लवणता और नहरों में रिसाव से कृषि क्षेत्र की उपलब्धियाँ दबाव में
आर्थिक अनुसंधान एवं सुधार केंद्र (CERR) के शोध के अनुसार, उज़्बेकिस्तान की आधी सिंचित भूमि लवणता से प्रभावित है और सिंचाई का 37% पानी खेतों तक पहुँचने से पहले नहरों में बर्बाद हो जाता है। निष्कर्षों में 2070 तक कृषि, वानिकी और भूमि उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के तीन परिदृश्यों के केंद्र में मिट्टी की बहाली और जल प्रबंधन को रखा गया है।
विषय-सूची
- लवणता और नहरों में रिसाव से कृषि क्षेत्र की उपलब्धियाँ दबाव में
- दशकों के माप से पता चलता है कि लवणता कहाँ फैली
- सिंचाई के साथ कारगर जल निकासी भी क्यों जरूरी है
- पानी की आपूर्ति की पूरी श्रृंखला में नुकसान
- पैदावार बढ़ने से शुरुआती स्थिति बदली
- दक्ष उपकरणों से पानी का इस्तेमाल क्यों बढ़ सकता है
- उत्सर्जन की चुनौती में पशुधन अहम
- तीन परिदृश्य 2070 तक के लिए
- साक्ष्य और नीतियों का विकास
- मुख्य बिंदु
CERR के क्षेत्र प्रमुख अब्दुराशिद बोज़ोरोव ने 19–20 अक्टूबर को अर्थव्यवस्था एवं वित्त मंत्रालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में शोध प्रस्तुत किया। सतत विकास समाधान नेटवर्क और सतत विकास एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध संस्थान के प्रतिनिधियों ने खाद्य उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों और जलवायु लक्ष्यों पर चर्चा में हिस्सा लिया।
केंद्र ने 2017 और 2025 के बीच कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति भी दर्ज की: अनाज की पैदावार 48% बढ़ी, कच्चे कपास की पैदावार में 71% की वृद्धि हुई और पानी की निकासी 22% घटी। पानी बचाने के लिए बनाई गई तकनीकें अब 2.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में इस्तेमाल हो रही हैं।
इसलिए उज़्बेकिस्तान के सामने एक साथ दो काम हैं: उत्पादन में हुई बढ़ोतरी को बनाए रखना और उन भूमि एवं जल प्रणालियों की मरम्मत करना जिन पर यह उत्पादन निर्भर है। किसानों के लिए, सिंचाई का पानी मिलने के बावजूद मिट्टी में नमक जमा होने से फसल कमजोर हो सकती है। जल प्रबंधकों के लिए, पानी पहुँचाने के रास्ते में होने वाला नुकसान खेतों को भरोसेमंद आपूर्ति देना मुश्किल बनाता है।
अकादमिक शोध और विश्व बैंक का आकलन बताते हैं कि ये समस्याएँ कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। ये यह भी स्पष्ट करते हैं कि अधिक दक्ष सिंचाई उपकरण लगाने के साथ-साथ जल निकासी की मरम्मत, पानी का भरोसेमंद आवंटन और बचाए गए पानी के इस्तेमाल के बारे में फैसले लेना क्यों जरूरी है।
दशकों के माप से पता चलता है कि लवणता कहाँ फैली
Frontiers in Sustainable Food Systems में प्रकाशित 2025 का भूमि क्षरण अध्ययन ऐतिहासिक तुलनाओं का विस्तृत विवरण देता है। ताशकंद स्थित मृदा एवं कृषि-रसायन अनुसंधान संस्थान के आँकड़ों पर आधारित इसकी तालिका के अनुसार, 2020 में 2.1241 मिलियन हेक्टेयर सिंचित भूमि लवणता से प्रभावित थी, यानी कुल सिंचित क्षेत्र का 49.1%।
देश में लवणता से प्रभावित सिंचित भूमि का अनुपात 2010 के 47.5% से बढ़कर 2020 में 49.1% हो गया, यानी 1.6 प्रतिशत अंक की वृद्धि। लवणीय भूमि का क्षेत्रफल 2.0452 मिलियन से बढ़कर 2.1241 मिलियन हेक्टेयर हो गया। दशक भर में यह लगभग 78,900 हेक्टेयर की बढ़ोतरी है।
