900,000 डॉलर का कर्ज और प्रतिनिधित्व पर विवाद
अफगानिस्तान के संयुक्त राष्ट्र के बकाया भुगतान को लेकर विवाद इस बड़े संघर्ष से जुड़ गया है कि देश की ओर से कौन बोलेगा। मई 2024 में बकाया राशि 900,000 डॉलर बताई गई थी और बाद के विवरणों में इसे इससे अधिक बताया गया। इसके चलते अफगानिस्तान ने महासभा में अपना मतदान अधिकार गंवा दिया है, जबकि तालिबान अधिकारियों ने भुगतान को देश की संयुक्त राष्ट्र सीट मिलने की शर्त से जोड़ दिया है।
विषय-सूची
- 900,000 डॉलर का कर्ज और प्रतिनिधित्व पर विवाद
- संयुक्त राष्ट्र के भुगतान नियम में क्या है
- अफगानिस्तान ने अपवाद की मांग क्यों की
- विवाद कैसे आगे बढ़ा
- अफगानिस्तान की सीट पर किसका दावा है?
- मान्यता को लेकर विवाद क्यों बना हुआ है
- भुगतान के प्रस्तावों से विवाद नहीं सुलझा
- अफगानिस्तान अब भी संयुक्त राष्ट्र में क्या कर सकता है
- मुख्य बिंदु
संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान के मिशन का नेतृत्व कर रहे प्रभारी राजदूत नसीर अहमद फ़ाइक ने मतदान निलंबन को संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय नियमों का तकनीकी नतीजा बताया है। उनके प्रतिनिधिमंडल में वे राजनयिक हैं जो अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने पर अपदस्थ हुई सरकार का प्रतिनिधित्व करते थे। तालिबान, जो अपने प्रशासन को इस्लामिक अमीरात कहता है, अफगानिस्तान पर नियंत्रण रखता है, लेकिन इस प्रतिनिधिमंडल में अपनी जगह सुनिश्चित नहीं कर पाया है।
इस विवाद में संयुक्त राष्ट्र की दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शामिल हैं। एक यह तय करती है कि अफगानिस्तान ने मतदान के लिए अपने आकलित योगदान का पर्याप्त भुगतान किया है या नहीं। दूसरी यह तय करती है कि संगठन अफगानिस्तान की ओर से बोलने के लिए किन प्रतिनिधियों को स्वीकार करता है। कर्ज चुकाने से वित्तीय पाबंदी हट सकती है; सीट को लेकर तालिबान की मांग एक अलग प्रक्रिया से गुजरती है।
अफगानों के लिए इसका तात्कालिक नतीजा स्पष्ट है: उनका देश महासभा की चर्चाओं में हिस्सा ले सकता है, लेकिन निलंबन लागू रहने तक मतदान नहीं कर सकता। अफगानिस्तान 1946 से संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है। 193 सदस्य देशों वाली महासभा में हर देश का एक वोट है, चाहे उसकी संपत्ति, आबादी या सैन्य ताकत कुछ भी हो।
संयुक्त राष्ट्र के भुगतान नियम में क्या है
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 19 महासभा में मतदान का अधिकार खोने की सीमा तय करता है। जब किसी सदस्य देश का बकाया योगदान पिछले दो पूरे वर्षों के लिए देय राशि के बराबर या उससे अधिक हो जाता है, तो उस पर यह पाबंदी लागू होती है। नियम इस बात पर निर्भर करता है कि कर्ज कितना है, न कि सिर्फ इस पर कि भुगतान देर से आया है या नहीं।
मई 2024 में अफगानिस्तान का मतदान निलंबित होने पर फ़ाइक ने नियम की व्याख्या करते हुए कहा:
"यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 19 के तहत सभी सदस्य देशों पर लागू एक तकनीकी, बल्कि सामान्य नियम है। इसके अनुसार, संगठन को वित्तीय योगदान देने में पीछे चल रहे सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान नहीं कर सकते, यदि उनकी बकाया राशि पिछले दो वर्षों के योगदान के बराबर या उससे अधिक हो," उन्होंने कहा।
