शहबाज़ ने केपी में आपातकालीन शासन का बचाव किया, पीटीआई की संघीय हस्तक्षेप को चुनौती के बीच 160 अरब रुपये का वादा

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Shehbaz Defends KP Emergency Rule, Promises Rs160 Billion as PTI Challenges Federal Takeover

निर्वाचित सरकार हटाए जाने के बाद सुरक्षा के वादे

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने 11 अक्टूबर, 2026 को ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में आपातकाल और राज्यपाल शासन लागू किए जाने का बचाव किया है। उन्होंने विकास के लिए 160 अरब रुपये देने का वादा किया, जबकि उनकी सरकार बढ़ती उग्रवादी हिंसा और गहराते राजनीतिक टकराव का सामना कर रहे इस प्रांत की सीधी ज़िम्मेदारी संभाल रही है।

विषय-सूची
  1. निर्वाचित सरकार हटाए जाने के बाद सुरक्षा के वादे
  2. शहबाज़ के मुताबिक़ हस्तक्षेप क्यों ज़रूरी हुआ
  3. हिंसा के आंकड़े क्या बताते हैं
  4. दो संवैधानिक अधिकार, अलग-अलग प्रभाव
  5. संसदीय मंज़ूरी और अदालत में चुनौती
  6. 12 ज़िलों के लिए अलग प्रशासनिक ढांचा
  7. 160 अरब रुपये, गेहूं और पुलिस उपकरण
  8. हिरासत और व्यवधान से बढ़ा विवाद
  9. टकराव कैसे बढ़ा
  10. मुख्य बिंदु

सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद पहली यात्रा के दौरान पेशावर स्थित गवर्नर हाउस में बोलते हुए शहबाज़ ने कहा कि बातचीत विफल होने के बाद यह कदम उठाया गया और सुरक्षा बहाल करने के लिए यह ज़रूरी था। राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत इन उपायों को मंज़ूरी दी, जिससे मुख्यमंत्री सोहेल अफ़रीदी और उनकी कैबिनेट से कार्यकारी अधिकार लेकर राज्यपाल फ़ैसल करीम कुंडी को सौंप दिए गए।

प्रांतीय सरकार का नेतृत्व करने वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी ने पेशावर हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी है। उसके नेताओं का कहना है कि इस्लामाबाद सुरक्षा चिंताओं का इस्तेमाल कर निर्वाचित सरकार को हटा रहा है और पार्टी को कमज़ोर करना चाहता है, जबकि पार्टी अपने जेल में बंद संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की रिहाई की मांग कर रही है।

इस टकराव से अब तीन अहम सवाल उठे हैं: प्रांत का शासन कैसे चलेगा, क्या अतिरिक्त धन और उपकरणों से सुरक्षा बेहतर होगी, और क्या संघीय सरकार का हस्तक्षेप संवैधानिक शर्तों पर खरा उतरता है। राजनीतिक विवाद से इतर, निवासी पहले ही संचार सेवाओं में रुकावट, स्कूल बंद होने और प्रदर्शनों पर पाबंदियों जैसे असर झेल रहे हैं।

शहबाज़ ने राष्ट्रीय कार्ययोजना पर शीर्ष समिति की बैठक की अध्यक्षता की। आतंकवाद से निपटने के प्रयासों में तालमेल के लिए यह पाकिस्तान का ढांचा है। बैठक में फ़ील्ड मार्शल असीम मुनीर शामिल थे, जिन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय ने रक्षा बलों का प्रमुख और सेना प्रमुख बताया। उपप्रधानमंत्री इशाक़ डार, गृह मंत्री मोहसिन नक़वी और राज्यपाल कुंडी भी बैठक में शामिल हुए।

शहबाज़ के मुताबिक़ हस्तक्षेप क्यों ज़रूरी हुआ

शहबाज़ ने कहा कि यह फैसला "बेहद मजबूरी" में लिया गया। उनके अनुसार, एक राजनीतिक समिति ने बातचीत से समझौता कराने के लिए 48 घंटे तक कोशिश की और आगे बढ़ने से पहले उन्होंने ज़रदारी से दो बार सलाह ली। संघीय और प्रांतीय प्रतिनिधियों के बीच 2 और 3 अक्टूबर को हुई बातचीत बेनतीजा रही।

