सूर्यकांत, एन. कोटिश्वर सिंह और भुइयां की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुईं, क्योंकि रविकुमार की सेवानिवृत्ति के बाद पीठ का पुनर्गठन करना पड़ा। सुनवाई 7 मई को दोपहर 2 बजे के लिए सूचीबद्ध थी; यहां उस सुनवाई का नतीजा स्थापित नहीं है।
मुख्य चरणों से पता चलता है कि मूल फैसला, पुनर्विलोकन याचिकाएं और व्यापक चुनौतियां किस तरह आगे बढ़ीं:
- 27 जुलाई, 2022: सुप्रीम कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में PMLA के प्रमुख प्रावधानों को बरकरार रखा।
- 25 अगस्त, 2022: मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने पुनर्विलोकन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और ECIR तक पहुंच तथा निर्दोषिता की धारणा पर चर्चा की।
- दिसंबर 2023 से पहले: कौल ने व्यापक पुनर्विचार कार्यवाही की अध्यक्षता की, जो उनकी सेवानिवृत्ति से पहले पूरी नहीं हुई।
- अगस्त 2024: ED के तैयारी के लिए समय मांगने के बाद पुनर्विलोकन याचिकाओं की सुनवाई 28 अगस्त तक स्थगित कर दी गई।
- बाद में 7 मई की सुनवाई: न्यायमूर्ति रविकुमार की सेवानिवृत्ति के बाद गठित नई पीठ में न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे।
न्यायमूर्ति खन्ना, एम.एम. सुंदरेश और त्रिवेदी की एक अन्य पीठ भी पुनर्विचार और बड़ी पीठ को भेजने की मांग वाली व्यापक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। कार्यवाही के दोनों समूहों को अलग-अलग समझने से स्पष्ट होता है कि मामले के इतिहास में न्यायाधीशों के अलग-अलग समूहों के नाम क्यों आते हैं।
नियुक्तियों का मामला कौल की पीठ से हटाया गया
कौल का दूसरा बड़ा आरोप न्यायिक नियुक्तियों में देरी को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं से जुड़ा है। उन्होंने और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने कॉलेजियम की सिफारिशों पर कार्रवाई करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया था और उस रवैये की आलोचना की थी जिसे उन्होंने "चुनिंदा तौर पर मंज़ूरी देने" का तरीका बताया।
कॉलेजियम वरिष्ठ न्यायाधीशों का वह समूह है जो उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों की सिफारिश करता है। सरकार इन सिफारिशों पर प्रक्रिया आगे बढ़ाती है और नियुक्ति प्रक्रिया में उसकी भूमिका होती है, जिसका अंत राष्ट्रपति के वारंट से होता है। देरी के कारण सिफारिशें लंबित रह सकती हैं और न्यायिक पद खाली रह सकते हैं।
कौल ने कहा कि मामला अचानक उनकी पीठ की कॉज़ लिस्ट से हटा दिया गया। कॉज़ लिस्ट वह कार्यक्रम है जिसमें बताया जाता है कि न्यायाधीश किन मामलों की सुनवाई करेंगे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक रजिस्ट्रार ने उन्हें बताया कि फाइल पर लिखे एक नोट से संकेत मिलता है कि दो साल पहले मामला उन्हें सौंपे जाने के समय मुख्य न्यायाधीश की औपचारिक अनुमति शायद नहीं ली गई थी। मामला वापस लेने के लिए यही वजह बताई गई।
कौल ने कहा कि उन्होंने चंद्रचूड़ के सामने अपनी शिकायत रखी। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके संस्मरण में यह संकेत है कि मुख्य न्यायाधीश दबाव में थे, तो उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ ने शायद सोचा होगा कि उन्हें यह मामला आगे नहीं संभालना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार ने मुख्य न्यायाधीश को मामला हटाने के लिए प्रेरित किया था, कौल ने कहा कि इस बारे में कुछ कहना उनके लिए मुश्किल है।
