मछुआरा समुदाय मुआवजे से आगे की मांग कर रहे हैं
रेयॉन्ग के समुद्री पर्यावरण की बहाली के लिए पीटीटी ग्लोबल केमिकल से वित्त मुहैया कराने की मांग 27 जुलाई, 2013 को हुए तेल रिसाव से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के मामले के केंद्र में है। रेयॉन्ग प्रांतीय अदालत ने फैसले के वाचन के लिए 22 अक्टूबर को सुबह 9 बजे का समय तय किया है। सुनवाई की घोषणा में वर्ष का उल्लेख नहीं है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला घोषित नहीं किया गया है।
विषय-सूची
- मछुआरा समुदाय मुआवजे से आगे की मांग कर रहे हैं
- तेल रिसाव कोह समेट तक कैसे पहुंचा
- बड़े पैमाने पर सफाई, लेकिन विवाद लंबा चला
- मुआवजे के फैसलों का मतलब
- बहाली कोष दो बार क्यों खारिज हुआ
- निवासियों ने समुद्र तट से परे नुकसान का ब्योरा दिया
- एक ही रिसाव के बाद कई मुकदमे चले
- दूसरे तेल रिसाव से जवाबदेही की मांग फिर तेज हुई
- कानूनी लड़ाई की प्रमुख तारीखें
- मुख्य बिंदु
रेयॉन्ग स्मॉल बोट फिशर्स एसोसिएशन और उसके साथ के वादियों, कुल 429 लोगों, ने मुआवजे के साथ कंपनी के औसत वार्षिक मुनाफे के 10% से वित्तपोषित कोष की मांग की। उनका उद्देश्य उस समुद्र को बहाल करना है, जिस पर मछली पकड़ने, समुद्री खाद्य के व्यापार और पर्यटन की निर्भरता है। साथ ही वे रिसाव के बाद हुई आय की हानि का भुगतान भी चाहते हैं।
निचली अदालतें पहले ही मुआवजा देने का आदेश दे चुकी हैं। 1 सितंबर, 2020 को क्षेत्र 2 की अपील अदालत ने प्रत्येक मछुआरा वादी के लिए मुआवजा बढ़ाकर 150,000 बाट और प्रत्येक विक्रेता वादी के लिए 120,000 बाट कर दिया। इसमें पहले दी गई 30,000 बाट की अंतरिम राहत घटाई जानी थी।
बाकी विवाद पर्यावरणीय बहाली के कानूनी रास्ते को लेकर है। अपील अदालत ने प्रस्तावित कोष को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वादियों को इस खास उपाय की मांग करने का अधिकार देने वाला कोई कानून नहीं है। निवासियों ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है और ऐसा फैसला मांगा है जो पर्यावरण से जुड़े दूसरे मामलों का मार्गदर्शन कर सके।
तेल रिसाव कोह समेट तक कैसे पहुंचा
माप ता फुत बंदरगाह से करीब 20 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में समुद्र के भीतर तेल स्थानांतरण के दौरान लगभग 50,000 लीटर कच्चा तेल रिस गया। रेयॉन्ग के प्रांतीय प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण कार्यालय ने बताया कि तेल की परत नौ वर्ग किलोमीटर में फैली थी और फिर खाओ लाम या–मु को समेट राष्ट्रीय उद्यान की ओर बढ़ी।
कम्युनिटी रिसोर्स सेंटर फाउंडेशन की मामले की समयरेखा में टैंकर का नाम मलान प्लेटो बताया गया है। इसमें रिसाव का स्रोत सिंगल पॉइंट मूरिंग बताया गया है, जो समुद्र में लगा बोया तंत्र है और जिसके जरिए टैंकर तेल को तट की ओर जाने वाली पाइपलाइनों में पहुंचाते हैं।
हवा और लहरें तेल कोह समेट और मुख्य भूमि की ओर ले गईं। द्वीप के पश्चिमी हिस्से में स्थित आओ फ्राओ को सबसे अधिक दिखाई देने वाला नुकसान हुआ। रेत काली पड़ गई, समुद्र तट पर तेज गंध फैल गई और खाड़ी को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