क्षेत्रीय बदलाव कहीं अधिक बड़े थे। 1990 से 2020 के बीच, लवणता से प्रभावित सिंचित भूमि का अनुपात जिज़ाख में 30.6% से बढ़कर 63.6%, नमांगन में 18.9% से बढ़कर 35.1% और फरगाना में 13% से बढ़कर 45.1% हो गया। जिज़ाख में यह अनुपात दोगुने से अधिक और फरगाना में तीन गुने से अधिक हो गया।
2020 की तालिका में सिरदरिया में लवणता का अनुपात 79.6%, काराकल्पाकस्तान में 73.6% और खोरज़्म में 73% दर्ज किया गया है। ये आँकड़े केवल राष्ट्रीय औसत की तुलना में योजनाकारों को जरूरत का अधिक सटीक नक्शा देते हैं: नुकसान का स्तर अलग-अलग क्षेत्रों में काफी भिन्न है।
लेखकों के अनुसार, पूरे उज़्बेकिस्तान में 21.507 मिलियन हेक्टेयर मिट्टी लवणता से प्रभावित है। इस व्यापक आकलन में सिंचित खेतों से बाहर की भूमि भी शामिल है, जिससे पता चलता है कि नमक प्रबंधन देश के शुष्क भूभागों तक फैला हुआ है।
सिंचाई के साथ कारगर जल निकासी भी क्यों जरूरी है
जब पानी घुले हुए लवणों को मिट्टी में लाता है और वाष्पीकरण के बाद वे वहीं रह जाते हैं, तो मिट्टी में नमक जमा होता है। जड़ों के आसपास नमक बढ़ने से पौधों के लिए पानी सोखना कठिन हो जाता है। जल निकासी से अतिरिक्त पानी और नमक खेतों से बाहर निकलते हैं।
विश्व बैंक का सिंचाई और जल निकासी आकलन अपर्याप्त जल निकासी को लवणता और जलभराव, दोनों का कारण बताता है। मिट्टी में जरूरत से ज्यादा पानी भर जाने पर जलभराव होता है और जड़ों तक हवा कम पहुँचती है। दोनों समस्याएँ फसल की पैदावार घटाती हैं और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचाती हैं।
इस आकलन में जल संसाधन मंत्रालय के 2018 के आँकड़ों का हवाला देते हुए प्रभावित क्षेत्र का अनुपात 50% से अधिक बताया गया है। वहीं, मृदा एवं कृषि-रसायन अनुसंधान संस्थान ने 2020 के लिए यह अनुपात 49.1% रखा था। CERR के नवीनतम निष्कर्ष में इसका पैमाना लगभग आधी सिंचित भूमि बताया गया है।
फरगाना घाटी जल निकासी की भूमिका का एक व्यावहारिक उदाहरण है। विश्व बैंक का आकलन वहाँ जल निकासी सुविधाओं के बिगड़ने, भूजल स्तर बढ़ने, जलभराव और मिट्टी में लवणता का वर्णन करता है। पहली फरगाना घाटी जल संसाधन प्रबंधन परियोजना की समीक्षा में काम के बाद भूजल स्तर, बाढ़ और लवणता में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। हालांकि, मूल्यांकन में ऐसी विश्वसनीय तुलना नहीं थी जो दिखाती कि परियोजना के बिना क्या होता। इससे परियोजना के योगदान का सटीक माप सीमित रहा।
पानी की आपूर्ति की पूरी श्रृंखला में नुकसान
CERR का अनुमान है कि सिंचाई का 37% पानी खेतों तक पहुँचने से पहले नहरों में नष्ट हो जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो, पानी पहुँचाने के इस रास्ते में डाली गई हर 100 इकाइयों में से लगभग 63 खेतों तक पहुँचती हैं।
2025 का अकादमिक अध्ययन इससे व्यापक अनुमान देता है। इसमें कृषि मंत्रालय के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि कुल 46.1 अरब घन मीटर की बताई गई आपूर्ति में से कम से कम 18.2 अरब घन मीटर पानी बर्बाद होता है, यानी 39.5%। इस अनुमान में खराब रखरखाव वाले बुनियादी ढाँचे और सिंचाई के अक्षम तरीकों को शामिल किया गया है, जबकि CERR का आँकड़ा नहरों में होने वाले नुकसान को बताता है।