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प्रधानमंत्री ने पीटीआई सरकार पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पुलिस व्यवस्था और जन सुरक्षा की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पुलिस के 5,000 पद खाली थे, सेफ़ सिटी परियोजनाएं अधूरी थीं और आतंकवाद-रोधी विभाग के पास पर्याप्त प्रशिक्षण, उपकरण और क्षमता नहीं थी। सेफ़ सिटी परियोजनाओं में आम तौर पर निगरानी कैमरों और पुलिस नियंत्रण प्रणालियों को जोड़ा जाता है, ताकि अधिकारी घटनाओं पर नज़र रख सकें और जवाब दे सकें।

शहबाज़ ने प्रांत के पिछले नेतृत्व पर पहले के सुरक्षा अभियानों के बाद उग्रवादियों को लौटने देने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में लगभग 80,000 जानें गंवाने और भारी आर्थिक नुकसान झेलने के बाद पाकिस्तान ने 2018 तक शांति बहाल कर दी थी।

पीटीआई ने सुरक्षा को लेकर सरकार के दावों को ख़ारिज किया है। प्रांत के पूर्व वित्त मंत्री तैमूर झगड़ा ने कहा कि सरकार ने आतंकवाद से लड़ने की ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी और इस काम से पीछे हटने के दावे को चुनौती दी।

पीटीआई नेता झगड़ा ने कहा:

बेशक प्रांतीय सरकार आतंकवाद से लड़ रही थी। आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई की ज़िम्मेदारी हम व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से लेते हैं। अगर मुद्दा आतंकवाद था, तो केपी से पहले बलूचिस्तान में आपातकाल लागू होना चाहिए था।

हिंसा के आंकड़े क्या बताते हैं

क़ानून मंत्री आज़म नज़ीर तरार ने संसद को बताया कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पिछले साल 3,787 आतंकवादी घटनाएं दर्ज की गईं। संघीय कैबिनेट को दी गई सुरक्षा संबंधी जानकारी के मुताबिक़, 1 मार्च, 2024 से 23 सितंबर, 2026 के बीच प्रांत में घटनाएं 195 प्रतिशत बढ़ीं और 2026 में वहां दर्ज हमलों में से 73 प्रतिशत पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाकर किए गए।

195 प्रतिशत की वृद्धि का मतलब है कि बाद का आंकड़ा शुरुआती आंकड़े से लगभग तीन गुना था। सुरक्षाकर्मियों पर हमलों की अधिक संख्या से यह भी समझ आता है कि सरकार के जवाब में पुलिसकर्मियों की संख्या, वाहन और प्रशिक्षण प्रमुखता से क्यों शामिल हैं।

स्वतंत्र शोध संस्था पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ ने पूरे देश में 2024 में 908 और 2025 में 1,066 हमले गिने। 2026 के पहले नौ महीनों में 1,232 और हमले दर्ज किए गए, जो 2025 के पूरे साल से 166 अधिक, यानी लगभग 16 प्रतिशत ज़्यादा हैं। इनमें से ज़्यादातर ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और बलूचिस्तान में हुए।

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संस्थान के राष्ट्रीय हमलों के आंकड़े और क़ानून मंत्री की प्रांतीय घटनाओं की संख्या अलग-अलग परिभाषाओं और समयावधियों पर आधारित हैं। बताए जा रहे पैमाने को समझने के लिए यह अंतर ध्यान में रखना ज़रूरी है: एक आंकड़ा पूरे पाकिस्तान में हमलों की गिनती करता है, जबकि मंत्री ने प्रांत में आतंकवादी घटनाओं का अधिक व्यापक आंकड़ा दिया।

सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने प्रांतीय सरकार के प्रदर्शन की आलोचना से आगे बढ़कर पीटीआई सरकार और उग्रवादी समूहों के बीच संबंध होने का आरोप लगाया। गृह मंत्री नक़वी ने कहा कि सरकार के पास अपने आरोपों के समर्थन में सबूत हैं। उपायों की घोषणा के समय ये सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए थे और पीटीआई ने आरोपों को ख़ारिज किया।