अनुमान के मुताबिक करीब 5,000 लीटर तेल आओ फ्राओ तक पहुंचा, जो समुद्र में रिसे अनुमानित 50,000 लीटर का लगभग दसवां हिस्सा था। फाउंडेशन के अनुसार समुद्र तट के 400 मीटर से अधिक हिस्से पर तेल फैला था; 29 जुलाई की आपात कार्रवाई के एक विवरण में प्रभावित हिस्सा एक किलोमीटर से अधिक बताया गया है।
बड़े पैमाने पर सफाई, लेकिन विवाद लंबा चला
प्रथम नौसैनिक क्षेत्र कमान ने हवाई निगरानी में सहायता दी, जबकि कंपनी के कर्मचारियों और सरकारी एजेंसियों ने तेल रोकने वाले अवरोध, सोखने वाली सामग्री और तेल इकट्ठा करने वाले जहाज तैनात किए। 29 जुलाई तक आओ फ्राओ में 500 से अधिक कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को लगाया गया था और सफाई दलों ने चौबीसों घंटे काम किया।
रिसाव के करीब 36 घंटे बाद ऑयल स्पिल रिस्पॉन्स सी-130 विमान ने छिड़काव शुरू किया। कोह समेट से लगभग एक किलोमीटर दूर अवरोध लगाए गए और बाद में समुद्र तट पर भारी मशीनें भी इस्तेमाल की गईं। रेयॉन्ग के गवर्नर ने समुद्री आपदा क्षेत्र घोषित किया, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री यिंगलक शिनावात्रा ने एजेंसियों को नुकसान से निपटने के निर्देश दिए।
फाउंडेशन के रिकॉर्ड के अनुसार कम-से-कम 37,500 लीटर डिस्पर्सेंट का इस्तेमाल हुआ। यह रासायनिक उपचार तेल की सतही परत को छोटी बूंदों में तोड़ता है। इसकी मात्रा समुद्र में छोड़े गए अनुमानित कच्चे तेल की मात्रा के तीन-चौथाई के बराबर थी। डिस्पर्सेंट पानी में तेल के फैलाव का तरीका बदलते हैं, जबकि भौतिक सफाई में समुद्र से तेलयुक्त सामग्री निकालकर इकट्ठा की जाती है।
1 अगस्त, 2013 को कंपनी और सरकारी एजेंसियों ने घोषणा की कि समुद्र और समुद्र तट की स्थिति सामान्य हो गई है और दिखाई देने वाला तेल बहुत कम बचा है। उन्होंने तेल और कुछ पानी वाली 54,000 लीटर सामग्री इकट्ठा करने की सूचना दी। इकट्ठी सामग्री की मात्रा अनुमानित रिसे कच्चे तेल से अधिक होने की वजह उसमें मौजूद पानी है।
मुआवजे के फैसलों का मतलब
एसोसिएशन ने 25 जुलाई, 2014 को रेयॉन्ग में दीवानी मुकदमा दायर किया, जिसका मामला नंबर พ 1150/2557 है। 28 सितंबर, 2018 को प्रांतीय अदालत ने मछुआरा वादियों को 90,000 बाट और विक्रेता वादियों को 60,000 बाट प्रति व्यक्ति देने का आदेश दिया। हर व्यक्ति को पहले मिली 30,000 बाट की अंतरिम राहत घटाई जानी थी।
मछुआरों के मुआवजे की गणना काम के अवसरों के लगभग तीन महीने के नुकसान के आधार पर की गई थी। निवासियों ने 22 मार्च, 2019 को अपील दायर की। सितंबर 2020 के अपील फैसले ने दोनों श्रेणियों की रकम 60,000 बाट बढ़ाई। इससे मछुआरों का मुआवजा दो-तिहाई बढ़ा और विक्रेताओं का दोगुना हो गया।
पहले दिए गए भुगतान को घटाने के बाद अपील अदालत के फैसले के तहत हर मछुआरा वादी को 120,000 बाट और हर विक्रेता वादी को 90,000 बाट मिलना था। पहले से मिली रकम के ऊपर फैसले से कितनी अतिरिक्त राशि मिलेगी, इसका हिसाब लगाते समय ये कटौतियां मायने रखती हैं।