पांच नामों पर सहमति, छठे पर विवाद
कौल ने प्रस्तावित नियुक्ति सूची को लेकर कॉलेजियम के भीतर मतभेद का भी ज़िक्र किया। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की छह रिक्तियां भरने के लिए सदस्य पांच नामों पर सहमत थे, तभी चंद्रचूड़ ने आखिरी समय में छठे उम्मीदवार का नाम प्रस्तावित किया। कौल और अन्य सदस्यों ने इस नाम को स्वीकार नहीं किया।
कौल ने कहा कि बैठक के दौरान चंद्रचूड़ उन्हें एक ओर ले गए और पूछा कि क्या उन्हें सरकार के विचार जानने के लिए फोन करना चाहिए। कौल ने आपत्ति जताई कि कॉलेजियम में विचार-विमर्श जारी रहने के दौरान ऐसा नहीं होना चाहिए। उनके संस्मरण के अनुसार, पांच सहमत नाम आगे बढ़े; छठा नहीं।
कौल ने संदेह जताया कि चंद्रचूड़ ने शायद नामों के लिए सरकार से किसी तरह की मंज़ूरी पहले ही ले ली थी। उन्होंने इसे अपनी आशंका के रूप में पेश किया। उनकी व्यापक आपत्ति इस बात पर थी कि न्यायाधीशों द्वारा औपचारिक रूप से सिफारिश के नाम तय करने से पहले पूरी सूची पर सरकार से चर्चा की जाए।
साक्षात्कार में अपनी स्थिति समझाते हुए कौल ने कहा कि परामर्श का समय और तरीका अहम था:
"मुझे नहीं लगता कि चर्चा की अवधारणा गलत है, लेकिन यह किस चरण में और किस तरीके से होती है, समस्या वहां है," उन्होंने कहा।
कौल ने चेतावनी दी कि अपेक्षाकृत लंबा कार्यकाल पाने वाला मुख्य न्यायाधीश ऐसी परंपरा कायम कर सकता है जिसका विरोध करना कम अवधि वाले कार्यकाल के उत्तराधिकारियों के लिए मुश्किल हो। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ के कार्यकाल से पहले और बाद में भी पहले से चर्चा हुई थी, इसलिए उनकी आलोचना सिर्फ उनके निजी मतभेद तक सीमित नहीं थी।
उम्मीदवार की जाति और दृढ़ता पर मतभेद
कौल के संस्मरण में अल्पसंख्यक धर्म के एक उम्मीदवार से जुड़ा एक और मतभेद दर्ज है। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ ने सरकार के सवाल उनसे साझा किए थे कि अल्पसंख्यकों को और प्रतिनिधित्व देने की ज़रूरत क्यों है और उम्मीदवार के परिवार की जाति क्या है, जबकि परिवार पीढ़ियों से उसी धर्म का पालन करता आया था।
कौल ने कहा कि उन्हें जाति से जुड़ा सवाल अजीब और अप्रासंगिक लगा। उन्होंने बताया कि सरकार के एक ऐसे रुख पर आगे की बातचीत के बाद उन्होंने फाइल बंद की और कमरे से बाहर चले गए, जिसका खुलासा उन्होंने संस्मरण में नहीं किया। उनके अनुसार, बैठक स्थगित कर दी गई और सरकार के पीछे हटने के बाद अंततः उम्मीदवार की नियुक्ति हो गई।
चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्हें कॉलेजियम की किसी बैठक से कौल के बाहर जाने की बात याद नहीं है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने उनके बीच हुई बातचीत को इन शब्दों में बयान किया:
हमारे बीच अच्छी बातचीत हुई है, तर्कपूर्ण संवाद हुआ है और कॉलेजियम में हमारी बैठकें सौहार्दपूर्ण रही हैं।
चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि वे कॉलेजियम की हर बैठक के बाद प्रस्ताव पारित करने की परंपरा का पालन करते थे और उन प्रस्तावों में दर्ज किसी असहमति को उन्हें याद नहीं है। उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका का बचाव करते हुए न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति में राष्ट्रपति की भूमिका का उल्लेख किया।