अफगानिस्तान का वार्षिक योगदान करीब 200,000 डॉलर बताया गया है, इसके अलावा कुछ अन्य छोटे भुगतान भी हैं। मई 2024 में दर्ज 900,000 डॉलर की राशि इस अनुमानित वार्षिक योगदान की लगभग साढ़े चार गुना थी। मतदान का अधिकार बहाल करने के लिए आवश्यक राशि बकाया रकम और अनुच्छेद 19 की सीमा की संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई गणना पर निर्भर करती है।
चार्टर महासभा को मतदान की अनुमति देने का अधिकार भी देता है, अगर वह मानती है कि किसी देश का भुगतान न कर पाना उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुआ। यह अपवाद अफगान मिशन को मतदान का अधिकार बहाल कराने का एक और संभावित रास्ता देता है।
अफगानिस्तान ने अपवाद की मांग क्यों की
फ़ाइक का तर्क रहा है कि मिशन की भुगतान करने में असमर्थता पर देश में वैध सत्ता के अभाव को ध्यान में रखकर विचार किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व मौजूदा प्रतिनिधिमंडल करता है, जबकि देश पर नियंत्रण रखने वाले अधिकारी उसकी जगह लेने की मांग कर रहे हैं। इससे यह व्यावहारिक विवाद पैदा हुआ है कि पैसा कौन दे।
योगदान संबंधी संयुक्त राष्ट्र समिति सदस्य देशों के भुगतान और अपवाद की मांग से जुड़े मामलों पर विचार करती है। मई 2024 में फ़ाइक ने उम्मीद जताई थी कि समिति अफगानिस्तान की परिस्थितियों पर विचार कर सकती है, अक्टूबर तक फैसला आ सकता है और उसी साल के अंत से पहले महासभा के प्रस्ताव के जरिए मतदान का अधिकार बहाल हो सकता है। ये 2024 में जताई गई उम्मीदें थीं, कोई नई घोषित समय-सीमा नहीं।
उस समय तक अफगानिस्तान की ओर से भुगतान न करने के कारणों को अपर्याप्त माना गया था। योगदान के भुगतान में पीछे चल रहे कोमोरोस, इक्वाडोर और सोमालिया को भुगतान में असमर्थता के कारण बताने के बाद छूट मिली। अफगानिस्तान और वेनेजुएला ने मतदान के अधिकार गंवा दिए। बकाया भुगतान वाले देशों की सूची में साओ टोमे और प्रिंसिपे भी था।
इन मामलों से पता चलता है कि अपवाद क्यों मायने रखता है: बकाया होने के बावजूद किसी देश का मतदान अधिकार बना रह सकता है, अगर महासभा उसकी परिस्थितियों को स्वीकार कर ले। चर्चाओं में हिस्सा लेते हुए अफगानिस्तान के मिशन ने भी यही नतीजा हासिल करने की मांग की।
विवाद कैसे आगे बढ़ा
अगस्त 2021 राजनीतिक बदलाव का अहम पड़ाव था, जब तालिबान ने सत्ता पर कब्जा किया और पिछली सरकार गिर गई। बकाया बिलों की शुरुआत का समय इतना स्पष्ट नहीं है। बकाये पर पहले के विवरण में कहा गया है कि तालिबान के सत्ता में आने से पहले से भुगतान नहीं किया गया था; बाद के विवरणों में कहा गया है कि पिछली सरकार ने 2021 से पहले भुगतान किया था और लगातार बने कर्ज को सत्ता परिवर्तन से जोड़ा गया है।
मुख्य तौर पर दर्ज घटनाक्रम:
- 1946: अफगानिस्तान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना।
- अगस्त 2021: तालिबान सत्ता में लौटा, जबकि संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व पिछली सरकार के राजनयिकों के पास रहा।
- 17 मई 2024: फ़ाइक ने सार्वजनिक रूप से मतदान निलंबन को संयुक्त राष्ट्र के भुगतान नियमों के तहत आने वाला तकनीकी मामला बताया।
- मई 2024: बकाया राशि 900,000 डॉलर बताई गई और फ़ाइक ने योगदान संबंधी समिति के जरिए अपवाद मांगने पर चर्चा की।
- बाद के विवरण: निलंबन पहले लगातार तीन साल और फिर लगातार चौथे साल तक जारी बताया गया, जबकि कर्ज 900,000 डॉलर से अधिक हो गया।
2024 में प्रस्तावित समीक्षा का कोई पुष्ट बहाली-समय या अंतिम नतीजा नहीं बताया गया है। लगातार चौथे साल निलंबन जारी रहने के बाद के विवरण से संकेत मिलता है कि अपवाद हासिल करने की शुरुआती कोशिश के बाद भी विवाद जारी रहा।
अफगानिस्तान की सीट पर किसका दावा है?