फाउंडेशन के विवरण में वादियों को मछुआरों और विक्रेताओं की श्रेणियों में बांटा गया है। एक अन्य विवरण दूसरी श्रेणी को पर्यटन संचालक कहता है, जबकि 2018 के फैसले के शुरुआती विवरण में सभी 429 वादियों को मछुआरा बताया गया है। एसोसिएशन के मामले के इतिहास में प्रभावित आजीविकाओं का दायरा किसी एक पेशे से व्यापक बताया गया है।
बहाली कोष दो बार क्यों खारिज हुआ
प्रांतीय अदालत और अपील अदालत, दोनों ने कोष की मांग खारिज की, लेकिन अलग-अलग वजहों से। इस बदलाव को समझने से स्पष्ट होता है कि अधिक मुआवजा मिलने के बाद भी निवासियों ने चुनौती जारी क्यों रखी।
प्रांतीय अदालत ने इस मांग को उसी तेल रिसाव के संबंध में बैंकॉक की दीवानी अदालत में पहले से चलाए गए मुकदमे की पुनरावृत्ति माना। उसने दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का हवाला दिया, जो प्रासंगिक परिस्थितियों में पहले ही निपटाए जा चुके मुद्दे पर न्यायिक कार्यवाही दोहराने पर रोक लगाती है।
क्षेत्र 2 की अपील अदालत ने इस तर्क से असहमति जताई। उसके पर्यावरण प्रभाग ने पाया कि कोष की मांग दोहराई गई कार्यवाही नहीं थी। फिर भी अदालत ने फैसला दिया कि मौजूदा कानून वादियों को किसी गलत कृत्य या प्रदूषण फैलने से हुए नुकसान के लिए प्रतिवादी को प्राकृतिक संसाधन बहाली कोष स्थापित करने का आदेश देने का अधिकार नहीं देता।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट में अपील एक खास तरह की बहाली पाने के अधिकार से जुड़ी है। व्यक्तिगत मुआवजा प्रभावित लोगों को भुगतान करता है। प्रस्तावित कोष से साझा संसाधनों, जिनमें उन समुद्री आवासों का भी समावेश है जिन पर कई परिवार निर्भर हैं, की बहाली के लिए धन दिया जाता। निवासी चाहते हैं कि अदालत उनके दीवानी मुकदमे के जरिए इस व्यापक बहाली पर विचार करे।
निवासियों ने समुद्र तट से परे नुकसान का ब्योरा दिया
मछुआरा समुदायों ने फाउंडेशन को बताया कि रिसाव के बाद शुरुआती तीन वर्षों में उनकी पकड़ में भारी गिरावट आई। उन्होंने कहा कि मौसमी क्रिल नहीं मिल रहे थे, मछलियां कम हो गई थीं और पकड़ी जाने वाली प्रजातियों की सीमा में बदलाव आया था। क्रिल छोटे समुद्री जीव हैं जिन्हें दूसरे समुद्री जीव खाते हैं, इसलिए स्थानीय खाद्य शृंखला में उनकी उपलब्धता महत्वपूर्ण है।
फाउंडेशन ने कोह समेट के पश्चिमी हिस्से में आओ फ्राओ, आओ तखराई और आओ कियो के आसपास प्रवाल के विरंजन के बारे में समुदायों के अवलोकन भी दर्ज किए हैं। निवासियों ने इन इलाकों की तुलना तेल की परत के रास्ते से बाहर पूर्वी समुद्र तटों से की, जिनमें साई काओ, आओ वोंग दुआन और आओ सेंग थियान शामिल हैं। प्रवाल विरंजन तब होता है जब तनावग्रस्त प्रवाल उन सूक्ष्म जीवों को खो देते हैं जो उनके पोषण में मदद करते हैं।
मछुआरों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील सोर रतनतामीन ने 2018 के फैसले के बाद बताया कि दावा केवल नकद भुगतान तक सीमित क्यों नहीं था:
पर्यावरण की स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। स्थानीय मछुआरों को कंपनी से मिलने वाली रकम की परवाह नहीं थी, बल्कि वे ऐसे सार्थक पारिस्थितिक पुनर्वास उपाय देखना चाहते थे जो गांववालों के लिए अच्छा समुद्री पर्यावरण वापस ला सकें,