कौल की आलोचना में चंद्रचूड़ की न्यायिक क्षमता और उनके प्रशासनिक रुख के बीच फर्क किया गया। उन्होंने न्यायिक पक्ष में चंद्रचूड़ की बुद्धिमत्ता, क्षमता और मेहनत की सराहना की, जबकि यह तर्क दिया कि नियुक्तियों के मामले में वे सरकार के प्रति बहुत अधिक विनम्र थे।
नियुक्ति व्यवस्था तक पहुंची कौल की आलोचना
कौल ने कहा कि जून 2022 में चंद्रचूड़ के कॉलेजियम में शामिल होने के बाद उन्होंने सरकार के साथ व्यवहार में अधिक दृढ़ साझा रुख अपनाने का प्रस्ताव रखा था। उनके अनुसार, चंद्रचूड़ आम तौर पर इस संबंध को खुद संभालना पसंद करते थे।
संस्मरण में ऐसे उदाहरण दिए गए हैं जिनमें सीधे बातचीत से सरकार ने कार्रवाई की, जिनमें दिल्ली हाई कोर्ट के दो न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंज़ूरी देना शामिल है। कौल का तर्क है कि दृढ़ता से नतीजे हासिल किए जा सकते हैं, बिना अदालत को सरकार का राजनीतिक विरोधी बनाए।
कौल ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को काम करने का मौका देने का समर्थन भी किया। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में नियुक्तियों की उस वैकल्पिक व्यवस्था को रद्द कर दिया था। उनका रुख नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भागीदारी की गुंजाइश स्वीकार करता है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में उसके प्रभाव के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाता है।
एक अन्य घटना वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने से जुड़ी थी, जो अदालत द्वारा दी जाने वाली पेशेवर मान्यता है। कौल ने कहा कि बाद में उन्हें पता चला कि कुछ लोगों ने प्रक्रिया को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद तक टालने की सलाह दी थी, क्योंकि वे कड़ा रुख अपनाते। उन्होंने माना कि इस स्पष्टीकरण को लेकर वे निश्चित नहीं थे; वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा जनवरी 2024 में दिया गया, जब वे सेवानिवृत्त हो चुके थे।
इसलिए मुख्य विवाद उन संस्थागत फैसलों को लेकर है जिनके व्यावहारिक नतीजे हैं: गिरफ्तारी और ज़मानत की शक्तियों को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई कौन-सी पीठ करेगी, नियुक्ति की सिफारिशें कितने समय तक लंबित रहेंगी और प्रस्तावित न्यायाधीशों को लेकर सरकार से कब सलाह ली जाएगी। कौल ने इन फैसलों का विस्तृत निजी विवरण दिया है। चंद्रचूड़ ने उनके कॉलेजियम संबंधों की अलग याद साझा की है और कहा है कि किताब पढ़ने के बाद ही वे विस्तार से जवाब देंगे।
प्रमुख बातें
- न्यायमूर्ति संजय किशन कौल का कहना है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने 2022 के PMLA फैसले पर पुनर्विचार की कार्यवाही में बीच का रास्ता अपनाने को कहा था।
- कौल का कहना है कि दिसंबर 2023 में उनकी सेवानिवृत्ति से पहले PMLA पर व्यापक सुनवाई पूरी नहीं हुई।
- आठ अलग पुनर्विलोकन याचिकाओं में ECIR तक पहुंच और निर्दोषिता की धारणा पर ध्यान दिया गया।
- कौल का कहना है कि नियुक्तियों में देरी को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के दौरान न्यायिक नियुक्तियों का मामला उनकी पीठ से हटा दिया गया।
- उन्होंने कॉलेजियम के औपचारिक फैसलों से पहले सरकार से चर्चा करने की आलोचना की, हालांकि परामर्श की भूमिका को स्वीकार किया।
- चंद्रचूड़ ने कॉलेजियम में अपने संबंधों को सम्मानजनक बताया और कहा कि उन्हें किसी बैठक से कौल के बाहर जाने की बात याद नहीं है।