दो संवैधानिक अधिकार, अलग-अलग प्रभाव

अनुच्छेद 232 गंभीर सुरक्षा आपातकाल से जुड़ा है, जिसमें ऐसी आंतरिक अशांति भी शामिल है जिसे प्रांतीय सरकार काबू न कर सके। इसके तहत संसद को प्रांतीय मामलों पर क़ानून बनाने के व्यापक अधिकार मिलते हैं। आपातकाल के दौरान संघीय और प्रांतीय क़ानूनों में टकराव होने पर संघीय क़ानून को प्राथमिकता मिलती है।

अनुच्छेद 234 उस स्थिति से जुड़ा है जब कोई प्रांत संविधान के अनुसार शासित न हो पा रहा हो। ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में लागू व्यवस्था के तहत मुख्यमंत्री और कैबिनेट ने अपने पदों पर काम करना बंद कर दिया, राज्यपाल ने प्रांत के कार्यकारी अधिकार संभाल लिए और संसद ने प्रांतीय विधानसभा की विधायी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं।

कुंडी की सहायता के लिए 11 सदस्यों वाली एक सलाहकार परिषद बनाई गई, जबकि डॉ. मुहम्मद फ़ख़्र आलम इरफ़ान को मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। संघीय सरकार ने नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए पाकिस्तान सेना के सैनिकों और संसाधनों को तैनात करने की भी मंज़ूरी दी।

लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज़ में सहायक प्राध्यापक और संवैधानिक वकील हसन अब्दुल्लाह नियाज़ी ने कहा कि हस्तक्षेप के तहत निर्वाचित संस्थाएं अस्थायी रूप से काम करने में असमर्थ हो गई हैं। उनकी व्याख्या के मुताबिक़, आपातकाल समाप्त होने पर इन संस्थाओं को बहाल करना होगा।

आपातकाल के दौरान कुछ मौलिक अधिकारों को निलंबित करने की शक्तियों से जुड़ा अनुच्छेद 233 राष्ट्रपति के सारांश में सूचीबद्ध नहीं था। हालांकि, निर्धारित ज़िलों के लिए जारी एक अलग आदेश में कहा गया कि वहां न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने की संवैधानिक शर्त लागू नहीं होगी।

लाहौर की संवैधानिक वकील रिदा हुसैन ने इसका व्यावहारिक असर समझाया:

संविधान का वह प्रावधान निलंबित कर दिया गया है जो न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का आदेश देता है। इससे कार्यकारी अधिकारियों को न्यायिक काम करने की अनुमति मिलती है।

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संसदीय मंज़ूरी और अदालत में चुनौती

विपक्ष के विरोध के बीच नेशनल असेंबली और सीनेट ने अलग-अलग प्रस्ताव पारित कर अनुच्छेद 232 के तहत आपातकाल की घोषणा को मंज़ूरी दी। नेशनल असेंबली के प्रस्ताव में विशेष रूप से अनुच्छेद 232(1) के दूसरे परंतुक का उल्लेख था। क़ानून मंत्री तरार ने संसदीय प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से उचित बताया।

मंज़ूरी की प्रक्रिया के कई चरण हैं। चूंकि प्रांतीय विधानसभा के प्रस्ताव के बिना घोषणा लागू की गई थी, इसलिए 21 अक्टूबर तक, यानी 10 दिनों के भीतर, संघीय संसद के दोनों सदनों की अलग-अलग मंज़ूरी ज़रूरी थी। राज्यपाल शासन पर विचार करने के लिए संयुक्त बैठक भी बुलाई गई और शहबाज़ की यात्रा के बाद के एक विवरण में कहा गया कि संसद ने पिछले सप्ताह दोनों उपायों का समर्थन किया था।

बताई गई समय-सीमाओं को ध्यान से समझने की ज़रूरत है। संसदीय समय-सारणी में 30 दिनों के भीतर संयुक्त बैठक की बात कही गई, जबकि अनुच्छेद 234 के उद्धृत पाठ के मुताबिक़, संयुक्त बैठक से मंज़ूरी न मिलने पर राज्यपाल शासन दो महीने बाद समाप्त हो जाता है। इस प्रावधान के तहत एक बार में अधिकतम दो महीने का विस्तार दिया जा सकता है, जिसकी कुल अवधि छह महीने से ज़्यादा नहीं हो सकती। अनुच्छेद 232 के तहत आपातकाल के लिए मंज़ूरी और उसे जारी रखने के अलग नियम हैं।