समुद्री खाद्य विक्रेताओं ने भी बताया कि स्थानीय आपूर्ति घटने के कारण उन्हें दूसरे प्रांतों से उत्पाद मंगाने पड़े। इन कारोबारियों के लिए समुद्र की बहाली का मतलब था कि वे फिर से रेयॉन्ग का समुद्री खाद्य खरीद और बेच सकें। मछुआरा परिवार चाहते थे कि काम रुकने के बदले सीमित भुगतान के बजाय उनकी पकड़ भरोसेमंद हो।
एसोसिएशन ने समुद्र तल का सर्वेक्षण करने, पर्यावरणीय आंकड़े जुटाने, बचे हुए तेल को हटाने, शोध करने और समुद्री संसाधनों को बहाल करने का प्रस्ताव दिया। उसने गवर्नर से बहाली के लिए खाड़ी बंद करने की मांग भी की। इन मांगों में वे व्यावहारिक काम बताए गए थे जिनके लिए निवासी लगातार वित्तपोषण चाहते थे।
एक ही रिसाव के बाद कई मुकदमे चले
रेयॉन्ग का दीवानी मुकदमा इस आपदा से जुड़े कई कानूनी मामलों में से एक है। 2016 में बैंकॉक की दीवानी अदालत ने 302 वादियों को उनके नुकसान के आधार पर 30,000 से 50,000 बाट तक मुआवजा देने और कंपनी को समुद्री पर्यावरण के पुनर्वास का खर्च उठाने का आदेश दिया।
एसोसिएशन ने प्रशासनिक अदालतों के जरिए सरकारी एजेंसियों को भी चुनौती दी। 25 जुलाई, 2014 को, रेयॉन्ग में दीवानी मुकदमा दायर करने वाले उसी दिन, निवासियों ने प्रदूषण से निपटने और समुद्री संसाधनों की जिम्मेदारी संभालने वाले निकायों के खिलाफ मुकदमा किया। इनमें समुद्री विभाग, मत्स्य विभाग, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, समुद्री एवं तटीय संसाधन विभाग और रेयॉन्ग के गवर्नर शामिल थे।
21 जुलाई, 2020 को प्रशासनिक अदालत ने एसोसिएशन और 454 लोगों की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने पाया कि सरकारी प्रतिवादियों ने रिसाव से निपटने में अपने कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की थी। फाउंडेशन के विवरण के समय सुप्रीम प्रशासनिक अदालत में अपील लंबित थी।
दोनों अदालती रास्ते अलग-अलग प्रतिवादियों और जिम्मेदारियों से जुड़े हैं। दीवानी मामले में कंपनी से उपाय मांगे गए हैं। प्रशासनिक मामले में प्रदूषण नियंत्रित करने और समुद्री तथा तटीय संसाधनों की रक्षा करने के अपने कर्तव्य निभाने के तरीके को चुनौती दी गई है।
दूसरे तेल रिसाव से जवाबदेही की मांग फिर तेज हुई
25 जनवरी, 2022 को रेयॉन्ग में समुद्र के भीतर एक और तेल रिसाव हुआ। इस बार इसमें स्टार पेट्रोलियम रिफाइनिंग, यानी एसपीआरसी, शामिल थी। रिसाव रात 9:06 बजे माप ता फुत औद्योगिक क्षेत्र को सेवा देने वाले समुद्री स्थानांतरण केंद्र के पास शुरू हुआ। 28 जनवरी को तेल माए राम फुएंग समुद्र तट तक पहुंच गया।
यह व्यवधान ऐसे समय आया जब कारोबारी कोविड-19 के दौरान हुई मुश्किलों के बाद चंद्र नववर्ष के पर्यटकों के स्वागत की तैयारी कर रहे थे। पर्यटन से जुड़े विवरण के अनुसार कोह समेट के 150 होटलों में, जिनमें 4,000 से अधिक कमरे हैं, बुकिंग रद्द होने की दर 100% तक पहुंच गई। माए राम फुएंग समुद्र तट को आपदा क्षेत्र घोषित किया गया और 30 जनवरी को पंजीकरण शुरू होने के बाद तीन दिनों में 500 से अधिक लोगों ने सहायता के लिए पंजीकरण कराया।