विश्व बैंक का आकलन पानी की कमी के तीन आपस में जुड़े कारण बताता है: आपूर्ति के दौरान नुकसान, सिंचाई की खराब योजना और समय-निर्धारण, और खेतों में पानी का अक्षम इस्तेमाल। इसलिए किसी खेत तक कम पानी पहुँचने की वजह नहर से रिसाव, गलत समय पर आपूर्ति या पानी पहुँचने के बाद उसका खराब वितरण हो सकता है।
Sustainability में प्रकाशित 2022 के एक सिंचाई अध्ययन में भी कृषि सिंचाई के पानी का नुकसान 37% बताया गया है। विशेषज्ञों के आकलन में देशभर में सिंचाई के पानी की कमी 20–30% आँकी गई, जो प्रांत और वर्ष के अनुसार बदलती है। इससे समझ आता है कि किसान दक्षता से हुई बचत का इस्तेमाल पहले प्यासी फसलों को अधिक पानी देने के लिए क्यों कर सकते हैं।
पैदावार बढ़ने से शुरुआती स्थिति बदली
2017–2025 के CERR आँकड़े दिखाते हैं कि उज़्बेकिस्तान प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ने के दौर के बाद इन समस्याओं से निपट रहा है। पैदावार का मतलब किसी निश्चित क्षेत्र से काटी गई फसल की मात्रा है। इसलिए दर्ज की गई बढ़ोतरी खेत की उत्पादकता से जुड़ी है, न कि केवल कुल फसल की मात्रा से।
यदि 2017 के स्तर को 100 मानें, तो रिपोर्ट की गई बढ़ोतरी के अनुसार 2025 में अनाज की पैदावार 148 और कच्चे कपास की पैदावार 171 पर होगी। पानी की निकासी में दर्ज 22% कमी के बाद, उसी प्रकार के सूचकांक पर यह 78 होगी। इन तुलनाओं से शुरुआती पैदावार या पानी की मात्रा का अनुमान लगाए बिना बदलाव का पैमाना समझा जा सकता है।
पानी बचाने की तकनीकों से आच्छादित 2.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र एक और बड़ा बदलाव है। CERR के प्रस्तावों में बेहतर जल प्रबंधन के साथ कृषि भूमि का अधिक दक्ष उपयोग और खाद्य नुकसान में कमी शामिल है।
खेतों के लिए आगे की प्रगति खेत में लगे उपकरणों से परे की स्थितियों पर निर्भर करती है। अधिक दक्ष सिंचाई प्रणाली को भी भरोसेमंद जल आपूर्ति, स्वस्थ जड़ों के अनुकूल मिट्टी और अतिरिक्त नमक को बाहर निकालने की व्यवस्था चाहिए। शोध इन जरूरतों को एक ही कृषि प्रणाली के हिस्से के रूप में देखने की ओर संकेत करता है।
दक्ष उपकरणों से पानी का इस्तेमाल क्यों बढ़ सकता है
8 जुलाई 2022 को प्रकाशित Sustainability के अध्ययन में एक समस्या की जाँच की गई, जिसे रिबाउंड प्रभाव कहा जाता है। ऐसा तब होता है जब कोई तकनीक एक काम के लिए पानी बचाती है, लेकिन लोग बाद में उस बचत का कुछ या पूरा हिस्सा अधिक उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं।
शोधकर्ताओं ने 2020 और 2021 में विशेषज्ञों के साक्षात्कार के दो दौर के जरिए आकलन किया कि उज़्बेकिस्तान में ऐसा कैसे हो सकता है। उन्होंने कई संभावित प्रतिक्रियाएँ पहचानीं: जिन फसलों को अभी बहुत कम पानी मिल रहा है उन्हें अधिक पानी देना, सिंचित भूमि का विस्तार करना, अधिक पानी माँगने वाली फसलों को अपनाना और अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों में माँग बढ़ना।