पीटीआई अध्यक्ष गोहर अली ख़ान ने 14 अक्टूबर को पेशावर हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उपायों को रद्द करने और निर्वाचित सरकार बहाल करने की मांग की। याचिका में तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 232 और 234 लागू करने की शर्तें पूरी नहीं हुई थीं। सुनवाई की कोई तारीख़ या फैसला नहीं बताया गया।

गोहर ने यह सवाल भी उठाया कि जब विशेष सुरक्षा व्यवस्था 12 ज़िलों पर केंद्रित थी, तो प्रशासनिक नियंत्रण पूरे प्रांत में क्यों लागू किया गया। एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने पूछा:

अगर आतंकवाद है और 12 ज़िलों में आपातकाल की ज़रूरत है, तो पूरे प्रांत में राज्यपाल शासन क्यों है?

12 ज़िलों के लिए अलग प्रशासनिक ढांचा

संघीय सरकार ने 12 निर्धारित ज़िलों के लिए क्षेत्र विकास सचिवालय बनाया, जिसके साथ एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि और विकास परिषद भी है। परिषद में 48 बुज़ुर्ग और प्रमुख स्थानीय लोग शामिल हैं और इसकी अध्यक्षता शौकतुल्लाह ख़ान करते हैं।

इन ज़िलों में डेरा इस्माइल ख़ान, टैंक, लक्की मरवत, बन्नू, बाजौर, मोहम्मद, ख़ैबर, कुर्रम, ओरकज़ई, उत्तरी वज़ीरिस्तान, ऊपरी दक्षिण वज़ीरिस्तान और निचला दक्षिण वज़ीरिस्तान शामिल हैं। इनमें से कई अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास या पूर्ववर्ती कबायली इलाक़ों में स्थित हैं।

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इस सचिवालय का नेतृत्व एक अतिरिक्त मुख्य सचिव करते हैं और इसके आदेशों का वही क़ानूनी प्रभाव है जो प्रांतीय सरकार के आदेशों का होता है। इसकी ज़िम्मेदारियों में सुरक्षा, निवासियों की रक्षा, प्रशासन और विकास शामिल हैं। इस व्यवस्था से निर्धारित इलाक़ों में संघीय फैसले लागू करने का अधिक सीधा माध्यम बनता है।

सुरक्षा नीति कौन तय करेगा, इस पर विवाद सत्ता हस्तांतरण से पहले से चला आ रहा है। जुलाई 2024 में प्रांतीय विधानसभा ने किसी भी नए सैन्य अभियान से पहले सलाह-मशविरे की मांग की थी। उसी साल दिसंबर में उसने ख़ैबर और बन्नू के कुछ हिस्सों में संभावित अभियान का सर्वसम्मति से विरोध किया। बाद में राजनीतिक और सामुदायिक प्रतिनिधियों की एक ग्रैंड जिरगा ने अफ़ग़ानिस्तान के साथ बातचीत और अफ़ग़ान नीति पर प्रांतीय परामर्श की मांग की।

पीटीआई का कहना है कि प्रांत को प्रभावित करने वाले फैसलों में उसे शामिल नहीं किया गया, जबकि संघीय सरकार इससे इनकार करती है। सिंध के राज्यपाल निहाल हाशमी ने टोरंटो में पाकिस्तानियों से बात करते हुए हस्तक्षेप का सशर्त बचाव किया: उन्होंने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से आपातकालीन शासन की तुलना में लोकतांत्रिक सरकार को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन उनके मुताबिक़ यह कदम संवैधानिक और राज्य के दुश्मनों को मदद रोकने के लिए ज़रूरी था।