रिसाव की मात्रा के एसपीआरसी के बदलते अनुमानों के बाद स्पष्ट जानकारी की मांग उठी। गवर्नर चन्ना इमसाएंग ने कहा कि कंपनी ने अनुमान लगाया था कि अधिकतम 50,000 लीटर तेल रिसा, जबकि इससे पहले सबसे खराब स्थिति में 400,000 लीटर और फिर 160,000 लीटर का अनुमान दिया गया था। उन्होंने मात्रा की जांच के लिए सरकारी, कारोबारी और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों वाली समिति बनाने की घोषणा की।
थाईलैंड एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट के पर्यावरण विशेषज्ञ सोन्थी कोचावत ने जरूरत से ज्यादा डिस्पर्सेंट इस्तेमाल करने और तेल की बूंदों से समुद्री जीवों को होने वाले नुकसान के जोखिमों पर चेतावनी दी। उनकी चिंताएं पहले की उस सामुदायिक मांग से मेल खाती थीं, जिसमें दिखाई देने वाला तेल हटाने से आगे जाकर बहाली का काम करने की बात कही गई थी।
एसपीआरसी ने यह भी बताया कि उसके पास संपत्ति और कारोबार में रुकावट के लिए 1 अरब डॉलर तथा तीसरे पक्ष की देनदारी के लिए 100 मिलियन डॉलर का बीमा था। रेयॉन्ग के निवासियों के लिए दूसरी आपात स्थिति ने 2013 के बाद उठी व्यावहारिक मांगों को फिर सामने ला दिया: समय पर सहायता, भरोसेमंद जानकारी और समुद्री पर्यावरण की बहाली के लिए संसाधन।
कानूनी लड़ाई की प्रमुख तारीखें
2013 के तेल रिसाव के बाद मुआवजे, सार्वजनिक कर्तव्यों और पर्यावरणीय बहाली को लेकर वर्षों तक मुकदमे चले। रेयॉन्ग के दीवानी मामले के प्रमुख पड़ाव ये हैं:
- 27 जुलाई, 2013: माप ता फुत के पास समुद्र में लगभग 50,000 लीटर कच्चा तेल रिसा।
- 25 जुलाई, 2014: एसोसिएशन और उसके साथ के वादियों ने रेयॉन्ग में दीवानी मुकदमा और सरकारी निकायों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई दायर की।
- 28 सितंबर, 2018: प्रांतीय अदालत ने मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन बहाली कोष की मांग खारिज कर दी।
- 22 मार्च, 2019: निवासियों ने अपील दायर की।
- 1 सितंबर, 2020: अपील अदालत ने मुआवजा बढ़ाया और अलग कानूनी आधार पर कोष की मांग खारिज कर दी।
- 22 अक्टूबर, सुबह 9 बजे: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वाचन के लिए घोषित समय।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या निवासियों को वह पर्यावरणीय बहाली का उपाय मिल सकता है जिसकी उन्होंने मांग की है। उनका प्रस्तावित कोष कंपनी के वित्त को उस संसाधन की बहाली से जोड़ता है जिसे मछुआरा परिवार, विक्रेता और पर्यटन कारोबार साझा करते हैं।
मुख्य बिंदु
- रेयॉन्ग मामले में पीटीटी ग्लोबल केमिकल के 2013 के तेल रिसाव से प्रभावित 429 वादी शामिल हैं।
- निवासियों ने कंपनी के औसत वार्षिक मुनाफे के 10% से वित्तपोषित समुद्री बहाली कोष की मांग की।
- अपील अदालत ने हर मछुआरा वादी के लिए 150,000 बाट और हर विक्रेता वादी के लिए 120,000 बाट का मुआवजा दिया, जिसमें से पहले मिली अंतरिम राहत घटाई जानी थी।
- अपील अदालत ने यह कहते हुए कोष की मांग खारिज की कि मांगे गए उपाय की अनुमति देने वाला कोई कानून नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट में अपील का केंद्र पर्यावरणीय बहाली और प्रस्तावित कोष है।