जो किसान उसी खेत की सिंचाई कम पानी से कर सकता है, वह बची हुई आपूर्ति का इस्तेमाल दूसरी फसल के लिए कर सकता है। इससे खाद्य उत्पादन और आमदनी बढ़ सकती है, लेकिन अन्य खेतों या प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के लिए उपलब्ध पानी उस मात्रा से कम रह सकता है जिसका संकेत केवल तकनीकी गणना देगी।
अध्ययन यह भी बताता है कि नहरों या खेतों से रिसने वाला कुछ पानी धाराओं या उथले भूजल में लौट जाता है। इसलिए पानी के लेखे-जोखे में पूरे नदी बेसिन में उसके इस्तेमाल पर नज़र रखनी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल हो कि पानी कहाँ लौटता है और कहाँ खर्च होता है।
शोधकर्ता सिंचित भूमि के विस्तार पर सीमा, दक्षता में सुधार के बाद पानी के आवंटन में बदलाव और बचत का कुछ हिस्सा पर्यावरणीय जरूरतों के लिए सुरक्षित रखने जैसे नीतिगत विकल्पों पर चर्चा करते हैं। सिंचाई में निवेश से अपेक्षित लाभ हासिल करने के लिए बचाए गए पानी का बँटवारा कैसे होगा, यह तय करना अहम है।
उत्सर्जन की चुनौती में पशुधन अहम
CERR के अनुसार, उज़्बेकिस्तान के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा 17.5% है। कृषि उत्सर्जन में लगभग दो-तिहाई मीथेन है और इसका मुख्य स्रोत पशुधन है। मीथेन ऐसी गैस है जो वातावरण में गर्मी रोकती है।
CERR के मॉडल में उत्सर्जन घटाने के उपायों में पशुधन उत्पादकता बढ़ाना, उर्वरकों का अधिक दक्ष इस्तेमाल, चरागाहों की बहाली और वानिकी का विकास शामिल है। यहाँ डीकार्बोनाइजेशन का अर्थ खाद्य उत्पादन और भूमि प्रबंधन से जुड़ी जलवायु को गर्म करने वाली गैसों, जिनमें मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड दोनों शामिल हैं, को कम करना है।
पशुधन उत्पादकता बढ़ने से इस्तेमाल किए गए संसाधनों के अनुपात में खाद्य उत्पादन बढ़ सकता है और चरागाहों पर दबाव घट सकता है। चराई की भूमि बहाल करना और उर्वरकों का अधिक सावधानी से उपयोग करना जलवायु योजना को सीधे मिट्टी की स्थिति से जोड़ता है।
2025 का भूमि अध्ययन अतिचराई, वनस्पति के नुकसान और मिट्टी के कटाव को उज़्बेकिस्तान के भूभागों पर बड़े दबावों के रूप में बताता है। इसमें 10 जून 2022 के राष्ट्रपति के आदेश संख्या PP-277 और 12 मार्च 2024 के चरागाह संरक्षण संबंधी मंत्रिमंडल के आदेश का भी उल्लेख है, जिससे भूमि बहाली मौजूदा नीतिगत ढाँचे का हिस्सा बनती है।
तीन परिदृश्य 2070 तक के लिए
CERR ने 2070 तक कृषि, वानिकी और भूमि उपयोग के तीन संभावित रास्तों का आकलन किया। पहला मौजूदा रुझानों को जारी रखता है। दूसरा सरकार के मौजूदा कार्यक्रमों को लागू करता है। तीसरे में उत्पादकता बढ़ाने और उत्सर्जन घटाने के लिए अतिरिक्त उपाय शामिल हैं।
इन परिदृश्यों में समान अवधि के दौरान कार्रवाई के अलग-अलग स्तरों की तुलना की गई है। मौजूदा रुझान जारी रखने वाला परिदृश्य संदर्भ बिंदु देता है, जबकि बाकी रास्ते यह देखते हैं कि मौजूदा प्रतिबद्धताओं और अतिरिक्त उपायों से क्या बदलाव आ सकते हैं।
प्रस्तुति के विवरण में उत्सर्जन घटाने का कोई संख्यात्मक लक्ष्य, परिदृश्यों की लागत या अमल की समय-सीमा नहीं दी गई। 2070 मॉडलिंग की अंतिम समय-सीमा है, जबकि नीतिगत प्रस्ताव जल प्रबंधन, खाद्य नुकसान, भूमि उत्पादकता, पशुधन, उर्वरक, चरागाहों और जंगलों पर केंद्रित हैं।