160 अरब रुपये, गेहूं और पुलिस उपकरण

शहबाज़ ने ज़िला परिषद को संबोधित करते हुए विकास परियोजनाओं के लिए 160 अरब रुपये देने की घोषणा की। उन्होंने कमी दूर करने के लिए पाकिस्तान एग्रीकल्चरल स्टोरेज एंड सर्विसेज़ कॉरपोरेशन के गोदामों से गेहूं देने का वादा भी किया और राज्यपाल तथा मुख्य सचिव को कबायली ज़िलों समेत सभी इलाक़ों में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि निवासियों को गेहूं संघीय सरकार की तय कीमत पर मिलना चाहिए और जमाखोरी के ख़िलाफ़ चेतावनी दी। परिवारों के लिए यह वादा रोज़मर्रा के खाने के खर्च में कितनी राहत देगा, यह आपूर्ति की व्यवस्था और खुदरा कीमतों पर निर्भर करेगा।

पुलिस को सहायता के तहत आतंकवाद-रोधी विभाग को मज़बूत करने और सेफ़ सिटी परियोजनाएं पूरी करने के निर्देश दिए गए। कुंडी ने पहले से आवंटित धन से पुलिस वाहन ख़रीदने पर लगी पाबंदी में ढील को मंज़ूरी दी। 12 अक्टूबर को हुई शीर्ष समिति की बैठक में अतिरिक्त उपकरण, वाहन, हथियार और कर्मियों की मांग भी की गई थी।

शहबाज़ ने कहा कि 2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग पुरस्कार से जुड़ी व्यवस्थाओं के तहत आतंकवाद से निपटने के लिए ख़ैबर पख़्तूनख़्वा को 800 अरब रुपये से ज़्यादा दिए गए हैं या दिए जा रहे हैं। यह पुरस्कार तय करता है कि सार्वजनिक राजस्व संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच कैसे बांटा जाएगा।

विकास के लिए घोषित नए 160 अरब रुपये, 2010 से आतंकवाद-रोधी कामों के लिए बताए गए 800 अरब रुपये का पांचवां हिस्सा हैं। दोनों राशियां अलग-अलग उद्देश्यों और अवधियों से जुड़ी हैं: एक नई विकास प्रतिबद्धता है, जबकि दूसरी कई वर्षों में सुरक्षा के लिए किए गए आवंटनों का ब्योरा देती है।

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हिरासत और व्यवधान से बढ़ा विवाद

गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने 12 अक्टूबर को पुष्टि की कि अफ़रीदी और कैबिनेट के कुछ सदस्यों को एहतियातन हिरासत में लिया गया है। एहतियाती हिरासत में आपराधिक मुकदमे का इंतज़ार करने के बजाय सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर लोगों को हिरासत में रखा जाता है।

पीटीआई ने हिरासत में लिए गए नेताओं की रिहाई और उन्हें रखने के क़ानूनी आधार का खुलासा करने की मांग की। ये गिरफ़्तारियां इमरान ख़ान की रिहाई की मांग को लेकर इस्लामाबाद तक प्रस्तावित मार्च को रोकने की कोशिशों के दौरान हुईं। संचार सेवाओं में रुकावटों के कारण पार्टी नेताओं के लिए अपने सहयोगियों से संपर्क करना मुश्किल हो गया।

स्वाबी में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, जबकि पेशावर और कुछ अन्य इलाक़ों में भी व्यवधान आया। ज़िला प्रशासन ने 12 अक्टूबर को पेशावर, मर्दान, स्वाबी और नौशेरा में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए। 14 अक्टूबर को बारा में पीटीआई का प्रदर्शन हिंसक हो गया, जिसमें पार्टी कार्यकर्ता और पुलिसकर्मी घायल हुए।

विपक्षी नेताओं महमूद ख़ान अचकज़ई और अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने 17 अक्टूबर को संयुक्त संवैधानिक संघर्ष का संकल्प लिया। अचकज़ई ने सभी दलों के सम्मेलन का प्रस्ताव रखा और कहा कि विधानसभाओं से इस्तीफ़ा देना भी एक विकल्प है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फ़ज़ल के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर रहमान ने सरकार पर बातचीत के दौरान किए वादे छोड़ने का आरोप लगाया।

पीटीआई नेताओं सेवानिवृत्त मेजर ताहिर सादिक़ और नेशनल असेंबली के पूर्व सदस्य ईमान ताहिर ने 24 अक्टूबर को जारी संयुक्त बयान में विरोध जताया। उन्होंने इन उपायों को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की।