तालिबान अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय संप्रभुता के तहत अफगानिस्तान की संयुक्त राष्ट्र सीट उनके नामित प्रतिनिधि को मिलनी चाहिए। उनका दावा देश पर उनके नियंत्रण पर आधारित है। हालांकि, मौजूदा मिशन संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान की जगह पर बना हुआ है।
प्रतिनिधियों की मान्यता के लिए बनी समिति संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यह तय करती है कि किसी सदस्य देश का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसे है। प्रत्यय-पत्र ऐसे दस्तावेज हैं जो प्रतिनिधिमंडल और बोलने के उसके अधिकार की पहचान करते हैं। समिति का काम प्रतिनिधियों को स्वीकार करने के महासभा के फैसले में योगदान देता है।
इस विवाद के दौरान अफगानिस्तान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना हुआ है। विवाद संगठन में उसके राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर है, जिसमें महासभा भी शामिल है, जहां सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता है। अलग-अलग देशों द्वारा राजनयिक मान्यता देना और किसी प्रतिनिधिमंडल के प्रत्यय-पत्र स्वीकार करना आपस में जुड़े राजनीतिक प्रश्न हैं, लेकिन इन पर अलग-अलग फैसले होते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक इदरीस मोहम्मदी ज़ाज़ी ने इस मुद्दे को सरकारी कार्यालयों पर नियंत्रण के बजाय अफगानिस्तान की जनता के प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा:
संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान की सीट का सही हकदार अफगानिस्तान की जनता है, ऐसा व्यक्ति जो देश के सभी जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व और उनके हितों की रक्षा करे।
मान्यता को लेकर विवाद क्यों बना हुआ है
समावेशी सरकार और मानवाधिकारों के सम्मान की मांगें तालिबान के प्रतिनिधित्व के दावे के अंतरराष्ट्रीय विरोध की प्रमुख वजह रही हैं। लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार पर लगी पाबंदियां अहम चिंताएं बनी हुई हैं। इसके साथ ही आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ी मांगें भी हैं।
अफगानिस्तान एनालिस्ट्स नेटवर्क के सह-संस्थापक थॉमस रुटिग ने तालिबान की कोशिशों को खारिज किए जाने को संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के रुख से जोड़ा:
"कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और समावेशी सरकार तथा मानवाधिकारों, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के सम्मान के लिए सदस्य देशों की बार-बार की गई मांगों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्यों ने अमीरात [अफगानिस्तान का इस्लामिक अमीरात, देश के लिए तालिबान का नाम] को वैध नहीं माना है, इसलिए उन्होंने उसकी मान्यता पाने और संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने की कोशिशों को ठुकराया है," थॉमस रुटिग ने कहा।
तालिबान अधिकारी अपनी सरकार की संरचना और मानवाधिकारों से जुड़े सवालों को आंतरिक मामले बताते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल दूसरे देशों को धमकाने के लिए नहीं किया जाएगा। इन रुखों के चलते उन बदलावों पर गहरा मतभेद बना हुआ है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय सरकारें उनके प्रतिनिधियों को स्वीकार करने से पहले अपेक्षा करती हैं।