खाद्य नुकसान घटाने का संसाधनों के उपयोग से सीधा संबंध है: उपभोक्ताओं तक पहुँचने वाला भोजन उसे उगाने में पहले ही खर्च की गई भूमि, पानी और अन्य साधनों का उत्पादक उपयोग करता है। इस तरीके को स्वस्थ मिट्टी और बेहतर सिंचाई के साथ जोड़ने से जलवायु योजना पर्याप्त भोजन उत्पादन के रोजमर्रा के काम से जुड़ती है।
साक्ष्य और नीतियों का विकास
उज़्बेकिस्तान की मौजूदा बहस में दशकों के मिट्टी संबंधी माप, पहले के सिंचाई आकलन और कृषि के नए परिदृश्य शामिल हैं। मुख्य तारीखें दिखाती हैं कि क्षतिग्रस्त भूमि के प्रबंधन से आगे बढ़कर ध्यान पानी, खाद्य उत्पादन और उत्सर्जन के समन्वय पर कैसे केंद्रित हुआ है।
- 1990–2020: मृदा संस्थान के आँकड़े सिंचित भूमि में लवणता के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बदलाव दर्ज करते हैं, जिनमें जिज़ाख, नमांगन और फरगाना में तेज बढ़ोतरी शामिल है।
- 2017–2025: CERR अनाज और कच्चे कपास की बढ़ी हुई पैदावार के साथ पानी की निकासी में 22% कमी दर्ज करता है।
- 2020–2021: शोधकर्ता उज़्बेकिस्तान में सिंचाई दक्षता से पानी के इस्तेमाल में संभावित बदलाव पर विशेषज्ञों के साक्षात्कार करते हैं।
- 10 जून 2022: भूमि क्षरण अध्ययन में उल्लिखित राष्ट्रपति का आदेश संख्या PP-277 जारी होता है।
- 8 जुलाई 2022: Sustainability में सिंचाई के संभावित रिबाउंड प्रभावों का आकलन प्रकाशित होता है।
- 12 मार्च 2024: मंत्रिमंडल का एक आदेश चरागाह संरक्षण से जुड़ा है।
- 19–20 अक्टूबर: CERR अर्थव्यवस्था एवं वित्त मंत्रालय की कार्यशाला में अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।
- 2070: कृषि, वानिकी और भूमि उपयोग के CERR के तीन परिदृश्यों की अंतिम समय-सीमा।
किसानों और जल प्रबंधकों के लिए इन सभी तारीखों से जुड़ा साझा काम ठोस है: भरोसेमंद तरीके से पानी पहुँचाना, अतिरिक्त पानी और नमक निकालना, उपजाऊ मिट्टी की रक्षा करना और दक्षता से हुए लाभ का बँटवारा तय करना। CERR के परिदृश्य इन फैसलों को खाद्य सुरक्षा और उत्सर्जन में कमी के साथ एक ही चर्चा में लाते हैं।
मुख्य बिंदु
- CERR का अनुमान है कि उज़्बेकिस्तान की आधी सिंचित भूमि लवणता से प्रभावित है और सिंचाई का 37% पानी नहरों में बर्बाद होता है।
- मृदा संस्थान के आँकड़ों के अनुसार, 2020 में 2.1241 मिलियन हेक्टेयर सिंचित भूमि लवणता से प्रभावित थी, जो कुल सिंचित क्षेत्र का 49.1% है।
- CERR के अनुसार, 2017 और 2025 के बीच अनाज की पैदावार 48% और कच्चे कपास की पैदावार 71% बढ़ी, जबकि पानी की निकासी 22% घटी।
- खराब जल निकासी से लवणता और जलभराव बढ़ता है। इसलिए सिंचाई में सुधार के साथ जल निकासी की मरम्मत जरूरी है।
- देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा 17.5% है; कृषि उत्सर्जन में लगभग दो-तिहाई मीथेन है।
- 2070 तक के तीन परिदृश्य मौजूदा रुझानों, मौजूदा कार्यक्रमों और उत्पादकता सुधारने तथा उत्सर्जन घटाने के अतिरिक्त उपायों का आकलन करते हैं।
- शोध चेतावनी देता है कि खेती का विस्तार या अधिक गहन उत्पादन दक्ष उपकरणों से बचाए गए पानी का इस्तेमाल कर सकता है।