टकराव कैसे बढ़ा

यह हस्तक्षेप सैन्य अभियानों को लेकर वर्षों से चले आ रहे मतभेदों और कई हफ्तों की नाकाम राजनीतिक बातचीत के बाद हुआ। इसके बाद राष्ट्रपति के फैसले से लेकर हिरासत, संसदीय मतदान और अदालत में याचिका तक घटनाएं तेज़ी से आगे बढ़ीं।

  • जुलाई और दिसंबर 2024: केपी विधानसभा ने सैन्य अभियानों पर सलाह-मशविरे की मांग की और ख़ैबर तथा बन्नू के कुछ हिस्सों में संभावित अभियान का विरोध किया।
  • 2 और 3 अक्टूबर, 2026: संघीय और प्रांतीय प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई, जो बेनतीजा रही।
  • 11 अक्टूबर: ज़रदारी ने अनुच्छेद 232 और 234 के तहत आपातकाल और राज्यपाल शासन को मंज़ूरी दी।
  • 12 अक्टूबर: शीर्ष समिति ने सुरक्षा उपायों की समीक्षा की और तलाल चौधरी ने अफ़रीदी तथा कैबिनेट के कुछ सदस्यों को एहतियातन हिरासत में लेने की पुष्टि की।
  • 14 अक्टूबर: गोहर ने पीटीआई की ओर से अदालत में चुनौती दी; बारा के प्रदर्शन में हिंसा से कार्यकर्ता और पुलिसकर्मी घायल हुए।
  • 17 अक्टूबर: विपक्षी नेताओं ने हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ संयुक्त अभियान की योजना घोषित की।
  • 24 अक्टूबर: ताहिर सादिक़ और ईमान ताहिर ने आपातकालीन शासन वापस लेने की मांग की।

शहबाज़ ने सत्ता हस्तांतरण के बचाव में जनकल्याण और भ्रष्टाचार को भी प्रमुख मुद्दा बनाया है। उन्होंने सिटीज़ इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट में 100 अरब रुपये और कोहिस्तान ज़िला लेखा कार्यालय मामले में 37 अरब रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तथा प्लेसर गोल्ड के ठेकों में पक्षपात का आरोप भी लगाया। ये प्रांतीय शासन के बारे में उनके दावों में लगाए गए आरोप हैं।

प्रधानमंत्री ने पेशावर में स्कूल की छत गिरने से एक शिक्षक और बच्चों की मौत पर दुख जताया और कुंडी को घटनास्थल का दौरा कर जांच सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। सुरक्षा संबंधी प्रतिबद्धताओं के साथ इस प्रतिक्रिया से स्कूलों की सुरक्षा, बुनियादी सेवाएं और विकास कार्यों को पूरा करना भी राज्यपाल प्रशासन की ज़िम्मेदारियों में शामिल हो गया है।

मुख्य बिंदु

  • 11 अक्टूबर, 2026 को आपातकाल और राज्यपाल शासन लागू किया गया, जिससे प्रांत के कार्यकारी अधिकार राज्यपाल फ़ैसल करीम कुंडी को सौंप दिए गए।
  • शहबाज़ ने विकास के लिए 160 अरब रुपये, गेहूं की आपूर्ति और पुलिस की क्षमताएं मज़बूत करने का वादा किया।
  • पीटीआई ने पेशावर हाई कोर्ट में हस्तक्षेप को चुनौती दी और निर्वाचित सरकार बहाल करने की मांग की।
  • एक विशेष प्रशासनिक ढांचे में 12 ज़िले शामिल हैं और इसकी परिषद में 48 बुज़ुर्ग तथा प्रमुख लोग हैं।
  • विरोध प्रदर्शनों के बीच संसद ने आपातकाल को मंज़ूरी दी; राज्यपाल शासन की संवैधानिक प्रक्रिया में संयुक्त बैठक की मंज़ूरी और अधिकतम छह महीने की अवधि शामिल है।
  • सत्ता हस्तांतरण के साथ राजनीतिक हिरासत, संचार सेवाओं में व्यवधान और स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करना भी हुआ।
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