पूर्व राजनयिक अज़ीज़ मारिज ने भी सीट के विवाद को लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के काम पर लगी पाबंदियों से जोड़ा। उनका आकलन था कि इन मुद्दों का समाधान होने तक स्थिति जारी रहेगी। यह एक राजनीतिक आकलन है, जबकि मतदान पर पाबंदी अनुच्छेद 19 के अलग वित्तीय नियम के तहत लगती है।
भुगतान के प्रस्तावों से विवाद नहीं सुलझा
तालिबान ने बकाया चुकाने की पेशकश एक शर्त के साथ की है: अफगानिस्तान की सीट उसके प्रशासन को सौंप दी जाए। इससे वित्तीय भुगतान को प्रत्यय-पत्रों, प्रतिनिधित्व और संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के रुख से जुड़े फैसले के साथ जोड़ दिया गया है।
पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने मई 2024 में धन का एक और संभावित स्रोत पेश किया था। उन्होंने कहा कि वे बकाया कर्ज और अगले तीन वर्षों का योगदान चुकाने के लिए तैयार हैं। करीब 200,000 डॉलर की अनुमानित वार्षिक दर से अगले तीन वर्षों का योगदान लगभग 600,000 डॉलर होगा, जो बकाया राशि के अतिरिक्त है।
भुगतान की प्रक्रिया पर फैसला नहीं हुआ, जिसमें यह सवाल भी शामिल था कि क्या कोई व्यक्ति देश का बकाया चुका सकता है। इसी बीच, राजनीतिक विश्लेषक गुल मोहम्मद दीन मोहम्मदी ने मौजूदा अधिकारियों को काली सूची से हटाने और अफगान संपत्तियों पर लगी रोक हटाने की मांग की। उन्होंने तालिबान से अंतरराष्ट्रीय मांगों पर लचीलापन दिखाने की भी अपील की, बशर्ते वे शरिया और अफगान मूल्यों की उसकी व्याख्या के अनुरूप हों।
अफगानिस्तान अब भी संयुक्त राष्ट्र में क्या कर सकता है
अफगानिस्तान का प्रतिनिधिमंडल मतदान न कर पाने के बावजूद बोलना और भाग लेना जारी रख सकता है। फ़ाइक ने इस भूमिका को सीधे तौर पर बताया:
अफगानिस्तान अब भी हिस्सा ले सकता है, मेज पर अपनी बात रख सकता है।
मतदान का अधिकार न होना फिर भी मायने रखता है। महासभा में मतदान से प्रस्तावों और अन्य फैसलों पर देशों के रुख दर्ज होते हैं। अफगान राजनयिक भाषण में अपना पक्ष रख सकते हैं, लेकिन निलंबन उन्हें औपचारिक नतीजे में देश का वोट जोड़ने से रोकता है।
व्यावहारिक रास्ते अब भी वही हैं: संयुक्त राष्ट्र के नियमों के मुताबिक पर्याप्त भुगतान करना या देश के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों वाले अपवाद के तहत मतदान की अनुमति हासिल करना। तालिबान के प्रतिनिधिमंडल को स्वीकार करने के लिए प्रत्यय-पत्रों की प्रक्रिया से फैसला होना जरूरी है। इस तरह अफगानिस्तान की वित्तीय देनदारियां और उसके प्रतिनिधियों को लेकर विवाद बातचीत में जुड़े हुए हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में इनके लिए अलग-अलग फैसले जरूरी हैं।
मुख्य बिंदु
- मई 2024 में अफगानिस्तान का संयुक्त राष्ट्र का बकाया 900,000 डॉलर बताया गया था और बाद के विवरणों में इसे इससे अधिक बताया गया।
- अनुच्छेद 19 के तहत, जब बकाया पिछले दो पूरे वर्षों की देय राशि तक पहुंच जाता है, तो महासभा में मतदान का अधिकार सीमित हो जाता है।
- अगर भुगतान न कर पाना देश के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुआ हो, तो महासभा अपवाद की अनुमति दे सकती है।
- फ़ाइक का प्रतिनिधिमंडल अपनी जगह पर बना हुआ है, जबकि तालिबान अपने प्रतिनिधि को स्वीकार किए जाने की मांग कर रहा है।
- तालिबान ने भुगतान को अफगानिस्तान की संयुक्त राष्ट्र सीट मिलने की शर्त से जोड़ा है।
- बाद के विवरणों में मतदान निलंबन लगातार चौथे साल तक जारी बताया गया है।
- महासभा में मतदान का अधिकार निलंबित रहने के बावजूद अफगानिस्तान संयुक्त राष्ट्र चर्चाओं में हिस्सा ले सकता है।






